जो लोग तत्त्वदर्शी महात्माओंके सङ्गके प्रभावसे शरीर, शरीरी (आत्मा) और आत्माके सखा परमात्माको एकसाथ अनुभव करते हैं, वे ही यथार्थ ज्ञानी हैं। किन्तु इसके विपरीत सत्सङ्गसे रहित व्यक्ति ही यथार्थ अज्ञानी हैं। ये लोग केवल शरीरको ही देखते हैं तथा नश्वर शरीरको ही ‘मैं’ समझते हैं। शरीरके नष्ट होनेपर ये लोग ऐसा समझते हैं कि सब कुछ नष्ट हो गया। किन्तु, ज्ञानी व्यक्ति शरीरके नाश होनेपर भी आत्मा और परमात्माका अस्तित्व अनुभव करते हैं। एक शरीरके नष्ट होनेपर आत्मा अपनी इन्द्रियों और सूक्ष्म शरीरके साथ किसी दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है। उसके सखा परमात्मा भी साक्षीके रूपमें जीवात्माके साथ ही विराजमान रहते हैं। जो लोग ऐसा जानते हैं, वे ही यथार्थ ज्ञानी हैं।

श्रीमद्विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर विरचित सारार्थवर्षिणी टीका

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ए घोर संसारे पड़ि कृष्णनाम लय।
सद्य मुक्त हय आर भय पाय भय।

घोर कलियुगके जीवोंके विपदका विचार कर दूरदर्शी ऋषिगण सूतगोस्वामी पादसे कहने लगे- हे सौम्य ! संसारमें आसक्त बद्धजीव किस प्रकार मुक्त हो सकते हैं? सूतजीने उत्तर दिया- इसका उपाय है भगवद् भक्तोंका संग। गंगाजलमें स्नान करनेसे पाप नष्ट तो होते हैं, किन्तु नाम-परायण भक्तके दर्शन मात्रसे समस्त पापादि दूर हो जाते हैं। भगवद् भक्तोंके संग तथा सेवाके फलस्वरूप साक्षात् रूपमें प्रेम फल प्राप्त होता है। कोई जीव मरणासन्न अवस्थामें भी यदि नाम करे तो नाम-प्रभु अपना प्रेम प्रदान करते हैं।

भजनरहस्य

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हमारे लिए क्या करणीय है और क्या अकरणीय, इसको भली भांति समझने के लिए मापदंड स्वयं वेद व्यास मुनि ने पद्म पुराण में दिया है—“हमें सदैव श्रीकृष्ण का स्मरण करना है व उन्हें कभी भूलना नहीं है।” निरन्तर श्रीकृष्ण स्मरण उपयोगी भक्ति अंगों के पालन के विषय में व श्रीकृष्ण विस्मृति कारक कर्मों के निषेध के विषय में शास्त्रों में बताया गया है। इन शास्त्र-विधान के अतिरिक्त यदि कोई क्रिया कृष्ण का स्मरण कराए तो वह स्वीकार्य व श्रीकृष्ण का विस्मरण कराए तो वह परित्यज्य है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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In the case when deities are installed as per prescript of vaiṣṇava śāstra, worship of those deities must be done without fail, as per regulation of vaiṣṇava śruti, daily.

Sreela Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj
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शास्त्रीय उपदेशानुसार जीवन गठित होने पर भगवान् के प्रति आकर्षण में वृद्धि

श्रीभगवान् ने शास्त्रों में जो उपदेश-निर्देश दिये हैं, उन्हें ही अपने जीवन में सामर्थ्य अनुसार पालन करने से और उनके अनुरूप जीवन गठित होने पर उनके प्रति आकर्षण बढ़ता है। वे ही प्रेमास्पद (प्रेम के पात्र) भगवान् हैं, उनको केन्द्र करके ही जगत में समस्त स्नेह-ममता, प्रेम-प्रीति है। उन्हीं प्रेममय भगवान् को सदैव अपने निकट रख पाने पर ही उनकी सेवा का सौभाग्य प्राप्त होता है। दिनभर में जो काम किया जाता है, वह उस परमेश्वर के उद्देश्य से होने पर ही उसकी सफलता एवं मूल्यांकन है। उसे तुम अपने कृष्ण-संसार के अन्तर्गत सेवा समझना। तुम्हारा कर्म, तुम्हारे नित्य-धर्म से बिल्कुल भी अलग नहीं है, इसे याद रखना। भगवत् सेवा-परायण जीवन ही भक्त का वैशिष्ट्य और भक्तत्व है।

श्रील भक्ति वेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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अपनी इच्छानुसार ब्रज में नहीं जाया जा सकता

सब विषयों में कृष्ण की इच्छा ही बलवती है। मेरी कुछ करने की इच्छा होने पर भी यदि कृष्ण की इच्छा न हो, तो वह निश्चय ही बदल जाएगी। उनकी इच्छा से अपनी इच्छा को मिलाना ही शरणागति या शान्ति है। समस्त प्रापञ्चिक विषय ही कृष्णलीला के अनुकूल हैं। संसार में हम सुख प्राप्त करने पर भगवान को भूल जायेंगे, इसीलिए हमारे मन की परीक्षा लेने के लिए ही दयामय भगवान ने इस प्रपञ्च जगत का निर्माण किया है। अतः इस जगत में सुखी रहने पर कृष्ण-विस्मृति अवश्यम्भावी होने के कारण ही यह (उनके द्वारा प्रपञ्च जगत का निर्माण) उनकी दया का परिचय है ।

अपनी इच्छानुसार ब्रज में नहीं जाया जा सकता । राधाकृष्ण की शुभेच्छा और उनकी कृपा होने पर ही ब्रजवास सम्भव होता है। ब्रजयात्रा में हमारी अपनी इच्छा ही कृष्ण के प्रतिकूल अनुशीलन और बाधक स्वरूप है ।

चैत्रमास में हमारी मथुरा जाने की प्रबल इच्छा होने पर भी कृष्ण की इच्छा न होने के कारण ही हमारी इच्छा में बाधा पड़ गयी। अब हमने अगले आश्विन मास में जाने की इच्छा की है। फिर भी यदि कृष्ण की इच्छा दूसरी प्रकार की हुई, तो इसमें हमारा कोई हाथ नहीं है। बल्कि उनकी इच्छा के विरुद्ध चेष्टा करने पर हमें दोषी होना ही पड़ेगा।

हरिभजन करने पर ही शरीर, मन और आत्मा- ये तीनों ठीक रहेंगे, किन्तु मेरी तरह भजन-विमुख होने पर ये तीनों प्रतिकूल होकर खड़े हो जायेंगे ।

प्रभुपाद
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‘ईश्वर भक्ति से आत्मा को सुप्रसन्नता लाभ होती है’

श्रीमद् भागवत में वर्णित, प्रत्यक्ष, अनुमान, इतिहास और शब्द-इन चार प्रमाणों में से, केवल अनुमान प्रमाण ही प्रत्यक्ष ज्ञान की स्थूल सीमा रेखा को निराश करने में समर्थ है। श्रीगौराङ्ग महाप्रभु की जन्म तिथि पर बुलाने पर, मैं एक बार पंजाब के जालन्धर नगर में गया था। वहाँ पर कुछ शिल्पपति और आयकर विभाग के परिदर्शक (Income tax officer) मुझे मिलने के लिए आए। उनमें से एक प्रमुख व्यक्ति मुझसे कहने लगे “महाराज जी! मैं आंखों से जिस वस्तु को नहीं देख सकता, हाथों से जिस वस्तु को स्पर्श नहीं कर सकता, उस वस्तु को मानता नहीं हूँ।”

दैवयोग से और-2 बातें करते हुए उस प्रमुख व्यक्ति ने कहा, ‘महाराज जी, मेरा मन बहुत चंचल है, सर्वदा ही मैं अशान्ति का अनुभव करता हूँ। आप तो साधु पुरुष हैं, आप मुझे ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे मैं मन में शान्ति प्राप्त कर सकूँ। मैंने उसी समय उन्हें मुस्कराते हुए कहा कि आप तो अपने आप को प्रत्यक्षवादी कहते हैं और अब कह रहे हैं कि मेरे मन में बड़ी अशान्ति है।

क्या आपने मन को देखा है? अथवा उसका स्पर्श किया है? यदि ऐसा नहीं कर सके हैं, तब मन स्वीकार करने की क्या आवश्यकता है? उसके उत्तर में उस व्यक्ति ने कहा, नहीं, नहीं। सुख-दुख और संकल्प-विकल्प की अनुभूति द्वारा मन का अस्तित्व स्वीकार होता है।

मैंने कहा कि अपनी बात से आपने स्वीकार कर लिया है कि वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान न होने से भी वस्तु का अस्तित्त्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि वस्तु को न देखने से भी, उसके फल से, फल का कारण मालूम हो जाता है। उसी प्रकार परमात्मा व भगवान का प्रत्यक्ष ज्ञान न होने से भी, ऐसे बहुत से विशेष लक्षण हैं कि जिनसे उनका अस्तित्त्व अस्वीकार करने का कोई उपाय नहीं दीखता। चराचर जगत में, कार्य-चेतन का कारण, कारण- चेतन अवस्थान कर रहा है। वह अनुमान-सिद्ध तो है ही, ऐसा कि उसकी कृपा से वह दर्शन-सिद्ध वस्तु के रूप में भी दिखाई देता है। यह कारण-चेतन ही परमात्मा व भगवान् है। तत्वतः परमात्मा या भगवान् की स्वीकृति के साथ-साथ ही, जीव के हृदय के तमाम अनर्थ, मूल सहित दूर हो जाते हैं एवं क्रमानुसार जीवात्मा की भगवान् के प्रति सेवा-प्रवृत्ति के रहने से वह सुनिर्मल और सुप्रसन्न होती है।

श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज