दुर्दैव लक्षण; यथा श्रीमद्भागवत (३.९.७) –

दैवेन ते हतधियो भवतः प्रसङ्गात् सर्वाशुभोपशमनाद्विमुखेन्द्रिया ये।
कुर्वन्ति कामसुखलेशलवाय दीना लोभाभिभूतमनसोऽकुशलानि शश्वत् ।।

– जो लोग सब प्रकारके अमङ्गलोंको नष्ट करनेवाले आपके श्रवण-कीर्त्तनादि प्रसङ्गोंसे इन्द्रियोंको हटाकर लेशमात्र विषयसुखके लिए दीनतावश लालायित चित्त होकर निरन्तर दुष्कर्मोंमें लगे रहते हैं, उन बेचारोंकी बुद्धि दैवने हर ली है।

तोमार प्रसङ्ग सर्व, अशुभ करये खर्व, दुर्दैव प्रभावे मोर मन।
कामसुख-लेश आशे, लोभ अकुशलायासे, से प्रसङ्गे ना कैल यतन।।

भजनरहस्यवृत्ति-ब्रह्माजी भगवानकी स्तुति करते हुए कहते हैं- जो व्यक्ति भगवत् कथा या भक्तिसे विमुख होकर तुच्छ इन्द्रिय-काम-सुखमें लिप्त होकर निरन्तर अमंगलजनक कर्म करते हैं, वे हतबुद्धि और दुर्भागे हैं। प्रह्लाद महाराज भी कहते हैं- असंयमित इन्द्रियोंके द्वारा गृहमें आसक्त जीव घोर नरकमें प्रवेश करते हैं। जो संसारमें चर्वित सुख-दुःखको बारम्बार चर्वित करते हैं, उनकी बुद्धि कभी शुद्ध नहीं होती। वेद-विहित मधुपुष्पित वाक्यों द्वारा जो कर्म काण्डमें लिप्त रहते हैं वे वेद-दीर्घ रज्जु द्वारा आबद्ध रहते हैं। कामुक जीवोंके उद्धारका एकमात्र उपाय है निष्किञ्चन परमहंस महावैष्णवकी चरणरजमें अभिषिक्त होना।

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