श्रौत पंथा ही भक्ति पथ है; यथा ब्रह्मयामले –
श्रुतिस्मृतिपुराणादि पञ्चरात्रविधिं विना।
ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरूत्पातायैव कल्पते ।।
– शुद्ध भक्तिका ऐकान्तिक भाव अर्थात् अनन्य भाव पूर्व-पूर्व महाजन पथका अवलम्बन करनेसे ही प्राप्त होता है। पूर्व महाजन पथको छोड़कर अन्य पथकी सृष्टि करनेसे ऐकान्तिक भाव प्राप्त नहीं होता। इसीलिए दत्तात्रेय, बुद्ध आदि अर्वाचीन प्रचारकगण शुद्धभक्तिको समझ न सकनेके कारण उसके कुछ-कुछ भावाभासको ग्रहणकर किसीने मायावाद मिश्र, किसीने नास्तिकता मिश्र एक-एक क्षुद्र पंथका प्रदर्शन कर उसीमें ऐकान्तिकी हरिभक्तिका आरोप किया है, परन्तु वास्तवमें उन लोगों द्वारा प्रवर्तित पंथ हरिभक्ति नहीं है- उत्पात मात्र है ।
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