श्रीमद्भागवत (३.२.१२) में श्रीउद्धव विदुरजीसे कहते हैं-

यन्मत्र्त्यलीलौपयिकं स्वयोगमायाबलं दर्शयता गृहीतम् ।
विस्मापनं स्वस्य च सौभगद्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम् ।।

– भगवानने अपनी योगमायाके द्वारा मानव लीलाओंके योग्य जो दिव्य श्रीविग्रह अवतीर्ण किया था, वह इतना सुन्दर था कि उसे देखकर सारा जगत तो मोहित हो ही जाता है, वे स्वयं भी विस्मित हो जाते हैं। वह रूप सौभाग्य और सौन्दर्यकी अन्तिम पराकाष्ठा है। उस सुन्दर अंग-कान्तिमें आभूषण भी सुशोभित हो जाते थे।

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