
अथापि ते देव पदाम्बुजद्वय-प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि।
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन् ॥
(श्रीमद्भागवत १०/१४/२९)
हे देव ! जो व्यक्ति आपके युगल चरणकमलोंका तनिक सा भी कृपाप्रसाद प्राप्त कर लेता है, उससे अनुगृहीत हो जाता है, वही आपकी सच्चिदानन्दमयी महिमाका तत्त्व जान सकता है। दूसरा कोई भी ज्ञान-वैराग्य आदि अपने साधनोंके द्वारा बहुत समय तक भी अनुसन्धान क्यों न करता रहे, वह आपकी महिमाका यथार्थ तत्त्व नहीं जान सकता ।
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श्रीराधादास्य प्राप्त रतियुक्त साधकका परिचय श्रीमद्भागवत (११.६.४६) में दिया है-
त्वयोपभुक्तस्त्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः ।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ।।
हे प्रभो! हमने आपकी धारण की हुई माला, चन्दन, वस्त्र एवं आभूषणोंको धारण किया। हम आपकी जूठन खानेवाले सेवक हैं। इसलिए हम आपकी मायापर अवश्य ही विजय प्राप्त कर लेंगे। (अतः प्रभो ! हमें आपकी मायाका डर नहीं है, डर है तो केवल आपके वियोगका) ।
तोमार प्रसाद माला गन्ध अलङ्कार।
वस्त्रादि परिया दिन यायत आमार ।।
तोमार उच्छिष्टभोजी दास परिचये।
तव माया जय करि अनासक्त हये।।
भजनरहस्यवृत्ति- कृष्ण सेवाविमुख जन निजभोगोंमें तत्पर होकर शयन, आसन, भ्रमण, आवास, क्रीड़ा आदि भोग क्रियाओंका अनुष्ठान करते हैं। यदि इसी क्रियाको भगवत सम्बन्धीय बनाकर अनुष्ठान किया जाय तो जीवका नित्य मंगल होता है। श्रीकृष्णके उपभुक्त अवशेष माल्य, गन्ध, वस्त्र, अलंकारादिके सेवनके प्रति यदि जीवका लोभ हो तो वह भवबन्धनमें नहीं बंधता। उद्धवजी श्रीभगवानसे यही कहते हैं कि आपके उच्छिष्ट प्रसादको प्राप्तकर जीव मायाके दासत्वसे मुक्त हो जाता है। हरिभक्तिविलासमें वर्णित है कि विष्णु नैवेद्य आदिमें संशय करनेवालेको अनन्तकालतक नरक वास मिलता है।
महाप्रसादकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए। कुत्तेके मुखमें गिरा हुआ महाप्रसाद भी परम पवित्र है तथा ब्राह्मणके लिए भी ग्रहणीय है।
प्राचीन विग्रह अथवा महापुरुषों द्वारा प्रतिष्ठित विग्रहोंको निवेदित प्रसाद अत्यन्त पावन है तथा ग्रहणीय है, किन्तु असंयमी व्यक्ति यत्र-तत्र विग्रह-स्थापन करके प्रसाद वितरण करते हैं, वह उचित नहीं है-
श्रुति स्मृति पुराणादि पंचरात्र विधिं बिना।
ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरूत्पातायैव कल्पते ।।
(नारदपंचरात्र)
श्रुति, स्मृति, पुराणादि एवं पंचरात्रकी विधिको छोड़कर ऐकान्तिकी हरिभक्तिका जो आचरण करता है, वह केवल उत्पातको ही उदय करनेवाला होता है। श्रीकृष्णके उच्छिष्टका नाम ‘महाप्रसाद’ है। जब भक्त उस महाप्रसादको पा लें तब उनके उच्छिष्टको महा-महाप्रसाद कहते हैं। श्रीचैतन्य चरितामृतमें श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीपाद कहते हैं-
भक्तपद धूलि आर भक्त पद जल।
भक्त भुक्त अवशेष एइ तिन महाबल ।।
इन तीनों के सेवन से श्रीकृष्णकी प्रेमा भक्ति उदय होती है- इन तीनों में महान बल है।
साधक भक्तोंके लिए भी सिद्ध भक्तके आचरणका अनुकरण विधेय नहीं है। किसी समय श्रीविनोदबिहारी ब्रह्मचारी एवं नरहरि प्रभु श्रीबंशीदास बाबाजीकी भजन कुटीमें दर्शनके लिए उपस्थित हुए। बाबाजी चायका भोग लगाकर वितरण कर रहे थे। विनोदबिहारीजी तथा नरहरि प्रभुको भी चायका प्रसाद मिला। विनोदबिहारीजीने उसे प्रणाम करके रख दिया, ग्रहण नहीं किया। नरहरि प्रभुके जिज्ञासा करनेपर श्रीविनोदबिहारीजीने दार्शनिक युक्ति देते हुए कहा कि, “महाभागवत द्वारा सेवनीय वस्तु हमारे लिए अनुपयुक्त भी हो सकती है। महादेवजीने कालकूट विषका पान किया, वे समर्थ हैं किन्तु साधारण व्यक्ति यदि विषपान करे तो मृत्यु निश्चित है। साधकके लिए तो केवलमात्र भक्ति शास्त्रोक्त विधिका पालन करना ही उचित है।”
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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यदि हम भगवान के शरणापन्न हो जायें, तभी हमारा जड़ अहंकार दूर हो सकता है। इसके अतिरिक्त जड़ अहंकार से मुक्ति का अन्य कोई उपाय नहीं है। भगवान ही एकमात्र पूर्णवस्तु एवं जीवों के एकमात्र उपास्य या आश्रय हैं यदि उनकी सेवा प्राप्त करनी हो, तो उसका उपाय यही है कि उनके विषय में जानकारी प्रदान करने वाले भगवान के प्रकाशविग्रह श्रीगुरुदेव के चरणों का ही आश्रय ग्रहण करना होगा। श्रीगुरुदेव से ही अप्राकृत शब्द – ब्रह्म वैकुण्ठ नाम (हरिनाम) प्राप्त होता है। उस नाम के आभास से ही संसार से मुक्ति हो जाती है। भगवान का नाम ग्रहण करनेवाले को पुनः मातृगर्भ में नहीं आना पड़ता । इस प्रकार आत्मकल्याण-जनक बातें एक बार सुनने से समझ में न आयें तो पुनः – पुनः सुननी चाहिए। जो शब्दब्रह्म एवं श्रुति-वेद इत्यादि का आश्रय ग्रहण नहीं करता, उसे पुनः इस संसार में आना पड़ता है ।
जो भगवान का दर्शन करा सकते हैं, जो स्वयं चौबीस घन्टे भगवान की सेवा में नियुक्त रहते हैं, उनसे ही भगवान की कथाओं को सुनना चाहिए । मठमन्दिर भगवान का सेवागार है अथवा शिक्षागार है । भगवान के भक्त भक्तिरूपी नेत्रों के द्वारा श्यामसुन्दर कृष्ण का अपने हृदय में दर्शन करते हैं, ऐसे वैष्णवों की कृपा होने पर हम भी भगवान के दर्शन अपने हृदय में कर सकते हैं। इन जड़ नेत्रों के द्वारा भगवान का दर्शन करने की चेष्टा करने पर वे इस जड़ जगत की ही कोई वस्तु दिखाई पड़ेंगे। यदि इन सांसारिक विषयों में ही हम मुग्ध हो जायें तो कदापि भगवान को नहीं जान सकते । अतः हमें बिल्कुल भी समय नष्ट न कर सम्पूर्ण रूप से समस्त सुखों के आधार स्वरूप भगवान का ही स्मरण एवं उनका ही अनुशीलन करना चाहिए । इसके फलस्वरूप भगवान के दर्शन में आने वाली बाधाएँ जैसे अनर्थ, अपराध इत्यादि दूर हो जाते हैं। कृष्ण की आराधना के द्वारा ही हमारा परम मंगल होगा। जिस क्षण हम समझ जायेंगे कि भगवान ही मेरे प्रभु हैं। उसी क्षण हमारे समस्त दुःख कष्ट दूर हो जायेंगे, तथा हमारे लिए सुविधा हो जायेगी। भगवान की कथाओं का श्रवण एवं कीर्तन करने से ही वास्तविक कल्याण होगा । भगवान को भूलकर कर्त्ता अभिमान से जो कुछ भी कर्म किये जाते हैं, उनसे अमंगल ही होता है। वर्तमान समय में हम अपने स्वरूप अर्थात् भगवत् दासत्व से पतित हो गए है तथा हमारा सम्बन्ध जड़ जगत से हो गया है। अतः हमें भगवान के साथ सम्बन्ध जोड़कर अपने नित्यस्वभाव भगवान की सेवा को प्रकट करना होगा। हम सदैव के लिए इस जगत में नहीं रह सकते, जो भगवान की सेवा प्राप्त करना चाहते हैं, उनके हृदय में जागतिक किसी भी वस्तु की कामना नहीं रहती । वे अकिञ्चन होते हैं। जगत के कल्याण के लिए एवं स्वयं अपने कल्याण के लिए भी निष्किञ्चन होकर भगवान की सेवा करनी चाहिए।
श्रीलप्रभुपाद
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विच्छेद और विरह में अन्तर
मिलन के अभाव से ही विरह की उत्पत्ति होती है। “आम तौर पर, विरह का अर्थ-विच्छेद (बिछुड़ना) समझा जाता है। एक भौतिक वस्तु को दूसरी वस्तु से अलग कर देने से विच्छेद होता है, वह ‘विरह’ नहीं है। भले ही उस विच्छेद को कई बार ‘विरह’ की संज्ञा दी जाती है, लेकिन उस विरह या विच्छेद के कारण शोक-मोह जैसा हम एक भाव देखते हैं। शोक-मोह हमें संसार के प्रति आसक्त बना देता है; लेकिन विरह हमें सांसारिक आसक्ति से मुक्ति प्रदान कर भगवत् सेवा में निष्ठा प्रदान करता है। इसीलिए हम वैष्णवों की विरह तिथि का पालन करते हैं। आपके हृदय में यही भाव जागृत हो, ठाकुर से यही प्रार्थना है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीयद् भक्तप्रियादृतगिरः सुहृदः कृतज्ञात् ।
सर्वान् ददाति सुहृदो भजतोऽभिकामा-नात्मानमप्युपचयापचयो न यस्य ।।
(चै.च. मध्य 22.96)
हे प्रभु! आप अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त वत्सल हैं। आप सत्यनिष्ठ तथा कृतज्ञ मित्र भी हैं। भला ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो आपको त्यागकर किसी और की शरण ग्रहण करेगा? आप अपने शरणागत् भक्तों की सभी इच्छायें पूर्ण करते हैं, यहाँ तक कि उनके ऋण से उऋण होने के लिए आप अपने आपको भी दे डालते हैं। फिर भी ऐसे कार्य से आप में ना तो वृद्धि होती है और ना ही कमी आती है।
परमआराध्य श्रील प्रभुपाद अपने अनुभाष्य में लिखते हैं कि दीक्षा के समय में भक्त अपने प्राकृत अनुभूति समूहों को समर्पण करके अप्राकृत सम्बन्ध ज्ञान में स्थित होता है। अप्राकृत दिव्य ज्ञान को प्राप्त करके वो अप्राकृत शरीर में कृष्ण की सेवा अधिकार को प्राप्त करता है।
भक्त किसी व्यक्ति को माया से छुड़ाकर एवं उसको कृष्ण के शरणागत बनाकर आत्मसात करते हैं। तब उसका भोग राज्य में भोक्ता अभिमान दूर हो जाता है और वह अपने अस्तित्व में नित्य कृष्ण दासत्व प्राप्त कर लेता है। तब वह सच्चिदानन्दमय स्वरूप में नित्य सेवक भाव को प्राप्त करके अप्राकृत देह में श्री कृष्ण चन्द्र की सेवा का अधिकारी होता है। भक्त के उसी समय के अप्राकृत देह के द्वारा अप्राकृत भावमय-सेवा को जो कर्मी लोग प्राकृत बुद्धि द्वारा प्राकृत मान लेते हैं, वह अपने गुरु की कृपा से वंचित हो जाते हैं।
श्रीमन् महाप्रभु ने अपनी शिक्षाओं के द्वारा सदैव यही दर्शाया है कि वैष्णव की देह दिव्य है।
श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
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“एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥”
(भा. 1/3/28)
श्रीकृष्ण समस्त अवतारों के कारण- अवतारों हैं, स्वयं भगवान् हैं। “याँर भगवत्ता हैते अन्येर भगवत्ता”, (चै० चः) अर्थात् जिनकी भगवत्ता से औरों की भगवत्ता है। ब्रह्मसंहिता में भी श्रीकृष्ण को सर्वकारण कारण परमेश्वर कहा गया है।
“ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारण कारणम्”
(ब्र० सं० 5 अध्याय 1 श्लोक)
श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु जी ने भी नन्दनन्दन श्रीकृष्ण को ही सर्वोत्तम आराध्य रूप से निर्देश किया है। जीव की हर प्रकार की इच्छित वस्तु की सर्वोत्तम परिपूर्ति एक मात्र नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की आराधना से ही हो सकती है। किन्तु ये सब बातें हम समझेंगे कैसे? जब तक हमारा (Prejudice) स्वार्थ रहेगा, तब तक हम समझ नहीं सकेंगे। भगवद् तत्त्व को समझने के लिये हमें जिस ज्ञान व अधिकार की आवश्यकता है वह ज्ञान व अधिकार न आने तक साँसारिक बहुत सी योग्यता रहने पर भी हम उसकी (उस भगवद् तत्त्व की) उपलब्धि नहीं कर पायेंगे। अधिकार प्राप्ति के लिये हम किसी भी तरह का साधन करने के लिये तैयार नहीं है। दम्भ से उन्हें नहीं जाना जा सकता, कारण, वे unchallengeable truth हैं। उनका न तो कोई कारण है, न कोई उनके समान है, उनसे अधिक होने का तो प्रश्न ही नहीं है। अतः उन भगवान् को जानने के लिये उनकी कृपा के अतिरिक्त’ किसी अन्य उपाय को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिये यदि भगवद्-तत्त्व की उपलब्धि करनी है तो प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा-वृत्ति लेकर तत्त्वदर्शी ज्ञानी गुरु के पास जाना होगा। श्रीमद् भगवद् गीता में भी ऐसा ही निर्देश दिया है:-
“तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेश्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्व दर्शिनः ॥”
(गीता – 4/34)
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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साधन-भजन में लोगों की अपेक्षा अवश्य ही परित्यज्य
लोकभय और लोकलाज के कारण हमारा साधनभजन बन्द नहीं होना चाहिए। उसे पूरी तरह से त्यागकर ही हमें साधन पथ पर चलना होगा। भजन से च्युत होना बहुत सहज बात है, किन्तु भजन-निष्ठ होना बहुत कठिन। श्रीभगवान् ही हमारे रक्षाकर्ता हैं, पालन-पोषणकर्त्ता हैं। अपराध रहित होकर श्रीनाम कर पाने से हमें किसी प्रकार का भय नहीं रहता।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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‘जय ध्वनि’ अप्रयोजनीय नहीं है। गुरु-वैष्णव-भगवान की कृपा के बिना हम उनकी सेवा प्राप्त नहीं कर सकते। अधिकतर भक्त जय ध्वनि में ध्यान दिए बिना ही ‘जय’ शब्द का उच्चारण कर देते हैं। मैंने श्री सिद्धान्ति महाराज के मठ में देखा कि जय ध्वनि देने वाले वैष्णव उच्च स्वर से नाम का उच्चारण करके जय देते थे और उनके पीछे-पीछे सब भक्त ‘जय….जय’ का उच्चारण किया करते थे।) जब मैंने पूछा कि यह क्या है? तब भक्त कहते हैं—“हमारे गुरुदेव श्री सिद्धान्ति महाराज ने ऐसा नियम बनाया है कि जो जय ध्वनि देने वाले के पीछे-पीछे जय नहीं देगा, उसे प्रसाद नहीं मिलेगा। यदि जय कहेंगे तभी प्रसाद मिलेगा, इसलिए भय के कारण सभी ‘जय……जय’ कहते हैं।” उनका अपने शिष्यों के प्रति स्नेह है, इसीलिए ऐसा करते हैं। हमने देखा कि उनके मठ में जय देने का इस प्रकार नियम है। वहाँ जैसा नियम कहीं और नहीं देखा।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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