विष्णु के बिना देवताओं की पूजा अवैधानिक है-
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
(गीता ९/२३)
श्रीविष्णुके अतिरिक्त अन्य देवताओंकी पूजा कर्मका ही अङ्ग विशेष है। यही स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्त और सखा अर्जुनको लक्ष्यकर सब जीवोंको उपदेश दे रहे हैं-हे कौन्तेय! जो सकाम भक्त स्वतन्त्रभावसे अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे अविधिपूर्वक मेरी ही उपासना करते हैं। ‘अविधि’ का तात्पर्य यही है कि, ऐसी उपासनाके द्वारा भगवत्प्राप्तिरूप नित्य फल नहीं मिलता, इसलिए वह अनित्य कर्मकाण्डके अन्तर्गत तुच्छ फलको देनेवाला है ।
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यथा श्रीमद्भागवत (१०.२९.३३)-
कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशलाः स्व आत्मन् नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम् ।
तन्नः प्रसीद परमेश्वर मास्म छिन्या आशां धृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र ।।
हे परमात्मन । आत्म हितैषी महापुरुष आपसे ही प्रेम करते हैं क्योंकि आप सभी आत्माओं के आत्मा स्वरूप हैं। अनित्य दुःखद पति-पुत्रादि की सेवा या रति करनेसे क्या प्रयोजन? आप हमपर प्रसन्न होकर कृपा करें। कमलनयन ! चिरकालसे तुम्हारे प्रति पालीपोसी आशा-अभिलाषाकी लहलहाती हुई लताका छेदन मत करो।
तुमि प्रिय आत्मा नित्य रतिर भाजन।
आर्तिदाता पतिपुत्रे रति अकारण।।
बड़ आशा करि आइनु तोमार चरणे।
कमलनयन हेर प्रसन्नवदने ।।
भजनरहस्यवृत्ति – आत्मदर्शन होनेके पश्चात् जीवका लौकिक पति-पुत्रादि से सम्बन्ध नहीं रह जाता। संसारको असार समझकर स्वाभाविक कृष्ण रतिमें निमज्जित होता है। इस स्थितिमें जीव विधि-निषेधके आधीन न रहकर रागमार्गीय भक्तिमें प्रवृत्त होकर ऐकान्तिक रूपसे श्रीराधाकृष्णका भजन करता है।
इस स्थलमें गोपियाँ श्रीकृष्णसे कह रही हैं- हमलोग पति आदि का सम्बन्ध चिरकाल के लिए छोड़कर आपके सम्मुख उपस्थित हुई हैं हमारे हृदयमें प्रेमका अंकुर उदय हुआ है। अब वह आशारूपी लता बृहद्रूप धारणकर चुकी है। हमलोग तो बाल्यावस्थासे ही आपके प्रति अनुरक्त हुई हैं तथा आपके प्रति प्रेमप्रीति निष्कपट है। आप इस प्रीति-लताका छेदन मत कीजिए। अथवा आपके आरक्तिम कमलनेत्रोंके दर्शनसे हमारा हृदय स्वाभाविक रूपसे अनुरंजित हो गया है तथा हम आपकी बिनामोलकी दासी बन चुकी हैं।
श्लेष वाक्योंके द्वारा ब्रजदेवियाँ कहने लगीं- “हे अरविन्दलोचन कृष्ण ! रात्रिकाल में जिस प्रकार कमल बन्द हो जाता है, उसी प्रकार आपके नेत्र भी अर्धमुद्रित हो रहे हैं। इस प्रकार आप हमारे रूपसौन्दर्य तथा यौवनको देख नहीं पा रहे हैं तथा इसके दर्शनसे वंचित हो रहे हैं। अतः आपका नयन धारण करना व्यर्थ है।” अथवा ब्रजदेवियाँ कहने लगीं, “आपके मनोऽभीष्टको हम समझ गई हैं। आपका अनुचित कर्मोंसे विरत होना उचित है। इसलिए हमलोग अधिक समय यहाँ नहीं ठहरेंगी। आपके हृदयमें जो वासनाप्रसून है उसका परित्यागकर दीजिए।”
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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सरल, सहज एवं श्रेष्ठ उपाय
आत्मकल्याण के लिए हरिनाम को छोड़कर अन्य उपाय नहीं है। इस संसार में जिस व्यक्ति की किसी के धर्म-कर्म में रुचि नहीं है वही हरिनाम करते हैं। हरिनाम संकीर्तन ही एकमात्र उपाय है। इस हरिनाम के सिवा वैकुण्ठ जाने का अन्य कोई उपाय नहीं है। हरिनाम संकीर्तन ही एकमात्र लक्ष्य – कृष्णप्रेम को प्राप्त करने का उपाय है। हरिनाम संकीर्तन के अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है। नाम संकीर्तन के माध्यम से जो लक्ष्य (कृष्णप्रेम) प्राप्त होता है, उसके अतिरिक्त जीवों के लिए और कोई श्रेष्ठ लक्ष्य हो ही नहीं सकता। इसीलिए शास्त्र कह रहे हैं-
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ।।
अर्थात् इस कलियुग में आत्मकल्याण के लिए हरिनाम के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है, नहीं है, नहीं है। इस श्लोक में हरिनाम को ही निश्चित उपाय बताने के लिए ही तीन बार ‘नहीं हैं’ शब्द का प्रयोग हुआ है।
श्रीलप्रभुपाद
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भोगमय बुद्धि का त्याग नहीं होने से धाम परिकमा नहीं होती ब्रज की तृण-गुल्म (झाड़ी) – लता (बेल) आदि सभी वस्तुएँ चिन्मय और भगवत् सेवा के उपकरण हैं। इसलिए धाम परिक्रमा करते समय यदि हम उन्हें अपने इन्द्रियतर्पण में लगाने का प्रयास करते हैं तो परिक्रमा न होकर इससे अपराध ही संचय होगा। इसीलिए तीर्थयात्रियों से अनुरोध है कि, वे वृक्ष-बेल इत्यादि की अंगहानि (तोड़ना) न करें। यहाँ का प्रत्येक कुण्ड ही तीर्थ-स्थान है। इसीलिए हम साधारण तालाब जैसे इनका इस्तेमाल न करें। भोगमय बुद्धि का परित्याग नहीं करने पर यथार्थ रूप से धाम की परिक्रमा नहीं होगी।
हंम लोग जिस स्थान पर अभी हैं- इसका नाम मथुरापुरी है। श्रीकृष्णचन्द्र ने इसी स्थान पर आविर्भूत होकर निर्विशेषवाद के प्रतीक-कंस को ध्वंस किया था। कर्मजड़-स्मार्तवाद का प्रतीक रजक भी इसी स्थान पर ध्वंस हुआ था। निर्विशेषवादीगण- अहंग्रहोपासक हैं; ‘अन्त में मैं ही प्रभु बनूँगा’- यही उनका विचार है। शक्तिमान को रखकर शक्ति को ध्वंस करने की कोशिश करना और फिर शक्ति को रखकर शक्तिमान को विनाश करने का विचार – दोनों ही आसुरिक प्रवृत्तियाँ हैं। भोगी, त्यागी, ज्ञानी-सम्प्रदाय मूल रूप से सभी शक्ति और शक्तिमान् तत्त्व की अवमानना करने वाले हैं- भगवान् इन्हें वंचित करके भक्तों के सामने अपना स्वरूप प्रदर्शित करते हैं।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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तथाहि (पद्मपुराणे, ब्रह्म खण्डे)
“सतां निन्दा नाम्नः परममपराधं वितनुते।
यतः ख्यातिं यातं कथमु सहते तद्विगरिहाम् ।।
सज्जनों की निन्दा करना श्रीहरिनाम के निकट परम अपराध का विस्तार करती है। जिन सत्पुरुषों के माध्यम से नाम की जगत् में प्रसिद्धि हुई है, उनकी निन्दा नाम कैसे सहन कर सकता है?
भाष्य-स्मृति कथित सभी प्रकार के प्रायश्चित की अपेक्षा नाम ही पाप हरण करने का शक्तिशाली उपाय है। परन्तु यदि नाम लेने वाले व्यक्ति के प्रति किसी का अपराध हो जाता है तो उसका उद्धार करने की शक्ति नाम में भी नहीं है। नाम अपराधों में साधु-निन्दा प्रथम अपराध है। नाम अपराध होने से नामाभास एवं शुद्धनाम ग्रहण करने पर भी फल की प्राप्ति की संभावना नहीं है।
जिस सभा में वैष्णवों की निन्दा होती है, वहाँ धर्म के सभी आचरण रहने पर भी सभा नष्ट हो जाती है। यदि संन्यासी की सभा में भी वैष्णव निन्दा रूपी निन्दनीय कर्म होता है, तो उस सभा को शराबियों की सभा से अधिक अधार्मिक जानना चाहिये। किसी समय शराबी का तो कल्याण हो सकता है किन्तु परनिन्दक को कभी भी अच्छी गति नहीं मिलती है।
श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
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“प्रणयी-भक्तों के साथ धाम में जाने पर वहाँ उनके श्रीमुख से निःसृत हरिकथा-कीर्तन के श्रवण से ही धाम-परिक्रमा का फल होता है अन्यथा नहीं।”
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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श्रीगुरु-भगवान् भक्त को कभी धोखा नहीं देते
तुम भक्ति-शून्य नहीं हो, अपराधी और पाखण्डी भी नहीं हो। जो लोग श्रद्धापूर्वक श्रीनाम ग्रहण करते हैं, श्रीहरि-गुरु-वैष्णवों की सेवा में तत्पर हैं, उन्हें श्रीभगवान् हरिभजन के समस्त अधिकार और योग्यताएँ प्रदान करते हैं। उनकी कृपा के द्वारा ही हम उनको जान सकते हैं और समझ सकते हैं। तुम वृक्ष की डालियों और पत्तों पर जल नहीं देकर वृक्ष के मूल में ही पानी दे रही हो। इससे तुम्हें अभीष्ट (मनोवांछित) फल प्राप्त होगा। गुरु-वैष्णवों के प्रति जो लोग स्नेह्प्रीतिशील हैं, उन्हें श्रीभगवान् की कृपा अवश्य ही प्राप्त हुई है। श्रीभगवान् ही तुम्हारे प्रभु, सखा, पुत्र और पति हैं। तुम अपने अभीष्ट आराध्य के रूप में उनकी सेवा करना। तुम्हारा जागतिक दुःख कष्ट नहीं रहेगा-संसार के विषयभोग सुख को भूलकर प्रेममय सेवा में आत्म-नियोग कर (अर्थात् स्वयं को लगा) सकोगी। श्रीगुरु भगवान् भक्त को कभी नहीं भूलते हैं, और किसी को कभी धोखा भी नहीं देते हैं।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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वैष्णव – धर्म तो परमहंसों का धर्म है
एक हंस में ये गुण होता है कि यदि उसे दूध और पानी मिलाकर दे दिया जाए तो वह बड़ी आसानी से दूध – दूध पी जाता है और पानी को छोड़ देता है। इसी प्रकार एक सच्चा वैष्णव, जो कि परमहंस होता है, वह भी इस संसार में ऐसे ही रहता है। उसके सम्पर्क में आने वालों के गुणों को तो वह देखता है पर उनके अवगुणों की ओर वह देखता भी नहीं, जबकि माया-बद्ध जीव भगवान की त्रिगुणात्मिका माया के सत्, रज व तमोगुण के द्वारा मोहित रहता है; इसलिए वह गुणग्राही नहीं होता। वह तो केवल-मात्र दूसरों के दोष ही ढूँढता रहता है। अतः ये जीव, जब तक वैष्णवों की व गुरु की श्रेष्ठता को नहीं समझ पाता, तब तक सम्भावना ही नहीं है कि वह गुरु – वैष्णवों के सम्पर्क में आये या उनका अन्तरंग बन सके।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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