बहिर्मुख कर्म की निन्दा
नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते।
न तीर्थपदसेवायै जीवन्नपि मृतो हि सः ॥
(श्रीमद्भागवत ३/२३/५६)
इस संसारमें जिस पुरुषके कर्म, धर्म, अर्थ तथा कामरूप इन तीनोंके उद्देश्यसे अनुष्ठित नहीं होते, उनका वह कर्म निष्काम होकर कृष्णेतर विषयोंमें यदि वैराग्य उत्पत्र नहीं करता है और वह वैराग्य यदि भगवानकी सेवामें पर्यवसित नहीं होता है, तो वह पुरुष जीते जी ही मुर्देके समान है ।
* * * * * * * * * * * * * * * *
यथा श्रीमद्भागवत (४.२२.३९)-
यत्पादपङ्कजपलाशविलासभक्त्या
कर्माशयं, ग्रथितमुद्यथयन्ति सन्तः ।
तद्वन्न रिक्तमतयो यतयोऽपि रुद्ध-
स्रोतोगणास्तमरणं भज वासुदेवम् ।।
श्रीसनत्कुमार पृथु महाराजको उपदेश करते हुए कहते हैं- ‘भगवद्भक्त जिनके चरणकमलोंके अङ्गुलिदलकी छिटकती हुई छटाका स्मरण करते ही कर्म वासनासे बनी हृदय ग्रन्थिका अनायास ही छेदन कर डालनेमें समर्थ हैं, भक्तिरहित निर्विषयी योगीगण इन्द्रियोंको संयम करके भी वैसा नहीं कर पाते। अतएव ज्ञान योगादि चेष्टाओंको छोड़कर वासुदेव कृष्णका भजन करो।
प्रत्याहारे रुद्धमति योगेश्वरगण।
कदाच करिते पारे याहा सम्पादन।।
सेइ कर्माशय ग्रन्थि काटे साधुगण।
यार कृपाबले, लह ताहार शरण।।
भजनरहस्यवृत्ति- निर्विशेषवादी ज्ञानीजन अत्यन्त कठिन साधनोंके द्वारा भी इन्द्रियोंको वशीभूत नहीं कर पाते हैं किन्तु भक्तजन अत्यन्त सहज सरल रूपमें, परम करुणामय भगवानके चरणकमलोंके कमलपत्र सदृश अङ्कलियोंकी कान्तिका स्मरणकर महाबलवान इन्द्रियोंको वशीभूत कर ध्यानस्थ हो जाते हैं। यही ध्यान तथा ध्येय श्रीभगवान, ये दो वस्तु नित्य हैं। दूसरी ओर अद्वैतवादी यह कहते हैं, ‘साधकानाम् हितार्थाय ब्रह्मणीरूप कल्पते’ अर्थात् ब्रह्म निराकार हैं। परन्तु साधकोंके कल्याणके लिए अरूप ब्रह्ममें रूपकी कल्पना की गयी है। इन काल्पनिक विष्णु, शिव, शक्तिदुर्गा, सूर्य और गणेशकी आराधनासे चित्तशुद्धि होनेपर ब्रह्ममें सायुज्यमुक्ति मिलती है। किन्तु वस्तुतः यह धारणा शास्त्र-विरुद्ध और कोरी कल्पना है। ‘विलासभक्त्या’ का तात्पर्य है कि साधक श्रीकृष्णके श्रीअंगका स्मरण कर उद्वर्तन, तैलमर्दन, स्नान आदि नानाविध सेवा परिचर्याका चिन्तन करते हैं। व्रजरस विदग्ध श्रीकृष्णकी अङ्कलियोंका चिन्तन अर्थात् ‘व्रजदेवियोंके साथ निकुञ्ज विलासमें श्रीकृष्णके चरणद्वयकी अङ्गुलियाँ कुंकुम रंगसे रंजित हो गई हैं’, इस अप्राकृत लीला चिन्तनसे साधककी सारी हृदरोग ग्रंथियाँ सरल-सहज रूपमें छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। अविद्याग्रस्त निर्विशेषवादियोंको ये सब भाव कैसे प्राप्त होंगे, वे तो भगवानकी नित्यता भी स्वीकार ही नहीं करते तथा उनका अप्राकृत रूप भी स्वीकार नहीं करते। यद्यपि वे अपनेको मुक्त समझते हैं, किन्तु यथार्थतः वे मुक्त नहीं।
ज्ञानी जीवन्मुक्त दशा पाइनु करि माने।
वस्तुतः बुद्धि शुद्ध नहे कृष्ण भक्ति बिने ।।
(चै. च. सनातन शिक्षा)
अपराधी निर्विशेष-ज्ञानियोंकी इन्द्रिय संयम चेष्टा वृथा है। बाह्य रूपसे संयम दिखनेपर भी फल्गु नदीकी भाँति वासनारूपी कलुषित धारा अन्तरमें प्रवाहित होती है। सौभरि ऋषि हजारों वर्षोंतक कठोर साधनकरके भी विषय वासनासे निर्मुक्त नहीं हुये। पक्षान्तरमें शुद्धभक्त अम्बरीष महाराजके संगमें भगवानकी सेवा द्वारा वे अति सहज रूपमें संसारसे मुक्त हुये। भक्तजन भक्तिके प्रभावसे अविद्याकी जड़ ही काट देते हैं। उनकी समस्त इन्द्रियाँ भगवद् सेवामें नियुक्त रहती हैं। भगवत् सौन्दर्यामृत आस्वादनके द्वारा वे इन्द्रियोंको सार्थक बनाते हैं। अतएव वृथा इन्द्रियोंका दमन करनेकी चेष्टाका परित्यागकर, नित्य चिदानन्दमय श्रीब्रजेन्द्रनन्दनका भजन करना ही श्रेयस्कर है।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
* * * * * * * * * * * * * * * *
मैं कर्ता हूँ, ऐसी दुर्बुद्धि श्रीगुरुदेव की कृपा से दूर होती है। मैं भगवान का सेवक हूँ-ऐसा शुद्ध अभिमान श्रीगुरुदेव की कृपा से ही आता है। जागतिक अभिमान, अहंकार, अविचार, कुविचार इत्यादि उनकी कृपा एवं उनकी सेवा से ही दूर होते हैं। मैं सालों साल तक श्रीगुरुदेव की पूजा करने का पक्षपाती नहीं था । श्रीगुरुदेव की सेवा ही मेरा एकमात्र कर्तव्य है, इसे में श्रीगुरुदेव की कृपा से ही समझ पाया । अन्धे व्यक्ति का अनुगमन न कर नेत्रयुक्त श्रीगुरुदेव का अनुगमन अर्थात् उनकी पूजा करनी चाहिए। श्रीगुरुदेव ही मेरे एकमात्र बन्धु, आत्मीय और रक्षक हैं, इसे में उनकी कृपा से ही समझ पाया । श्रीगुरुदेव के चरणकमलों का दर्शन करने के पश्चात् ही मेरी ऐसी बुद्धि हुई कि श्रीगुरुदेव की सेवा के अतिरिक्त मेरे लिए और कोई कर्त्तव्य नहीं है। श्रीगुरुदेव भगवान के अति प्रिय सेवक हैं। जब भगवान के निज जन उन श्रीगुरुदेव ने मुझे अहंकार से बचाने के लिए कृपापूर्वक नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की सेवा की शिक्षा दी, तभी मैं जान पाया कि कृष्ण की इन्द्रियों को तृप्त करने के अतिरिक्त जीवों के लिए कोई अन्य कर्तव्य नहीं है नन्दनन्दन ही जीवों के एकमात्र उपास्य हैं। वे ही जीवों के जीवनस्वरूप, भूषण स्वरूप एवं सर्वस्व हैं । श्रीगुरुदेव नन्दनन्दन के अत्यन्त प्रिय हैं।
श्रीलप्रभुपाद
* * * * * * * * * * * * * * * *
ब्रज और ब्रजवासी की संज्ञा
श्रील ठाकुर महाशय के इस कीर्त्तन का तात्पर्य समझना बहुत ज़रूरी है। श्रीमन् महाप्रभु ने कहा है, “आनेर हृदय मन, मोर मन वृन्दावन।” भावना का अतिक्रम करके विशुद्ध सत्त्व से उज्ज्वलित हुये हृदय में जब दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर आदि मुख्य रस प्रकाशित होते हैं तो रसिकेन्द-चूड़ामणि श्रीकृष्ण का प्रीतिविधान संभव होता है। ‘वन’ से यहाँ वास्तविक रूप में सत्वोज्ज्वल हृदय को ही समझा जाता है यहाँ भावना-वर्त्म (अर्थात् कष्ट कल्पना) के मार्ग-रूप का कोई स्थान नहीं है। मनोधर्म त्याग नहीं कर सकने पर कभी भी अप्राकृत रस का अधिकारी नहीं हुआ जा सकता है। द्वादश-वन में रसलीला, उनका एकछत्र अधिपति “रसः वै सः” पुरुष श्रीबजेन्द्रनन्दन ही हैं। जो लोग उन वनों में या ब्रज में निवास करते हैं वे ही वास्तविक ब्रजवासी हैं। श्रीकृष्ण को सबसे अधिक प्रसन्न कैसे किया जा सकता है, उसे वे ब्रजवासी ही ठीक ढंग से जानते हैं। गो, वेत्र (बेंत), विषाण (सींग का बना बिगुल), वेणु, रक्तक-चित्रक (श्रीकृष्ण के दास्य-रस के भक्त), सुदाम-वसुदाम (श्रीकृष्ण के सखा), नन्द-यशोदा, ब्रजवासीगण – सभी विभिन्न रसों में उन अद्वयज्ञान श्रीकृष्ण की ही इन्द्रिय तर्पण करने में व्यस्त हैं। किस प्रकार से भगवान को सर्वतोभाव से सुखी किया जा सके- यही उनका एकमात्र लक्ष्य है। इस प्रकार नित्यसिद्ध ब्रजवासी के आनुगत्य में ही हमें ब्रज में निवास करना चाहिए। शास्त्रों में ‘ब्रजवासी’ किसे कहा गया है? चिद् विचारों से युक्त अनन्य भगवत् भक्त ही वास्तविक ब्रजवासी हैं।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
भगवान् को प्राप्त करने के लिये अलग-अलग उपायों का अवलम्बन करते हुए कर्म योगी, ज्ञान योगी, तथा भक्ति योगी अपना साधन तो करते हैं। परन्तु भक्ति के बिना कोई भी सर्वश्रेष्ठ वस्तु को प्राप्त नहीं कर सकता। दूसरे-2 सभी योग मार्ग भक्ति पर निर्भर करते हैं परन्तु भक्ति किसी भी अन्य मार्ग की उपेक्षा नहीं रखती।
श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
निष्कपट सेवा ही साधुसंग तथा श्रेष्ठसंग की प्राप्ति का अचूक उपाय है
श्रीभगवद-प्रेम की प्राप्ति के लिये जो मठ का आश्रय लेते हैं वे त्याग या भोग की कसरत में अपने मूल्यवान समय और शक्ति का अपव्यय नहीं करते। वे तो श्रीभगवद् प्रीति के अनुकूल और प्रतिकूल को समझकर शास्त्र और महाजनों के द्वारा बताये गये रास्ते के अनुसार विषयों को ग्रहण करते हैं व त्याग करते हैं। वास्तविकता भी यही है कि युक्त वैराग्य ही भक्ति का सहायक है। केवल चिन्मात्र बोध या विषयों में विरक्ति ही भक्ति का हेतु नहीं है। शुद्ध-भक्त का संग ही भक्ति का हेतु एवं पोषक है। भक्ति-साधना करने वाले जिस किसी भी वर्ण या आश्रम में रहकर उस-उस वर्ण व आश्रम के अभिमान को छोड़कर शुद्ध भक्तों के संग के द्वारा भक्ति को पुष्ट करते हुए धीरे-धीरे श्रीभगवद्-प्रेमानन्द को प्राप्त कर सकते हैं। निष्कपट सेवा ही साधुसंग तथा श्रेष्ठसंग की प्राप्ति का अचूक उपाय है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
अन्तर्यामी श्रीगुरु-भगवान् साधक की सभी प्रार्थनाओं से अवगत
भक्तों के द्वारा स्वयं को ‘पाषाण हृदय’ (पत्थर दिल) कहने पर भी उन पर श्रीगुरु-भगवान् की असीम कृपा होती है। उनकी इस अपार्थिव दया और स्नेह-ममता की काई तुलना नहीं है। उनकी अहैतुकी कृपा की बात को स्मरण कर भक्तगण एकान्त में मौन होकर व्याकुल क्रन्दन करते रहते हैं। वे अन्तर्यामी होने के कारण ही साधक साधिका की सम्पूर्ण दीनता और प्रार्थना से अवगत होते हैं एवं साक्षात् रूप से और परोक्ष रूप से (directly and indirectly) उन्हें पूरा करते हैं। अनुगत व्यक्तियों के प्रति भक्त और भगवान् की असीम कृपा है; उनकी कृपादृष्टि से ही साधन-भजन में सिद्धिलाभ और श्रीनाम के प्रति निष्ठा प्राप्त होती है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
दो मार्ग हैं 1) प्रवृत्ति मार्ग—गृहस्थ जीवन (स्व-वर्ण-विवाह) व 2) निवृत्ति मार्ग—गृह त्यागी जीवन। साधारणतः लोग प्रवृत्ति मार्ग के अधिकारी हैं। जिन्होंने निश्चय कर लिया है कि वे गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं करेंगे, वे ही त्यागी जीवन के अधिकारी हैं।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
* * * * * * * * * * * *