बृहद विष्णु पुराण

नाम्नो हि यावती शक्तिः पापनिर्हरेणे हरेः।
तावत् कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी नरः ।।

हरि का एक बार नाम उच्चारण करने से पापी मनुष्य जितने पाप करता है उससे भी अधिक पापों के फलों का निवारण करता है।

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श्रेयः और प्रेयः- दो मार्ग हैं-

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमान् वृणीते ॥

(कठ १/२/२)

श्रेयः और प्रेयः- मनुष्य इन दोनों मार्गोंका ही आश्रय करते हैं। किन्तु बुद्धिमान् व्यक्ति इन दो तत्त्वोंसे उचितरूपसे अवगत होकर पहला मुक्तिका कारण, दूसरा बन्धनका कारण है-इस प्रकार सोचते हैं। वे प्रेयः का परित्याग कर श्रेयः को ग्रहण करते हैं और विवेकहीन मन्द व्यक्ति योग अर्थात् अप्राप्त वस्तुका लाभ और उसकी सुरक्षा अर्थात् प्राप्त वस्तुका संरक्षण-इन दोनों प्रेयःकी ही प्रार्थना करते हैं ।

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अहेतु की भक्तिकी उन्नतिका लक्षण

यथा श्रीमद्भागवत (११.२.४२)-भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र चैष त्रिक एककालः ।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नतः स्युस्तुष्टिः पुष्टिः क्षुदपायोऽनुघासम् ।।

भोजनकारी व्यक्ति प्रति ग्रासपर तुष्टि (तृप्ति सुख), पुष्टि (जीवन सुख लाभ) और क्षुधा निवृत्तिका अनुभव करता है। जिस प्रकार ये तीनों क्रियाएँ एक साथ होती हैं, ठीक वैसे ही शरणागत भक्त भी भक्ति करनेके साथ-ही-साथ परेशानुभव अर्थात् अपने आराध्यकी अनुभूति करता है, उसका सम्बन्ध अपने आराध्यसे पुष्ट होता है और इस अनित्य संसार एवं अनित्य सम्बन्धोंके प्रति उसे विरक्ति होने लगती है।

भक्तजने सममाने युगपदुदय।
भक्ति ज्ञान विरक्ति तिन जानह निश्चय ।।
चिदचिदीश्वर सम्बन्धज्ञाने-ज्ञान।
कृष्णेतरे अनासक्ति विरक्ति-प्रमाण ।।
येरूप भजने तुष्टि पुष्टि प्रति ग्रासे।
क्षुधार निवृत्ति एइ तिन अनायासे ।।

भजनरहस्यवृत्ति- भगवत् माधुर्यका अनुभव होनेपर साधकमें जो लक्षण लक्षित होते हैं, उन्हींका इस श्लोकमें वर्णन है। इस अवस्थाके भक्तोंमें भगवत् सेवा प्राप्ति, भक्तियुक्त तत्त्वज्ञानका अनुभव तथा कृष्णेतर वस्तुओंके प्रति वैराग्य ये तीनों ही एक साथ परिलक्षित होते हैं। साधकका वैराग्य उन भोग्य पदार्थोंसे होता है, जिनकी श्रीकृष्ण सेवामें अनुपयोगिता है। श्रीकृष्ण सेवाके उपयोगी उपकरणोंसे वैराग्य नहीं होता तथा न ही भोग विचार होता है, इसलिए वह वस्तु त्यागने योग्य भी नहीं होती।

जब श्रील सनातन गोस्वामीपादजीने दैन्यके कारण अपने शरीरको रथके पहियेके नीचे आकर त्यागनेका संकल्प किया, तब सर्वान्तर्यामी श्रीगौरसुन्दरने उन्हें उपदेश दिया कि देह त्यागसे कृष्ण प्राप्ति नहीं होती। एकमात्र भजन अर्थात् श्रील गुरुजीकी मनोऽभीष्ट सेवा द्वारा कृष्णकी प्राप्ति होती है।

साधक जब श्रीगुरुके पादपद्ममें शरणागत होता है, उस समय उसकी देहपर गुरुजीका अधिकार हो जाता है। इसलिए उस देहको गुरुकी सम्पत्ति मानकर उसकी रक्षा करना आवश्यक है। इसी भावनाके अनुसार ही व्रजदेवियाँ श्रीकृष्ण सेवाके लिए वस्त्र, अलंकार तथा सौंदर्य प्रसाधन, श्रृंगारादिसे अपने शरीरको विभूषित करती हैं।

जितने परिमाणमें भगवद् अनुभूति होती है, उतने ही परिमाणमें जड़ विषयोंके प्रति उदासीनता उत्पन्न होती है। यही उदासीनता भगवद् सेवा में अधिकार प्राप्त कराती है।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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भगवान की इच्छा से हम कहीं भी क्यों न रहें, यदि वहीं पर भगवान की कथाओं का हम अनुशीलन करते हैं, तो समस्त प्रकार के सांसारिक कार्य एवं सांसारिक बातों में भी हमें भगवान की कृपा, भगवान की स्मृति एवं भगवान की भक्ति का अनुभव होगा। भगवान अपने भक्तों को जिस किसी भी अवस्था में रखकर सुखी हों, वे भक्त उसी अवस्था में रहकर अपने दुःखों को भूलकर भगवान का गुणगान करते हैं। साधुओं का संग एवं हरिकथा आलोचना की करते-करते हमारे हृदय में भगवान की सेवा की प्रवृत्ति अवश्य ही उदित होगी। इसी अवस्था में हमें भगवान का स्मरण रहेगा। हमारी परीक्षा लेने के लिए भगवान सदैव ही आड़ में छिपे रहते हैं। प्रत्येक घटना के पीछे भगवान की कृपा अनुभव करने पर किसी प्रकार का दुःख-कष्ट हमें व्यथित नहीं कर सकेगा ।

श्रीलप्रभुपाद

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गुरुसेवा के बदले उत्साह पाने के नाम पर, प्रतिष्ठा की कामना गुरुसेवा या शरणागति का लक्ष्ण नहीं

हमने कई बार देखा है कि, कई लोग लाभ-पूजा-प्रतिष्ठा की कामना करते हुए पाठ, कीर्त्तन, भाषण, प्रबंध आदि-लेखन, ग्रंथों का प्रकाशन आदि कार्यों में बहुत उत्साह दिखाते हैं। यदि कुछ पाने की संभावना या प्रशंसा-स्वरूप प्रतिष्ठा भी न मिले तो हमसे और गुरुसेवा नहीं हो पाती है। हम हमेशा ही गुरुदेव के पास उत्साह पाने के नाम पर प्रतिष्ठा की कामना किया करते हैं। यह वास्तविक गुरुसेवा और शरणागति का लक्षण नहीं है।

गुरुदेव में जो जितने तक आसक्त हैं, वे उतने ही गुरुसेवक हैं। हम महाजन-पदावली में देखते हैं-“विषये जे प्रीति एबे आछ्ये आमार। सेइमत प्रीति हउक् चरणे तोमार।” (अर्थात् धन-सम्पत्ति विषयादि में मेरी जितनी प्रीति है, उतनी प्रीति तुम्हारे चरणों के प्रति भी हो।) मायिक विषयों को अपना समझकर उसके प्रति इतना आसक्त हो जाते हैं कि, उनसे एक क्षण भी दृष्टि हटाने पर कष्ट का बोध होता है। हरि-गुरु-वैष्णवों की सेवा की वस्तुओं के प्रति ‘अपनापन’ न रहने से भगवान की कृपा प्राप्त करने की सम्भावना कहाँ है? ‘हरि-गुरु-वैष्णवों की व्यवहार की वस्तुएँ नष्ट होती हैं तो हो जायें लेकिन मेरी चीज़ ठीक रहे’- इस प्रकार की बुद्धि सेवा-बुद्धि नहीं है। जगत की सभी वस्तुएँ भले ही ध्वंस हो जाएँ परन्तु हरि-गुरु-वैष्णव सेवा की वस्तुओं को कणमात्र भी मैं ध्वंस नहीं होने दूँगा-यही है असली सेवक का लक्षण।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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वैष्णव चरित्र, सर्वदा पवित्र, जे निन्दे हिंसा करि।
भकति विनोद ना सम्भाषे तारे, थाके सदा मौन धरि ।।

वैष्णव-चरित्र सदा ही पवित्र है। जो द्वेष परवश होकर निन्दा करता है, भक्ति विनोद ठाकुर उसके साथ सम्भाषण नहीं करके मौन रहते हैं।

नाम में आश्रय रखने वाले वैष्णव की निन्दा से जीव नाम के रसास्वादन से वंचित होकर कामिनी और काँचन के वशीभूत होकर आत्मविनाश करता है। इस तथ्य को समझने के लिये शास्त्रों में दृष्टान्तों का अभाव नहीं है।

स्कन्ध पुराण में मार्कण्डेय और भागीरथ सवांद में कहा गया है-

निन्दां कुर्वन्ति ये मूढ़ा वैष्णवानां महात्मनाम्।
पतन्ति पितृभिः सार्ध महारौरव संज्ञिते ।।
हन्ति निन्दति वै द्वेष्टि वैष्णवान्नाभिन्दति ।
क्रधश्यते धति नोऽर्श दर्शने पतनानि घट ।।

(हरि-भक्ति-विलास 10.311-312)

जो मूढ़ वैष्णव महात्माओं की निन्दा करते हैं, वे लोग अपने पितरों सहित महारौरव नामक नरक में गिरते हैं। जो व्यक्ति वैष्णव पर प्रहार करता है, उनकी निन्दा करता है, उनसे द्वेष करता है, उनका सम्मान नहीं करता है, उनको क्रोध करता है या फिर उनके दर्शन से प्रसन्न नहीं होता है, उसे नरकगामी होना पड़ता है।

श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज

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ग्रहण करने से पूर्व प्रदान करने का आदर्श

श्रीगुरु महाराज जिस किसी भी स्थान पर प्रचार के उद्देश्य से जाते थे, वे अपने साथ सदैव जल लेकर जाते थे। गन्तव्य स्थान पर पहुँचते ही वे कथा-कीर्त्तन इत्यादि प्रारम्भ कर देते थे तथा उसके पश्चात् ही आयोजक गण के द्वारा परोसी गई किसी वस्तु को ग्रहण करते थे, अन्यथा नहीं। यदि कहीं पर जाकर किसी कारणवश सर्वप्रथम हरिकथा, कीर्त्तन इत्यादि का सुयोग नहीं मिलता था और उसी बीच यदि उन्हें प्यास लगती तो वे अपने साथ लाए हुए जल को ही ग्रहण करते, आयोजक के द्वारा दिए गए जल को नहीं। वे कहा करते थे, “हम भक्त हैं और हमारी सम्पत्ति एकमात्र श्रीहरि, गुरु एवं वैष्णव हैं। यदि हम आयोजक को हरिकथा, कीर्त्तन के माध्यम से सर्वप्रथम श्रीहरि-गुरु-वैष्णव प्रदान नहीं करेंगे, तब इनके द्वारा प्रदत्त किसी भी वस्तु को ग्रहण करने से हम इनके ऋणी बनेंगे। श्रील प्रभुपाद ने निज आचरण द्वारा यह अतिविशिष्ट शिक्षा हमें प्रदान की है। एक बार जब वे कासिम बाजार के राजा के निमन्त्रण पर वहाँ हरिकथा परिवेशन के उद्देश्य से गए परन्तु तीन दिन तक हरिकथा करने का सुयोग प्राप्त नहीं हुआ, तब उन्होंने पूर्णतया उपवास किया एवं केवल मात्र एक तुलसी के दल को ही ग्रहण किया। श्रीरूपगोस्वामी ने भी स्वरचित उपदेशामृत (श्लोक संख्या ४) में ‘ददाति’ अर्थात् पहले देना और तत्पश्चात् ‘प्रतिगृह्णाति’ अर्थात् ग्रहण करने का विचार ही प्रदर्शित किया है।”

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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साधन-भजन के द्वारा ही श्रीगुरु-भगवान् की महिमा की अनुभूति

सेवा-विहीन जीवन व्यर्थ है, इसीलिए समर्पितात्म (शरणागत) भक्त अपने जीवन का सम्पूर्ण दायित्व श्रीगुरु-भगवान् के श्रीचरणों में समर्पित करते हैं। वे जानते हैं कि, श्रीभगवान् मेरे हैं और मैं श्रीभगवान् का हूँ। सद्‌गुरु के माध्यम से ही प्रेममय श्रीभगवान् का प्रकाश होता है; श्रीभगवान् जीव की मनोवांछित सभी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं-वे कंगालों के बन्धु हैं। जिनका श्रीभगवान् के प्रति प्रचुर भक्तिविश्वास नहीं है किन्तु सरलता है, उनके साधन भजन में कातस्भाव आ जाता है; वे श्रीगुरु और भगवान् की अहैतुकी कृपा प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। जो लोग गुरु-वैष्णव-भगवान् की श्रद्धापूर्वक सेवा-पूजा के द्वारा साधन-भजन करते हैं, वे प्रत्यक्ष रूप से ही इनके महिमा-महात्म्य को अनुभव कर सकते हैं।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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सृष्टि के अणु-चैतन्य जीवसमूह, जब अपनी सीमित स्वतंत्रता के अपव्यवहार के फलस्वरूप, श्रीकृष्ण से विमुख हो जाते हैं तब भगवान की त्रिगुणमयी माया से आच्छादित हो जाते हैं व इस जगत में निक्षेपित किये जाते हैं।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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