भागवत पारमहंसी संहिता है-

अनर्थोपशमं साक्षाद्भक्तियोगमधोक्षजे ।
लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वत संहिताम् ॥
यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपुरुषे।
भक्तिरुत्पद्यते पुंसः शोकमोहभयापहा ॥

(श्रीमद्भागवत १/७/६-७)

अनर्थोंकी शान्तिका साक्षात् साधन है- इन्द्रिय ज्ञानसे अतीत केवल भगवान्‌का अविरल भक्तियोग। परन्तु संसारके लोग इस बातको नहीं जानते। यही समझकर उन्होंने इस परमहंसोंकी संहिता श्रीमद्भागवतकी रचना की। इसके श्रवणमात्रसे पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके प्रति परम प्रेममयी भक्ति हो जाती है, जिससे जीवके शोक, मोह और भय नष्ट होकर भक्तिका उदय हो जाता है ।

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जगत् में जितने जीव हैं उन सबको मैं कृष्णदास समझकर प्रणाम करता हूँ। कोई माने अथवा न माने, सभी उनके दास हैं। यद्यपि निखिल जीव श्रीकृष्णके स्वतः सिद्ध दास हैं, तथापि जो अज्ञानवश या भ्रमवश अपनेको कृष्णदास नहीं मानते, वे एक श्रेणीके लोग हैं, और जो उनकी दासता स्वीकार करते हैं वे दूसरी श्रेणीके। इस तरह जगत्में दो प्रकारके लोग हैं- एक बहिर्मुख और दूसरे अन्तर्मुख या कृष्णोन्मुख। संसारमें कृष्ण-बहिर्मुख लोग ही अधिक हैं। ये लोग धर्म स्वीकार नहीं करते। ऐसे लोगोंके सम्बन्धमें कुछ कहना या न कहना बराबर है। इनमें कर्त्तव्याकर्त्तव्यका तनिक भी विवेक नहीं होता। अपना सुख और स्वार्थ ही इनका सर्वस्व होता है। जो लोग धर्म स्वीकार करते हैं उनमें कर्त्तव्य अकर्त्तव्यका विवेक होता है। ऐसे कर्त्तव्यपरायण मनुष्योंके लिए मनुजीने (६/९२) कहा है-

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीविद्यासत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥

अर्थात् धृति (सन्तोष), क्षमा (सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरोंके द्वारा किये गये अपकारोंके बदले अपकार न करना), दम (विकारका कारण उपस्थित होनेपर भी मनकी अविकृत अवस्था), अस्तेय (चोरी), शौच, इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियोंको विषयसे हटाना), धी (शास्त्र आदिका तत्त्वज्ञान), विद्या (आत्मज्ञान), सत्य, अक्रोध (क्रोधका कारण उपस्थित होनेपर भी क्रोध न करना)- ये दस धर्मके लक्षण हैं।

इनमें धृति, दम, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, धी और विद्या-ये छह तो अपने प्रति कर्त्तव्य हैं, बाकी क्षमा, अस्तेय, सत्य और अक्रोध-ये चार दूसरोंके प्रति कर्त्तव्य हैं। ये दसों प्रकारके धर्म साधारण लोगोंके लिए हैं। क्योंकि इनमेंसे किसी भी लक्षणमें हरि भजनका स्पष्ट निर्देश नहीं पाया जाता है। दूसरी बात यह है कि यह भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है कि इन दस लक्षणात्मक-धर्मका पालन करनेसे ही मानव जीवन सम्पूर्ण रूपसे कल्याणमय हो जायेगा।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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हरिनाम – कीर्तन ही महाध्यान, महायज्ञ एवं महार्चन है । कृष्ण का ध्यान, यज्ञ, अर्चन साधारण है कृष्णकीर्तनरूप महाध्यान, महायज्ञ, महार्चन, में उनके समस्त विषयों की परिपूर्णता है। श्रीनामभजन ही महार्चन, महायज्ञ, महाध्यान है। इस महाध्यान में अन्यमनस्क होना उचित नहीं। बुद्धिमान व्यक्ति इस महाध्यान, महायज्ञ एवं महार्चनरूप हरिनाम संकीर्तन करते हैं, परन्तु उसके अतिरिक्त दुर्बुद्धिपरायण लोग हरिनाम संकीर्तन के अतिरिक्त अन्यान्य उपायों का अवलम्बन करते हैं, जिससे उनका मंगल नहीं होता। श्रीमद्भागवत में ऐसा कहा गया है-

कृष्णवर्ण त्विषाकृष्णं सांगोपागास्त्रपार्षदम् ।
यज्ञैः संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ।।
संकीर्तनयज्ञे कलौ कृष्ण – आराधन ।
सेइ त सुमेधा पाय कृष्णेर चरण ।।

(चै. च.)

संकीर्तन यज्ञ के द्वारा ही कलियुग में कृष्ण की आराधना की बात कही गयी है। जो ऐसा करता है, वह परम बुद्धिमान है तथा वह कृष्ण के चरणों को प्राप्त कर लेता है।

श्रीलप्रभुपाद
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ब्रह्म में लीन होने के विचार का अर्थ है अधःपतन होना

ज्ञान के द्वारा मोक्ष मिलना संभव नहीं है- विशेष रूप से जिस ज्ञान का लक्ष्य है ब्रह्म के साथ एक हो जाना उससे आत्मा का अधोपतन ही होता है। जिस ज्ञान में ‘मुक्ति’ शब्द जुड़ता है, वही ज्ञान अप्राकृत-तत्त्वज्ञान को लक्षित करता है। और द्विभुज (दो भुजाओं वाले) मुरलीधारी कृष्णचन्द्र के चरणों की सेवा प्राप्त करना ही उस मुक्ति का उद्दिष्ट (सोचा हुआ) विषय है। कृष्ण के चरणों के नाखून की ज्योति ही ‘ब्रह्म’ है। इसीलिए शास्त्रों में “ज्योतिरभ्यन्तरे रूपमतुलं श्यामसुन्दरम् (नारद पंचरात्र) वाक्य देखते हैं। श्यामसुन्दर की ज्योति को देखकर ज्ञानी लोग उसे मूल तत्त्व वस्तु समझते हैं। किन्तु वह पूर्णदर्शन नहीं है- भगवत् तत्त्व का एक असम्यक् दर्शन मात्र है। ब्रह्म में लीन होने का विचार हृदय में प्रवेश करते ही उसी समय अधःपतन शुरू हो जाता है। जीव भगवान् का अंश है, कला है; वह किस प्रकार से पूर्ण के समान होगा? “The part equal to the whole, which is absurd” (अंश, पूर्ण की बराबरी करता है, जोकि बकवास है)। इसीलिए मेखले ने कहा है, “More than a man you cannot be” (आप एक मनुष्य से ज़्यादा कुछ नहीं हो सकते)। हम लोग मायिक धर्म के अंदर चले आये हैं इसीलिए भगवान् को हम नहीं जान पा रहे हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु जी ने ऐसा ही एक रास्ता दिखाया है जिस पर चलकर हम प्राणी-हिंसा से निर्मुक्त हो सकते हैं और साथ-साथ सब प्राणियों का उपकार भी कर सकते हैं। किसी जीव के स्वार्थ पर चोट करने से उसकी हिंसा मानी जाती है। जीव की वास्तविक आवश्यकता उसके स्वरूप निर्णय पर निर्भर करती है। जिस बोध सत्ता (चेतनता) के रहने से व्यक्ति का व्यक्तित्व है और जिसके न रहने से व्यक्ति का व्यक्तित्व नहीं रहता, वही बोध सत्ता (चेतनता) ही वास्तविक व्यक्ति है। उसी को शास्त्रीय भाषा में आत्मा कहा गया है, जो कि अविनाशी है।

“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
अच्छेद्यो ऽयमदाह्यो ऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः

(गीता-2/23-24)

“जीव चेतन होने पर भी तमाम चेतनों का कारण-चेतन नहीं है। ‘कारण-चेतन’ या ‘पूर्ण-चेतन’ किसी के लिए भी नहीं होता, जबकि पक्षान्तर में समस्त वस्तुयें उनके लिये हैं। जीव पूर्ण-चेतन से निकला उसकी शक्ति का एक परमाणु है, इसीलिये निर्भर शील है। सर्वकारण-कारण-परिपूर्ण-चिद्वस्तु- भगवान् की सत्ता से ही जीव की सत्ता है। जीव की सत्ता से भगवान् की सत्ता नहीं है।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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मठ वासियों के लिए विशेष उपदेशावली

तुम लोग मिलजुलकर हरिभजन करना। ईर्ष्या-मात्सर्य, लाभ-पूजा-प्रतिष्ठाशा, परनिन्दा-परचर्चा-परसमालोचना, अन्याभिलाष-कुटिलता रहित होकर गुरु-वैष्णवों के उच्छिष्ट-भोजी दासानुदास के रूप में जीवन यापन का अभ्यास करना। सिद्धान्त-विरोध, रसाभास-दोष, मर्यादा-लंघन आदि अभक्तोचित आचरण से हमेशा स्वयं को दूर रखना। श्रीगौर-नित्यानन्द प्रभु अवश्य ही तुम लोगों के प्रति निष्कपट रूप से कृपा करेंगे। गौड़ीय गोस्वामी गुरुवर्ग के माध्यम से ही गौड़ीय तत्त्व-सिद्धान्त को सम्यक् रूप से समझने का प्रयास करना। प्राकृत-सहजिया (वैष्णवता के नाम पर अपसिद्धान्तों को मानने वाले), स्मार्त (कर्मकाण्डी), पंचोपासकी (तत्त्वसिद्धान्त रहित होकर शक्ति, शिव, सूर्य, गणेश, और विष्णु की उपासना करने वाले), चित्तजड़समन्यवादी (चेतन और अचेतन को समान समझने वाले), जीव-ब्रह्मकवादियों (जीव और ब्रह्म को एक समझने वाले) का संग कभी मत करना।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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जब बद्ध जीव हरि भजन से विमुख हो जाते हैं, वे त्रिगुणात्मिका (सत्वः, रजः व तमः गुणयुक्त) बहिरंगा माया शक्ति द्वारा आच्छादित होते हैं।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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