स्मृति-शास्त्रोंमें नाम-माहात्म्य –
वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा।
आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥
(हरिवंश)
वेद, रामायण, महाभारत और पुराणोंमें आदि, मध्य और अन्त्यमें सर्वत्र ही एकमात्र श्रीहरिका ही कीर्त्तन किया गया है ।
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कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः ।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्त्तनात् ॥
(श्रीमद्भागवत १२/३/५१-५२)
सत्युगमें भगवान्का ध्यानके द्वारा, त्रेतामें बड़े-बड़े यज्ञोंके द्वारा उनकी आराधना करनेसे और द्वापरमें विधिपूर्वक उनकी पूजासे जो फल मिलता है, वह कलियुगमें केवल भगवन्नामका कीर्त्तन करनेसे अनायास ही प्राप्त हो जाता है ।
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शरणागति
देवर्षिभूताप्तनृणां पितृणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्त्तम् ॥
(श्रीमद्भागवत ११/५/४१)
हे राजन् ! जो सब प्रकारसे सांसारिक कर्त्तव्यका परित्यागकर शरणागतवत्सल भगवान् मुकुन्दकी शरणमें आ गया है, वह देवताओं, पितरों, प्राणियों, कुटुम्बियों और अतिथियोंके ऋणसे उऋण हो जाता है, वह किसीके अधीन या किसीका सेवक नहीं रहता ।
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उद्धवसे भी ब्रजदेवियाँ श्रेष्ठ हैं-
उद्धव की प्रार्थना-
आसामहो चरणरेणु जुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम् ।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथञ्च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवींश्रुतिभिर्विमृग्याम् ॥
(श्रीमद्भागवत १०/४७/६१)
मेरे लिए तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि मैं इस वृन्दावन धाममें कोई झाड़ी, लता अथवा औषधि जड़ी-बूटी ही बन जाऊँ। अहा! यदि मैं ऐसा बन जाऊँगा, तो मुझे इन ब्रजाङ्गनाओंकी चरणधूलि निरन्तर सेवन करनेके लिए मिलती रहेगी। इनकी चरणरजमें स्नान करके मैं धन्य हो जाऊँगा। धन्य हैं ये गोपियाँ ! देखो तो सही जिनको छोड़ना अत्यन्त कठिन है, उन स्वजन सम्बन्धियों तथा लोक, वेदकी आर्य मर्यादाका परित्याग करके उनका परमप्रेम प्राप्त कर लिया है-औरोंकी तो बात ही क्या भगवद्वाणी उनकी निःश्वासरूप समस्त श्रुतियाँ, उपनिषदें भी भगवान्के परम प्रेममय स्वरूपको ढूढ़ती ही रहती हैं, प्राप्त नहीं कर पातीं ।
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सद्गुरु और सशिष्य दुर्लभ-
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः। श्रृन्वन्तोऽपि बहवो यं न विदुः ।
आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥
(कठ १/२/७)
इस आत्माके सम्बन्धमें श्रवण करनेका सौभाग्य बहुत ही कम लोगोंको प्राप्त होता है। श्रवण करनेवालोंमें भी अधिकांश इसका अनुभव नहीं कर पाते हैं। क्योंकि उस आत्माका तत्त्वविद् उपदेष्टा जगत्में अत्यन्त दुर्लभ है। यदि उपदेष्टा मिल भी जाय तो योग्य श्रोता अत्यन्त दुर्लभ होता है।
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कर्मकाण्ड में भक्तिरूप साधन द्वारा भोगकी प्राप्ति होती है और ज्ञानकाण्डमें भक्तिरूप साधनसे मुक्तिकी प्राप्ति होती है-यह सत्य है। क्योंकि परमेश्वरके सन्तुष्ट हुए बिना कोई भी फल नहीं होता और परमेश्वर एकमात्र भक्तिसे ही सन्तुष्ट होते हैं। ईश्वर शक्तियोंके आश्रय हैं। जीवोंमें अथवा जड़वस्तुओंमें जो कुछ शक्ति है, वह ईश्वरकी ही शक्तिका अणु-प्रकाशमात्र है। कर्म अथवा ज्ञान ईश्वरको सन्तुष्ट नहीं कर सकता है। भगवद्भक्तिकी सहायतासे ही कर्म और ज्ञान फल प्रदान करते हैं, वे स्वतन्त्र रूपमें कोई फल प्रदान करनेमें असमर्थ हैं।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर
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हरिभजन न करने पर जीव कर्मी, ज्ञानी या अन्याभिलाषी हो जाता है । इसीलिए सर्वदा ही भगवान को ‘हरेकृष्ण महामन्त्र’ का उच्चारणकर पुकारना चाहिए । अपनी सामर्थ्य के अनुसार संख्यापूर्वक हरिनाम करने से अनर्थ दूर होते हैं, साथ ही जाड्य और आलस्य इत्यादि भी दूर भाग जाते हैं । निरपराध होकर हरिनाम करने से समस्त प्रकार की सिद्धियाँ सहज रूप में ही प्राप्त हो जाती हैं ।
श्रीलप्रभुपाद
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निष्काम सेवा परायणता ही भक्ति है, इसीलिए भक्त का हृदय भगवान का विश्राम-स्थल
भक्ति ऐसी वस्तु है कि, भगवान् स्वयं भक्त के वश में आकर भक्त के सेवक का कार्य भी कर देते हैं। किन्तु वसुदेव ने नारद से कहा कि, -आप मुझे ऐसा उपदेश दें ताकि भगवान् की सेवा करने के लिए मैं हमेशा उन्हें पुत्र के रूप में रख सकूँ। वात्सल्य का स्वभाव स्नेह के पात्र के प्रति हमेशा ध्यान केन्द्रित रखना, ‘कहीं मेरे पुत्र का किसी प्रकार से अमंगल न हो जाय’ – इसी चिन्ता से परेशान रहना। वसुदेव सदैव भक्तवत्सल भगवान् को नित्यकाल तक अपने पास रखने के लिए प्रयासरत हैं।
“भक्तेर हृदये सदा गोविन्देर विश्राम।” (अर्थात् भक्त के हृदय में हमेशा गोविन्द विश्राम करते हैं।) यहाँ ‘विश्राम’ शब्द का विशेष तात्पर्य है। कामी व्यक्तियों की कामना पूरी करते-करते भगवान् परेशान होकर थक जाते हैं। किन्तु भक्त के हृदय में किसी प्रकार की कामना-वासना नहीं रहने पर भगवान् वहाँ विश्राम लेते हैं। वसुदेव जगत को शिक्षा दे रहे हैं – कामना-वासना रहित न होने पर भगवान् की ऐकान्तिक उपासना संभव नहीं है – हृदय को निष्काम करना होगा; अन्यथा जन्म-मरण की माला समाप्त नहीं होगी।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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सम्बन्ध-ज्ञान
अभिमान ही कर्म का प्रवर्तक है। प्राकृत अस्मिता- मैं संसार का हूँ, ये भावना या वृत्ति परित्यज्य है किन्तु अप्राकृत अस्मिता कि मैं भगवान् का दास हूँ, इस प्रकार की वृत्ति परित्यज्य नहीं है।
मैं संसार का हूँ- इसी ज्ञान से हम संसार के लिये, स्त्री-पुत्र आदि के लिये कार्य करते हैं। मठ मन्दिर में आने पर भी संसार के स्वार्थों की सिद्धि के लिये ही आते हैं, भगवान् के लिये नहीं आते। यह स्वाभाविक ही है कि जहाँ पर हमारा अभिमान होगा, जिनके लिये हम कार्य करेंगे, उनके प्रति ही हमारी प्रीति होगी। जब मैं समझेंगा कि मैं भगवान् का हूँ, भगवान् से ही सब प्रकार से मेरा नित्य सम्बन्ध है, अर्थात् अप्राकृत शुद्ध-अस्मिता जब प्रकट होगी, तब भगवद्-प्राप्ति ही मेरी सबसे बड़ी आवश्यकता है, ऐसा ज्ञान हो जाएगा तथा तब मैं स्वाभाविक ही भगवान् के लिये कार्य करूँगा। भगवान में स्वार्थबोध अर्थात् भगवान् ही हमारी परम अवश्यकता हैं, ऐसा ज्ञान होने पर मैं अपने को एवं अपना कह कर जो कुछ है वह सब भगवान् को अर्पित कर पाऊँगा। इस प्रकार की अवस्था में ही भगवान् में प्रीति और प्रेम होना सम्भव है। सद्गुरु या शुद्ध-भक्त की कृपा से सम्बन्ध उदय होता है। सम्बन्ध-ज्ञान से पहले भगवान् की आराधना सम्भव ही नहीं होती। हम लोग सम्बन्ध-ज्ञान की प्राप्ति के लिये अधिक ध्यान नहीं देते, इसीलिये उपयुक्त फल भी प्राप्त नहीं कर पाते। सम्बन्ध-ज्ञान के पश्चात् अभिधेय (अर्थात् साधन) तथा साधन के द्वारा प्राप्त वस्तु को प्रयोजन कहते हैं। सनातन धर्म के शास्त्रों में तथा सभी महानुभावों के उपदेशों में तीन विषय ही विशेष रूप से आलोचित हुये हैं- सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन। पारमार्थिक जीवन की प्रथम सीढ़ी सम्बन्ध-ज्ञान ही है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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बद्धजीव जिसे निर्दयता समझते हैं, वास्तव में वही भक्त और भगवान् की कृपा
वैष्णव के अप्राकृत स्नेह और करुणा की कोई तुलना नहीं है। भजनाकांक्षी जीव यदि उस करुणा की उपलब्धि कर सकता है, तब निश्चय ही उसका कल्याण होता है। गुरु-वैष्णवों का शासन और करुणा का अनुभव करना विशेष सौभाग्य का परिचायक है। विषयों में आसक्त मनुष्य भगवान् व भक्त की कृपा को निर्दयता तथा उनके शासन को क्रोध और अनुदारता मानकर भूल करता है। वस्तुतः शासन और कृपा एक ही उद्देश्य में ही प्रयुक्त होते हैं। “वजादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि” (वज से भी कठोर तथा पुष्प से भी कोमल) विचार को समझना आवश्यक है। भाव या तात्पर्य को ग्रहण करने वाले का ही श्रेष्ठत्व सर्वत्र स्वीकृत हुआ है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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ऐसे परिवार जन जिन्होंने शुद्ध भक्ति धारा का आश्रय नहीं लिया है, यदि कुलदेवी की पूजा पुर्नस्थापन करने के लिए आग्रह करते हैं, तो उन्हें ऐसा करने दें; उनका विरोध करना बुद्धिमानी नहीं है। हमें किन्तु अनन्य भक्ति में दृढ़ रहना है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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