“ब्रह्मसूत्रार्थ”
सर्ववेदान्तसारं हि श्रीमद्भागवतमिष्यते ।
तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित् ॥
(श्रीमद्भागवत १२/१३/१५)
समस्त वेदोंके सारको ही श्रीमद्भागवत कहा जाता है। जो इस रस-सुधाका पान करके छक चुका है, वह और किसी पुराण-शास्त्रमें नहीं रम सकता ॥
वेदसार और अभिन्न-श्रीकृष्णविग्रह-
सबे पुरुषार्थ ‘भक्ति’ भागवते हय।
‘प्रेम-रूप भागवत’ चारि वेदे कय ॥
चारि वेद-‘दधि भागवत- ‘नवनीत’ ।
मथिलेन शुके, खाइलेन परीक्षित ॥
(चै. भा. म. २१/१५-१६)
श्रीमद्भागवत में केवल भक्तिको ही पुरुषार्थ बतलाया गया है। श्रीमद्भागवत प्रेमस्वरूप है, चारों वेद इस तथ्यका प्रतिपादन करते हैं। चारों वेद ‘दधि’ हैं और श्रीमद्भागवत उसका ‘नवनीत’ है। श्रीशुकदेव गोस्वामीने मथकर उस नवनीतको निकाला तथा परीक्षितजीको खिलाया है ।
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भागवत-अधोक्षज मूर्तविग्रह है-
पादौ यदीयौ प्रथमद्वितीयौ तृतीयतुर्यौ कथितौ यदूरू
नाभिस्तथा पञ्चम एव षष्ठौ भुजान्तरं दोर्युगलं तथान्यौ।
कण्ठस्तु राजन्नवमो यदीयो मुखारविन्दं दशमः प्रफुल्लम्
एकादशो यस्य ललाटपट्ट शिरोऽपि तु द्वादश एव भाति ॥
तमादिदेवं करुणानिधानं तमालवर्णं सुहितावतारम्।
अपारसंसार-समुद्र-सेतुं भजामहे भागवत-स्वरूपम् ॥
(पद्म-पुराण)
अपार संसार-सागर पार होनेके लिए सेतु-स्वरूप आदिदेव, करुणा-निधान, तमालवर्ण श्रीकृष्णके मङ्गलमय शाब्दिक अवतार श्रीमद्भागवतका मैं भजन करता हूँ। इस ग्रन्थावतारके द्वादश स्कन्ध द्वादश अङ्ग-स्वरूप हैं। प्रथम और द्वितीय स्कन्ध इनके युगलपाद हैं, तृतीय और चतुर्थ स्कन्ध इनकी जंघाएँ हैं, पञ्चम इनका नाभिदेश है, षष्ठ स्कन्ध इनका भुजान्तर अर्थात् वक्षःस्थल है। सप्तम और अष्टम ये दोनों इनके युगल बाहु हैं, दशम स्कन्ध इनका प्रफुल्ल मुख पद्मस्वरूप है, एकादश स्कन्ध इनका ललाटदेश एवं द्वादश स्कन्ध इनका मस्तक है ।
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सेइ से परमबन्धु, सेइ माता पिता।
श्रीकृष्णचरणे जेइ प्रेमभक्तिदाता ॥
सकल जन्मे पितामाता सबे पाय ।
कृष्ण गुरु नाहि मिले, भजह हियाय ॥
( श्रीचैतन्यमंगल मध्यखण्ड)
जो श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रेमभक्तिकी शिक्षा प्रदान करते हैं, वे ही परम-बन्धु एवं माता-पिता हैं। प्रत्येक जन्ममें सभीको माता-पिता मिलते हैं, किन्तु श्रीकृष्ण एवं श्रीगुरुका मिलना बहुत ही दुर्लभ है। इसलिए मनुष्य जन्ममें ही श्रीगुरु-चरणाश्रयकर श्रीकृष्णका भजन करना चाहिए ।
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नाहं वन्दे तव चरणयोर्द्वन्द्वमद्वन्द्वहेतोः कुम्भीपाकं गुरुमपि हरे नारकं नापनेतुम्।
रम्या रामा-मृदुतनुलता नन्दने नाभिरन्तुं भावे भावे हृदयभवने भावयेयं भवन्तम् ॥
(मुकुन्दमालास्तोत्र ४)
हे हरे ! मैं विषय सुखके लिए अथवा कुम्भीपाक तथा अन्य नरकोंसे छुटकारा पानेके लिए आपके पादपद्मोंकी वन्दना नहीं करता हूँ अथवा नन्दनवनमें सुन्दरी सुर-कामिनियोंके सुकोमल तनुलताके बीच विहार करनेके लिए भी आपके चरणोंकी वन्दना नहीं करता हूँ, किन्तु केवल भक्तिकी प्रत्येक सतहपर विलास करनेके लिए ही हृदयमन्दिरमें आपके पादपद्मोंका ध्यान करता हूँ ।
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स्मृति-शास्त्रोंमें नाम-माहात्म्य –
वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा।
आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥
(हरिवंश)
वेद, रामायण, महाभारत और पुराणोंमें आदि, मध्य और अन्त्यमें सर्वत्र ही एकमात्र श्रीहरिका ही कीर्त्तन किया गया है ।
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श्रीमद्भागवतमें उत्तम वैष्णवोंका लक्षण इस प्रकार कहा गया है-
सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः ।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥
(श्रीमद्भा० ११/२/४५)
जो समस्त प्राणियोंमें भगवान्के साथ सम्बन्धजनित प्रेममयभावोंकी उपलब्धि करते हैं और साथ ही भगवान्में भी समस्त प्राणियोंके सम्बन्धजनित प्रेममय भावकी उपलब्धि करते हैं। वे उत्तम कोटिके वैष्णव हैं। इस प्रेममय भावके अतिरिक्त कोई भी दूसरा भाव इनमें नहीं पाया जाता। भगवान्के साथ सम्बन्धजनित दूसरे भाव भी कभी-कभी इनमें प्रकाशित हो पड़ते हैं। ऐसे भावोंको प्रेमका विकार समझना चाहिये। उदाहरण-स्वरूप, उत्तम भागवत होते हुए भी शुकदेव गोस्वामीने कंसके प्रति ‘भोजपांशुल’ आदि जिन शब्दोंका प्रयोग किया है, वे द्वेषपूर्ण जैसे प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें द्वेषपूर्ण नहीं हैं- प्रेमके विकार हैं। इसी प्रकार जब भक्तोंका जीवन शुद्धप्रेममय हो जाता है तब उसे ‘उत्तम भागवत’ कहा जाता है। इस अवस्थामें मध्यमाधिकारके प्रेम, मैत्री, कृपा और उपेक्षारूप व्यवहारोंके तारतम्यका विचार नहीं रहता, प्रत्युत् उनके समस्त व्यवहार प्रेमाकार हो पड़ते हैं। इनकी दृष्टिमें उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ वैष्णवका अथवा वैष्णव और अवैष्णवका कोई भेद नहीं रहता। ऐसी अवस्था अत्यन्त दुर्लभ है।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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सेवोन्मुख, निष्कपट एवं दैन्यमय प्रीति-चक्षुओं के द्वारा ही श्रीरूपगोस्वामीजी के चरणकमलों का दर्शन हो सकता है। हमारा भजन, पूजन, सर्वस्व, यह एवं परकाल जब सब श्रीरूपगोस्वामी के चरणकमल ही बन जाएँगे, तभी श्रीचैतन्यमहाप्रभु को पूर्णरूप से प्राप्त किया जा सकता है । अतः श्रीरूपगोस्वामी के चरणकमल ही हमारे लिए एकमात्र आशा और भरोसा हैं । उनकी कृपा ही हमारी एकमात्र अवलम्बन है ।।
यही प्रार्थना है-
आददानस्तृणं दन्तैरिदं याचे पुनः पुनः ।
श्रीमदूपपदाम्भोजधूलि : स्याज्जन्मजन्मनि ।।
अर्थात् मैं दाँतों में तिनका धारणकर (अति दीनहीन भाव से ) यही प्रार्थना करता हूँ कि जन्म-जन्मों तक श्रीरूपगोस्वामीजी के चरणकमलों की धूलि बन जाऊँ ।
श्रीलप्रभुपद
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श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला, सभी के लिए पाठ्य नहीं
द्वादश स्कन्ध युक्त श्रीमद्भागवत में, इसीलिए दशम स्कन्ध ही सार का सार है। क्योंकि, वहाँ अखिल रसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण की अशेष लीला-कथाएँ ही वर्णित हैं। भले ही अज्ञानी लोगों के मंगल के लिए ही उस पारमहंसी संहिता की रचना हुई है, सत्य है, फिर भी भागवत में कथित श्रीकृष्ण की समस्त लीलाएँ सभी के लिए पाठ्य नहीं हैं। इन सब लीलाओं में दो भाग देखे जाते हैं। एक अनर्थ-युक्त अवस्था में साधन-कम में चर्चा के लिए, अर्थात् वह बद्ध जीवों की अनर्थ-निवृत्ति के लिए आलोच्य है – बाकी अनर्थों से मुक्त होने के बाद आलोच्य हैं। अनर्थयुक्त अवस्था में, कृष्ण की बाल्य लीला, असुर वध, गोवर्धन-धारण इत्यादि लीलाओं की उपयोगिता है; किन्तु कृष्ण के द्वारा वस्त्र-हरण, नौकाविलास, रासलीला इत्यादि के सम्बन्ध में चर्चा, स्वयं व्यासदेव ने ही अनाधिकारियों के लिए निषेध की है। वास्तव में जो अधिकारी हैं, केवल वे ही उन लीलाओं की चर्चा कर सकेंगे। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में कहा गया है, –
“नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः ।
विनशत्याचरन्मौठ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम् ।।”
अर्थात् समर्थवान व्यक्ति के अलावा कोई ऐसा आचरण मन. से भी न करे। रूद्र (शिव) के अलावा, यदि कोई और समुद्र से निकले, विष का पान करता है तो उसकी गति जैसी होगी, वैसे ही मूर्खता वश, इन सब लीलाओं का अनुकरण करने पर उसका विनाश अवश्यम्भावी है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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अनन्त ब्रह्माण्ड और उनमें रहने वाले अनन्त जीवों की सृष्टि व लय करने के मूल कारण जो भगवान् हैं, वे कितने महान् हैं। तमाम ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान व वैराग्य उनमें परिपूर्ण मात्रा में है। जो भगवान् समस्त तत्त्वों की खान हैं, वे भगवान् भी जिनके प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं; वे भगवद्-विजयी ‘भक्त लोग’ कितने महान् हैं, जाना नहीं जा सकता। इस प्रकार देखा जाता है कि भगवद्-सेवक की मर्यादा ही ब्रह्माण्ड में सर्वोपरि है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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जड़-स्वार्थ के लिए भक्त-भगवान् का उपयोग करने की चेष्टा अपराधजनक
दुनिया के लोग भोगवादी-प्रवृत्ति-मार्गीय हैं। निवृत्ति-मार्ग या त्याग की सोच उनकी बुद्धि से परे है। खाने-पहनने रहने को लेकर ही व्यस्त रहने पर जगत के बहिर्मुख लोग समझते हैं कि, उनके दायित्व का पालन हो गया है। वे परमार्थ की चिन्ता नहीं कर सकते हैं, इसीलिए उन्हें “पशुघाती व्याध” (पशु की हत्या करने वाले शिकारी) की संज्ञा दी गयी है। भोगी लोग भगवान् व भक्त को अपने काम में लगाने में व्यस्त हैं। दीक्षा ग्रहण करने का फल- जड़ शरीर की तात्कालिक स्वस्थता और परिणाम में सौगुना अधिक भोग की आकांक्षा नहीं है। जो लोग उस प्रकार फल के लिए प्रयास करते हैं वे थोड़े-बहुत अपराधी हैं। अपने सुख व स्वार्थ को पूरा करने के लिए गुरु-वैष्णवों से काम निकलवाना- नामापराध, वैष्णवापराध, सेवापराध में गिना जाता है। मायाबद्ध जीव का चित्त स्वाभाविक रूप से भोगोन्मुखी है, इसमें जो लोग बढ़ावा देना चाहते हैं, वे मूर्ख और नराधम (मनुष्यों में अधम), दुष्कृति (बुरे काम करने वाले), मायापहृत-ज्ञान (जिनकी बुद्धि, माया द्वारा हर ली गई है) और आसुरिक स्वभाव के हैं। इस प्रकार के दुःसंग को अवश्य ही त्याग देना चाहिए।
श्रील भक्ति वेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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श्रीचैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं के अनुगत होते हुए़ भी, यदि हम अपने ही बन्धु-बांधवों से प्रीति न कर सके, तो किसी अन्य से प्रीति कैसे करेंगे?
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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The significance of the teachings of authentic scriptures and of the teachings of a transcendental personality, mahabhagavat, descends to a completely surrendered soul.
Srila Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj
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