भक्ति पोषक छहसत्संग: यथा उपदेशामृत चतुर्थ श्लोक-
ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति ।
भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ।।
– विशुद्ध भक्तोंको उनकी आवश्यकतानुसार वस्तु देना, विशुद्ध भक्तोंके द्वारा दी हुई प्रसाद स्वरूप वस्तुको लेना, भजन सम्बन्धी अपनी गुप्त बातें भक्तोंके निकट कहना, वैसी ही रहस्यमयी गुप्त बातोंको उनसे पूछना, भक्तोंके. द्वारा दिये गये प्रसादको प्रीतिपूर्वक भोजन करना और उन्हें प्रीतिपूर्वक भोजन कराना-ये छह प्रकारके सत्संग प्रीतिके लक्षण हैं।

आदान प्रदान प्रीते, गूढ़ आलापन।
आहार भोजन छ्य सङ्गर लक्षण ।।
साधुर सहित सङ्गे भक्तिवृद्धि हय।
अभक्त असत्सङ्ग भक्ति हय क्षय।।
भजनरहस्यवृत्ति- इस श्लोकमें भक्ति पोषक सत्प्रीति अर्थात् विशुद्ध भक्तसे प्रीति रखना- इस तटस्थ लक्षणको बतला रहे हैं। भगवद्भक्तोंके संगसे भक्तिका प्रादुर्भाव होता है। किन्तु सतर्कतापूर्वक केवल विशुद्ध भक्तोंका संग ही करना चाहिए। विषयी, मोक्षकामी तथा अन्याभिलाषी व्यक्तियोंका संग तथा परस्पर आदान-प्रदान कभी न करें। उनके सङ्ग दोषसे भक्तिकी हानि होती है। भक्ति सम्बन्धी गोपनीय विषय भी उनके निकट श्रवण नहीं करना चाहिए। उनका स्पर्श किया हुआ अन्न भी ग्रहण नहीं करना चाहिए ‘विषयीर अन्न खाइले मलिन हय मन। मलिन मन हइले नहे कृष्णेर स्मरण’ ।। श्रीचैतन्य चरितामृत। स्वजातीय स्निग्धाशय भक्तोंके साथ परस्पर प्रीति द्वारा भक्तिकी वृद्धि होती है।
श्रील सचिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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जिस प्रकार नदी पार होने के लिए एक नाव एवं नाविक की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार इस भवसागर से पार होने के लिए भी एक गुरु की भी आवश्यकता होती है। इसी भावना से आजकल लोग मुझे अपना गुरु बना रहे हैं। वास्तव में उन्होंने मुझे कभी देखा ही नहीं, और न मैं ही इनसे कभी मिला । तात्पर्य यह है कि कुछ लोग एक विधि जानकर गुरु तो कर लेते हैं, परन्तु गुरु की क्या महिमा होती है, इसे जानने की चेष्टा नहीं करते। ऐसे लोगों के द्वारा गुरु किये जाने पर भी वास्तव में गुरु करना नहीं होता ।
श्रील प्रभुपाद
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श्रील प्रभुपाद कीर्तन-विग्रह हैं। जिन्होंने उनका सान्निध्य लाभ किया है, उन्होंने निश्चय ही यह अनुभव किया है। हरिकथा कीर्तन में वे अकेले ही हजारों मुख वाले थे। हम 24 घण्टे में एक दिन की गणना करते हैं। श्रील प्रभुपाद के लिए हरिकथा-कीर्तन के समय एक दिन, हजारों दिनों में परिणत हो (बदल) जाता था। हरिकथा-कीर्तन में वे इतना आनन्द प्राप्त करते थे कि उसकी सीमा किसी भाषा में व्यक्त नहीं की जा सकती है। साधारण मनुष्य को केवल आहार-विहार-निद्रा में आनन्द प्राप्त होता है। परन्तु श्रील प्रभुपाद हरिकथा-कीर्तन में इतना आनन्द प्राप्त करते थे कि आहार-निद्रा छोड़कर भी वे हरिकथा करते थे। हम लोग भौतिक दृष्टिकोण से सोचते थे कि इस प्रकार दिन रात बोलते रहने से स्वास्थ्य की हानि होगी। इसीलिए हरिकथा बन्द करवाकर उनसे भोजन और निद्रा लेने के लिए अनुरोध किया करते थे। इससे वे असंतोष व्यक्त करते ! वे हमेशा कहा करते थे कि “खाना-पीना ही मनुष्य का प्रधान कार्य नहीं है।”
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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साधक के या श्रीगुरुचरणाश्रित व्यक्तियों के चित्त में, अन्याभिलाष – कर्म, ज्ञान की मैल या भुक्ति-मुक्ति-सिद्धिवाञ्छा आदि अवान्तर उद्देश्य रहने तक, उनको श्रीगुरुदेव या अनन्यभक्त के चित्त का सम्यक् अनुसरण करने या उनके दर्शन करने में बाधा रहती है। ऐसी अवस्था में, वह वस्तु की यथार्थ उपलब्धि न कर पाने के कारण अपनी गलती का आरोप, अनन्यभक्त या श्रीगुरुदेव में आरोपित करता है तथा मूल में ही गलती है- ऐसा कह कर अपनी त्रुटि-विच्युति की सफाई देने में व्यस्त रहता है। इस प्रकार प्रतिष्ठा की आशा से, कपटता का आश्रय लेकर, भक्त व श्रीगुरु-चरणों में अपराधों को इकट्ठा करने की व्यवस्था करता रहता है। इन अपराधों का पता लगने पर भी यदि इनका मार्जन न होगा, तो धीरे-धीरे अपराधों के ढेर बढ़ जाएँगे और वैष्णव व गुरु की अवज्ञा और निन्दा एवं अन्त में भगवत्-विद्वेष शुरु हो जाएगा। तब वह सबके मूल – भगवान की गलती या दोष दिखाने के लिए कमर कस लेगा। ऐसी अवस्था में आनुषंगिक भाव से, पहले उसे विषयी और बाद में घोरतर आसुरिक स्वभाव-सम्पन्न होना होगा।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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नारायण और महादेव का विचार-वैशिष्ट्य
श्रीनारायण पूर्ण हैं और महादेव अंश हैं। तत्त्व-विचार के अनुसार पूर्ण कभी अंश नहीं होता और फिर अंश भी कभी पूर्ण नहीं हो सकता है। राजा और प्रजा, मालिक और कर्मचारी, सेव्य और सेवक-एक नहीं हैं। विधि या मर्यादा के मार्ग में हमेशा अधिकार का भेद रहेगा ही। आधार और आधेय (आधार में रखी जाने वाली वस्तु) कभी एक नहीं हो सकते हैं। प्रत्येक का ही अलग-अलग वैशिष्ट्य रहेगा ही। श्रीभगवान् भक्त को स्नेह करते हैं और भक्त भी भगवान् की भक्ति करते हैं। इसलिए भक्त सृष्टि-स्थिति-लय करने वाले भगवान् नहीं बन जाते हैं और फिर भगवान् की भी भक्त-वत्सलता के कारण सर्वशक्तिमत्ता कम नहीं होती। सभी ईश्वरों के ईश्वर, श्रीभगवान् के साथ, आधिकारिक देव-देवियों को अर्थात् कर्मचारी-कर्मचारिणियों को समान कर देने से श्रीभगवान् के चरणों में अपराध होता है। दार्शनिक विचार में यह भयंकर दोष है। ब्रह्मा-शिव आदि देवताओं को स्वीकार करना एक बात है और उन्हें स्वतंत्र परमेश्वर के रूप में मानना दूसरी बात है। जीव का सौभाग्य उदय होने पर ये सब तत्त्व हृदय में प्रकाशित होते हैं और उसे वास्तव सत्य की जानकारी मिलती है।
श्रील वामन गोस्वामी महाराज
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साधक के भजन व पारमार्थिक उन्नति के लिए शुद्ध भक्तों का संग आवश्यक है। शुद्ध भक्तों के संग के अभाव में, साधक को भक्ति-शास्त्रों का अध्ययन कर, साधुजनों द्वारा वर्णित वीर्यवती उपदेशों का आश्रय करना है। श्रद्धा के साथ तुलसी देवी की सेवा व कृपा-प्रार्थना करनी है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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हम सेवा करने से बच नहीं सकते। इस सभा में बैठा प्रत्येक व्यक्ति दास है। ये बालक तथा बालिकाएँ, जिन्होंने कृष्णभावनामृत स्वीकार किया है, कृष्ण के दास बनने के लिए राजी हो चुके हैं। अतः उनकी समस्या हल हो चुकी है। किन्तु अन्य लोग सोच रहे हैं “मैं ईश्वर का दास क्यों बनूँ ? मैं तो स्वामी बनूँगा”। वस्तुतः कोई भी व्यक्ति स्वामी नहीं बन सकता और यदि कोई स्वामी बनना चाहता भी है तो वह अपनी इन्द्रियों का दास बनकर रह जाता है। बस ! वह अपनी वासना का, अपने लोभ का, अपने क्रोध का – इतनी सारी वस्तुओं का – दास बन जाता है।
श्री श्रीमद् ए.सी. भक्तिवेदान्त स्वामी महाराज
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