श्रीमद्भागवत (१०.२१.९)-

गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु-दर्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम् ।
भुक्ते स्वयं यदवशिष्टरसं हृदिन्यो हृष्यत्वचोऽश्रुमुमुचुस्तरवो यथाऽऽर्याः ।।

– अरी गोपियों ! इस वेणुने ऐसी कौनसा पुण्याचरण किया है कि यह गोपियोंके प्राप्य कृष्णाधर-सुधाका पान करता है। उसका अवशिष्ट रस भी सम्पूर्णरूपसे पान कर लेता है-हमलोगोंके लिए तनिक भी नहीं छोड़ता। सखी री! यमुना, मानसीगंगा आदि नदियाँ और सरोवर भी वेणुके सौभाग्य दर्शनकर कमल आदि पुष्पोंके रूपमें रोमांचित हो रही हैं तथा वृक्षगण प्रेमसे अनुमोचन करते हैं। वे वृक्ष मन-ही-मन सोचते हैं कि हमारे वंशमें एक ऐसा ही वंशधर पैदा हुआ है, जैसे आर्य पुरुषोंके कुलमें एक वैष्णव संतान पैदा होनेपर वे प्रसन्न होते हैं ।

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