मुनियों की जिज्ञासा

आगे . . . . . इस दिव्य सन्देश को ग्रहण करने की उचित विधि यह है कि इसे विनीत भाव से सुना जाय। चुनौती देने की प्रवृत्ति से इस दिव्य सन्देश की अनुभूति नहीं की जा सकती। यहाँ पर उचित मार्गदर्शन के लिए जो एक शब्द प्रयुक्त है वह है शुश्रूषु। मनुष्य को इस दिव्य सन्देश को सुनने के लिए उत्सुक रहना चाहिए। निष्ठापूर्वक सुनने (श्रवण करने) की कामना ही इसकी पहली पात्रता (योग्यता) है। कम भाग्यशाली व्यक्ति इस श्रीम‌द्भागवत को सुनने (श्रवण) में बिल्कुल रुचि नहीं दिखाते। यह श्रवण विधि सरल है, किन्तु इसे व्यवहार में लाना कठिन है। भाग्यहीन व्यक्तियों को व्यर्थ सामाजिक तथा राजनीतिक बातें सुनने के लिए पर्याप्त समय रहता है, किन्तु जब उन्हें भक्तों की सभा में श्रीम‌द्भागवत सुनने के लिए आमन्त्रित किया जाता है तो वे सहसा अन्यमनस्क हो उठते हैं। कभी-कभी भागवत के व्यवसायी कथावाचक सहसा भगवान् की गुह्य लीलाओं में पहुँच जाते हैं और उनकी व्याख्या यौन (अश्लील) साहित्य के रूप में करते हैं। श्रीमद्भागवत तो प्रारम्भ से सुनने के लिए है। जो लोग इस ग्रन्थ को आत्मसात् कर सकते हैं उनका उल्लेख इसी श्लोक में है, “अनेक पुण्य कर्मों के बाद वह श्रीमद्भागवत सुनने का अधिकारी बनता है।” महामुनि व्यासदेव बुद्धिमान एवं विचारवान व्यक्तियों को आश्वासन देते हैं कि श्रीमद्भागवत का श्रवण करने से उन्हें भगवान् का साक्षात्कार सीधे हो सकता है। वेदों में साक्षात्कार की विभिन्न अवस्थाओं को पार किये बिना ही, इस सन्देश को ग्रहण करने के लिए सहमत होने मात्र से, मानव परमहंस पद को तुरन्त प्राप्त हो सकता है।

* * * * * * * * * * * * * * * *

श्रीनित्यानन्द महिमा-

जय जय नित्यानन्द, नित्यानन्द राम।
जाँहार कृपाते पाइनु वृन्दावन धाम ॥
जय जय नित्यानन्द, जय कृपामय ।
जाँहा हइते पाइनु रूप-सनातनाश्रय ॥
जाँहा हइते पाइनु रघुनाथ महाशय।
जाँहा हइते पाइनु श्रीस्वरूप आश्रय ॥
सनातन-कृपाय पाइनु भक्तिर सिद्धान्त ।
श्रीरूप-कृपाय पाइनु भक्ति-रस-प्रान्त ॥
जय जय नित्यानन्द-चरणारविन्द ।
जाँहा हइते पाइनु श्रीराधागोविन्द ॥

(चै. च. आ. ५/२००-२०४)

श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी बड़े उल्लसित होकर दयालु शिरोमणि श्रीनित्यानन्द प्रभुका वर्णन कर रहे हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो! जय हो ! जिनकी कृपासे मुझे वृन्दावन धामकी प्राप्ति हुई, उन श्रीनित्यानन्द रामकी जय हो, जिनकी कृपासे मुझे श्रीरघुनाथदास गोस्वामीका संग मिला, जिनकी कृपासे मुझे श्रीस्वरूप गोस्वामीका आश्रय मिला, उन नित्यानन्द प्रभुकी पुनः जय हो। श्रीसनातन गोस्वामीकी कृपासे मुझे भक्तिके सिद्धान्त प्राप्त हुए, श्रीरूप गोस्वामीकी कृपासे मुझे पूर्णरूपमें भक्तिरसकी प्राप्ति हुई। अहो! जिन श्रीनित्यानन्द प्रभुके श्रीचरणकमलोंकी कृपासे श्रीश्रीराधा-गोविन्दजीकी प्राप्ति हुई, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुकी पुनः पुनः जय हो ।

गौड़ीय कण्ठहार

* * * * * * * * * * * * * * *

श्रीचैतन्य महाप्रभु

बालक निमाई आठ भुजाओं के साथ शाम

एक बार एक तैर्थिक ब्राह्मण नाना तीर्थ भ्रमण करते-करते दैवयोग से श्रीजगन्नाथ मिश्र के घर आ पहुँचा। वह हमेशा आठ अक्षरों वाले गोपाल मन्त्र से गोपाल जी की उपासना करता तथा जो भी मिलता उसे गोपाल जी को भोग लगाकर ही प्रसाद ग्रहण करता था। ब्राह्मण को आया देख मिश्रवर सम्भ्रम के साथ उठे और उन्हें प्रणाम किया। उनके चरण धोए तथा आसन इत्यादि प्रदान किया । शची माता ने रसोई की सब सामग्री ब्राह्मण को दी।

ब्राह्मण ने बड़े प्रेम से अपने हाथों गोपाल के लिए रसोई की। ज्यों ही ब्राह्मण रसोई पकाकर ध्यान करके गोपाल जी को भोग लगाने लगा त्यों ही बाल निमाई घुटनों के बल चलते-चलते वहाँ आकर अन्न खाने लगा । बालक को देखकर ब्राह्मण चिल्ला उठा। सब घटना देख जगन्नाथ मिश्र को गुस्सा आ गया और वे निमाई को मारने दौड़े, किन्तु ब्राह्मण ने उन्हें पकड़ लिया। मिश्र जी द्वारा क्षमा प्रार्थना करने पर व अनुनय विनय से ब्राह्मण दुबारा रसोई करने लगा । इधर जगन्नाथ मिश्र जी निमाई को पड़ोसियों के घर ले गये ताकि निमाई पुनः कोई उत्पात न करे। लेकिन तैर्थिक ब्राह्मण ने जैसे ही गोपाल मन्त्र से गोपाल जी को भोग निवेदन किया वैसे ही न जाने कहाँ से निमाई आकर खाने लगा। निमाई को खाता देख कर ब्राह्मण “नष्ट हो गया'”‘नष्ट हो गया” बोलकर चिल्लाने लगा। यह सुनकर जगन्नाथ मिश्र जी बहुत मर्माहत हुए और निमाई की पिटाई करने लगे तो ब्राह्मण ने ऐसा कहकर मिश्र जी को समझाया कि बच्चे को बोध नहीं और फिर इसका क्या दोष है, मेरे ही भाग्य में शायद आज भोजन नहीं लिखा है। तीसरी बार निमाई के बड़े भाई विश्वरूप के अपूर्व रूप लावण्य एवं मधुर वाक्य से मुग्ध होकर व उसकी प्रार्थना पर फिर सब साफ सफाई करके ब्राह्मण ने रसोई करना प्रारम्भ किया । तब काफी रात हो जाने के कारण सभी घर के लोग निद्रामग्न हो चुके थे । ब्राह्मण दरवाज़ा बन्द किए रसोई कर रहे थे तथा जगन्नाथ मिश्र दरवाज़े के बाहर बैठे चौकीदारी कर रहे थे। लेकिन उन्हें भी नींद आ रही थी। कुछ समय पश्चात् ब्राह्मण ने पहले की तरह गोपाल मन्त्र पढ़ा और भोग लगाने लगे। साथ ही साथ न जाने कहाँ से गोपाल निमाई आकर चावल खाने लगा। ब्राह्मण फिर चिल्लाने लगा तो निमाई कहने लगा – तुम कैसे भक्त हो, अपने आप मन्त्र द्वारा मुझे बुलाते हो और जब मैं आता हूँ तो चिल्लाने लगते हो ? इतना कहते-कहते ही महाप्रभु जी ने अपने भक्त तैर्थिक ब्राह्मण को अष्ट भुजा रूप से दर्शन दिये ।

महाप्रभु का ऐश्वर्य देख ब्राह्मण मूच्छित होकर गिर पड़ा । ब्राह्मण ने देखा कि छोटे से बालक निमाई ने एक अद्भुत रूप धारण किया जिसमें अष्ट भुजाऐं थीं जो शंख, चक्र, गदा, पद्म से व मुरली व माखन से युक्त थीं । अर्थात् उस समय उनके चार हाथों में शंख, चक्र, गदा व पद्म थे, दो हाथों से वे मुरली पकड़े हुए थे तथा एक हाथ में उन्होंने ताजा मक्खन लिया हुआ था और दूसरे हाथ से खा रहे थे। बाद में महाप्रभु ने उसे इस रहस्य को गुप्त रखने को कहा ।

* * * * * * * * * * * * * * *

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैश्च, बुद्धयात्मना वानुसृति – स्वभावात् ।
करोमि यद्यद् सकलं परस्मै, नारायणयैव समर्पयामि ।।19।।

हे परम पुरुष नारायण! आप मुझ पर ऐसी कृपा बरसाओ जैसे मैं अपने शरीर के द्वारा, वाक्यों के द्वारा, मन के द्वारा, इन्द्रियों के द्वारा, बुद्धि के द्वारा, चित्त के द्वारा व धर्म के द्वारा जो कुछ भी करूँ वह सब मैं आपको समर्पित करता रहूँ।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

* * * * * * * * * * * * * * *

श्रीगुरुदेव एकान्त रूप से भगवान के सेवक हैं। उनके प्रत्येक कार्य भगवद् सेवा के सर्वोत्तम आदर्श हैं, गुरुदेव के दर्शन में जब तक ऐसी दृष्टि नहीं होगी तब तक मेरी आँखों में बाधा की पट्टी लगी रहेगी। उनकी दया प्राप्त नहीं होने से, दिव्य ज्ञान प्राप्त नहीं होने से, हम गुरुपादपद्म की महिमा को समझ नहीं सकते हैं ।

श्रीलप्रभुपाद

* * * * * * * * * * * * * * * *

श्रीमद्भागवत (11/9/29) ने कहा है-

“लब्धा सुदुर्लभमिदं बहु-सम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः।
तूर्ण यतेत न पतेदनुमृत्यु यावत् निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्व्वतः स्यात् ।।

कई जन्म-जन्मांतर के बाद हमें यह बहुत ही दुर्लभ मनुष्य जन्म लाभहुआ है। अन्य सभी जन्मों की तरह भले ही यह जन्म भी अनित्य है फिर भी इसकी विशेषता यह है कि केवल इस जन्म में ही परमार्थ लाभ किया जाता है। इसीलिए धीर व्यक्ति जितना जल्दी सम्भव हो परम-मंगल, नित्य-मंगल प्राप्ति के लिए अंतिम सांस तक प्रयत्न करे वे रूप-रस इत्यादि विषयों के संग्रह के लिए दौड़ते नहीं हैं, क्योंकि सभी जन्मों में ही वे वस्तुएँ प्राप्त हो जाया करती हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

* * * * * * * * * * * * * * * *

अप्राकृत भूमिका में संसार के प्रति लोभ या कर्त्तव्यबोध अन्तर्हित हो जाता है। तदीय अभिमान जाग्रत होने पर श्रीकृष्ण और उनके भक्त तथा उनसे सम्बन्धित चाहे कोई भी वस्तु क्यों न हो, उसमें प्रीति उत्पन्न हो जायेगी। सम्बन्ध-ज्ञान के साथ श्रीकृष्ण और उनके प्रियजनों की सेवा ही हरिभजन है। शुद्ध सम्बन्धज्ञान उदित न होने तक किये गये प्रत्येक कर्मार्पण आदि मिश्रा-भक्ति के कार्य हो सकते हैं। शुद्धभक्ति दुष्प्राप्य होने पर भी वही हमारी अन्वेषणीय है। कर्म-काण्डियों के बगीचे में जन-साधारण को मोहित करने के लिये जो कुछ भी देखा जाता है उसके द्वारा श्रीकृष्ण का शुद्ध अनुशीलन नहीं हो सकता। आत्मज्ञान में स्थित हुये बिना वैकुण्ठभजन नहीं होता। भेड़-चाल का अनुसरण करते हुये अनावश्यक कार्यों के लिये जीवन नष्ट करना हमारे लिये बुद्धिमता नहीं है। ‘To make the best of a bad bargain की Policy ग्रहण करना आवश्यक है।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

* * * * * * * * * * * * * * * *

अपनी विचारधारा को छोड़कर, श्रीगुरु-वैष्णवों के उपदेश-निर्देश मानकर चलने से ही, मैं समझता हूँ कि, तुम्हारा अधिक मंगल होगा।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

* * * * * * * * * * * * * * * *

कोई भी जन्म-मरण के इस सागर से अचानक निस्तार नहीं पा सकता, इसमें समय लगेगा। धीरे-धीरे ही इससे छुटकारा मिल सकता है, अतः बाहर से सांसारिक कार्य-कलापों से अपनी अरुचि न दर्शाते हुए, भीतर ही भीतर अनासक्ति का अभ्यास करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की निष्ठापूर्वक आराधना करनी होगी; श्रीकृष्ण शीघ्रातिशीघ्र इस संसार-दुःख के पंजों से उद्धार करेंगे।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

* * * * * * * * * * * * * *
* * * * * * * * * *