मुनियों की जिज्ञासा

आगे . . . . . यह ज्ञान कि भगवान् की शक्ति एकसाथ भगवान् से एक तथा भिन्न है, उन मीमांसकों (मनोधर्मियों) पर करारी चपत है जो इस शक्ति को परमेश्वर के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। जब यह ज्ञान वास्तविक रूप से समझ में आ जाता है तो अद्वैतवाद तथा द्वैतवाद अपूर्ण लगने लगते हैं। इस दिव्य चेतना के विकास से, जो एक ही समय एक तथा भिन्न की विचारधारा पर आश्रित है, तीनों प्रकार के कष्टों से तुरन्त ही मुक्ति मिल जाती है। ये तीन प्रकार के कष्ट हैं (१) मन तथा शरीर से उत्पन्न, (२) अन्य जीवों द्वारा पहुँचाये गये तथा (३) प्राकृतिक विपदाओं से उत्पन्न जिनपर किसी का वश नहीं है। श्रीमद्भागवत का शुभारम्भ परम पुरुष के प्रति भक्त के आत्मसमर्पण (शरणागति) से होता है। भक्त भलीभाँति जानता रहता है कि वह भगवान् से एकाकार होते हुए भी उनके नित्य दास के रूप में है। भौतिक विचारधारा के अनुसार मनुष्य झूठे ही अपने को अपने कृत्यों का स्वामी मानता है, इसीलिए वह जीवन के इन तीन प्रकार के कष्टों से पीड़ित रहता है। किन्तु ज्योंही उसे अपनी इस वास्तविक स्थिति का पता चल जाता है कि वह नित्य दास रूप में है तो वह तुरन्त इन सभी कष्टों से मुक्त हो जाता है। जब तक जीव भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताना चाहता है तब तक वह परमेश्वर का दास नहीं बन सकता। भगवान् की सेवा मनुष्य के आध्यात्मिक स्वरूप की विशुद्ध चेतना द्वारा की जाती है। इस सेवा से वह समस्त भौतिक अवरोधों से तुरन्त मुक्त हो जाता है। इससे भी बढ़कर, श्रीमद्भागवत श्रीव्यासदेव द्वारा की गई वेदान्त-सूत्र पर व्यक्तिगत टीका है। इसका प्रणयन उन्होंने अपने आध्यात्मिक जीवन की परिपक्वावस्था में नारद के अनुग्रह से किया। श्रीव्यासदेव भगवान् नारायण के प्रामाणिक अवतार हैं, अतः उनकी प्रामाणिकता पर किसी प्रकार का सन्देह नहीं किया जा सकता। वे अन्य सभी वैदिक साहित्य के भी प्रणेता हैं तो भी वे श्रीमद्भागवत के अध्ययन को उन सबों से बढ़कर बताते हैं। अन्य पुराणों में विभिन्न विधियाँ दी गई हैं जिनके द्वारा देवताओं की पूजा की जा सकती है, किन्तु भागवत में केवल परमेश्वर का उल्लेख है। परमेश्वर समग्र शरीर हैं और अन्य सारे देवता इस शरीर के विभिन्न अंग हैं। फलस्वरूप परमेश्वर की पूजा करने पर अन्य देवताओं को पूजने की आवश्यकता नहीं रहती। परमेश्वर तुरन्त ही भक्त के हृदय में स्थित हो जाते हैं। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने बताया है कि श्रीमद्भागवत निष्कलंक पुराण है, अतः यह अन्य समस्त पुराणों से भिन्न है। आगे . . . . .
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रागानुगा भक्तिका उदाहरण-
लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म-कर्म।
लज्जा, धैर्य, देहसुख, आत्मसुख-मर्म ॥
दुस्त्याज्य आर्यपथ, निज परिजन।
स्वजने करये जत ताड़न-भर्त्सन ॥
सर्वत्याग करि’ करे कृष्णेर भजन।
कृष्णसुख हेतु करे प्रेम-सेवन ॥
इहाके कहिये कृष्ण दृढ़ अनुराग।
स्वच्छ धौतवस्त्रे यैछे नाहि कोन दाग ॥
अतएव काम-प्रेमे बहुत अंतर।
काम-अन्धतम; प्रेम-निर्मल भास्कर ॥
अतएव गोपीगणेर नाहि कामगन्ध।
कृष्णसुख लागि’ मात्र, कृष्णसे सम्बन्ध।
आत्म-सुख-दुःखे गोपीर नाहिक विचार।
कृष्णसुखहेतु करे सब व्यवहार ॥
कृष्ण लागि’ आर सब करि’ परित्याग।
कृष्णसुखहेतु करे शुद्ध अनुराग ॥
(चै. च. आ. ४/१६७-१७२, १७४-१७५)
लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, विविध प्रकारके कर्म, लज्जा, धैर्य, अपनी इन्द्रियोंका सुख, दुस्त्यज्य आर्यपथ, परिजनोंके प्रति प्रीति तथा स्वजन-बान्धवोंका भय-ये सर्वस्व परित्यागकर गोपियाँ एकमात्र कृष्णका सुख विधान करनेके लिए प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करती हैं। जिस प्रकार धुले हुए वस्त्रमें किसी प्रकारका दाग नहीं होता, उसी प्रकार उनके प्रेममें किसी प्रकारकी कपटता (निजेन्द्रियसुख) रूपी दाग नहीं होता है। ऐसा निर्मल प्रेम ही कृष्णमें अनुराग कहलाता है।
अतएव काम और प्रेममें बहुत अन्तर है। काम घने अन्धकारके समान है तथा प्रेम मेघरहित निर्मल आकाशमें चमकते हुए सूर्यके समान है। अतः गोपियोंमें लेशमात्र भी कामकी गन्ध नहीं है। एकमात्र श्रीकृष्णका सुख ही उनकी काम्य वस्तु है। अपने सुख-दुःखके विषयमें गोपियोंको लेशमात्र भी चिन्ता नहीं होती। उनकी सारी क्रियाएँ श्रीकृष्णको सुख प्रदान करनेके लिए होती हैं। कृष्णके लिए अपना सर्वस्व परित्यागकर कृष्णकी प्रसन्नताके लिए शुद्ध अनुराग करती हैं।
गौड़ीय कण्ठहार
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

नूपर की रुनझुन-रुनझुन ध्वनि एवं विष्णु चरण-चिन्ह
एक दिन श्रीजगन्नाथ मिश्र जी ने पुत्र निमाई को पुस्तक लाने का आदेश दिया। पिता की आज्ञा पाकर निमाई अत्यन्त उत्साह के साथ पिता की आज्ञा को पूर्ण करने लगा। उसी समय शची माता व जगन्नाथ मिश्र ने सुना कि घर में से अद्भुत नूपुर ध्वनि आ रही है। पिता को पुस्तक देकर निमाई खेलने भाग गया। बस, इतने में ही एक और चमत्कार हो गया । शची माता और जगन्नाथ मिश्र ने देखा कि जहाँ जहाँ से निमाई कमरे में गया था, वहाँ-वहाँ पड़े चरण चिन्हों पर ध्वज, वज शंख, अंकुश व पताकादि के चिन्ह पड़े हैं। ये सब देख सुन कर शची-जगन्नाथ आश्चर्य चकित हो गये। लेकिन भगवान की माया द्वारा समझ नहीं पाये कि यह हमारा पुत्र नहीं, भगवान है। सोचने लगे शायद गृह-देवता दामोदर शालिग्राम के पदचिन्ह होगे । दामोदर शालिग्राम शायद घर में विचरण कर रहे होंगे । इसी परमोल्लास में उन्होंने दामोदर शालिग्राम का महाभिषेक, पूजा और भोग रागादि का उत्सव किया ।
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मा मे स्त्रीत्त्वं मा च मे स्यात् कुभावो, मा मूर्खत्त्वं मा कुदेशेषु जन्म।
मिथ्यादृष्टि – र्मा च मे स्यात् कदाचित्, जातौ जातौ विष्णुभक्तो भवेयम् ।।।8।।
मैं कभी भी स्त्री रूप में न जन्मूं, मेरे मन में कभी भी कुभाव न हों। बस, मुझ पर ऐसी कृपा करना कि न तो मैं कभी मूढ़ के रूप में जन्मूं और न ही कभी किसी पतित देश में मेरा जन्म हो। मुझे कभी मिथ्या विषयों का चिन्तन भी न करना पड़े। मेरी तो प्रभो! यही प्रार्थना है कि हर जन्म में मैं केवल एकमात्र विष्णुभक्त ही होऊँ।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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जीव की बहिर्मुख रुचि को बदलना ही सर्वापेक्षा दयालु व्यक्तियों का एकमात्र कर्तव्य है । माया के जाल से एक जीव की रक्षा कर सको तो अनन्त कोटि अस्पताल बनाने की अपेक्षा उससे अनन्तगुण परोपकार का कार्य होगा ।
श्रीलप्रभुपाद
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कानूनी कठोरता आदि से भ्रष्टाचार बन्द नहीं होता
खाने की वस्तुओं की अधिकता से ही यदि सुख शांति होती तो जगत में राजा-महाराजा सब अशांति के बीच जीवन नहीं बिताते। खाने की वस्तुओं की प्रचुरता (अधिकता), कृषि-प्रणाली में विकास या नियम-कानून में कठोरता लाने से भी समस्या का समाधान सम्भव नहीं है। भ्रष्ट लोग कानूनी कमियों की आड़ में ही दुष्कर्म करेंगे। गलत तरीके से यदि ज़्यादा उपार्जन हो सकता है तो मेहनत करके ईमानदारी से जीवन व्यतीत करना निरर्थक है – यही है भ्रष्ट लोगों की युक्ति। 3000 रुपये चोरी करने के बाद यदि कोई पकड़ा जाता है तो 1000 रुपये रिश्वत देकर या वकील को किन्तु इन देकर कानूनी कमियों की आड़ में मुक्त होने पर भी 2000 रुपये का लाभरहता है। या फिर दो या तीन साल की जेल हो सकती है दण्डों के द्वारा भ्रष्टाचार को रोका नहीं जा सकता है। देश के सभी लोग भ्रष्ट हो जाते हैं तो कानून भले कितना ही कठोर हो, रक्षक ही भक्षक में बदल जायेगा।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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प्राचीन वैष्णवजन धीरे-धीरे इस लोक को छोड़कर हम लोगों को परमार्थ की ओर अधिक ध्यान देने का संकेत दे रहे हैं। हम लोगों की आयु बहुत ही कम है। फिर भी श्रीकृष्णपादपद्म प्राप्ति का अवसर, उसके अनुरुप सुविधा और पथ के विषय में जानते हुये भी हम तीव्रता से भजन करने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं। जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों के कारण हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गये हैं। जिस कारण हम देह-गेह (शरीर और घर) या उससे सम्बन्धित मायिक वस्तुओं को ही अपना धन और सर्वस्व समझ बैठे हैं। इसीलिये हम अपने वास्तविक सर्वस्व- अखिल रसामृत मूर्त्ति- श्रीकृष्ण की प्राप्ति से वन्चित हो गये हैं। जब तक हमारा अहंकार नहीं बदलेगा तब तक श्रीकृष्ण का वास्तविक अनुशीलन सम्भव नहीं है। सांसारिक अभिमान से जो भी साधन किया जाता है, वह अध्यात्म मार्ग में आगे नहीं ले जा सकता। जब तक इस मायिक barrier को transcend (अतिक्रमण) नहीं किया जायेगा तब तक परमात्मा का अनुशीलन नहीं हो सकता।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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सेवा के राज्य में ‘बदला’ लेने की कोई बात नहीं है। वहाँ संयम और सहनशीलता ही सेवक का विशेष सद्गुण है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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आत्मा ही आत्मा की आवश्यकता
स्वतंत्रता सेनानी अरविंद घोष ने अपनी आत्म-कथा में अपने द्वारा अनुभव की हुई एक घटना का वर्णन किया है। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन था। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कोलकाता की अलीपुर जेल के एक छोटे से कमरे में बंद कर दिया था। तब उन्हें अनुभव होने लगा, “इस बंद कमरे में मैं और जीवित नहीं रह सकता, इससे तो अच्छा होता वे मुझे मार ही देते।”
वे उदास रहने लगे। एक दिन उनका ध्यान कमरे में घूम रही कुछ चींटियों की ओर गया। बहुत दिनों के बाद किसी चेतन वस्तु को देखकर उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई। वे सोचने लगे कि चींटी के शरीर में आत्मा है, उसी प्रकार मेरे शरीर में भी आत्मा है। इस प्रकार का ध्यान करते-करते वे तन्मय हो गए। आत्म-तत्व के बारे में विचार करते-करते उन्हें सभी जगह व्याप्त चेतन-सत्ता के ज्ञान की अनुभूति हुई जिसने उनके हृदय में शांति की अनुभूति करवाई। वे अनुभव कर पाए कि सभी अणुचेतन जीवों का मूल कारण वह सर्वव्यापक चेतन-सत्ता है। और क्योंकि सभी जीव उस चेतन-सत्ता से आते हैं, चेतन-वस्तु ही जीव की आवश्यकता है और चेतन-वस्तु ही जीव को सुख दे सकती है, अचेतन (जड़) वस्तु नहीं।
यदि किसी व्यक्ति को बहुत सी ज़मीन दे दी जाए, खाने-पीने की नाना प्रकार की वस्तुएँ दे दी जाएँ, रहने के लिए बड़ी-बड़ी इमारतें दे दी जाएँ, किन्तु यदि वहाँ पर कोई चेतन-वस्तु (मनुष्य, पक्षी, पशु या तो कोई भी जीव) का अस्तित्व न हो तो उस व्यक्ति को वहाँ घुटन होने लगेगी। ऐसी स्थिति में उसे सोने-चाँदी, हीरे, जवाहरात जैसी मूल्यवान वस्तुएँ मिल जाएँ तब भी वह दुःख का ही अनुभव करेगा। यहाँ तक कि ऐसी परिस्थिति में वह आत्महत्या भी कर सकता है। किन्तु यदि उसे वहाँ कोई एक भी जीव दिख जाए तो वह उसे देखकर आनंद का अनुभव करेगा क्योंकि प्रत्येक जीव में आनंद-सत्ता, चेतन-सत्ता विराजित है। जब तक चेतन-सत्ता शरीर में है तब तक जीव अन्य जीवों को आनंद प्रदान कर सकता है। किन्तु उस चेतन-सत्ता के चले जाने के बाद एक मृत-जड़-शरीर किसी को आनंद नहीं दे सकता। आत्मा जड़ वस्तुओं से अलग है। आत्मा ही शरीर (जड़-वस्तु) को चेतनता प्रदान करती है। एक चींटी के शरीर में जो आत्मा है, वही एक हाथी के शरीर में, मनुष्य के शरीर में और बाकी जीवों के शरीर में है। आत्मा ही आत्मा की आवश्यकता है, अनात्मा (प्राण-विहीन वस्तु) नहीं। प्रत्येक आत्मा (जीव), विभु-आत्मा भगवान् से आती है इसलिए जीव की वास्तविक आवश्यकता है- भगवान्। भगवान् ही शांति स्वरूप पूर्ण वस्तु हैं। पूर्ण से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही बाकी रहता है। इसलिए एक व्यक्ति को वह पूर्ण वस्तु मिलने पर अन्य कोई व्यक्ति उस पूर्ण वस्तु से वंचित रह जाएगा, ऐसा नहीं है। अनंत जीव उस पूर्ण को प्राप्त कर सकते हैं। ब्रह्माजी भगवान् श्रीकृष्ण से कहते हैं-
तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं ।
स्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदुःखदुःखम्।
त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते
मायात उद्यदपि यत्सदिवावभाति ॥
(श्रीमद् भागवतम् १०/१४/२२)
“यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड अनित्य है; एक स्वप्न जैसा है, क्षणभंगुर (अस्थायी), ज्ञान से रहित, निष्क्रिय और अत्यंत पीड़ा-दायक है। किन्तु आप नित्य, पूर्ण ज्ञानमय और पूर्ण आनंदमय हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड आपकी दिव्य शक्ति द्वारा निर्मित और नष्ट होता है। फिर भी यह नित्य प्रतीत होता है।”
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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