मुनियों की जिज्ञासा
आगे . . . . . वेदों में उपर्युक्त चारों कर्मों की संस्तुति विधान के रूप में है जिससे इन्द्रियतृप्ति के लिए अनावश्यक स्पर्धा न उत्पन्न हो। किन्तु श्रीमद्भागवत इन इन्द्रियतृप्ति सम्बन्धी कर्मों से परे है। यह नितान्त दिव्य साहित्य है जो उन्हीं शुद्ध भगवद्भक्तों द्वारा समझा जा सकता हैं जो प्रतियोगी इन्द्रियतृप्ति से परे रहते हैं। इस भौतिक जगत में पशु तथा पशु, मनुष्य तथा मनुष्य, सम्प्रदाय तथा सम्प्रदाय और राष्ट्र तथा राष्ट्र के मध्य विकट स्पर्धा चल रही है। लेकिन भगवान् के भक्त ऐसी स्पर्धा से बहुत ऊपर रहते हैं। वे भौतिकतावादी व्यक्ति से स्पर्धा नहीं करते, क्योंकि वे भगवद्धाम वापस जाने के मार्ग पर होते हैं जहाँ जीवन शाश्वत तथा आनन्दमय होता है। ऐसे अध्यात्मवादी द्वेषरहित और शुद्ध-हृदय होते हैं। भौतिक जगत में प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से ईर्ष्या करता है, अतएव स्पर्धा चलती रहती है। लेकिन भगवान् के दिव्य भक्त न केवल ईर्ष्या द्वेष से रहित होते हैं, अपितु सबका कल्याण चाहते हैं और वे ईश्वर को केन्द्र मानकर एक स्पर्धाविहीन समाज स्थापित करने का प्रयास करते रहते हैं। स्पर्धारहित समाज की वर्तमान समाजवादी विचारधारा कृत्रिम है, क्योंकि उसमें तानाशाह के पद के लिए स्पर्धा चलती है। वेदों की दृष्टि से या सामान्य जन के क्रियाकलापों की दृष्टि से, इन्द्रियतृप्ति ही भौतिक जीवन का मूलाधार है। वेदों में तीन मार्ग बताये गये हैं। पहला है श्रेष्ठतर लोकों की प्राप्ति के उद्देश्य से सकाम कर्म करना। दूसरा है देवलोक जाने के लिए विभिन्न देवताओं की पूजा करना और तीसरा है परमसत्य तथा उनके निर्विकार स्वरूप का साक्षात्कार करके तदाकार होना। किन्तु परमसत्य का निराकार स्वरूप ही सर्वोत्कृष्ट नहीं है। इससे भी बढ़कर परमात्मा-स्वरूप है और इसके भी ऊपर है परमसत्य या भगवान् का साकार रूप। श्रीमद्भागवत परमसत्य के साकार स्वरूप के विषय में सूचना प्रदान करता है। यह समस्त निर्विशेषवादी साहित्य तथा वेदों के ज्ञानकाण्ड विभाग से श्रेष्ठ है। यह कर्मकाण्ड विभाग तथा उपासना काण्ड विभाग से भी उच्चतर है, क्योंकि यह भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा का निर्देश करता है। कर्म-काण्ड में श्रेष्ठ इन्द्रियतृप्ति के लिए स्वर्ग जाने की स्पर्धा चलती है। इसी प्रकार ज्ञान-काण्ड तथा उपासना काण्ड में भी स्पर्धा चलती है। श्रीमद्भागवत इन सबों से श्रेष्ठ है, क्योंकि इसका लक्ष्य परमसत्य है जो इन समस्त विभागों का मूल है। श्रीमद्भागवत से वस्तु तथा विभाग दोनों जाने जा सकते हैं। यह वस्तु परमसत्य परमेश्वर है और अन्य सारे उद्भासन शक्ति के सापेक्ष रूप हैं। फि वस्तु से भिन्न कुछ नहीं है, किन्तु साथ ही, सारी शक्तियाँ वस्तु से पृथक हैं। यह विचारधारा विरोधमूलक नहीं है। श्रीमद्भागवत स्पष्ट रूप से वेदान्त सूत्र के इस एक-तथा-भिन्न युगपत् दर्शन (भेदाभेदवाद) को घोषित करता है जो जन्माद्यस्य सूत्र से प्रारम्भ होता है। आगे . . . . .
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वेद-तात्पर्य ग्रहण करनेमें देवताओंका भी मोह-
कर्माकर्म विकर्मेति वेदवादो न लौकिकः ।
वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥
परोक्षवादो वेदोऽयं बालानामनुशासनम् ।
कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते ह्यगदं यथा ॥
नाचरेद् वस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः ।
विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः ।।
वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे ।
नैष्कर्यं लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुतिः ॥
(श्रीमद्भागवत ११/३/४३-४६)
कर्म, अकर्म और विकर्म-ये तीनों एकमात्र वेदके द्वारा जाने जाते हैं, वेद स्वयं ईश्वर हैं। इसलिए उनके तात्पर्यका निश्चय करना बहुत कठिन है। इसीसे बड़े-बड़े विद्वान् भी उनके अभिप्रायका निर्णय करनेमें भूल कर बैठते हैं। अर्थका सङ्गोपन करनेके लिए उसको अन्य प्रकारसे वर्णन करनेका नाम परोक्षवाद है। वेद स्वयं परोक्षवाद एवं अज्ञ, अशान्त, बालस्वभावतुल्य जीवोंके लिए अनुशासनस्वरूप हैं। जैसे पिता रोगग्रस्त बालकको आरोग्यके लिए उसको मिठाई आदिका लालच देकर औषध खिलाते हैं, उसी प्रकार शास्त्र भी कर्मोंकी निवृत्ति हेतु कर्ममूढ़ जीवोंके लिए कर्मका विधान करते हैं।
गौड़ीय कण्ठहार
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

निमाई की शेष – शैया पर शयन लीला
श्रीकृष्ण लीला में जैसे यशोदा का गोपाल नन्द महाराज के आंगन में घुटनों के बल खेलता रहता था और कौवा आकर गोपाल के हाथ से रोटी छीन कर ले जाता था, उसी प्रकार एक दिन शची माता के आंगन में, भगवान बालक निमाई के रूप में घुटनों के बल मनोहर भंगी से स्वच्छन्द विहार कर रहे थे कि अचानक एक विशाल काला सर्प वहाँ आ निकला और फन फैलाकर और कुण्डली मार कर बैठ गया। निमाई नादान बच्चे की तरह कमर में लगी किंकणी की टुन-टुन घ्वनि के साथ सर्प को पकड़ने के लिए दौड़ने लगा और सर्प के ऊपर जाकर लेट गया। शिशु को इस प्रकार लेटा देख सभी भय से व्याकुल हो गये। शची माता व जगन्नाथ मिश्र जी अति दुखित होकर पुत्र की सर्प से रक्षा के लिए सर्पों के शत्रु गुरुड़ को पुकारने लगे । लेकिन बालक निमाई सर्प के ऊपर लेटा निश्चिन्त हँसता रहा। भक्तों को दुःखी देख अनन्त देव निमाई को छोड़ कर चले गए। निमाई फिर उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे घुटनों के बल दौड़ने लगा, लेकिन सर्प से भयभीत नारी – गणों ने फुर्ती से निमाई को गोद में उठा लिया और उसके मंगल के लिए उसे आशीर्वाद देने लगीं तथा स्तुति मन्त्रादि उच्चारण करने लगीं ।
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अपराध – सहस्त्र संकुलं, पतितं भीम – भवार्णवोदरे।
अगतिं शरणागतं हरे ! कृपया केवलमात्मसात् कुरु ।।17।।
हे हरि ! मैं अगणित अपराधों से ग्रस्त हूँ, भयंकर संसार रूपी समुद्र में गोते खा रहा हूँ तथा बिल्कुल ही आश्रयहीन हूँ। अतः आपकी शरण ग्रहण कर रहा हूँ। आप अपने अनेक गुणों में से केवल एक गुण ‘कृपा’ के द्वारा मुझे अपना बना लें अर्थात् मुझे अपने दास के रूप में स्वीकार कर लें।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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जिस क्षण हमारा रक्षाकर्ता नहीं रहेगा उसी क्षण हमारी निकटवर्तीनी सब वस्तुएँ शत्रु होकर हम पर आक्रमण करेंगी । सच्चे साधु की हरिकथा ही हमारी रक्षक है ।
श्रीलप्रभुपाद
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हरिभजन की चेतना से युक्त प्राणी ही श्रेष्ठ
“ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव ।
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्तिलता बीज ।।”
“ताते कृष्ण भजे, करे गुरुर सेवन।
मायाजाल छुटे-पाये श्रीकृष्णचरण।।”
(अर्थात् ब्रह्माण्ड में भ्रमण करते हुए किसी भाग्यवान जीव को गुरु-कृष्ण-प्रसाद (कृपा) से भक्ति का बीज मिलता है। उसमें गुरु की सेवा करते हुए कृष्ण को भजते हैं और माया जाल से मुक्ति पाकर श्रीकृष्ण के चरण लाभ करते हैं।)
वैसे प्राणी मात्र को ही हरिभजन का अधिकार है। पशु भी यदि हरिभजन करता है तो वह हरिविमुख मनुष्य, देवता, गन्धर्व आदि से श्रेष्ठ है। जैसे हम श्रीचैतन्य चरितामृत में देखते हैं कि, श्रीमन् महाप्रभु के पार्षद श्रीशिवानन्द सेन का एक कुत्ता था। उसने महाप्रभु के दर्शन के लिए शिवानन्द प्रभु के साथ पुरी की यात्रा की थी और पुरी जाकर महाप्रभु के दर्शन प्राप्त कर, उनकी अशेष कृपा प्राप्त की थी। इससे उस कुत्ते ने ‘कृष्ण’ नाम उच्चारण करते-करते सिद्ध शरीर प्राप्त कर बैकुण्ठ गति लाभकी थी। जो प्राणी हरिभजन करेगा, उसे और 84 लाख जन्मों का असहनीय कष्ट भोगना नहीं पड़ेगा भगवान की कृपा लाभ कर एकदम परमगति अर्जन करेगा। भक्ति की ऐसी महिमा कि देवता, गन्धर्व तक भगवद्भक्त की सेवा के लिए उतावले हो जाते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि, एकबार देवराज इन्द्र ने अत्यन्त अहंकार के मद में श्रीकृष्ण के चरणों में कोई महापराध कर दिया था; तब उस अपराध से मुक्त होने के लिए वे कृष्णभक्त ‘सुरभी-गाय की शरण में गये थे। भले ही इन्द्र, देवराज थे और सुरभी एक गाय अर्थात् पशु श्रेणी के अन्तर्गत थी, फिर भी इन्द्र की अपेक्षा सुरभी की प्राधान्यता ज्यादा रही क्योंकि ‘सुरभी’ कृष्णभक्त है। शास्त्रों में भक्तों की ऐसी महिमा का उल्लेख है।
फिर हम रामायण में देखते हैं कि, जब श्रीरामचन्द्र के लंका में जाने के लिए सेतु तैयार हो रहा था, तब एक गिलहरी भी उस सेवा में लग गई थी। संकुचित चेतन गिलहरी में भी सेवा भाव देखकर श्रीरामचन्द्र अत्यंत आनन्दित हो गये और संतुष्ट होकर उसे परमगति प्रदान की। शुक-सारी (तोता-तोती) दो पक्षी हरदम भगवान् का ही नामगान करते हैं। अतः देखा जाता है कि प्रत्येक प्राणी ही भगवान् की सेवा कर सकता है और उस सेवा के द्वारा वह श्रेष्ठ गति भी लाभ कर सकता है इसके बहुत सारे प्रमाण हमें शास्त्रों में दिखायी देते हैं।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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भगवान् का एक नाम कृष्ण है। कारण, वे सब को आकर्षित करके आनन्द प्रदान करते हैं एवं स्वयं आनन्दित होते हैं। कृष्ण हर विषय में सर्वोत्तम हैं, अखिलरसामृत मूर्ति हैं, वे सच्चिदानन्द विग्रह हैं, अनादि हैं व सबके आदि हैं। वे समस्त कारणों के भी कारण हैं। अतः वे एक मात्र विशुद्ध प्रेम द्वारा ही आराधनीय है। उनके साथ ही जीवों का नित्य सम्बन्ध है। श्रीकृष्ण को भूलना ही जीवों के दुःखों का मूल कारण है। श्रीकृष्ण को याद करने का सबसे सहज और निश्चित उपाय उनका नाम-संकीर्त्तन है। जाति, धर्म, पुरुष या स्त्री के भेदभाव के बिना व वृद्ध-युवक व बालक आदि अवस्थाओं के भेदभाव के बिना सभी भगवान् का नाम संकीर्त्तन करने के अधिकारी हैं। इस हरिनाम संकीर्त्तन रूपी झण्डे के नीचे सभी स्तरों के लोग एकत्रित हो सकते हैं। हमारी वैदिक-संस्कृति में ऋषियों ने धर्म और अधर्म के तारतम्यानुसार असीम समय को चार भागों में विभक्त किया है सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि। सत्ययुग के मनुष्यों में ज्ञान की प्रधानता होने की वजह से उन्हें जागतिक वस्तुओं की नश्वरता का बोध था। ये सभी विषय परिणाम में दुःख देने वाले हैं – इस बात का ज्ञान रहने के कारण उनकी संसार में स्वाभाविक अनासक्ति थी व उनका चित्त भी स्थिर था। अतः तब सर्वसाधारण भी ‘ध्यान’ के द्वारा भगवान् की आराधना कर सकते थे। बाद में त्रेतायुग में एक पाद अधर्म प्रवेश करने पर व रजोगुण की प्रधानता होने से सत्य युग की अपेक्षा कर्म और विषयों की तरफ लोगों का अधिक झुकाव होने के कारण उन विषयों को भगवान् के चरणों में समर्पण कर ‘यज्ञ’ के द्वारा भगवान् की आराधना की व्यवस्था दी गयी।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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गुरु-वैष्णवों को प्रीति करने के लिए उनके अन्य सतीर्थ और अपने गुरु-भाईयों के प्रति भी समान रूप से ही श्रद्धा-भक्ति रखनी चाहिए।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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वास्तविक धाम दर्शन
हमारे गुरुजी (श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज) जब कोलकाता मठ में विराजमान थे तब बिरलाजी के एक रिश्तेदार उनसे मिलने के लिए आए। वे गुरुजी के प्रति बहुत श्रद्धा रखते थे। उन्होंने गुरुजी से कहा, “स्वामी जी, मैं जब बीस-पच्चीस साल पहले वृन्दावन गया था, तब वृन्दावन बहुत अच्छा था। पर अभी कुछ दिन पहले जब मैं गया तो देखा कि वृन्दावन गन्दा हो गया है।”
गुरुजी ने आश्चर्य से कहा, “वृन्दावन गंदा हो गया? ऐसा तो कभी सुना नहीं!”
उन्होंने आगे बताया, “मैं आज से बीस-पच्चीस साल पहले जब वृन्दावन गया था तब वहाँ बहुत अच्छा दूध और दही मिलता था। मिठाई और रबड़ी भी बहुत अच्छी मिलती थी। वहाँ के लोग भी बहुत अच्छे थे। तब मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ था। पच्चीस साल बाद अभी मैं दोबारा वहाँ गया तो फिर मैंने रबड़ी खरीदकर खाई। किन्तु इस बार उससे मुझे रक्त पेचिश (blood dysentery) हो गया। रबड़ी बनानेवाले ने उसमें ब्लॉटिंग पेपर (Blotting paper) मिला दिया था। मेरी स्थिति बहुत नाजुक हो गई थी और लगने लगा था कि मेरी मृत्यु हो जाएगी। हॉस्पिटल में किसी प्रकार मेरे प्राण बचे। अभी वृन्दावन में बाहर का कोई भी खाद्य पदार्थ नहीं खा सकते। कोई भी ठग सकता है। वृन्दावन गंदा हो गया है।”
उनकी बातें सुनकर गुरुजी बोले, “वृन्दावन कभी गन्दा नहीं होता। हमें वृन्दावन इस शरीर या इन इंद्रियों के सुख के लिए नहीं जाना चाहिए। वृन्दावन साक्षात् भगवान् है। जैसे भगवान् इस जगत् में अवतीर्ण होते हैं, उसी प्रकार उनका धाम भी अवतीर्ण होता है। जिस प्रकार भगवान् किसी के अधीन नहीं हैं और किसी के भोग की वस्तु नहीं हैं, ठीक उसी प्रकार वृन्दावन भी किसी के अधीन नहीं है। आप वृन्दावन को भगवान् से अलग समझते हैं क्या? भगवान् का नाम, विग्रह (श्रीमूर्ति), स्वरूप और धाम, सब एक ही हैं।”
वृन्दावन धाम भारत या उत्तर प्रदेश का हिस्सा नहीं है। वह पंचमहाभूत-भूमि, जल, अग्नि, वायु या आकाश से नहीं बना है। जब कोई व्यक्ति अपनी सीमित बुद्धि से धाम को समझने का प्रयास करता है तब वह धाम की तुलना इस जगत् के किसी सामान्य स्थान-जैसे दिल्ली, कोलकाता या मुंबई- के साथ करता है और उन स्थानों को धाम से अच्छा समझता है। धाम का दर्शन करने के लिए दिव्य नेत्रों की आवश्यकता है। शरणागत व्यक्ति के हृदय में ही धाम की महिमा प्रकाशित होती है। क्योंकि अशरणागत व्यक्ति अपनी सीमित बुद्धि से भगवान् और उनके धाम को समझने का प्रयास करता है पर कभी भी उन्हें समझ नहीं पाता। ऐसा व्यक्ति पूर्ण रूप से वंचित रह जाता है और कभी भी धाम का स्पर्श भी नहीं कर पाता। वह धाम के बाह्य (बाहरी) रूप को ही देखता है। कोई भी व्यक्ति जड़-शरीर से धाम में प्रवेश नहीं कर सकता।
हमारे गुरुदेव ब्रजमण्डल परिक्रमा के समय कहते थे, “कोई भी व्यक्ति अपने दांतो को साफ करने के लिए धाम के वृक्ष के दातुन का उपयोग न करें। केवल ब्रजवासी ही इसका उपयोग कर सकते हैं। हमारे लिए इसका उपयोग करना अच्छा नहीं होगा।”
धाम से सम्बन्धित सभी वस्तुएँ भगवान की सेवा के लिए होतीं हैं। हमें धाम में शरणागति के साथ निवास करना चाहिए। श्रील रूप गोस्वामी, श्रील सनातन गोस्वामी तथा श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी अति धनाढ्य तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। वे साधारण व्यक्ति नहीं थे। फिर भी वे वृन्दावन में वृक्ष के नीचे वास किया करते थे। क्या उन्होंने वृन्दावन को एक गन्दे स्थान के रूप में देखा? नहीं, उनके चक्षु दिव्य थे। उन्हीं दिव्य चक्षुओं द्वारा वे भगवान की दिव्य लीलाओं के दर्शन किया करते थे। यदि कोई व्यक्ति बिना शरणागति के धाम की चिन्मय वस्तुओं को जानने का प्रयास करता है, तो महामाया उसे अपने बन्धन में बाँध लेती है तथा वह व्यक्ति धाम में वास करने पर भी घृणित कृत्यों में लिप्त हो जाता है। भगवान के जितने भी नित्य निवास स्थान हैं जैसे कि मायापुर, वृन्दावन तथा पुरुषोत्तम धाम इत्यादि, सभी चिन्मय (अप्राकृतिक) स्थान हैं। यदि धाम में वास करके भी हमें स्वयं की इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने की इच्छा रहती है, तो धाम अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकाशित नहीं करते।
जो व्यक्ति, “मैं भगवान् का हूँ,” इस बात का अनुभव करते हुए भक्तों के संग में शरणागति के छह अंगों का पालन करता है, उसके हृदय में भगवान् और उनका धाम स्वयं ही प्रकाशित हो जाते हैं।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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