श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

मुनियों की जिज्ञासा
धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् ।
श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ।।२।।
यथा श्रीमद्भागवत (1.01.02)
अनुवाद – यह भागवत पुराण, भौतिक दृष्टि से प्रेरित होने वाले समस्त धार्मिक कृत्यों को पूर्णतया बहिष्कृत करते हुए, सर्वोच्च सत्य का प्रतिपादन करता है, जो पूर्णतया शुद्ध हृदय वाले भक्तों के द्वारा बोधगम्य है। यह सर्वोच्च सत्य वास्तविकता है जो सबों के कल्याण के लिए मोह से विभेदित है। ऐसा सत्य तापत्रय को समूल नष्ट करने वाला है। महामुनि व्यासदेव द्वारा (अपनी परिपक्वावस्था में) संकलित यह सुन्दर भागवत ईश्वर-साक्षात्कार के लिए अपने में पर्याप्त है। तो फिर अन्य किसी शास्त्र की कैसी आवश्यकता ? ज्योंही कोई ध्यानपूर्वक तथा विनीत भाव से भागवत के सन्देश को सुनता है तो ज्ञान के इस संस्कार (अनुशीलन) से उसके हृदय में परमेश्वर स्थापित हो जाते हैं।
तात्पर्य – धर्म में चार मूल विषय सम्मिलित हैं- शुभ कर्म, आर्थिक विकास, इन्द्रियतुष्टि तथा भवबन्धन से मोक्ष। अधार्मिक जीवन बर्बर अवस्था है। मानव जीवन का सूत्रपात धर्म से होता है। आहार, निद्रा, भय तथा मैथुनये पशु जीवन के चार नियम (लक्षण) हैं। ये चारों पशुओं तथा मनुष्यों में समान रूप से लागू होते हैं। किन्तु मनुष्यों में धर्म अतिरिक्त कार्य होता है। धर्म के बिना मनुष्य जीवन पशु जीवन के तुल्य है। अतः प्रत्येक मानव समाज में धर्म का कोई न कोई रूप पाया जाता है जिसका उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार है और जो ईश्वर के साथ मनुष्य के शाश्वत सम्बन्ध को बताने वाला है।
मानव सभ्यता की निम्नतर अवस्थाओं में, प्रकृति पर प्रभुत्व दिखाने के लिए सदैव होड़ लगी रहती है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि इन्द्रियों को तुष्ट करने के लिए निरन्तर स्पर्धा चलती रहती है। ऐसी प्रवृत्ति के वशीभूत होकर मनुष्य धर्म की ओर मुड़ता है। इस तरह वह कुछ भौतिक लाभप्राप्त करने के लिए पुण्य कर्म या धार्मिक कृत्य करता है। किन्तु यदि ऐसे भौतिक लाभ अन्य साधनों से प्राप्त हो जाते हैं तो तथाकथित धर्म उपेक्षित हो जाता है। आधुनिक सभ्यता का यही हाल है। मनुष्य आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होता जा रहा है अतः वर्तमान समय में वह धर्म में अधिक रुचि नहीं लेता। गिरजाघर, मसजिदें या मन्दिर एक तरह से अब निर्जन हैं। लोगों की रुचि अपने पूर्वजों द्वारा निर्मित कराये गये धार्मिक स्थलों में न होकर फैक्टरियों, दूकानों तथा सिनेमाघरों की ओर अधिक है। इससे यह सिद्ध होता है कि किसी न किसी आर्थिक लाभ के लिए ही धर्म किया जाता है। आर्थिक लाभ की आवश्यकता इन्द्रियतृप्ति के लिए है। प्रायः इन्द्रियतृप्ति की खोज से ऊब कर मनुष्य मोक्ष की ओर मुड़ता है और परमेश्वर से तदाकार होने का प्रयत्न करता है। फलस्वरूप, ये सारी दशाएँ इन्द्रियतृप्ति के विभिन्न प्रकार बन जाती हैं। आगे . . . . .
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यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति ।
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म ॥
(तैत्तिरीय ३/१)
जिनसे समस्त प्राणी-समुदाय उत्पन्न हुआ है- इससे ईश्वरमें अपादान-कारकत्व सिद्ध हुआ है, जिनके द्वारा सभी जीवित हैं- इससे उनमें करण कारकत्व सिद्ध है तथा जिनमें गमन और प्रवेश करता है- इससे ईश्वरमें अधिकरण-कारकत्व सिद्ध है। इन तीन लक्षणोंसे परतत्त्व विशिष्ट हैं। ये तीन उनके विशेष हैं। अतएव भगवान् सर्वदा सविशेष हैं। ऐसे भगवान् कदापि केवल निराकार नहीं हो सकते। षडैश्वर्यपूर्ण सच्चिदानन्द-स्वरूप ही उनका नित्य अप्राकृत आकार है ।
गौड़ीय कण्ठहार
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

मिट्टी खाता गौर – गोपाल
अब निमाई कुछ बड़ा हो गया और थोड़ा चलने फिरने लग गया, लेकिन बहुत चंचल । एक दिन शची माता ने निमाई को खाने के लिए सुन्दर बर्तन में खई – सन्देश (मिठाई) खाने को दी और स्वयं घर के कामों में लग गयी। लेकिन निमाई वे सब न खाकर चोरी से मिट्टी खाने लगा । जब शची माता ने देखा तो दौड़कर आयी और यशोदा माता की तरह ज़बरदस्ती बच्चे का मुँह खोलकर मिट्टी निकालने लगी। लेकिन आज इस लीला में श्रीकृष्ण अपनी माता को मुँह में विश्वरूप नहीं दिखाते बल्कि कहते हैं कि वई, सन्देश या चावल इत्यादि सभी तो मिट्टी के विकार हैं, फिर खई और मिट्टी या सन्देश में क्या अन्तर है? ये शरीर भी मिट्टी है और शरीर की आवश्यक खाद्य सामग्री भी मिट्टी है, तो मैंने खई सन्देश की बजाए मिट्टी खा ली तो इसमें दोष क्या है? शची माता बालक के मुँह से इस प्रकार ज्ञान की बात सुनकर आश्चर्य चकित हो गयी और कहने लगी कि यह सब ज्ञान की बातें तुझे किसने सिखाईं? देखो ! मिट्टी के ही विकार अन्न (चावल) खाने से शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है किन्तु सिर्फ मिट्टी खाने से शरीर रोगी हो जाता है तथा नष्ट हो जाता है। और देखो ! मिट्टी के विकार घड़े में पानी रखा जा सकता है, किन्तु सिर्फ मिट्टी के ढेले पर पानी डालने से वह पानी सोख लेता है और फूट जाता है। तब निमाई मुस्करा कर कहने लगा “माँ ! अब मैं समझ गया, अब मैं मिट्टी नहीं खाऊँगा, भूख लगने से आपका दूध पिया करूँगा ।”
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रजसि निपतितानां मोहजालावृतानां,
जनन – मरण – दोलादुर्ग – संसर्गगानाम् ।
शरणमशरणानामेक एवातुराणां,
कुशलपथ नियुक्तश्चक्रपाणिर्नराणाम् ।।।6।।
अहंकार में डूबे हुए, मोह रूपी जाल में फंसे हुए, जन्म-मरण के चक्कर में फंसे हुए, निराश्रय तथा संसार में तड़पते हुए प्राणियों के मंगलमय पथ के प्रवर्तक, भगवान् श्रीनारायण ही उनके एकमात्र आश्रय हैं।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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अपने गृह वृन्दावन में पाने के लिए गोपियों की तीव्र उत्कण्ठा,
यथा श्रीमद्भागवत (१०.८२.४९)-
आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं योगेश्वरैर्हदि विचिन्त्यमगाधबोधैः ।
संसार-कूप-पतितोत्तरगावलम्ब गेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः ।।
– कुरुक्षेत्र मिलनमें श्रीराधिका प्रमुख गोपियोंने कहा- हे कमलनाभ! अगाध बोधसम्पन्न बड़े-बड़े योगेश्वर अपने हृदय कमलमें आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं। जो संसार कूपमें गिरे हैं, उन्हें उससे निकालनेके लिए आपके चरणकमल ही एकमात्र अवलम्बन हैं। प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिए कि आपके वह चरणकमल, घर-गृहस्थका काम करते रहनेपर भी सदासर्वदा हमारे हृदयमें विराजमान रहें, हम एक क्षणके लिए भी उन्हें न भूलें ।। २१ ।।
कृष्ण हे!
अगाध बोध सम्पन्न, योगेश्वरगण धन्य,
तव पद करुन चिन्तन।
संसार पतित जन, धरु तव श्रीचरण,
कूप हइते उद्धार कारण।।
आमि ब्रज गोप नारी, नाहि योगी न संसारी,
तोमा लजा आमार संसार।
मम मन वृन्दावन, राखि तथा ओ चरण,
एइ वाञ्छा पूराओ आमार ।।
भजनरहस्यवृत्ति-कुरुक्षेत्रमें मिलनके समय श्रीकृष्णने विरह-कातरा व्रजगोपियोंको सान्त्वना देनेके लिए ब्रह्मज्ञान और योगकी शिक्षा दी कि ‘मैं सर्वत्र ही व्याप्त हूँ, तुमलोगोंसे कदापि मैं सर्वथा अलग नहीं हूँ, ध्यानयोगके द्वारा मुझे अपने हृदयमें दर्शन करनेका प्रयास करो।’
प्रियतमके ब्रह्मज्ञान और योग सम्बन्धी उपदेशोंको सुनकर इषत् कूपित होकर कहने लगीं- ‘हे तत्त्वाचार्यभाष्कर! यह ज्ञानयोगका उपदेश और कहीं करना। हम भोलीभाली अज्ञ गोपियाँ इसे समझ नहीं सकीं। श्रोताके अनुरूप ही उपदेश करना श्रेयस्कर होता है। इन उपदेशोंको सुनकर हमारा हृदय जलने लगता है। प्राणनाथ ! दूसरोंका हृदय, मन है- यह बात सत्य है किन्तु हमारा मन वृन्दावन है। यदि तुम वृन्दावनमें चलो तो हम यह समझ लेंगी कि हमारे मनमें चले आये। यही तुम्हारी पूर्णकृपा होगी, अन्यथा नहीं। व्रज हमारा मन ही नहीं, अपितु घर भी है। वहाँपर तुम्हारे साथ मिलन नहीं होनेपर हमारे प्राण निकलने लगते हैं।
तुमने पहले उद्धवके द्वारा इसी योग-ज्ञानका उपदेश दिया था। आज स्वयं भी हमें उसीका उपदेश दे रहे हो। तुम रसिक और परम दयालु हो। हमारे हृदयकी भावनाओंको भी समझते हो। फिर भी ऐसी बातें क्यों करते हो? तुम जानते हो कि हम तुमसे अपनी प्रीति निकालकर सांसारिक विषयोंमें लगाना चाहती हैं; किन्तु लाख प्रयत्न करनेपर भी ऐसा नहीं कर पार्ती। इधर तुम हमें अपने ध्यानकी शिक्षा दे रहे हो, क्या तुम्हें कहाँ क्या शिक्षा देनी चाहिए इसका तनिक भी विचार नहीं रहा? हम गोपियाँ योगेश्वर नहीं हैं। हमें तुम्हारे श्रीचरणोंके ध्यानसे कदापि सन्तोष नहीं हो सकता। हमें तुम्हारी ऐसी बातोंको सुनकर बड़ा ही रोष होता है। भले मानुष! जिन्हें अपनी देहकी भी स्मृति नहीं है-उन्हें संसार-कूप कहाँ सम्भव है, फिर उससे उद्धारकी कामना उनमें कहाँ सम्भव है? वे तो सदासर्वदा तुम्हारे विरहके अगाध जलमें निमज्जित हो रही हैं, वहाँ कामरूप मगरमच्छ उन्हें निगल रहा है। हे प्राणनाथ। उन गोपियोंकी रक्षा करो।
हे जीवनधन ! तुम वृन्दावन, गोवर्द्धन, यमुना-पुलिन और कुंजोंमें रासादि लीलाओंको भूल गयेः अहो! यह आश्चर्यकी बात है कि तुम व्रजवासियों, सखाओं और माता-पिताको कैसे भूल गये? यह हमारा दुर्दैव है। हम अपने लिए दुःखी नहीं, दुःखी हैं व्रजेश्वरी यशोदा मैयाके लिए। उनका उदास मुख देखकर हृदय विदीर्ण हो जाता है। हमारे साथ तुम्हारा सम्बन्ध मानो तो है, नहीं मानो तो नहीं है; किन्तु यशोदा मैयाके साथ तुम्हारा रक्तका सम्बन्ध है। उनके रक्तसे तुम्हारा शरीर गठित हुआ है, तुम्हारे भूलनेपर भी वह सम्बन्ध दूर नहीं हो सकता। तुम व्रजमें पधारो या न पधारो-यह तुम्हारी इच्छाके ऊपर निर्भर है। किन्तु तुमने व्रजवासियोंको जीवित क्यों रखा है? क्या बार-बार दुःख देनेके लिए ही उन्हें जीवित रखा है? हाँ, यदि जीवित रखना ही है, तो तुम शीघ्र ही वृन्दावनमें पधारो। तुम्हारा यह राजवेश, हाथी-घोड़े, यहाँके राजपुरुषोंका संग, यह अन्य प्रदेश-व्रजवासियोंको तनिक भी शोभा नहीं देता। हम वृन्दावन छोड़ नहीं सकर्ती, इधर तुम्हें देखे बिना जीवित भी नहीं रह सकतीं। तुम व्रजके प्राण हो, व्रजराजके प्राणधन हो और हमारे प्राणोंके भी प्राण। तुम शीघ्रातिशीघ्र वृन्दावनमें चलकर सभीके प्राणोंकी रक्षा करो।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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गौड़ीय मठ का निःस्वार्थ – दयाशील प्रत्येक व्यक्ति इस मनुष्य समाज में से प्रत्येक व्यक्ति के चित्शरीर के पोषण के लिए दो सौ गैलन रक्त खर्च करने के लिए प्रस्तुत रहे ।
श्रीलप्रभुपाद
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श्रुति-प्रमाण-
“भक्तिरेवैनं नयति भक्तिरेवैनं दर्शयति भक्तिवशः पुरुषो भक्तिरेव भूयसी।”
अर्थात् भक्ति ही भक्त को भगवान् के धाम में ले जाकर भगवद्दर्शन कराती है और भक्ति के द्वारा ही भगवान् का प्रेम मिलता है। भगवान् केवल भक्ति के ही वशीभूत होते हैं। इसलिए साधारण भाषा में कह सकते हैं कि, भगवान् की प्रीति के लिए जो कुछ किया जाता है, उसे ही ‘भक्ति’ की संज्ञा दी जाती है। और भगवान् यदि संतुष्ट होते हैं तो भक्त को भी अशेष आनन्द प्राप्त होता है। अतएव भगवत् सेवा-रूप सनातन धर्म या वैष्णव धर्म का पालन करने से ही परमानन्द प्राप्त होता है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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चेतन प्राणी होने के कारण मनुष्य में आपेक्षिक स्वतन्त्रता स्वयं ही प्रमाणित है। इसलिये जन्म, कर्म, संगति और उसके चारों तरफ के वातावरण के अलग-अलग होने के कारण सबका अलग-अलग स्वभाव होना अवश्यम्भावी है। पृथ्वी पर एक भी ऐसा मनुष्य नहीं है कि जो दूसरे किसी भी मनुष्य के साथ शत-प्रतिशत मिलता हो। किन्तु इस प्रकार मनुष्यों की अलग-अलग रुचियों और मतों को देखकर घबराने की बात नहीं, ये तो स्वाभाविक ही है। जो मनुष्य को ज़बरदस्ती एक मत में बाँधने की चेष्टा करते हैं, उनकी यह प्रचेष्टा अस्वाभाविक ही है। इस प्रकार की प्रचेष्टा को तो मतान्धता अथवा कट्टरपना कहा जाता है। परन्तु यहाँ पर किसी को समझा कर अपने मत में लाने का प्रयास करने को मना नहीं किया जा रहा।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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जो लोग मार्ग पर चलते हैं, उनसे ही गलती हो सकती है, किन्तु उस भूल को सुधारने का प्रयास करने पर ही हृदय की दुर्बलता दूर होती है और भजन में आत्मबल प्राप्त होता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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उदेश्य गलत तो समझ भी गलत
हमारे पूज्यपाद श्रील संत गोस्वामी महाराज एक बार कश्मीर गए थे। वहाँ वे हरिसिंह नामक एक धनी व्यक्ति के घर पर अतिथि बने। हरिसिंह का अपना चाय का बागान था। उनके घर पर श्रील संत गोस्वामी महाराज की हरिकथा का आयोजन किया गया। हरिकथा सुनने के लिए अनेक धनी व्यक्ति वहाँ आए। उनमें से कई व्यक्ति चाय-बागानों के मालिक थे।
महाराज ने धर्म विषयक शिक्षा देते हुए गंभीरता से कहा, “प्रत्येक व्यक्ति के लिए धर्म-शास्त्रों की शिक्षा का पालन करना अति आवश्यक है। धर्म-शास्त्रों की शिक्षा के अनुसार व्यक्ति को चार वस्तुओं का त्याग करना होगा। ये चार वस्तुएँ हैं-द्यूतं पानं स्त्रियः सूना। यहाँ ‘द्यूतं’ का अर्थ है- जुआ-सट्टा जैसे खेल-कर्म, ‘पानं’ का अर्थ है नशीले पदार्थों का सेवन, ‘स्त्रियः’ का अर्थ है- विवाहित जीवन के बाहर (अवैध) स्त्री-संग और ‘सूना’ का अर्थ है- पशु-पक्षियों के माँस का भक्षण। इन चार वस्तुओं में कलि का वास है।”
श्रील महाराज ने ‘पानं’ के अर्थ को समझाते हुए कहा, “मद, गांजा, भांग, बीड़ी, सिगरेट, यहाँ तक कि चाय भी नशीले पदार्थों के अंतर्गत है। धर्म के मार्ग पर चलने के इच्छुक व्यक्तियों को इन सब का सेवन छोड़ना होगा।”
क्योंकि वहाँ बैठे बहुत से लोगों के चाय के बागान थे, वे सोचने लगे, “अरे ! ये तो सर्वनाश हो गया। ये किस महात्मा को यहाँ ले आए? हम तो चाय की अधिक बिक्री हो इसलिए विज्ञापन देते हैं किन्तु ये तो हमारा व्यवसाय ही बंद करवा देंगे!”
श्रील महाराज ने अपने प्रवचन में आगे कहा, “चाय कलि का स्थान है। चाय कभी नहीं पीना। चाय हमारे देश की पेय वस्तु नहीं है। ब्रिटिश लोग चाय को हमारे देश में ले आए। पहले वे लोग चाय को बिना किसी मूल्य के देते थे किन्तु बाद में उसकी बिक्री करने लगे।”
श्रील महाराज का प्रवचन सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोगों का मन दुःखी हो गया। प्रवचन के बाद चाय बागानों के एक मालिक ने श्रील महाराज से कहा, “स्वामी जी, मैंने तो सुना है कि चाय पीने से बहुत सारे लाभ होते हैं। यहाँ तक कि श्रीमद् भगवद् गीता में भी चाय का वर्णन किया गया है। श्रीकृष्ण ने स्वयं चाय के विषय में बतलाया है।”
श्रील महाराज ने आश्चर्य से पूछा, “मैंने बहुत बार श्रीमद् भगवद् गीता का अध्ययन किया है। उसमें चाय के विषय में तो मैंने कुछ पढ़ा नहीं! चाय के विषय में श्रीमद् भगवद् गीता में कहाँ बताया गया है?”
उस व्यक्ति ने प्रमाण के रूप में श्रीमद् भगवद् गीता का एक श्लोक कहा-
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ।। (श्रीमद् भगवद् गीता १५/१५)
उसने इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार से बताया, “श्रीकृष्ण कहते हैं-मैं सभी जीवों के हृदय में चाय के रूप में वास करता हूँ! चाय सभी प्रकार के दुःख दूर करती है और स्मृति और ज्ञान रूप सुख प्रदान करती है!”
उसने महाराज से यह भी कहा, “मैं आपके लिए उत्तम गुणोंवाली चाय लेकर आऊँगा, जिसे पीकर आप संतुष्ट हो जाएँगे। चाय पीने से उससे होनेवाले लाभ के विषय में आप स्वयं ही जान जाएँगे।”
महाराज श्री ने कहा, “उसकी कोई आवश्यकता नहीं है।”
क्या श्रीमद् भगवद् गीता के श्लोक का वास्तविक अर्थ उस व्यक्ति ने जो समझा, वह है? यहाँ ‘चाहं’ शब्द का संधि विच्छेद है ‘च अहम्’। ‘च’ का अर्थ है ‘और’। श्रीकृष्ण कहते हैं, “मैं सभी जीवों के हृदय में वास करता हूँ और उनकी स्मृति, ज्ञान और विस्मृति का कारण भी मैं ही हूँ।” क्या यहाँ चाय के विषय में कुछ बतलाया गया है?
लोग अपने उल्टे उद्देश्य और रुचि के अनुसार शास्त्र की शिक्षाओं का गलत अर्थ निकालते हैं। श्रीमद् भगवद् गीता पूरे विश्व में प्रसिद्ध है और बहुत से विद्वानों ने इसका अनेक प्रकार का अनुवाद किया है। किन्तु उनमें से अधिकांश लोगों का उद्देश्य उनकी अपनी स्वार्थ-सिद्धि ही है। शास्त्रों के गूढ़ अर्थ को समझना सरल नहीं है। वह केवल शरणागत व्यक्ति के हृदय में ही प्रकाशित होता है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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