मुनियों की जिज्ञासा

आगे . . . . कुछ मायावादी विद्वान् तर्क करते हैं कि श्रीमद्भागवत की रचना श्रीव्यासदेव ने नहीं की और कुछ लोगों का सुझाव है कि यह ग्रन्थ आधुनिक है और बोपदेव नामक किसी व्यक्ति ने लिखा है। ऐसे व्यर्थ के तर्कों को खण्डित करने के लिए श्री श्रीधर स्वामी कहते हैं कि कई प्राचीनतम पुराणों में भागवत का उल्लेख हुआ है। भागवत का पहला श्लोक गायत्री मन्त्र से प्रारम्भ होता है। इसका उल्लेख प्राचीनतम पुराण, मत्स्य पुराण, में है। उस पुराण में भागवत में आये गायत्री मन्त्र का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि आध्यात्मिक उपदेशों से युक्त अनेक कथाएँ हैं जो गायत्री मन्त्र से प्रारम्भ होती हैं और उसमें वृत्रासुर का इतिहास दिया गया है। यह भी उल्लेख है कि जो कोई पूर्णमासी के दिन इस महान् ग्रन्थ का दान करता है उसे जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त होती है और वह भगवान् के धाम वापस जाता है। अन्य पुराणों में भी भागवत का सन्दर्भ आया है जिसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि यह ग्रंथ बारह स्कन्धों में पूर्ण हुआ है जिसमें अठारह हजार श्लोक हैं। पद्म पुराण में भी गौतम तथा महाराज अम्बरीष की वार्ता में भागवत का उल्लेख हुआ है। वहाँ पर राजा को उपदेश दिया गया है कि यदि वह भवबन्धन से मोक्ष चाहता है तो नियमित रूप से श्रीमद्भागवत का पाठ करे। ऐसी परिस्थितियों में भागवत की प्रामाणिकता असंदिग्ध है। विगत पाँच सौ वर्षों में अनेक प्रकाण्ड विद्वानों तथा आचार्यों, यथा जीव गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, विश्वनाथ चक्रवर्ती, वल्लभाचार्य तथा चैतन्य महाप्रभु के पश्चात् भी अन्य अनेक प्रसिद्ध विद्वानों ने भागवत पर विशद टीकाएँ की हैं। गम्भीर छात्र को चाहिए कि दिव्य उपदेशों के अधिक आस्वादन के लिए इन सबका अध्ययन करे।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने मूल तथा शुद्ध यौन मनोविज्ञान (आदि-रस) की विशेष विवेचना की है जो समस्त भौतिक उन्माद से रहित है। यह सारी भौतिक सृष्टि विषयी जीवन के सिद्धान्त के आधार पर गतिशील है। आधुनिक सभ्यता में विषयी जीवन ही सारे कार्यकलापों का केन्द्रबिन्दु है।
जिधर भी कोई अपना मुख मोड़ता है, उधर ही उसे विषयी जीवन प्रधान लगता है। अतः विषयी जीवन अवास्तविक नहीं है। इसकी वास्तविकता वैकुण्ठलोक में अनुभव की जाती है। भौतिक विषयी जीवन तो मूल तथ्य का विकृत रूप है। वास्तविक तथ्य तो परमसत्य में है, अतः परमसत्य कभी निराकार नहीं हो सकता। निराकार रहते हुए शुद्ध विषयी जर्जीवन रख पाना सम्भव नहीं है। फलस्वरूप निर्विशेषवादी चिन्तकों ने गर्हित सांसारिक विषयी जीवन को अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन दिया है, क्योंकि उन्होंने परम सत्य की निराकारता (निर्विशेषता) पर अत्यधिक बल दिया है। इसीलिए विषय के वास्तविक आध्यात्मिक रूप को न जानने के कारण, मनुष्यों ने विकृत भौतिक विषयी जीवन को ही सब कुछ मान रखा है। रुग्ण भौतिक अवस्था के विषयी जीवन तथा आध्यात्मिक विषयी जीवन में अन्तर है।

यह श्रीमद्भागवत निष्पक्ष पाठक को धीरे-धीरे अध्यात्म की पूर्णावस्था तक ले जाने वाला है। यह मनुष्य को प्रकृति के तीनों गुणों- सकाम कर्म, काल्पनिक दर्शन तथा कार्यकारी देवताओं की पूजा से ऊपर उठाने में सक्षम होगा जिनका विधान वैदिक श्लोकों में है।

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अचिन्त्य भेदाभेदके विषयमें गोस्वामियोंका सिद्धान्त-

एकमेव तत् परमतत्त्वं स्वाभाविकाचिन्त्यशक्त्या सर्वदैव स्वरूप-तद्दृपवैभव-जीव-प्रधान-रूपेण चतुर्द्धावतिष्ठते।
सूर्यान्तर्मण्डलस्थ-तेजइव मण्डल-तद्बहिर्गतरश्मि-तत्प्रतिच्छविरूपेण दुर्घटघटकत्वं ह्यचिन्त्यत्वम् ॥

(श्रीभगवत्सन्दर्भ १६ संख्या)

परम तत्त्व एक है। वे स्वाभाविक अचिन्त्य शक्ति सम्पन्न हैं, उसी शक्तिके सहारे वे सर्वदा स्वरूप, तद्रुप वैभव, जीव और प्रधान-इन चारों रूपोंमें प्रकाशित हैं। इस विषयमें सूर्यमण्डलस्थ तेज, मण्डल, उस मण्डलसे निर्गत सूर्य रश्मियाँ और उनकी प्रतिच्छवि अर्थात् दूरगत प्रतिफलन ये किञ्चित् उदाहरणके स्थल हैं। तात्पर्य यह है कि ये चारों प्रकाश जिस प्रकार नित्य हैं, परमतत्त्वका एकत्व भी उसी प्रकार नित्य है। ये दोनों परस्पर नित्य विरुद्ध व्यापार एक ही साथ किस प्रकार सम्भव है? इसके उत्तरमें कहते हैं कि अचिन्त्य अर्थात् जीवकी बुद्धिसे ये असम्भव है, क्योंकि जीवकी बुद्धि ससीम है। परमेश्वरकी अचिन्त्य शक्ति द्वारा यह असम्भव नहीं है ।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

व्रत तुम्हारा है, भगवान का नहीं

श्रीनिमाई जब भी रोते तो उनके पास उच्च स्वर से हरिनाम संकीर्तन करने से वे चुप हो जाया करते थे। किन्तु एक दिन आस पड़ोस की स्त्रियों ने बहुत हरिनाम किया लेकिन निमाई चुप ही नहीं हुए। बहुत देर बार श्रीनिमाई बोले यदि आप मुझे चुप ही कराना चाहते हो तो सुनो – “आज एकादशी का व्रत है, जगदीश पंडित और हिरण्य ने भी व्रत रखा है, वे भगवान श्रीविष्णु जी को भोग लगाने के लिए नाना प्रकार के नैवेद्य तैयार कर रहे हैं। यदि वे नैवेद्य मुझे लाकर खिलाओगे तब ही में स्वस्थ होऊँगा” – इस बात को सुनकर लगभग सभी लोगों ने अनसुनी के समान कर दिया। लेकिन हिरण्य और जगदीश के कान में जब यह बात पहुँची तो वे सोचने लगे कि आज एकादशी है, इस छोटे से बच्चे ने कैसे जान लिया और हम लोग श्रीविष्णु के लिए नैवेद्य तैयार कर रहे हैं इसने इतनी दूर से यह कैसे जान लिया ? लगता है कि इस बालक के शरीर में बाल गोपाल विराजमान होगे। ऐसा सोचकर दोनों ने अपनी बनाई सभी नैवेद्य की वस्तुएँ लाकर स्वयं अपने हाथों से प्रभु को खिलाई। नैवेद्य खाकर प्रभु (निमाई) बहुत ही प्रसन्न हुए । अपनी इस लीला से प्रभु शिक्षा देते हैं कि देखो एकादशी के दिन भी श्री जगदीश व हिरण्य की तरह अच्छी-अच्छी वस्तुएँ भगवान के भोग में लगानी चाहिएँ। क्योंकि आप तो भगवान की प्रसन्नता के लिए एकादशी इत्यादि व्रत करेंगे परन्तु परम आनन्दमय भगवान किसके लिए वती रहेंगे। व्रत तुम्हारा है, भगवान का नहीं ।

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भव – जलधि – गतानां द्वन्द्व – वाताहतानां,
विषम – विषय – तोये मज्जतामप्लवानां,
सुत – दुहितृ-कलत्र – त्राणभाराद्वितानाम्।
भवतु शरणमेको विन्षुपोतो नराणाम् ।।15।।

इस संसार रूपी समुद्र में गिरे हुए, राग-द्वेष व सुख-दुःख आदि के थपेड़ों से परेशान, पुत्र, कन्या व पत्नी इत्यादि की रक्षा करना व पालन करना रूपी भार से दबे हुए तथा भयंकर विषय-भोग के जल में डूबते हुए मनुष्य को बचाने के लिए एक मात्र श्रीभगवान के चरणकमल रूपी नाव ही समर्थ है।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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पुण्य जे सुखेर धाम, ना लइयो तार नाम,
पुण्य मुक्ति दुई त्याग करि।
प्रेम भक्ति सुधानिधि, ताहे डूबे निरवधि,
आर जत क्षार निधि प्राय।।

(प्रेमभक्तिचन्द्रिका)

प्रेमी भक्त को पुण्य कर्म, मुक्ति आदि राखके ढेरके समान लगते हैं। वह तो प्रेमभक्ति सुधानिधिमें ही निर्बन्ध रूपसे अवगाहन करना चाहता है, फिर जिसका हृदयभ्रमर श्रीराधाकी परम रसमय चरणरज सौरभसे आकृष्ट हो वह भला और कहीं कैसे जायेगा? अति उत्कृष्ट वस्तुके सुखको पाकर क्या कोई क्षुद्र सुखकी ओर आकर्षित होता है? ब्रह्मानन्दकी अपेक्षा भजनानन्द अधिक सुखकारी तथा अनिर्वचनीय आनन्दमय है। भजनानन्दका ही गाढ़तम स्वरूप प्रेमानन्द है तथा शब्दोंकी अभिव्यक्तिकी सीमासे परे केवल अनुभूतिकी वस्तु है। इस प्रेमानन्दमें विरहाकुला गोपियोंका प्रेम चरमसीमाका अतिक्रमणकर अनिर्वाच्यतम स्थितिको प्राप्त करता है। गोपियोंकी मुकुटमणि श्रीराधाकी चरणरेणुसे इसी अनिर्वाच्यतम आनन्दकी धारा स्मरणकारी साधककी ओर अनवरत रूपमें झरती रहती है। यह ऐश्वर्य-ज्ञान-गन्धशून्य शुद्ध माधुर्यमय आनन्दधारा सहज है तथा अद्भुत चमत्कारितासे पूर्ण है। यही अर्थ ‘सहजाद्भुत सौख्यधारा’ का।

‘श्रीराधिका चरणरेणुमहं स्मरामि’- श्रीराधादास्य निष्ठ साधक श्रीराधाकी परम दुर्लभ पदरजकी साक्षात् प्राप्तिके अभावमें उसे स्मरण करते हैं। इसका वास्तविक तात्पर्य है- श्रीराधाकी विलासकुञ्जमें लीला तथा लीलामें अभीष्ट-सेवा प्राप्तिकी अभिलाषा। यही गौड़ीय वैष्णवोंकी हार्दिक अभिलाषा है, यही उनकी श्रेष्ठतम साधना है।

साधन स्मरण लीला, इहाते ना कर हेला, काय मने करिया सुसार।

(प्रेमभक्तिचन्द्रिका)

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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जो लोग भगवान की सेवा करते हैं, जगत में वे ही धन्य हैं। सभी असुविधाओं, कष्टों और दुःखों के रहने पर भी भगवानकी कथा श्रवण, कीर्तन और स्मरण करते रहना चाहिए ।

श्रीलप्रभुपाद

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एक चरित्रहीन आस्तिक, चरित्रवान नास्तिक से अच्छा है

जो लोग ईश्वर को निराकार कहते हैं, उनका हुक्का पानी बन्द कर दें। उनसे कहिए, तुम लोग पूर्वजन्म में निश्चय ही ईसाई या मुसलमान थे। मेरे मत से – ईश्वर की सेवा करने वाला पियक्कड़ अच्छा है; परन्तु सत् चरित्र वाला निरीश्वर व्यक्ति अच्छा नहीं है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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लीलावतार, युगावतार, मन्वन्तरावतार, पुरुषावतार, गुणावतार, शक्तयावेशावतार – इन छः प्रकार के मुख्य अवतारों के अतिरिक्त भगवान् जगत् के जीवों को अपनी सेवा प्रदान करने के लिए कृपा पूर्वक ‘अर्चाविग्रह’ के रूप में भी प्रकट होते हैं। भगवान के श्रीविग्रह को भगवान का अर्चा अवतार कहते हैं। इस प्रकार भगवान के अर्चावतार को जो पत्थर समझता है, वह नरक में जाता है।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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इस जगत में सभी प्रकार के कार्य करते हुए भी मूल-कर्त्तव्य हरिभजन अवश्य करना चाहिए। संसार की विविध बाधा-विपत्तियों में भी मन को दृढ़ रखकर भगवान् के श्रीनाम-रूप-गुण-लीलाकथा में नियुक्त रखना होगा।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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हमें एक शुद्ध भक्त की शरण ग्रहण करनी है। वैसा करने से दिव्य जगत के भाव हमारे अन्तर्हृदय में प्रस्फुटित हो जाएँगे। भक्तों की कृपा के अतिरिक्त यह संभवपर नहीं है। इसे अभक्तों से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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