श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

(सूत गोस्वामी नैमिषारण्य ऋषि)
नारद द्वारा व्यास देव को श्रीमद्भागवत उपदेश

न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो जगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित् ।
तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा न यत्र हंसा निरमन्त्युशिक्क्षयाः ।।10।।
( 1/5/10)

न= नहीं; यत् वह; वचः वाणी; चित्र-पदम् अलंकारिक; हरेः = भगवान् का; यशः = महिमा; जगत् ब्रह्माण्ड; पवित्रम् पवित्र; प्रगृणीत वर्णित; कर्हिचित् मुश्किल से; तत् उस; वायसम् कौवे को; तीर्थम्-तीर्थ-स्थान; उशन्ति सोचते हैं; मानसाः साधु पुरुष; न नहीं; यत्र जहाँ; हंसाः परमहंस पुरुष; निरमन्ति आनन्द लेते हैं; उशिक्-क्षयाः = दिव्य धाम के वासी।

अनुवाद – जो वाणी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के वायुमण्डल को पवित्र करने वाले भगवान् की महिमा का वर्णन नहीं करती, उसे साधु पुरुष कौवों के तीर्थ-स्थान के सदृश मानते हैं। चूँकि परमहंस पुरुष दिव्य लोक के वासी होते हैं, अतः उन्हें ऐसे तीर्थ स्थान में कोई आनन्द नहीं मिलता।

तात्पर्य – भिन्न मानसिक प्रवृत्तियों के कारण कौवे तथा हंस एक-से नहीं होते। सकाम-कर्मियों या कामी व्यक्तियों की तुलना कौवों से की गई है और परमहंस साधु पुरुषों की हंसों से। कौवों को कूड़ा-करकट फेंका जाने वाला स्थान प्रिय लगता है जिस प्रकार कि कामी सकाम कर्मियों को सुरा, सुन्दरी तथा स्थूल इन्द्रियतृप्ति के स्थान प्रिय लगते हैं। हंसों को वे स्थान प्रिय नहीं लगते जहाँ कौवे सभाएँ करने के लिए एकत्र होते हैं, अपितु वे प्राकृतिक छटा वाले स्थानों में देखे जाते हैं जहाँ जल का दिव्य आगार होता है और जिसमें प्राकृतिक सौन्दर्य के नाना रंग के कमलों के नाल सुशोभित रहते हैं। इन दो प्रकार के पक्षियों में यही अन्तर है।

प्रकृति ने विभिन्न योनियों को भिन्न-भिन्न मानसिकताएँ दी हैं, अतएव उन्हें एक ही श्रेणी में लाना कठिन है।

इसी प्रकार से विभिन्न मानसिकता वाले व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार का साहित्य होता है। अधिकांशतया बाजारू-साहित्य कौवों-सरीखे व्यक्तियों को आकृष्ट करने वाला होता है जिसमें कामुक विषयों का कूड़ा-करकट भरा रहता है। ऐसे विषय सामान्यतास्थूल शरीर तथा सूक्ष्म मन से सम्बद्ध होने से संसारी वार्ताएँ कहे जाते हैं। ये संसारी उपमाओं तथा रूपकों वाली अलंकारमयी भाषा में लिखे होते हैं। ऐसा होने पर इनमें भगवान् की महिमा का वर्णन नहीं रहता। ऐसा पद्य या गद्य, चाहे वह जिस विषय पर हो, शव को अलंकृत करने के तुल्य है। आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत मनुष्य, जो हंसों के समान हैं, ऐसे मृत साहित्य में रुचि नहीं रखते, क्योंकि वह आध्यात्मिक दृष्टि से मृत पुरुषों के लिए ही आनन्द का स्रोत होता है। ऐसा रजो तथा तमो गुणी साहित्य विभिन्न शीर्षकों से वितरित किया जाता है, किन्तु इससे मानव की आध्यात्मिक जिज्ञासा की पूर्ति नहीं हो पाती। अतएव हंस सदृश आध्यात्मिक पुरुषों को ऐसे साहित्य से कोई सरोकार नहीं होता। ऐसे उन्नत पुरुष मानस भी कहलाते हैं, क्योंकि वे आध्यात्मिक धरातल पर भगवान् की दिव्य स्वच्छ सेवा के आदर्श (मानदण्ड) को बनाये रखते हैं। यह चेतना स्थूल शारीरिक इन्द्रिय-तुष्टि के कार्यों या अहंकारी मन के सूक्ष्म चिन्तन के लिए सकाम कर्म करने से मना करती है।

सामाजिक साहित्यिक जन, विज्ञानी, संसारी कवि, मीमांसक तथा राजनीतिज्ञ जो इन्द्रिय-सुख की भौतिक प्रगति में पूर्णतया लीन रहते हैं, सभी माया के हाथ की कठपुतलियाँ हैं। उन्हें उन्हीं स्थानों में आनन्द मिलता है जहाँ निषिद्ध विषय फेंके जाते हैं। श्रीधर स्वामी के अनुसार यह वेश्यागामियों का आनन्द है।

लेकिन जो साहित्य भगवान् की महिमा का वर्णन करता है, उसका आनन्द वे परमहंस लूटते हैं जिन्होंने मानव कार्यों के सार को प्राप्त कर लिया है।

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सकलभुवनमध्ये निर्धनास्तेऽपि धन्या निवसति हृदि येषां श्रीहरेर्भक्तिरेका।
हरिरपि निजलोकं सर्वथा तं विहाय प्रविशति हृदि तेषां भक्तिसूत्रोपनद्धः ।।

समस्त संसार में परम निर्धन होकर भी वे धन्य हैं जिनके हृदय में एक भगवद्भक्ति का वास है, क्योंकि भगवान् हरी भी उनके भक्तिसूत्रसे बँधकर अपने लोक को छोडकर उनके हृदय में प्रवेश करते हैं।

श्लोक संग्रह

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

राजा प्रताप रुद्र की झाडू सेवा

महाप्रभु जब दक्षिण यात्रा के बाद लौटे तो भक्तों में इस प्रकार चेतना आ गयी जैसे अनावृष्टि के समय धान इत्यादि सूख जाते हैं और पुनः वर्षा होने से सब प्रफुल्लित हो उठते हैं। चारों ओर से सभी भक्तों का नीलाचल में जमघट लग गया। सभी महाप्रभु जी के साथ लीलारस में आनन्द लेते व प्रभु को आनन्द देते। किन्तु उस समय के उड़ीसा के शासक प्रताप रुद्र (शासन काल 1497 ई0 से 1540 ई0) हृदय में मिलन की प्रबल इच्छा के बावजूद भी प्रभु की कृपा से वंचित थे क्योंकि महाप्रभु जी अपनी सन्यास लीला में स्त्री दर्शन और राजदर्शन से लोक शिक्षा के लिए परहेज़ रखते थे । सार्वभौम इत्यादि भक्तों ने बहुत अनुनय विनय की थी किन्तु महाप्रभु जी ने स्वीकार नहीं किया। स्वयं को महाप्रभु जी की कृपा से वंचित देख राजा प्रताप रुद्र श्रीजगन्नाथ रथ यात्रा के समय, जब महाप्रभु जी रथ के आगे संकीर्तन की सात टोलियाँ बनाकर सातों टोलियों में एक साथ नृत्य करते तो वे संकीर्तनरत एक साथ सात रूपों में महाप्रभु जी का दर्शन करते व रथ के आगे – 2 राजा होते हुए भी झाडू लगाकर सफाई का काम करते। एक दिन महाप्रभु जी नृत्य करने के बाद बलगण्डि नामक उपवन में विश्राम कर रहे थे कि भक्तों के निर्देशानुसार प्रताप रुद्र वैष्णव वेष में अकेले उपस्थित होकर महाप्रभु जी के चरण दबाते हुए श्रीम‌द्भागवत् के ‘गोपी गीत’ का एक श्लोक पाठ करने लगे। राजा के मुख से तत्कालोचित भागवतीय श्लोक का पाठ सुनकर श्रीमहाप्रभु जी प्रेमाविष्ट हो गए व भक्तों की इच्छा पूर्ति करने में तत्पर भक्तवत्सल महाप्रभु ने राजा प्रताप रुद्र का आलिंगन कर अपनी अतुलनीय कृपा का परिचय दिया ।

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श्रृन्वन् जनार्दन – कथा – गुण – कीर्त्तनानि, देहे न यस्य पुलकोद्गम – रोमराजिः ।
नोत्पद्यते नयनयो – विमलाम्बुमाला, धिक् तस्य जीवितमहो पुरुषाधमस्य ।।42।।

भगवान जनार्दन का नाम, गुण और कीर्तन सुनकर जिसके शरीर में पुलक नहीं होता, कम्पन्न नहीं होता व आनन्द से जिसके रोम खड़े नहीं हो जाते तथा भगवान के नाम, गुण व कीर्त्तन को सुनकर जिसकी आखों से भगवान के प्रेम की निर्मल आसुंओं की धाराऐं नहीं बहने लगती, अहो! उस अधम व्यक्ति के जीवन को धिक्कार है।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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वर्ण के अनुसार कर्म-व्यवस्था

किस वर्णका किस कर्ममें अधिकार है, उसका धर्मशास्त्रमें विस्तारसे उल्लेख है। इस ग्रन्थमें उसका साङ्गोपाङ्ग वर्णन करना असम्भव है। अतिथियोंको अन्न-दान, पवित्रताके लिए दिनमें तीन बार स्नान, देव-देवियोंकी पूजा, वेद-पाठ, उपदेश देना, पौरोहित्य करना, उपनयन आदि व्रत, ब्रह्मचर्य और संन्यास-इन कर्मोंमें केवल ब्राह्मणका अधिकार है। धर्म-युद्ध, राज्य शासन, प्रजा-रक्षण और बड़े-बड़े दान आदि कर्मोंमें क्षत्रियका अधिकार है। पशु-पालन और व्यापार आदि कर्मोंमें वैश्योंका अधिकार है। बिना मन्त्र देव-सेवन और तीनों वर्णोंके विविध प्रकारके सेवा कार्योंमें शूद्रका अधिकार है। विवाहादि व्रत, ईशभक्ति, परोपकार, साधारण दान, गुरुसेवा, अतिथिसत्कार, पवित्रता, महोत्सव, गोसेवा, जगत्-वृद्धिकरण और न्याय-आचरण आदि कर्मोंमें सभी वर्णोंके सभी स्त्री-पुरुषोंका अधिकार है। पति सेवाकार्यमें स्त्रियोंका विशेष अधिकार है। मूल-विधि यह है कि जिस व्यक्तिका जैसा स्वभाव है, उस स्वभावके उपयोगी कर्मोंमें ही उसका अधिकार है। सभी लोग सरल बुद्धि द्वारा अपने-अपने कर्माधिकारको स्थिर कर सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करनेमें असमर्थ हो, तो वह उपयुक्त गुरुसे पूछकर अपना कर्माधिकार स्थिर करे। निर्गुण वैष्णवगण इस विषयमें अधिक जाननेकी इच्छा करनेपर श्रीमद्‌गोपालभट्ट गोस्वामीकृत सत्-क्रियासार-दीपिका ग्रन्थका अध्ययन करेंगे।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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भक्तों के क्रियाकलापों को कौन समझ सकता है ?

जो लोग निष्कपट होकर भगवद् भक्तों के आचरण और शिक्षा का अनुशीलन करते हैं, वे लोग ही दुर्जेय चरित्र (जिनके चरित्र को जानना कठिन है) भक्तों की कृपा से उनके क्रियाकलापों को समझ सकते हैं। अन्य किसी उपाय से भगवद् भक्तों का चालचालन समझ नहीं सकते । अक्षज (इन्द्रियज) ज्ञान द्वारा वैष्णव का चरित्र कदापि नहीं समझ सकते । भक्त के बाह्य आचरणों से उनको सब समय पकड़ नहीं सकते। यदि सौभाग्य से हम सेवोन्मुख होकर भक्त के चरित्र को देखने का सुयोग प्राप्त करते हैं, तभी हमारा मंगल है। अक्षजज्ञान से मापने का धर्म जीव को असुविधा में डालता है ।

श्रीलप्रभुपाद

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श्रीविष्णु के सेवकगण वैष्णव हैं। अद्वयज्ञान-तत्त्व श्रीविष्णु पूर्ण व्यक्ति हैं। उनके सेवकों का भी व्यक्तित्त्व है। असीम व्यक्तित्त्व में मायिक लम्बी, चौड़ी और ऊँची सीमारेखा नहीं है। पूर्ण वैकुण्ठ व्यक्तित्त्व में अणुत्त्व, विभुत्त्व व मध्यमत्त्व या सर्वत्व स्वतः-सिद्ध है। प्राकृत सीमा वाले स्वरूपों के अनुभव को लेकर और उसी के विचार का मापदण्ड समझकर हम परतत्त्व को या वैकुण्ठ-स्वरूप को निर्णय करने की कोशिश करते हैं। फिर ये सोचकर हम डर से जाते हैं कि स्वरूप मान लेने से तो हम परतत्त्व को एक सीमा में बाँध रहे हैं और फिर हम में परतत्त्व के निराकार व निर्विशेष होने की भावना घर कर जाती है। दुनियावी प्राकृत अनुभव को अप्राकृत-स्वरूप-निर्णय में प्रयोग करने के प्रयास से ही इस प्रकार की विभ्रान्ति होती है।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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“आहार निद्रा-भय-मैथुनंच सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ।।”

पशु और मनुष्य में अंतर केवल धर्माचरण में है। इसके अलावा आहार-निद्रा-भय-मैथुन की प्रवृत्ति दोनों में ही है। अतः मनुष्य में जो मनुष्यता है वह खाना, पीना, निद्रा, इन्द्रियतर्पण की प्रवृत्ति को ही निश्चय नहीं समझा जायेगा। क्योंकि ये सब प्रवृत्तियाँ पशुओं में भी पायी जाती हैं। अतएव मनुष्यता कहने पर एकमात्र मनुष्य के धर्माचरण को ही देखा जायेगा यह साधारण युक्ति यदि मनुष्य अपनी विचारशक्ति के द्वारा नहीं समझ सकता है तो उसमें और पशु में अंतर कहाँ है? “धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।” किन्तु आजकल देखा जाता है कि मनुष्य ने अपनी ‘मनुष्यता’ तो खो ही दी है, वह पशु से भी अधम हो गया है। मनुष्य अपने को पशु की अपेक्षा श्रेष्ठ होने का दावा नहीं कर सकता है। खाना-पीना इत्यादि के दृष्टिकोण से सोचने पर दोनों में कोई अंतर नहीं है बल्कि कुछ-कुछ मामलों में पशु, मनुष्यों से भी श्रेष्ठ है। जैसे इन्द्रियतर्पण (मैथुन) के मामले में पशुओं का एक निर्धारित समय है किन्तु मनुष्य उसमें कोई समय-असमय का विचार नहीं करते हैं। फिर पशु से मनुष्य की बुद्धि ज्यादा है इसलिए पशु की अपेक्षा मनुष्य की दूसरों को नुकसान पहुँचाने की क्षमता भी ज्यादा है। मनुष्य यदि नास्तिक होता है तो उसमें धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं रहता है और वह पशु से भी ज्यादा हिंसक हो जाता है – चूंकि बुद्धि के बल पर दूसरों को हानि कितनी ज़्यादा पहुँचाई जा सकती है, इसका विचार मनुष्य कर सकता है; वह पशु नहीं कर सकता है। इसीलिए देखा जाता है कि हिंसक पशु भी मनुष्य से डरता है। इन विभिन्न कारणों से शास्त्रों के विचार के अनुसार धर्म-भाव-शून्य मनुष्य को पशु ही कहा गया है। मनुष्य के आकार का होने पर ही उस प्राणी को ‘मनुष्य’ नहीं कहा जा सकता है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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नियमपूर्वक एक लाख नाम जप करने से भगवान् की सेवा में अधिकार प्राप्त होता है

पचास हजार श्रीनाम जप करने से नहीं होगा, प्रतिदिन एक लाख नाम नियम के साथ ग्रहण करने पर भगवान् की सेवा में विशेष अधिकार प्राप्त होता है। इसलिए कष्ट होने पर भी वह समय निकालना ही होगा। प्रतिदिन श्रीविग्रह की पूजा-अर्चन और ग्रंथों की चर्चा का अभ्यास रखना ज़रूरी है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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अनेक योनियों में भ्रमण करने के पश्चात् हमें मनुष्य जन्म लाभ हुआ है। इसलिए यह अत्यन्त दुर्लभ है। यद्यपि मनुष्य जन्म अनित्य है, यह भगवद् सेवा में अधिकार प्रदान कर सर्वोत्तम वस्तु (भगवान) की नित्यप्राप्ति का सुयोग प्रदान करता है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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