श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

(सूत गोस्वामी नैमिषारण्य ऋषि)


समस्त अवतारों के उत्स: कृष्ण

कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह।
कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः ॥43॥
(श्रीमद्भगवतं 1/3/43)

कृष्णे कृष्ण के; स्व-धाम अपने धाम; उपगते वापस जाने पर; धर्म धर्म; ज्ञान =ज्ञान; आदिभिः = इत्यादि; सह साथ; कलौ कलियुग में; नष्ट-दृशाम् = जिन लोगों के दृष्टि नष्ट हो चुकी है, उनके; एषः ये सब; पुराण-अर्कः सूर्य के समान प्रकाशमान पुराण; अधुना इस समय; उदितः उदय हुआ है।

अनुवाद – यह भागवत पुराण सूर्य के समान प्रकाशवान है और धर्म, ज्ञान आदि सहित कृष्ण द्वारा निज धाम चले जाने के पश्चात् ही इसका उदय हुआ है। जिन लोगों ने कलियुग में अज्ञान में गहन अन्धकार के कारण अपनी दृष्टि खो दी है उन्हें इस पुराण से प्रकाश प्राप्त होगा।

तात्पर्य – भगवान् कृष्ण का अपना नित्य धाम है जहाँ वे, अपने पार्षदों तथा साज-सामग्री के साथ शाश्वत भोग करते रहते हैं। उनका नित्य धाम उनकी अन्तरंगा शक्ति की अभिव्यक्ति है जबकि भौतिक संसार उनकी बहिरंगा शक्ति की अभिव्यक्ति है। जब वे भौतिक जगत में आते हैं तो वे अपनी अन्तरंगा शक्ति से सम्पूर्ण साज-सामग्री का प्रदर्शन करते हैं जिसे आत्म-माया कहते हैं। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि वे अपनी शक्ति (आत्म-माया) द्वारा नीचे आते हैं। अतः उनका रूप, नाम, यश, साज-सामग्री, धाम आदि भौतिक सृष्टि नहीं हैं। वे पतित जीवों के उद्धार हेतु तथा धर्म के सिद्धान्तों की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं जिनका वे स्वयं प्रदर्शन करते हैं। ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी धर्म की स्थापना नहीं कर सकता। या तो वे, या उनका शक्त्यावेश अवतार ही धर्म की संहिता का नियमन कर सकता है। वास्तविक धर्म का अर्थ है ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध तथा उनके प्रति अपने कर्तव्य को जानना और जब यह भौतिक शरीर छूटे तो अपने अन्तिम गन्तव्य को जान लेना। माया के पाश में बँधे बद्धजीव बड़ी मुश्किल से जीवन के इन नियमों को जान पाते हैं। उनमें से अधिकांश पशुओं की तरह खाने, सोने, रक्षा तथा मैथुन में लगे रहते हैं। वे अधिकांशतया धार्मिकता, ज्ञान या मोक्ष के नाम पर इन्द्रिय-भोग में लगे रहते हैं। इस कलह-प्रधान कलियुग में तो वे और भी अंधे बन चुके हैं। कलियुग में सारी जनता पशुओं का राजसी संस्करण बनी हुई है, उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान या दैवी धार्मिक जीवन से कोई सरोकार नहीं। वे इतने अंधे हो जाते हैं कि उन्हें सूक्ष्म मन, बुद्धि या अहंकार के आगे कुछ भी नहीं दिखता, लेकिन वे ज्ञान, विज्ञान तथा सम्पन्नता में प्रगति के प्रति अत्यन्त गर्व का अनुभव करते हैं। वे इस शरीर को त्यागने के बाद कूकर या सूकर बनने के लिए तैयार हैं, क्योंकि उन्होंने जीवन के चरम लक्ष्य को दृष्टि से ओझल कर रखा है। भगवान् श्रीकृष्ण कलियुग का प्रारम्भ होने से कुछ काल पूर्व हमारे समक्ष प्रकट हुए थे और कलियुग के प्रारम्भ होते ही वे अपने दिव्य धाम को वापस चले गये। जब तक वे रहे, उन्होंने अपने कार्यकलापों से सब कुछ कर दिखलाया। उन्होंने विशेष रूप से भगवद्गीता का प्रवचन किया और धर्म के सारे बनावटी नियमों का विनाश किया। इस भौतिक जगत से अपने प्रयाण के पूर्व उन्होंने नारद के माध्यम से श्रीव्यासदेव को श्रीमद्भागवत का संदेश संकलित करने का अधिकार प्रदान किया। इस प्रकार भगवद्‌गीता तथा श्रीम‌द्भागवत, ये दोनों ग्रन्थ इस युग के अंधे लोगों के लिए प्रकाश स्तम्भ की भाँति हैं। दूसरे शब्दों में, यदि इस कलियुग के लोग जीवन के वास्तविक आलोक को देखना चाहते हैं तो उन्हें इन दोनों ग्रंथों की शरण लेनी चाहिए। इससे उनका जीवन-लक्ष्य पूरा हो सकेगा। भगवद्‌गीता तो भागवत का प्रारम्भिक अध्ययन है। श्रीमद्भागवत तो जीवन का आश्रय तत्व, साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण है। अतएव हमें चाहिए कि श्रीमद्भागवत को भगवान् श्रीकृष्ण का साक्षात् स्वरूप मानें। जो श्रीमद्भागवत को देख सकता है वह साक्षात् श्रीकृष्ण को देख सकता है। वे अभिन्न हैं।

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कुर्वन्ति शान्ति विबुधाः प्रहृष्टाः क्षेमं प्रकुर्वन्ति पितामहाद्याः ।
स्वस्ति प्रयच्छन्ति मुनीन्द्रमुख्या गोविन्दभक्तीं वहतां नराणाम् ।।

श्री गोविन्द की भक्ति करनेवाले मनुष्यको देवता भी हर्षित होकर शान्ति देते हैं, ब्रह्मा आदि रक्षा करते हैं, बडे बडे मुनिगण कल्याण प्रदान करते हैं।

श्लोक संग्रह

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

महाप्रभु जी की दक्षिण भारत यात्रा

अद्वैतवादी सार्वभौम का निस्तार करने के बाद महाप्रभु जी अपने बड़े भाई विश्वरूप से मिलने के बहाने दक्षिण देश का उद्धार करने चल पड़े। जाते समय नित्यानन्दादि भक्तों ने बहुत अनुनय विनय करके उनकी सेवा के लिए काला कृष्ण दास को भी उनके साथ भेज दिया। रास्ते में उन्होंने कूर्म नामक ब्राह्मण व गलित कुष्टी वासुदेव पर अपनी कृपा वर्षण की। तत्पश्चात महाप्रभु जी का गोदावरी तट पर उड़ीसा के तत्कालीन गवर्नर, राय रामानन्द से मिलन हुआ। प्रेमी भक्त रामानन्द को निमित्त बनाकर जगत् को साध्य-साधन तत्व के सम्बन्ध में शिक्षा दिलवायी तथा रामानन्द जी को अपने महा- रसराज स्वरूप का दर्शन कराया। इसके इलावा वहाँ तार्किक -मीमांसक वादियों का मत खण्डन किया । बौद्ध आचार्य का घमण्ड चूर किया, वेंकट भट्ट पर कृपा की तथा भट्टमारी सन्यासियों से श्री कृष्णदास का उद्धार किया । इस प्रकार सम्पूर्ण दक्षिण भारत में भक्तों को सुख व पापी – तापी – अपराधियों को अपना प्रेम बाँटते हुए पुनः नीलाचल आ गये ।

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चेतश्चिन्तय कीर्त्तयस्व रसने नम्रीभव त्वं शिरो,
हस्तावंजलि – सम्पुंटरचयतं वन्दस्व दीर्घं वपुः।
आत्मन् संश्रय पुण्डरीकनयनं नागाचलेन्द –
स्थितं, धन्यं पुण्यतम् तदेव परमं दैवं हि सत्सिद्धये।। 41।।

हे मेरे मन ! तू गिरिराज गोवर्धन में रहने वाले कमल लोचन श्रीकृष्ण का चिन्तन कर। हे जिहा! तू उन्हीं का नाम व उनकी गुण-महिमा का कीर्तन कर। हे मेरे मस्तक ! तुम उनके ही श्रीचरणों में झुक जाओ। हे हाथो ! तुम उनके सामने स्वयं को जोड़ लो। ओ मेरे दीर्घ शरीर ! तू उन्हें साष्टांग दण्डवत् पूर्वक प्रणाम कर, हे मेरी आत्मा ! तुम केवल मात्र उनका ही आश्रय ग्रहण कर, कारण, जीवों के मंगल की प्राप्ति के लिए एकमात्र वे ही धन्य हैं, पुण्यतम् हैं और परम दिव्य हैं।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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भारत में वर्त्तमान वर्णाश्रम-विधि की अवस्था

यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि क्या आजकल भारतमें वर्ण-व्यवस्था ठीक-ठीक रूपमें चल रही है? इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा। यह वर्ण-व्यवस्था भारतमें पूर्णावस्थामें प्रतिष्ठित होकर भी अन्तमें उसमें कुछ रोगोंके लग जानेके कारण ही भारतकी कुछ अवनति दृष्टिगोचर होती है। वह रोग क्या है? यही विवेचनाका विषय है।

त्रेतायुगके प्रारम्भमें आर्य जातिकी उन्नति चरमावस्थाको पहुँच चुकी थी। उसी समय वर्णाश्रम-व्यवस्थाकी स्थापना हुई। (१) उस समय ऐसी विधि बनाई गई कि हर व्यक्ति अपने स्वभावके अनुसार वर्णको प्राप्त करेगा और उसे उस वर्णके अनुसार अधिकार प्राप्त करके उस वर्णके लिए निर्दिष्ट किए गए कर्मको ही अपनाना होगा। श्रम-विभाग विधि और स्वभाव-निरूपण विधि द्वारा जगतके कर्म बड़े ही सुचारु ढङ्गसे परिचालित होते थे। जिसके पिताका कोई वर्ण नहीं होता था, उसके केवल स्वभावको परखकर ही उपयुक्त वर्णमें शामिल कर लिया जाता था। जाबाली और गौतम, जनश्रुति और चित्ररथ आदिका वैदिक इतिहास ही इसका साक्षी और उदाहरण है। जिनके पिताका वर्ण निर्दिष्ट था, उनके स्वभाव और वंश दोनोंके प्रति दृष्टि रखकर ही वर्णका निर्णय होता था। नरिष्यन्त वंशमें अग्निवेश्य स्वयं जातुकर्ण नामक महर्षि हुए हैं। उन्हींसे अग्निवेश्यायन नामक प्रसिद्ध ब्राह्मण-वंशकी उत्पत्ति हुई है। ऐल वंशमें होत्रके पुत्र जहनुने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया है। भरत वंशमें उत्पन्न भरद्वाज (जिनका नाम वितथ राजा था) के वंश में नरादिकी सन्तान क्षत्रिय और गर्गकी सन्तान ब्राह्मण हुए। भर्यस्व राजाके वंशमें मौद्गल्य गोत्रीय शतानन्द और कृपाचार्य आदि ब्राह्मण उत्पन्न हुए। शास्त्रमें ऐसे-ऐसे असंख्य उदाहरण हैं, जिनमेंसे मैंने केवल दो-चारका ही उल्लेख किया। जिस समय वर्ण-व्यवस्था ऐसी सुन्दर और संस्कृत रूपमें प्रचलित थी, उस समय भारतका यशसूर्य मध्याह रविकी भाँति पृथ्वीमें सर्वत्र ही अपनी प्रभाका विस्तार कर रहा था। संसारके सारे देश भारतवासियोंको राजा, दण्डदाता और गुरु मानकर पूजते थे। मिस्त्र और चीन आदि देशोंके लोग उस समय श्रद्धा एवं भयसे भारतवासियोंके उपदेश सुना करते थे।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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श्रीगुरुदेव अनुगत शिष्य को कृष्णनाम और कृष्णमन्त्र प्रदान करते हैं। जबतक गुरु में मर्त्यबुद्धि रहेगी, तबतक हरिनाम की कथा और महिमा नहीं समझी जा सकती। श्रीचैतन्यदेव को मनुष्य समझने से अनन्तकाल तक मंगल नहीं होगा। श्रीगुरुकृपा से श्रीगौरसुन्दर और ब्रजधाम का सन्धान प्राप्त होता है।

श्रीलप्रभुपाद

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शरणागति के बिना किसी भी बद्ध जीव के लिए माया की इस पहेली को सुलझाना सम्भव नहीं है। हमारे शरण्य- श्रीगुरुदेव, श्रीभगवान् के आश्रय-जातीय विष्णु-तत्त्व होने के कारण सेव्य-सेवक रूप से प्रकट रहकर हमारी सेवा ग्रहण करके व हमें उपदेश देकर कृतार्थ करते रहते हैं। यदि हम कोई बुरा उद्देश्य लेकर उनके पास न जायें तो ये निश्चित है कि उनकी करुणामयी इच्छा के कारण ही उनके विशुद्ध चिन्मय स्वरूप के दर्शन प्राप्त करके कृतार्थ हो जायेंगे। हमारे अधिकार के तारतम्यानुसार वे हमें विभिन्न रसोचित सेवा का सुयोग प्रदान करते हैं। सेवकवत्सल जगद्‌गुरु श्रील प्रभुपाद अपने नित्यकिंकरों को व किकंरों के भी किंकर बनने की भावना रखने वालों को तमाम प्रकार के अशुभ के चंगुल से निकालकर अपनी अभीष्ट भगवद्-सेवा में नियुक्त करें, यही उनके श्रीचरणों में मेरी कातर प्रार्थना है”।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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तर्क से नहीं, बल्कि अभ्यास से ही भगवान की सेवा के आनन्द की अनुभूति

अनेक लोग सम्भवतः कहेंगे कि भगवत्-सेवानन्द किसे कहते हैं, यह ज्ञात नहीं है। तो इसके उत्तर में मुझे कहना है कि- भगवान् की सेवा करने पर किस प्रकार के अप्राकृत आनन्द की अनुभूति होती है, उसे केवल भगवत्-सेवानन्दीगण (सेवा-आनन्द में निमग्न) ही जानते हैं, दूसरे लोग इसे नहीं जान सकते हैं। क्योंकि यह उपलब्धि से ही ज्ञात होता है भाषा के द्वारा इसे समझाया नहीं जा सकता है। जैसे संतान की सेवा-परिचर्या करने से माता को कितना आनन्द मिलता है, वह किसी बांझ महिला के लिए जानना निश्चय ही सम्भव नहीं है। इसी प्रकार सबसे पहले भगवान् की सेवा करनी ज़रूरी है, उसके बाद सेवा प्राप्त होता है, वह क्रमशः अनुभव होगा करने से जो अतुलनीय आनन्द यही शास्त्र की बात है।

अतः ‘धर्म पालन करने से क्या होगा’ इस प्रकार का तर्क उठाया नहीं जा सकता है। पहले उसका पालन करके देखना होगा, तभी सनातन धर्म अच्छा या बुरा, इसका फैसला होगा। नहीं तो पानी में नहीं उतरूँगा लेकिन तैरना सीखूँगा इस प्रकार की चेष्टाहीन भावना निरर्थक है, उसका कोई मूल्य नहीं है। हम स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण के नित्यदास हैं, इसलिए उनकी सेवा करना ही हमारा नित्य धर्म या सनातन धर्म है। इसी धर्म में ही उपास्य, उपासना और उपासक की नित्यता है अन्य सभी धर्मों में यह नहीं है। इसीलिए सनातन धर्म के अलावा अन्य किसी धर्म की नित्यता नहीं है।

“पृथिवीते जत कथा धर्म नामे चले।
भागवत कहे ताहा परिपूर्ण छले ।।”

अर्थात् भागवत धर्म या सनातन धर्म ही केवल कपटता-रहित धर्म है, बाकी सब धर्म छल-कपटता-युक्त धर्म हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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श्रीगुरु-वैष्णवों के अप्रकट होने के बाद उनके समस्त उपदेशनिर्देश की चर्चा और अनुशीलन करने से ही उनके प्रति श्रद्धा ज्ञापन होती है। इस प्रकार ही उनके साथ सम्बन्ध को संरक्षित रख पाना संभव है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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एक शुद्ध भक्त कृष्णप्रेम (श्रीकृष्ण के प्रति अहैतुकी अनन्य भक्ति) से परिपूर्ण होता है एवं वह संसार के सभी जीवों में प्रीति भाव रखता है। वह सर्वत्र कृष्ण-दर्शन करता है व सभी जीवों को कृष्ण-सम्बन्ध में देखता है; संसार में किसी को भी अपने शत्रु रूप से नहीं देखता।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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