श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

(सूत गोस्वामी नैमिषारण्य ऋषि)
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ।।21।।
( श्रीमद्भगवतं 1/2/21)

भिद्यते भिद जाती है; हृदय हृदय की; ग्रन्थिः गाँठें; छिद्यन्ते खण्ड-खण्ड हो जाते हैं; सर्व सभी; संशयाः भ्रम, संदेह; क्षीयन्ते समाप्त हो जाते है; च तथा; अस्य उसकी; कर्माणि सकाम कर्मों की श्रृंखला; दृष्टे देखने के पश्चात्; एव निश्चय ही; आत्मनिस्वयं आत्मा को ईश्वरे प्रधान या स्वामी में।

अनुवादा – इस प्रकार हृदय की गाँठ भिद जाती है और सारे सशंय छिन्न-छिन्न हो जाते हैं। जब मनुष्य अपने आपको स्वामी के रूप में देखता है, तो कर्मों की श्रृंखला समाप्त हो जाती है।

तात्पर्य – भगवान् का वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करने का अर्थ है उसी के साथ अपने आपको देखना। जहाँ तक आत्मारूप में जीव की पहचान की बात है उसके सम्बन्ध में अनेक कल्पनाएँ एवं भ्रान्तियाँ हैं। भौतिकतावादी लोग तो आत्मा के अस्तित्व को ही नहीं मानते और ज्ञानी दार्शनिक आत्मा को बिना स्वरूप वाले निर्विशेष रूप में मानते है। किन्तु अध्यात्मवादी (योगी) इस बात की पुष्टि करते हैं कि आत्मा तथा परमात्मा दो विभिन्न सत्ताएँ हैं जो गुणवत्ता में एकसमान, किन्तु परिमाण में भिन्न-भिन्न हैं। अन्य बहुत से सिद्धान्त भी हैं, किन्तु जब भक्तियोग विधि से श्रीकृष्ण का सचमुच साक्षात्कार हो जाता है तो ये सारी कल्पनाएँ दूर हो जाती हैं। श्रीकृष्ण सूर्य के समान हैं और परमसत्य विषयक भौतिकतावादी कल्पनाएँ गहनतम अर्धरात्रि के समान हैं। ज्योंही हृदय में कृष्णरूपी सूर्य उदित होता है त्योंही परम सत्य तथा जीवात्मा सम्बन्धी भौतिक कल्पनाओं का अन्धकार दूर हो जाता है। सूर्य की उपस्थिति में अन्धकार नहीं रह सकता और अज्ञान के अन्धकार में छिपा सापेक्ष सत्य, परमात्मा रूप में वास करने वाले अन्तर्यामी कृष्ण की कृपा से स्पष्टतया प्रकट हो जाता है।

भगवद्गीता में (१०.११) भगवान् कहते हैं कि अपने शुद्ध भक्तों पर विशेष अनुग्रह करने के लिए, भगवान् स्वयं अपने भक्त के हृदय में शुद्ध ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करके, सारे संशयों के गहन अन्धकार को दूर कर देते हैं। अतएव भगवान् द्वारा भक्त के हृदय को प्रकाशित करने का दायित्व अपने ऊपर लेने के कारण, जो भक्त उनकी दिव्य प्रेमाभक्ति में लगा होता है वह अन्धकार में नहीं रह सकता। उसे परम तथा सापेक्ष सत्य के विषय में सब कुछ ज्ञात होता रहता है। भक्त कभी भी अन्धकार में नहीं रह सकता और चूँकि भगवान् द्वारा उसे प्रकाश प्राप्त होता है, अतएव उसका ज्ञान निश्चय ही पूर्ण होता है। किन्तु जो लोग अपनी सीमित शक्ति से चिन्तन करते हैं उनके साथ ऐसा नहीं होता। पूर्णज्ञान परम्परा या निगमनीय (तर्कपूर्ण) ज्ञान कहलाता है जो एक अधिकारी से विनीत श्रोता तक पहुँचता है जो सेवा तथा आत्मसमर्पण द्वारा प्रामाणिक होता है। ऐसा नहीं है कि कोई परमेश्वर के प्रमाण को चुनौती भी दे और उन्हें जान भी सके। उन्हें अधिकार है कि ऐसे ललकारने वाले जीव के समक्ष, जो पूर्ण का क्षुद्र स्फुलिंग मात्र है, और ऐसा स्फुलिंग जो माया के अधीन है, प्रकट ही न हों। भक्तगण विनीत होते हैं, अतः यह दिव्य ज्ञान भगवान् से ब्रह्मा को, ब्रह्मा से उनके पुत्रों तथा शिष्यों को क्रम से प्राप्त होता है। इस विधि में ऐसे भक्तों के अन्तःकरण में स्थित परमात्मा द्वारा सहायता मिलती है। दिव्य ज्ञान को सीखने की यही पूर्ण विधि है।

इस प्रकाश के द्वारा भक्त आत्मा तथा पदार्थ के अन्तर को सही-सही समझ पाता है, क्योंकि आत्मा तथा पदार्थ की ग्रन्थि भगवान् द्वारा खोली जाती है। यह ग्रन्थि अहंकार कहलाती है जिससे झूठे ही जीव अपने को भौतिक पदार्थ मानता है। अतएव ज्योंही यह ग्रन्थि शिथिल हो जाती है, संशय के सारे बादल तुरंत छुट जाते हैं। मनुष्य अपने स्वामी का दर्शन करने लगता है और सकाम कर्मों के बन्धन को समाप्त करके वह भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लग जाता है। भौतिक जगत में जीव स्वयं कर्मबन्धन की सृष्टि करता है और जन्म-जन्मांतर तक इन कर्मों के अच्छे तथा बुरे फलों को भोगता रहता है। किन्तु ज्योंही वह भगवान् की प्रेमाभक्ति में लग जाता है, त्योंही वह कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाता है। फिर उसके कर्मों से कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं होती।

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स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् ।
सर्वे विधिनिषेधो स्युरेतयोरेव कि‌ङ्कराः ।।

कृष्ण ही भगवान् विष्णु के उद्गम हैं। उनका सतत स्मरण करना चाहिए और किसी भी समय उन्हें भूलना नहीं चाहिए। शास्त्रों में उल्लिखित सारे नियम तथा निषेध इन्हीं दोनों नियमों के अधिन है।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

भूल भुलैयाँ में महाप्रभु

श्रीमन्महाप्रभु चौबीस वर्ष गृहस्थ धर्म करने के बाद कोटाया में श्रीकेशव भारती से सन्यास लेने के बाद श्रीवृन्दावन जाने के लिए प्रेमविडल हो उठे । लेकिन नित्यानन्द प्रभु और चन्द्रशेखर आचार्य ग्वाल बालकों की सहायता से महाप्रभु जी को भूल भुलैयाँ में डालकर चालाकी से श्रीअद्वैत आचार्य के घर शान्तिपुर ले आये जहाँ उन्होंने भक्तों के साथ लीलास्वादन किया तथा जहाँ शची माता से उनका सन्यास के बाद प्रथम मिलन हुआ ।

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व्यामोह – प्रशमौषधं मुनिमनोवृत्ति – प्रवृत्यौषधं,
दैतयेन्द्रार्त्तिकरौषधं त्रिभुवने संजीवनैकौषधम् ।
भक्तात्यन्त – हितौषधं भवभय – प्रध्वंसनैकौषधं
श्रेयः – प्राप्तिकरौषधं पिव मनः श्रीकृष्ण – दिव्यौषधम् ।।39।।

हे मेरे मन ! जो मोह व भ्रम आदि को शान्त करने की औषधि, मुनियों के मन की कमज़ोरी को समाप्त करने वाली, दैत्यपति को कष्ट देने वाली, त्रिभुवन में अजर – अमर करने वाली, भक्तों का अत्यन्त हित करने वाली, संसार के भय को नाश करने की व यथार्थ मंगल प्राप्ति की औषधि है; तू उसी श्रीकृष्ण नाम रूपी दिव्य औषधि का पान करता रह।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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स्वभाव-निर्णय

अधिकार दो प्रकारके होते हैं- (१) स्वभावगत अधिकार और (२) अवस्थागत अधिकार। मनुष्य जीवनको तीन भागोंमें विभक्त किया जा सकता है-शिक्षा-काल, कार्य-काल और विश्रामकाल। जब तक मनुष्य विद्योपार्जन करता है, तब तकका समय शिक्षा-काल है। इस समय ग्रन्थ अध्ययन, सङ्ग और दूसरोंके कर्म आदिको देखकर तथा उपदेश ग्रहण करके जो प्रवृत्ति जिस व्यक्तिमें प्रबल हो उठती है, उसी प्रवृत्तिको उस व्यक्तिका स्वभाव कहते हैं। जिस वंशमें जन्म होता है, उसी वंशके अनुसार ही साधारणतः आलोचना, सङ्ग और उपदेश प्राप्त होनेके कारण विभिन्न लोगोंका स्वभाव भिन्न-भिन्न प्रकारका देखा जाता है। परन्तु कभी-कभी इसके विपरीत भी देखा जाता है। ऐसी दशामें शिक्षा-काल समाप्त होनेपर कार्य-कालके प्रारम्भमें जिस व्यक्तिमें जो स्वभाव लक्षित होता है, वही उसका स्वभाव है। विज्ञानके आधारपर विषयोंका विभाग करनेवाले चिन्ताशील पुरुषोंने चार प्रकारके स्वभाव बतलाये हैं- (१) ब्रह्म-स्वभाव, (२) क्षत्र-स्वभाव, (३) वैश्य-स्वभाव और (४) शूद्र-स्वभाव।

(१) ब्रह्म-स्वभाव- जिस स्वभावसे अन्तरेन्द्रियोंका निग्रह, बाह्य-इन्द्रियोंका दमन, सहिष्णुता, शुद्धाचार, क्षमा, सरलता, ज्ञानकी आलोचना और ईश्वर-आराधना आदि विषयोंमें प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, उस स्वभावको ब्रह्म-स्वभाव कहा गया है।

(२) क्षत्र-स्वभाव-जिस स्वभावसे वीरता, तेज, धारणा शक्ति, दक्षता, युद्धमें निर्भयता, दान, जगत रक्षा, जगत-शासन और ईश्वर-पूजन आदिकी ओर प्रवृत्ति होती है, उसे क्षत्र-स्वभाव कहा जाता है।

(३) वैश्य-स्वभाव-जिस स्वभावसे कृषि कार्य, पशुपालन तथा वाणिज्य-व्यवसाय आदिमें प्रवृत्ति उदित होती है, उस स्वभावको वैश्य-स्वभाव कहते हैं।

(४) शूद्र-स्वभाव-जिस स्वभावसे केवल दूसरोंकी सेवा द्वारा जीविका निर्वाहकी प्रवृत्ति उदित होती है, उसे शूद्र-स्वभाव कहते हैं।

अन्त्यज-स्वभाव-कर्त्तव्य अकर्त्तव्यके विचारसे रहित, आचरणसे विरत, सर्वदा कलहप्रिय, अतिशय स्वार्थपर, उदर-सर्वस्व, विवाह-विधि-रहित व्यक्तियोंका स्वभाव ही अन्त्यज-स्वभाव है। ऐसे स्वभावका परित्याग किए बिना मनुष्य स्वभाव नहीं होता। इसलिए मनुष्य-स्वभाव केवल चार प्रकारके ही माने गए हैं।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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मुझे अनेक लोग मठ-मन्दिर की एक पक्की व्यवस्था करने के लिए कहते हैं। किन्तु मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूँगा। यदि वास्तव में सेवोन्मुख प्राण है, यथार्थ शरणागति है, तब भगवत् कृपा के द्वारा ठाकुर-सेवा उत्तम रूप से चलती रहेगी एवं निर्भयता के साथ महाप्रभु की वाणी का प्रचार होगा, नहीं तो सब जहन्नुम में जाय ।

श्रीलप्रभुपाद

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“आप सब जागतिक मोह और आकर्षण के पात्र-पिता, माता, रिश्तेदार व बान्धवों आदि को भी छोड़कर श्रीकृष्ण की करुणा से आकर्षित होकर एकमात्र उनके श्रीचरणकमलों की सेवा में रहने के अभिप्राय से अनेक क्लेश स्वीकार कर रहे हैं तथा साथ ही साथ हमारे अभीष्टदेव श्रील प्रभुपाद जी के मनोभीष्ट को पूरा करने में सहायता करके मुझे कृतार्थ कर रहे हैं। इसलिये मैं श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के आश्रित सभी भक्तों के पास चिरकृतज्ञ हूँ। मैं अपने नित्य प्रभु की महिमा के श्रवण-कीर्तन की अभिलाषा में डूबा हुआ था। भक्तवत्सल श्रील प्रभुपाद जी ने करुणा परवश होकर मुझे यह सुयोग देने के लिये बन्धु के रूप में मेरी सहायता करने के लिए अपने नित्य-किंकरों को भेजा। श्रील गुरुदेव जी ने अपने जनों को मेरे श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ में भेजकर मुझे कृतार्थ किया है। श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के मठवासी मेरे श्रीगुरुदेव जी की ही करुणाशक्ति के विग्रहरूप से प्रकाशित हुये हैं। उनकी सेवा को ही मैं अपना धर्म समझता हूँ तथा इसे अपने श्रीगुरुदेव की सेवा का ही अंग मानता हूँ। मेरे जन्म दिन पर मेरे श्रीगुरुदेव जी के वैभवगण के स्मृति पथ पर मेरा स्थान होने के कारण मेरा भविष्य शुभसूचना दे रहा है। वैष्णवों को मर्यादा देने वाले भक्त ही शुद्ध-वैष्णव संज्ञा से संज्ञित हैं। जो केवलमात्र श्रीहरि के अर्चाविग्रह की श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, सभी देवताओं को परमेश्वर मानने के भ्रम से जो मुक्त हो गये हैं परन्तु वैष्णव-पूजा में उनका उत्साह नहीं होता, ऐसे व्यक्तियों को कनिष्ठ वैष्णव या प्राकृत वैष्णव कहा जाता है। परतत्त्व श्रीहरि को प्रसन्न करने में अति-उत्सुक किन्तु साक्षात् रूप से उनके स्वरूप का संग न पाकर उनकी प्रीति के उद्देश्य से उनके श्रीअर्चाविग्रह की आदर के साथ सेवा करने वाले व्यक्ति भक्ति-प्रकृति में प्रविष्ट होने के कारण प्राकृत-भक्त या कनिष्ठ-वैष्णव के रूप से सम्मानित होते हैं। इन कनिष्ठ वैष्णवों की अपेक्षा जो उन्नत भक्त हैं वे श्रीहरि के वैभव-स्वरूप-वैष्णवों में भगवान् का साक्षात् अधिष्ठान मानकर वैष्णव पूजा में आसक्त रहते हैं “तस्मात परतरं देवि तदीयानां समर्चनम्” ॥

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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हरिभजन की चेतना से युक्त प्राणी ही श्रेष्ठ

“ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव।
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्तिलता बीज।।”
“ताते कृष्ण भजे, करे गुरुर सेवन।
मायाजाल छुटे-पाये श्रीकृष्णचरण।।”

(अर्थात् ब्रह्माण्ड में भ्रमण करते हुए किसी भाग्यवान जीव को गुरु-कृष्ण-प्रसाद (कृपा) से भक्ति का बीज मिलता है। उसमें गुरु की सेवा करते हुए कृष्ण को भजते हैं और माया जाल से मुक्ति पाकर श्रीकृष्ण के चरण लाभ करते हैं।)

वैसे प्राणी मात्र को ही हरिभजन का अधिकार है। पशु भी यदि हरिभजन करता है तो वह हरिविमुख मनुष्य, देवता, गन्धर्व आदि से श्रेष्ठ है। जैसे हम श्रीचैतन्य चरितामृत में देखते हैं कि, श्रीमन् महाप्रभु के पार्षद श्रीशिवानन्द सेन का एक कुत्ता था। उसने महाप्रभु के दर्शन के लिए शिवानन्द प्रभु के साथ पुरी की यात्रा की थी और पुरी जाकर महाप्रभु के दर्शन प्राप्त कर, उनकी अशेष कृपा प्राप्त की थी। इससे उस कुत्ते ने ‘कृष्ण’ नाम उच्चारण करते-करते सिद्ध शरीर प्राप्त कर बैकुण्ठ गति लाभकी थी। जो प्राणी हरिभजन करेगा, उसे और 84 लाख जन्मों का असहनीय कष्ट भोगना नहीं पड़ेगा परमगति अर्जन करेगा। भक्ति की ऐसी महिमा कि देवता, गन्धर्व तक भगवद्भक्त की सेवा के लिए उतावलें हो जाते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि, एकबार देवराज इन्द्र ने अत्यन्त अहंकार के मद में श्रीकृष्ण के चरणों में कोई महापराध कर दिया था, तब उस अपराध से मुक्त होने के लिए वे कृष्णभक्त ‘सुरभी’ गाय की शरण में गये थे। भले ही इन्द्र, देवराज थे और सुरभी एक गाय अर्थात् पशु श्रेणी के अन्तर्गत थी, फिर भी इन्द्र की अपेक्षा सुरभी की प्राधान्यता ज्यादा रही क्योंकि ‘सुरभी’ कृष्णभक्त है। शास्त्रों में भक्तों की ऐसी महिमा का उल्लेख है।

फिर हम रामायण में देखते हैं कि, जब श्रीरामचन्द्र के लंका में जाने के लिए सेतु तैयार हो रहा था, तब एक गिलहरी भी उस सेवा में लग गई थी। संकुचित चेतन गिलहरी में भी सेवा भाव देखकर श्रीरामचन्द्र अत्यंत आनन्दित हो गये और संतुष्ट होकर उसे परमगति प्रदान की। शुक-सारी (तोता-तोती) दो पक्षी हरदम भगवान् का ही नामगान करते हैं। अतः देखा जाता है कि प्रत्येक प्राणी ही भगवान् की सेवा कर सकता है और उस सेवा के द्वारा वह श्रेष्ठ गति भी लाभ कर सकता है इसके बहुत सारे प्रमाण हमें शास्त्रों में दिखायी देते हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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श्रीराधाराणी-सेवाराणी हैं, ‘युगलप्रेम की गुरु हैं; उनकी अनुगत सखी-मंजरीगण के आनुगत्य में ही श्रीकृष्णसेवा प्राप्त करने की योग्यता और अधिकार प्राप्त किया जा सकता है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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यथार्थ मंगल लाभ करने के लिए आपको श्रीमद् भागवत् के सातवें स्कंध में प्रह्लाद महाराज द्वारा वर्णित नवधा भक्ति अथवा श्रीचैतन्य महाप्रभु की शिक्षा के अनुसार साधु-संग, नाम-कीर्तन, भागवत्-श्रवण, मथुरा-वास व श्रद्धा से श्रीमूर्ति-सेवन आदि भक्ति के पांच मुख्य अंगों का यथावत् पालन करना होगा। भक्ति के इन सभी अंगों में से कलियुग के जीव के लिए नामसंकीर्तन सर्वश्रेष्ठ है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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