श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

(सूत गोस्वामी नैमिषारण्य ऋषि)
नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया ।
भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी ॥18॥
(1/2/18)

नष्ट समाप्त; प्रायेषुः = प्रायः शून्य; अभद्रेषु समस्त अमंगलों से; नित्यम्-नियमित रूप से; भागवत श्रीमद्भागवत या शुद्ध भक्त की; सेवया सेवा द्वारा; भगवति भगवान् में; उत्तम दिव्य; श्लोके स्तुतियाँ; भक्तिः प्रेमाभक्ति, सेवा; भवति = (उत्पन्न) होती है; नैष्ठिकी अटल, अविचल ।

अनुवाद – भागवत की कक्षाओं में नियमित उपस्थित रहने तथा शुद्ध भक्त की सेवा करने से हृदय के सारे दुख पूर्णतः विनष्ट हो जाते हैं और उन पुण्यश्लोक भगवान् में जिनकी प्रशंसा दिव्य गीतों से की जाती है, अटल प्रेमाभक्ति स्थापित हो जाती है।

तात्पर्य – यहाँ पर हृदय से उन अमंगलकारी वस्तुओं को निकालने का उपचार दिया गया है जो आत्म-साक्षात्कार के पथ पर अवरोधस्वरूप हैं। यह उपचार है भागवतों की संगति करना। भागवत दो प्रकार के हैं- एक तो भागवत-ग्रंथ और दूसरे भागवत भक्त। ये दोनों ही कारगर औषधियाँ हैं और इनमें से कोई एक या दोनों ही अवरोधों को हटाने वाली हैं। भागवत भक्त भागवत ग्रन्थ के ही समान है, क्योंकि भागवत भक्त भागवत ग्रंथ के अनुसार ही जीवन-यापन करता है और भागवत ग्रन्थ तो भगवान् तथा उनके शुद्ध भक्तों यानी भागवतों के ज्ञान से पूर्ण है ही। भागवत ग्रन्थ तथा भागवत व्यक्ति अभिन्न हैं।

भागवत भगवान् का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि है। अतः भागवत भक्त को प्रसन्न करने से भागवत ग्रन्थ का लाभ उठाया जा सकता है। मानवीय तर्क यह नहीं समझ पाता कि किस प्रकार भागवत भक्त या भागवत ग्रन्थ की सेवा द्वारा कोई भक्ति के पथ पर अग्रसर होता है। किन्तु ये तथ्य हैं जिनकी व्याख्या श्रील नारददेव द्वारा की गई है जो अपने पूर्वजन्म में एक दासी के पुत्र थे। दासी ऋषियों की टहल करती थी और इस तरह वह भी उनके सम्पर्क में आया। केवल उनके सम्र्पक से तथा उनका जूठन खाकर यह दासी-पुत्र श्रील नारददेव नामक महान् भक्त तथा व्यक्ति बन सका। भागवतों की संगति के ऐसे चमत्कारी प्रभाव होते हैं। इन प्रभावों को समझने के लिए यह ध्यान देना आवश्यक है कि भागवतों की ऐसी निष्कलुष संगति से दिव्य ज्ञान अवश्यमेव बड़ी आसानी से प्राप्त होगा जिससे मनुष्य भगवान् की भक्ति में स्थिर हो जाता है। वह भागवतों के मार्गदर्शन में भक्ति में जितनी ही प्रगति करता है, उतना ही वह भगवान् की प्रेमा भक्ति में स्थिर होता जाता है। अतएव भागवत ग्रंथ की कथाओं को भक्त-भागवत से ही प्राप्त करना चाहिए और इस प्रकार इन दोनों भागवतों के संयोग से नवदीक्षित भक्त की प्रगति होती रहेगी।

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विष्णु पुराण
१.१२.६९

ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित् त्वय्येका सर्वसंश्रये ।
ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते ।।

हे प्रभु! आप समस्त दिव्य शक्तियों के दिव्य आगार हैं। आपकी ह्लादिनी, सन्धिनी तथा सम्वित् शक्तीयाँ वास्तव में आपकी एक ही अन्तरंगा शक्ति है। बद्ध आत्मा, आध्यात्मिक होते हुए भी कभी हर्ष का अनुभव करता है, तो भी पीडा का और कभी हर्ष और पीडा दोनों के मिश्रण का। पदार्थ का स्पर्श होने से ऐसा होता है। किन्तु आप इन समस्त गुणों से परे है, अतएव ये गुण आप में नहीं पाये जाते। आपकी अपरा शक्ति पूर्णतया दिव्य है। आपके लिए हर्ष, पीडा या हर्षमिश्रित पीडा जैसी कोई वस्तू नहीं होती।

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

महाप्रभु में जिस ने जैसा चाहा वैसा पाया

जिस प्रकार सौ रुपये के अन्दर एक, दो, दस, पचास आदि के नोट आ जाते हैं, उसी प्रकार 64 कला परिपूर्ण श्रीकृष्ण चन्द्र जब महाप्रभु जी रूप से इस धन्य कलि में अवतीर्ण हुए तो उनके जिस भक्त ने जैसा दर्शन करना चाहा वैसा ही किया। किसी किसी पर दया के सागर श्रीमन् महाप्रभु जी ने अपनी अहैतुकी कृपा द्वारा अपने अन्य स्वरूपों का दर्शन भी कराया जैसे श्रीवास पडित को ईश्वर रूप दर्शन, मुरारी गुप्त को वाराह रूप और चतुर्भुत रूप दर्शन, नित्यानन्द प्रभु को षड़भुज दर्शन, श्रीअद्वैत आचार्य को कुरूक्षेत्र भूमि वाला विराट रूप दर्शन, सर्वज्ञ ज्योतिषी को परमेश्वर रूप दर्शन, चाँद काजी को नरसिंह रूप दर्शन कराया तथा झारी खण्ड रास्ते में शेर, भालू हाथी, हरिण आदि छोटे-बड़े जानवरों तथा वृक्षलताओं तक को भी प्रेम दान दिया।

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श्रीनाथ नारायण वासुदेव, श्रीकृष्ण भक्तप्रिय चक्रपाणे।
श्रीपद्मनाभाच्युत कैटभारे, श्रीराम पद्माक्ष हरे मुरारे ।।35।।

अनन्त वैकुण्ठ मुकुन्द कृष्ण, गोविन्द दामोदर माधवेति ।
वक्तुं समर्थोऽपि न वक्ति कश्चिदहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम् ।।36।।
(युग्मकम्)

श्रीनाथ, नारायण, वासुदेव, श्रीकृष्ण, भक्तप्रिय, चक्रपाणि, श्रीपद्मनाभ, अच्युत, कैटभारि, श्रीराम, पद्मलोचन, हरि, मुरारी, अनन्त, वैकुण्ठ, मुकुन्द, कृष्ण, गोविन्द, दामोदर, माधव इत्यादि भगवान के नामों का उच्चारण करने में समर्थ होने पर भी व्यक्ति इनका उच्चारण नहीं करते, यही आश्चर्य है; इसी कारण व्यक्तियों में काम, क्रोधादि की प्रवृत्ति होती है।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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श्रीमन्महाप्रभु द्वारा प्रचारित धर्मकी दो विशेष बातें

श्रीमन्महाप्रभु द्वारा प्रचारित धर्ममें दो विशेष बातें हैं- रुचिपूर्वक हरिनाम करना और जीवोंपर दया करना। ये दोनों बातें जिस व्यक्तिमें जितनी अधिक परिमाणमें रहती हैं, वह उतना ही उत्तम वैष्णव है। अन्यान्य सद्‌गुणोंको प्राप्त करनेके लिए पृथक् रूपसे कोई चेष्टा करनेकी आवश्यकता नहीं है। भक्तमें समस्त गुणोंका उदय अपने आप होता है। भक्तजन स्वभावसे ही उत्तम श्रेयका आचरण करते हैं तथा श्रेयजनक आचरणसे प्रसन्नता प्राप्त करते हैं। कृष्णका दास हो जानेपर जीवोंको किसी प्रकारका दुःख या कष्ट नहीं होता। गुरु और आत्मीयवर्ग किस समय सङ्गके योग्य होते हैं-इस विषयमें सतर्क रहना आवश्यक है। जातरति-भावुक भक्तका जीवन अत्यन्त पवित्र होता है। उनकी रुचि सर्वदा विशुद्ध होती है।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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शुद्धज्ञान, शुद्धविराग एवं शुद्धभक्ति का एक ही तात्पर्य है। इसमें अपनी इन्द्रिय – तृप्ति के बदले केवल भगवान की सेवा की ही बात है । सुख एवं दुःख दोनों ही भिन्न वस्तुएँ हैं। सुख के लिए ही घूमते रहने से दुःख दोनों ही भिन्न वस्तुएँ हैं । सुख के लिए घूमते रहने से दुःख ही प्राप्त होते हैं । अतः फल की आकांक्षा करना उचित नहीं है। कर्म काण्ड मुक्तपुरुषों का कृत्य नहीं है। कर्म का फल कभी अच्छा तो कभी बुरा होता है ।

श्रीलप्रभुपाद

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जगत के लोग अपने चिन्मय स्वरूप को भूले हुए हैं, इसी कारण वे अपने इस जड़ीय शरीर को ही सब कुछ समझते हैं। शरीर में अभिमान होने के कारण ही उनमें जागतिक वस्तुओं की माँग बढ़ गयी है और यही कारण है कि जगत के लोग सीमित, नाशवान और परिवर्तनशील वस्तुओं के लिये खुद ही ताबडतोड़ हाय-हाय मचाते हुए पारिवारिक, सामाजिक व राष्ट्रीय अशान्ति को निमन्त्रण दे रहे हैं। लोगों में दुनियावी वस्तुओं को इकट्ठा करने की व उन सब वस्तुओं को अपने पास बनाये रखने की होड़ सी लग गयी है। इसी होड़ में भाई-भाई आपस में लड़ रहे हैं। यहीं नहीं, एक गाँव का दूसरे गाँवों से, एक जिले का दूसरे जिलों से, एक प्रदेश का अन्य प्रदेशों से तथा एक देश का दूसरे दूसरे देशों से संघर्ष चल रहा है जिससे सभी को आपसी संघर्ष का भय हमेशा बना रहता है। इसका परिणाम यह है कि सभी अपने बचाव को लेकर हमेशा उद्विग्न से बने रहते हैं व अपनी रक्षा के लिए कठोर परिश्रम करते हुए व्यस्त रहते हैं। सभी अपने-आप में इतने व्यस्त से हैं कि किसी को भी दूसरों के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं मिल पा रही है।

ऐसे स्वरूप-भ्रमित मनुष्य दुःखों को हटाने का प्रयास तो कर रहे हैं परन्तु भ्रमित होने के कारण दुःख हटाने के चक्करों में वह अपने झमेले ही बढ़ा रहे हैं। ऐसे में श्रीचैतन्य वाणी को छोड़कर क्या कोई ऐसा उपाय है जो विश्व को इस विषम परिस्थिति से छुटकारा दिला सके अर्थात् सुख पाने की अभिलाषा से पागलों की तरह अनावश्यक पदार्थों के पीछे दौड़ते हुए विश्ववासियों को इस भ्रमित स्थिति के लिए सतर्क कर सके व उन्हें वास्तविक सुख व वास्तविक आनन्द की ओर चला सकें?।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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मायावादियों की निराकार-धारणा पंचभौतिक ही है निर्गुण नहीं

निराकार वस्तु कभी भी पूज्य नहीं हो सकती है। कोई-कोई दार्शनिक लोग निराकार या अरूप की उपासना की व्यवस्था देते हैं। उनके विचार से साकार होने पर ही वह तुच्छ है एवं भौतिक और निराकार होने पर ही वह निर्गुण और अप्राकृत है। इसीलिए निराकार की साधना करना ही श्रेष्ठ है। किन्तु हम कहते हैं कि यह ठीक नहीं है। पंचभूतों में वायु और आकाश भी निराकार है। इसलिए निराकार होने पर भी वह अप्राकृत और निर्गुण है, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता है। मायावादियों और अद्वैतवादियों का निराकार यदि आकाश के समान है तो वह भी पंचभौतिक है। अतएव उसमें हम कभी पूज्यत्व नहीं थोप सकते हैं। सिर्फ यही नहीं वे जिस निराकारवाद की कल्पना करते हैं, वह भी जड़-आकाश के अलावा कोई निर्मल अप्राकृत-तत्त्व नहीं है। परन्तु वैष्णवगण जिस सच्चिदानन्द विग्रह की उपासना करते हैं वह भौतिक गुणों से परे निर्गुण, निर्मल व अप्राकृत वस्तु है। किन्तु भक्तिमय नेत्रों के द्वारा दिव्यसूरी (अप्राकृत तत्त्व जानने वाले) भक्तगण भगवान् के उस अप्राकृत-रूप के दर्शन सदैव करते हैं। यह बात स्वयं वेद भी कहते हैं, “ॐ तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः दिवीव चक्षुराततम्।”

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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भगवान् की कथा-कीर्तन करने वाले शिक्षक अत्यन्त दुर्लभ हैं। भगवान् की कृपा से सद्‌गुरु मिलने पर भी, निष्कपट अनुगत सत्शिष्य और भी दुर्लभ हैं।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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भगवान् की कृपा से यह दुर्लभ मनुष्य जन्म हमें केवल श्रीकृष्ण-भजन के लिए मिला है, न कि अनित्य सांसारिक विषय-भोग के लिए। किसी भी क्षण हमें इस अवसर से वंचित होना पड़ सकता है। अत: हमें अपने बहुमूल्य समय को केवल श्रीकृष्ण-सेवा में ही नियोजित करना है, कहीं और नहीं।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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