श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

(सूत गोस्वामी नैमिषारण्य ऋषि)
शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ।।17।।
(1/2/17)

शृण्वताम्-जिन्होंने कथा सुनने की रुचि उत्पन्न कर ली है; स्व-कथाः अपनी वाणी; कृष्णः = भगवान्; पुण्यपावन; श्रवण सुनना; कीर्तनः जाप; हृदि अन्तःस्थः अपने ह्यदय के भीतर; हि-निश्चय ही; अभद्राणि पदार्थ को भोगने की इच्छा; विधुनोति स्वच्छ करता है, विमल बनाता है; सुहृत्-उपकारी; सताम् सत्यनिष्ठ के।

अनुवाद – प्रत्येक ह्यदय में परमात्मास्वरूप स्थित तथा सत्यनिष्ठ भक्तों के उपकारी भगवान् श्रीकृष्ण, उस भक्त के हृदय से भौतिक भोग की इच्छा को हटाते हैं जिसने उनकी कथाओं को सुनने में रुचि उत्पन्न कर ली है, क्योंकि ये कथाएँ ठीक से सुने तथा उच्चरित किए जाने पर अत्यन्त पुण्यप्रद हैं।

तात्पर्य – भगवान् श्रीकृष्ण की कथाएँ उनसे अभिन्न हैं। अतएव जब भी अपराध-रहित होकर भगवान् का श्रवण तथा कीर्तन किया जाता है, तो यह समझना चाहिए कि वहाँ पर भगवान् कृष्ण दिव्य शब्द के रूप में उपस्थित हैं जो साक्षात् भगवान के समान ही शक्तिमान है। श्रीचैतन्य महाप्रभु अपने शिक्षाष्टक में स्पष्टतः घोषित करते हैं कि भगवान के पवित्र नाम में भगवान् की सारी शक्तियाँ निहित हैं और उन्होंने अपने असंख्य नामों को एक ही शक्ति प्रदान की है। इसके लिए कोई समय निश्चित नहीं है। कोई भी व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार ध्यानपूर्वक तथा आदरपूर्वक पवित्र नाम का जाप कर सकता है। भगवान् हम पर इतने दयालु हैं कि वे हमारे समक्ष दिव्य शब्द के रूप में साक्षात् उपस्थित हो सकते हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश हममें भगवान् के नाम और उनकी लीलाओं को सुनने तथा उनका महिमा-गान करने के प्रति कोई रुचि नहीं है। हम पहले ही पवित्र शब्द के श्रवण तथा कीर्तन के प्रति रुचि उत्पन्न करने के विषय में बता चुके हैं। इसे भगवान् के शुद्ध भक्त की सेवा करके प्राप्त किया जा सकता है।

भगवान् अपने भक्तों के साथ आदान-प्रदान करते हैं। जब वे देखते हैं कि भक्त उनकी सेवा में पूर्ण निष्ठा से तत्पर है और फलस्वरूप, उनके विषय में सुनने का इच्छुक है, तो वे भक्त के भीतर से इस तरह कार्य करते हैं कि भक्त उनके पास सरलता से वापस चला जाये। भगवान् हमारी अपेक्षा अधिक उत्सुक हैं कि हम उनके पास जाएँ। किन्तु हममें से अधिकांश वापस नहीं जाना चाहते। केवल कुछ ही ऐसे हैं जो भगवान् के पास वापस जाना चाहते हैं, और श्रीकृष्ण सब तरह से उनकी सहायता करते हैं।

कोई तब तक भगवान् के धाम में प्रविष्ट नहीं हो सकता जब तक कि वह समस्त प्रकार के पापों से मुक्त न हो जाए। हमारे भौतिक पाप हमारे द्वारा प्रकृति पर प्रभुत्व प्राप्त करने की इच्छाओं के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। ऐसी इच्छाओं से पिंड छुड़ा पाना बहुत कठिन है। भगवद्धाम जाने के मार्ग में कामिनी तथा कंचन मुख्य बाधाएँ हैं। भक्तिपथ के अनेक दिग्गज इन प्रलोभनों का शिकार होने से मुक्ति पथ से लौट आएँ, किन्तु जब भगवान् स्वयं सहायक बनते हैं तो भगवत्कृपा से सारी प्रक्रिया सुगम बन जाती है।

कामिनी तथा कंचन के संसर्ग में आकर अशान्त होना कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि प्रत्येक जीव अनादि काल से ऐसी वस्तुओं से जुड़ा रहा है और इस बेगानी प्रकृति से छुटकारा पाने में समय लगता है। किन्तु यदि कोई भगवान् के यश का श्रवण करता है तो धीरे-धीरे उसे अपनी स्थिति का आभास हो जाता है। भगवत्कृपा से ऐसे भक्त को प्रचुर शक्ति प्राप्त होती है जिससे वह विघ्नों से अपनी रक्षा कर सकता है और सारे उपद्रवकारी तत्व उसके मस्तिष्क से क्रमशः दूर हो जाते हैं।

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श्री चैतन्य चरितामृत


आदि लीला १.६

श्रीराधायाः प्रणय महिमा कीदृशो वानयैवा-
स्वायो येनाद्भुतमधुरिमा कीदृशो व मदीयः ।
सौख्यञ्चास्या मदनुभवतः कीदृशां वेति लोभा-
तद्भावाढ्यः समजनि शचीगर्भसिन्धौ हरीन्दुः ।।

राधारानी के उस प्रेम की महिमा को समझने की इच्छा से जिसके द्वारा राधा उनके अद्भुत गुणों का आस्वादन करती हैं और उनके प्रेम की मधुरता की अनुभूती से जिस सुख अनुभव करती हैं भगवान् श्री हरी राधा के भावों में विभोर होकर श्रीमती शचीदेवी के गर्भ से उसी प्रकार प्रकट होते हैं जिस तरह समुद्र से चन्द्रमा प्रकट होता है।

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

श्रीचन्द्रशेखर आचार्य के घर में व्रज-लीला-नाटक

एक दिन महाप्रभु जी ने श्रीचन्द्रशेखर आचार्य के घर व्रज लीला अभिनय करने की इच्छा की। नाटक में भक्तगण क्या-क्या सजेंगे, इसका निर्देशन श्री बुद्धिमन्त खान को दिया गया । भक्तगण लीला अभिनय के लिए विभिन्न पोशाकों में सज्जित हुए । श्रीमन् महाप्रभु जी ने कहा कि वे लक्ष्मी वेष में नृत्य करेंगे लेकिन जो जितेन्द्रिय हैं वे ही इस नृत्य को देखें। ये बात सुन कर सभी भक्तगण मन-मन में दुःख करने लगे । महाभागवत श्रीअद्वैत प्रभु एवं श्रीवास पंडित ने भी दीनता से अपने आपको अजितेन्द्रिय समझ कर नृत्य न देखने की बात कही तो महाप्रभु जी मुस्कराने लगे व साथ ही साथ कहा कि कोई बात नहीं सभी मेरे नृत्य को देखो, आज के दिन सभी महा-योगेश्वर के समान शक्ति प्राप्त कर लेंगे और किसी को भी मोह नहीं होगा।

श्रीविष्णुप्रिया के साथ शचीमाता तथा सभी वैष्णव लोग अपने परिवार के साथ लीलाभिनय दर्शन के लिए श्री चन्द्रशेखर आचार्य के घर में उपस्थित हुए । अभिनय कलाकारों में श्रीअद्वैत आचार्य संवाददाता की, हरिदास जी पहरेदार की तथा श्रीवास पडित जी’ नारद जी की वेषभूषाओं में सज्जित हुए । श्रीवास नारद जी के वेष तथा भाव में भावित हुए कहने लगे कि मैं श्रीकृष्ण दर्शन की अभिलाषा से वैकुण्ठ गया था लेकिन वैकुण्ठ खाली खाली, जन शून्य हो रखा था तब मैंने सुना कि कृष्ण नवद्वीप गये हैं। इसलिए मैं नवद्वीप में आकर प्रभु के लीला अभिनय में प्रविष्ट हुआ हूँ। श्रीवास का अभिनय देखकर शची माता मूच्छित हो पड़ी। श्रीमन् महाप्रभु जी ने रुक्मिणी का वेष धारण किया और रुक्मिणी भाव में डूब कर उस समय की लीला प्रदर्शन करने लगे जब विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणी ने महल में आने वाले अतिथियों से भगवान् कृष्ण के रूप, गुण, वीरता आदि की बातें सुनीं तो मन ही मन कृष्ण को अपना पति बना लिया । शिशुपाल कहीं उसे विवाह करके न ले जाए, इस भय से उसने पहले ही रोते, विलाप करते हुए एक पत्र श्रीकृष्ण के पास भेजा था। ये लीला प्रदर्शन करते हुए, महाप्रभु जी के रुक्मिणी के भाव में रोते हुए आँखों से भूमि पर आँसू गिरते हैं और वे उंगली द्वारा पत्रान्कन करते हुए प्रेम में गद्गद् होकर रुक्मिणी के पत्र विषयक श्लोक उच्चारण करने लगे । वैष्णवगण ये सब लीला देखकर व श्रवण कर अत्यन्त आनन्दित हुए । इस प्रकार प्रथम प्रहर की लीला समाप्त हुई।

द्वितीय प्रहर में श्रीगदाधर व्रज सुन्दरी बन कर रमा के आवेश में नृत्य करने लगे। इसके इलावा महाप्रभु जी आदिशक्ति – राधारानी तथा नित्यानन्द प्रभु राधारानी की बूढ़ी दूती ‘बड़ी बूढ़ी’ के वेष में सज कर प्रस्तुत हुए । महाप्रभु जी को आदिशक्ति के वेष में देखकर, जिन्होने सारी ज़िन्दगी प्रभु को देखा – यहाँ तक कि श्रीशची माता भी पहचान न सकीं। कोई भक्त लक्ष्मी, कोई सीता, कोई महामाया इत्यादि अपने अपने भावों के अनुसार दर्शन करने लगे। इस वेष में महाप्रभु जी का दर्शन करके यहाँ तक कि नित्यानन्द प्रभु भी मूच्छित होकर गिर पड़े और सभी भक्त लोग प्रेम में पागल होकर ज़ोर ज़ोर से रोने लगे। इस प्रकार लीला दर्शन करते करते कब सुबह हो गई किसीको पता भी न चला। प्रभात देख कर सभी भक्त व्याकुल होकर रोने लगे। भक्तों को रोता देख महाप्रभु जी ने जगत जननी भाव से सब को स्तनपान कराया, जिससे सब के दुःख दूर हो गये ।

उक्त लीला अभिनय के बाद श्रीमन् महाप्रभु जी की अचिन्त्य शक्ति से चन्द्रशेखर आचार्य के घर में सात दिन तक महातेज विद्यमान रहा।

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नमामि नारायण – पादपंकजं करोमि नारायण- पूजनं सदा।
वदामि नारायण – नाम निर्मलं, स्मरामि नारायण – तत्त्वत्मव्ययम् ।।3 4।।

जैसे मैं हमेशा श्रीमन् नारायणजी के चरणकमलों में नमस्कार करूँ, हमेशा ही श्रीमन् नारायण भगवान की पूजा करूँ तथा सदा-सर्वदा भगवान श्रीमन् नारायणजी के परम पवित्र नामों का उच्चारण करता रहूँ तथा अजर अमर व अव्यय नारायण – तत्त्व को स्मरण करता रहूँ।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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वर्णाश्रम में हरिभजन की प्रणाली

श्रीमन्महाप्रभुके वचनों का सारार्थ यह है कि जबसे भगवत् विषयमें श्रद्धा हो जाए, तभीसे सत्सङ्गमें रहकर हरिनाम ग्रहण करें। कर्म और ज्ञानकी चेष्टाओं द्वारा कदापि अपने चित्तको चञ्चल न करे। संख्यापूर्वक ‘हरेकृष्ण’ आदि सोलह नामोंका निरन्तर कीर्तन करनेका प्रयत्न करे। शरीर, गृह और समाजको श्रीनाम अनुशीलनके अनुकूल करके आवश्यक पदार्थोंका संग्रह और उनकी रक्षा आदिके लिए जितनी आवश्यकता हो, उतनी ही चेष्टा करे और जो कुछ भी करे कृष्णको अर्पण करके ही किया जाए तथा उन-उन विषयोंमें अधिक प्रयास नहीं करें। इन्द्रिय-प्रिय भोज्य पदार्थोंका तथा अन्यान्य विषयोंका व्यवहार भी नहीं किया जाए। जीवका शुद्धज्ञान और अनुकूल रागादि इन्द्रियाँ तथा मन आदि अन्तरेन्द्रियाँ कहीं नष्ट या विकृत न हो जाएँ, इस बातको ध्यानमें रखकर प्राणवृत्तिरूप परिमित सात्त्विक आहार द्वारा देहकी रक्षा करनी चाहिए। जीवन-निर्वाहके लिए न तो अधिक चेष्टा करनी पड़े और न वह अधिक कष्टसाध्य हो, ऐसे निर्जन स्थानमें रहना चाहिए। ऐसे समाजमें रहे, जो कृष्ण भक्तिके प्रतिकूल न हो तथा उस समाजकी उन्नतिके लिए प्रयत्न किया जाए। ऐसा करनेका तात्पर्य यह है कि ऐसे कार्योंसे निश्चिन्त होकर निर्जनमें दृढ़ यत्नके साथ भजन किया जा सकता है। स्त्रीसङ्ग और स्त्रीसङ्गीका सङ्ग सर्वथा परित्याग कर देना चाहिए। अभक्तोंका सङ्ग न हो जाए इस विषयमें सर्वदा सावधान रहना होगा। दूसरोंकी निन्दा अथवा परचर्चाका सर्वतोभावेन परित्याग करें। कपटतासे दूर रहें तथा अपनेको अत्यन्त दीन हीन समझें। तितिक्षापूर्ण हृदयसे समस्त विषयोंको सहकर जगतका यथार्थ उपकार किया जाए। अपने वर्ण, धन, जन, रूप, बल, पार्थिव विद्या और पद आदिके कारण किसी भी प्रकारका अभिमान नहीं रखें। सभी लोगोंको यथायोग्य सम्मान दें। इस प्रकार रहकर निरन्तर भावपूर्ण हृदयसे हरिनाम ग्रहण करें। इस प्रकार कृष्णकी कृपासे विशुद्ध प्रेमकी प्राप्ति होती है। ऐसा करनेसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि किङ्करके रूपमें हमारी सेवा करनेके लिए सर्वदा प्रतीक्षा करेंगे। यदि हृदयके अन्दर कुछ-कुछ कामना भी हो, तो उसे दीनताके साथ घृणापूर्वक स्वीकार करते-करते निष्कपट होकर भजन करते रहना चाहिए। कुछ ही दिनोंमें करुणामय भगवान् हमारे हृदयमें विराजमान होकर हृदयको निष्कामकर हमारे प्रेमको स्वीकार कर लेंगे।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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आत्मा की अप्राकृत इन्द्रियों के द्वारा कृष्ण की सेवा करनी होगी, मन की कल्पना के प्रभाव से कृष्णसेवा नहीं होगी। सम्बन्धज्ञान या दिव्यज्ञान होना चाहिये । हमें यह अनुभव होना चाहिये कि जिसका ऐसा विचार है कि केवल कृष्ण ही आराध्य हैं, ऐसे भक्तों के अतिरिक्त हमारा आत्मीय नहीं है, तभी हमारा मंगल होगा। यदि हम दूसरों को अपना मानें अर्थात् स्त्री-पुत्र कन्या आदि को अपना मानें तो समझना चाहिये कि हमें दिव्यज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, मन्त्र लेकर भी हम अन्धकार के अन्धकार में ही रह गये ।

श्रीलप्रभुपाद

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शुद्ध भक्तों की सेवा, शुद्ध भक्तों का संग और उनकी कृपा के बल से – धीरे-धीरे साधक अनन्य श्रीकृष्ण-भक्ति में रुचि प्राप्त करने लगता है तथा श्रीकृष्ण भक्ति में रुचि प्राप्त करके ये निष्कपट साधक तमाम गुणमयी एवं लौकिक बाधाओं को पार करके प्रेम-भक्ति में प्रतिष्ठित हो सकता है।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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वेद की अपेक्षा गीता की अधिक महिमा शास्त्रों में देखते हैं कि, “विष्णुभक्त्तो भवेद्देव आसुरस्तद्विपर्य्ययः।”

असुरकुल को ध्वंस करने के लिए कृष्ण स्वयं अपने को या अपने दास-दासियों का आविर्भाव कराते हैं। आज स्वयं श्रीकृष्ण आविर्भूत होंगे। इसलिए उनके स्वयं की शिक्षा के सम्बन्ध में दो-एक बातों की चर्चा करना अनुपयुक्त नहीं होगा। गीता के सोलहवें अध्याय के छठे और आठवें श्लोकों की यहाँ थोड़ी चर्चा कर रहा हूँ। गीता स्वयं श्रीकृष्ण द्वारा कही गई वाणी है – इसीलिए यह वेद की अपेक्षा भी पूजनीय है; इसीलिए गीता को धार्मिक समाज ‘उपनिषद्’ कहता है। इसीलिए गीता का अन्य नाम ‘गीतोपनिषद्’ है। वेदों से भी इसका गौरव अधिक बताने पर आप लोग आश्चर्यचकित मत होइये; क्योंकि वेद ईश्वर के श्वास स्वरूप हैं -शंकराचार्य भी ऐसा कहते हैं; किन्तु गीता या गीतोपनिषद् स्वयं श्रीकृष्ण के मुख से निकली वाणी है। नासिकागर्जन (वेद, भगवान विष्णु के श्वास से प्रकाशित हुए हैं। इसलिए वेदों को यहाँ भगवान की नासिका ध्वनि कहा गया है।) से अधरामृत (होंठो से निःसृत वाणी) का प्राधान्य निश्चित रूप से ज्यादा है – इसीलिए वेद की अपेक्षा गीता की महिमा अधिक है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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जो लोग गुरु-वैष्णवों की सेवा से वंचित हैं, वे ही वृथा समालोचक हैं। उनका कभी कल्याण नहीं हो सकता है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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हम स्वयं को कैसे समर्पित कर सकते हैं? शुद्ध वैष्णवों की सेवा के द्वारा ही यह संभवपर है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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