श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

(सूत गोस्वामी नैमिषारण्य ऋषि)
तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः ।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा ।।14 ।
(1/2/14)
तस्मात् अतः; एकेन एक, एकाग्र; मनसा मन के ध्यान द्वारा; भगवान भगवान्; सात्वताम् भक्तों के; पतिः रक्षकः श्रोतव्यः सुनने योग्यः कीर्तितव्यः = गुणगान के योग्यः च तथा; ध्येयः स्मरण करने योग्यः पूज्यः पूजने के योग्य, पूजनीयः च तथा; नित्यदा निरन्तर ।
अनुवाद – अतएव मनुष्य को एकाग्रचित से उन भगवान् के विषय में निरन्तर श्रवण, गुणगान, स्मरण तथा पूजन करना चाहिए जो भक्तों के रक्षक हैं।
तात्पर्य – यदि परमसत्य का साक्षात्कार ही जीवन का चरम लक्ष्य है तो इसे हर सम्भव साधन से अवश्य करना चाहिए। उपर्युक्त वर्णों तथा आश्रमों में से हर एक में गुणगान श्रवण, स्मरण तथा पूजन-ये चार विधियाँ सामान्य वृत्तियाँ हैं। इन जीवन-सिद्धान्तों के बिना कोई रह नहीं सकता। जीवों के कार्यकलाप जीवन के इन्हीं चार विभिन्न सिद्धान्तों में व्यस्त रहने में निहित हैं। विशेषतया आधुनिक समाज में तो सारे कार्यक्रम श्रवण तथा कीर्तन पर ही मुख्यतया आधारित हैं। कोई भी व्यक्ति, चाहे उसकी सामाजिक हैसियत कैसी भी क्यों न हो, वह कुछ ही काल में विख्यात हो जाता है यदि दैनिक समाचारपत्र उसका गुणगान करते हों, चाहे वह गुणगान झूठ हो या सच। कभी-कभी किसी दल विशेष के राजनीतिक नेताओं का विज्ञापन समाचारपत्रों में प्रचारित होता है और ऐसे गुणगान की विधि से एक नगण्य व्यक्ति भी अल्प समय में महत्वपूर्ण बन जाता है। किन्तु अयोग्य व्यक्ति के ऐसे झूठे प्रचार से न तो उस व्यक्ति का लाभ होता है, न समाज का। भले ही ऐसे प्रचार की क्षणिक प्रतिक्रिया हो ले, किन्तु इसका प्रभाव स्थायी नहीं होता। अतः ऐसे कार्य समय के अपव्यय हैं। गुणगान तो उन भगवान् का करना चाहिए जिन्होंने हमारे सामने प्रकट होने वाली प्रत्येक वस्तु की सृष्टि की। हम इसकी विस्तृत व्याख्या भागवत के जन्माद्यस्य वाले प्रथम श्लोक के आरम्भ में ही कर चुके हैं। अन्यों का गुणगान करने या अन्यों के विषय में सुनने की प्रवृत्ति को गुणगान के वास्तविक लक्ष्य परमेश्वर की ओर मोड़ना चाहिए। इससे सुख उपजेगा।
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श्री चैतन्य चरितामृत
आदि लीला 1.3
यद द्वैतं ब्रह्मोपनिषदि तदप्यस्य तनुभा य
आत्मान्तर्यामी पुरुष इति सोऽस्यांशविभवः ।
वडैश्वर्यैः पूर्णो य इह भगवान् से स्वयमय न
चैतन्यत् कृष्णाजगति परतत्त्वं परमिह ।।
जिसे उपनिषदों में निविशेष ब्रह्म कहा गया है वह उनके शरीर का तेजमात्र है और जिस भगवान् को परमात्मा के रूप में जाना जाता है वह उनका अन्तर्यामी अंशमात्र है। वे छहो, ऐश्वर्यो से युक्त साक्षात् भगवान् कृष्ण हैं। वे परम सत्य हैं और कोई भी सत्य न तो उनसे बडा है न उनके तुल्य है।
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

“भक्त की वस्तु प्रभु छीन कर खाते”
नवद्वीप में शुक्लाम्बर नामक विष्णुभक्ति परायण एक ब्राह्मण रहता था । वह प्रतिदिन भिक्षा माँगकर लाता, उसे श्रीकृष्ण को भोग लगाकर ही प्रसाद के रूप में ग्रहण करता। इतना गरीब होने पर भी दरिद्रता का दुःख उसे कभी अनुभव नहीं होता। वह दिन रात श्रीकृष्ण – नाम गुण आदि गाने में मस्त रहता था । साधारण लोग उसे भिखारी रूप से ही जानते थे क्योंकि महाप्रभु जी की कृपा बिना कोई महाप्रभु जी के भक्त को पहचान भी नहीं सकता। एक दिन महाप्रभु जी प्रेमाविष्ट थे। उसी समय भिक्षा की झोली कन्धे पर लिये शुक्लाम्बर भी वहाँ आ पहुँचा और शुक्लाम्बर को कृष्ण प्रेम में पागल देख महाप्रभु जी बहुत ही प्रसन्न हुए और स्वयं उसकी महिमा कहने लगे । शुक्लाम्बर की महिमा कहते-कहते महाप्रभु जी ने उसकी भिक्षा की फटी पुरानी झोली में हाथ डाला और मुट्ठी भर – भर चावल खाने लगे । महाप्रभु जी को निकृष्ट चावल खाते देख शुक्लाम्बर अत्यन्त शर्मिंदा हुए । इस लीला द्वारा महाप्रभु संकेत करते हैं कि यद्यपि शुक्लाम्बर नैवेद्य आदि भगवान् को अर्पण करने के अर्चन मार्गीय तरीके को नहीं जानते थे तथापि महाप्रभु जी ने ज़बरदस्ती चावल खाकर दिखाया कि अर्चन से भी अनुरागमयी सेवा श्रेष्ठ है।
इसी प्रकार एक और परम भागवत श्रीधर थे जो कि अत्यन्त गरीब थे व केला, केले के पत्ते व सब्जी इत्यादि बेचकर किसी तरह अपना गुज़ारा किया करते थे । महाप्रभु जी उसकी दुकान में जाकर केले के थोर इत्यादि छीन कर ले आने की लीला करते तथा बाद में महाप्रभु जी ने उसे भगवद्-स्वरूप के भी दर्शन करवाये ।
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मा द्राक्ष क्षीणपुण्यान् क्षणमपि भवतो भक्तिहीनान् पदाब्जे,
मा श्रौषं श्राव्यबन्धं तव चरितमपास्यान्यदाख्यानजातम् ।।
मा स्मार्षं माधव त्वामपि भुवनपते चेतसाऽपन्हुवानान्,
मा भूवं त्वत्सपर्या – व्यतिकर – रहितो जन्मजन्मान्तरेऽपि ।।31||
हे माधव ! हे त्रिलोकपति ! आप मुझ पर ऐसी कृपा करें कि आपके पादपद्मों में जिनकी भक्ति नहीं है अर्थात् जो भक्तिहीन हैं तथा जिनके पुण्य समाप्त हो चुके हैं, उन व्यक्तियों का मैं क्षण काल के लिये भी दर्शन न करूँ। आपकी पावन लीलाओं को छोड़कर दूसरी बातें, चाहे वह सुन्दर चरितावली ही क्यों न हो, मेरे कानों तक न पहुँचें। मैं उन्हें बिल्कुल नहीं सुनना चाहता। मैं तो अपने कानों से निरन्तर आपकी पावन कथा सुनना चाहता हूँ। जो आपका अवज्ञाकारी जन है, अर्थात् जो आपकी आज्ञा पालन नहीं करता, उसकी मेरे मन में कभी याद ही न आये। आपकी पूजा के जितने भी अंग हैं, जन्म – जन्मान्तर तक जैसे मैं उन समस्त अंगों से रहित होकर न रह पाऊँ अर्थात् जन्म-जन्मान्तर तक मैं केवल मात्र आपकी ही सेवा में नियुक्त रहूँ।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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क्रम पथ ही कल्याणप्रद है
कुछ अपक्व सिद्धान्तवाले व्यक्तियोंका यह कहना कि भक्तिमें साधनकी आवश्यकता नहीं है प्रमाणिक करता है कि उन लोगोंको या तो वर्णाश्रमधर्म जीवन अच्छा लगता है अथवा सम्पूर्ण रूपसे प्रेमभक्तिका कृत्रिम लक्षण। हम भक्ति सम्बन्धी उपदेशोंमें ऐसा देखते हैं कि क्रम-सोपन ही सुगम और फलप्रद है। सर्वप्रथम धर्म-जीवनमें वर्णाश्रमके प्रति निष्ठा आवश्यक है, पीछे क्रमोन्नति द्वारा वैधभक्त-जीवन ही उपस्थित होगा और अन्तमें प्रेमभक्ति होनेपर जीवनकी सम्पूर्णता होगी। (१९) अधिकारमें उन्नति होनेपर आकारमें कुछ-न-कुछ परिवर्त्तन अवश्य ही होता है
सतां प्रसंगन्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हत्कर्णरसायनाः कथाः।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवत्र्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्तिरनक्रुमिष्यति ॥
(श्रीमद्भा. 3/25/25)
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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अपराधों का परित्याग करके गुरु के आनुगत्य में हरिनाम – ग्रहण की इच्छा करने पर सदैव हरिनाम करते-करते अपराध दूर होंगे। हमारे दुर्भाग्य को हटाने के लिए श्रीनामभजन के बिना कोई अन्य उपाय नहीं है। जो सब दुर्भागे व्यक्ति ‘एकमात्र भजन’ शब्दवाच्य श्रीनामकीर्तन के प्रति उदासीन होकर अन्य भजन का छल करते हैं एवं गुरु-वैष्णव- सेवा त्यागकर नामभजन या श्रीमद्भागवत पाठ आदि करने का अभिनय करते हैं, वे सब दाम्भिक होने के कारण उन लोगों का कदापि मंगल नहीं हो सकता ।
श्रीलप्रभुपाद
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विश्व समस्या का मतलब भूमि, पर्वत, सागर, नदी, नाले इत्यादि जड़ पदार्थों की समस्या से नहीं है। इसका सम्बन्ध विश्व के तमाम चेतन प्राणियों की समस्या से है। हम लोग विश्व समस्या का अर्थ केवल मनुष्यों की समस्या ही समझते हैं, अन्य चेतन प्राणियों की बात नहीं सोचते। यदि विश्व समस्या का मतलब हम मनुष्यों की समस्या ही समझें, तब भी हमें यह जानना होगा कि मनुष्य का स्वरूप क्या है, क्या उसकी आवश्यकता है और कैसे उसको वास्तविक सुख मिल सकता है, शान्ति मिल सकती है और अशान्ति दूर हो सकती है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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गौड़ीय वैष्णवों के जिस आचार-विचार का श्रील प्रभुपाद जी ने प्रवर्त्तन किया है, उसका सब प्रकार से संरक्षण करना होगा। उससे कोई स्वेच्छा से हुआ हो या अनिच्छा से हुआ हो, पतित या भ्रष्ट होने पर उसका संशोधन करने की चेष्टा करनी होगी। संशोधन की सम्भावना नहीं रहने पर उसे दुःसंग समझकर त्याग देना होगा अथवा विशेष परिस्थिति में उससे निरपेक्ष होकर रहना होगा।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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भविष्य में खाने या पहनने के लिए Bank Balance (बैंक में जमाराशि) करने की चेष्टा श्रीगुरु और भगवान् के प्रति अविश्वास ही प्रमाणित करता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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आपको स्मरण रखना होगा कि अपनी योग्यता के बल पर न तो आप पारमार्थिक नित्य मंगल लाभ कर सकते हैं और न ही तथाकथित जागतिक समृद्धि।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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