मुनियों की जिज्ञासा

प्रथम श्लोक का तत्पर्य– आगे . . . . सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के शिल्पी ब्रह्मा से लेकर एक नगण्य चींटी तक सारे बद्धजीव सृजन का कार्य करते हैं, किन्तु इनमें से कोई भी परमेश्वर से स्वतन्त्र नहीं है। भौतिकतावादी व्यर्थ ही सोचता है कि उसके अतिरिक्त कोई अन्य स्रष्टा नहीं है। यह माया या भ्रम कहलाता है। अल्पज्ञान के कारण भौतिकतावादी अपनी अपूर्ण इन्द्रियों के परे देख नहीं पाता और इस प्रकार से वह सोचता है कि पदार्थ, किसी श्रेष्ठ बुद्धि के बिना ही, स्वतः आकार ग्रहण करता है। किन्तु श्रील व्यासदेव ने इस श्लोक में इसका खंडन किया है, “चूँकि परम पूर्ण या परम सत्य प्रत्येक वस्तु का उद्गम है, अतः परम सत्य के शरीर से स्वतन्त्र कोई भी वस्तु नहीं हो सकती है।” देह के साथ जो कुछ घटित होता है वह देही को तुरन्त ज्ञात हो जाता है। इसी प्रकार यह सृष्टि उस परम पूर्ण का शरीर है, अतः इस सृष्टि में जो कुछ घटित होता है उसे वे प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से जान जाते हैं।
श्रुति मन्त्र में यह भी कहा गया है कि परम पूर्ण या ब्रह्म समस्त वस्तुओं का चरम उद्गम है। प्रत्येक वस्तु उन्हीं से उद्भूत है, उन्हीं के द्वारा पालित है और अन्त में उन्हीं में प्रवेश कर जाती है। यही प्रकृति का नियम है। स्मृति मन्त्र में इसी की पुष्टि हुई है। यह कहा गया है कि ब्रह्मा के कल्प के प्रारम्भ में जिस उद्गम से सारी वस्तुएँ उद्भूत होती हैं और अन्ततः जिस आगार में वे प्रवेश करती हैं, वह परम सत्य या ब्रह्म है। भौतिक विज्ञानी यह मानकर चलते हैं कि ग्रहमंडल का उद्गम सूर्य है, किन्तु वे सूर्य का उद्गम नहीं बता पाते। यहाँ पर चरम उद्गम की व्याख्या की गई है। वैदिक वाङ्मय के अनुसार ब्रह्मा, जो सूर्य के तुल्य माने जा सकते हैं, परम सष्टा नहीं हैं। इस श्लोक में कहा गया है कि भगवान् ने ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान प्रदान किया। कोई चाहे तो यह तर्क कर सकता है कि आदि पुरुष होने के नाते, ब्रह्मा को प्रेरित नहीं किया जा सकता था क्योंकि उस समय कोई दूसरा जीव न था। यहाँ पर यह कहा गया है कि परमेश्वर ने गौण स्रष्टा ब्रह्मा को प्रेरित किया जिससे वे सृजन कार्य कर सकें। अतः समस्त सृष्टि के पीछे जो परम बुद्धि कार्य करती है, वह परब्रह्म श्रीकृष्ण हैं। भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही पदार्थ की समग्रता को सूचित करने वाली सर्जक शक्ति यानी प्रकृति का निरीक्षण करते हैं। अतएव श्रीव्यासदेव ब्रह्मा की नहीं, अपितु परमेश्वर की पूजा करते हैं जो सृष्टि-कार्यों में ब्रह्मा का मार्गदर्शन करने वाले हैं। इस श्लोक में अभिज्ञः तथा स्वराट् शब्द महत्वपूर्ण हैं। ये दो शब्द परमेश्वर और अन्य सभी जीवों में अन्तर बताते हैं। और कोई भी जीव अभिज्ञः अथवा स्वराट् नहीं है, अर्थात् कोई भी जीव न तो पूरी तरह जानता है, न ही पूर्णतया स्वतंत्र है, यहाँ तक कि सृष्टि करने के लिए ब्रह्मा को भी परमेश्वर का ध्यान करना होता है। तो फिर आइंस्टीन जैसे महान् विज्ञानियों के विषय में क्या कहा जा सकता है? ऐसे विज्ञानियों का मस्तिष्क किसी मनुष्य की उपज नहीं है। जब कोई विज्ञानी ऐसा मस्तिष्क नहीं बना सकता तो फिर उन मूर्ख नास्तिकों का क्या कहना जो भगवान् की सत्ता को चुनौती देते हैं? यहाँ तक कि मायावादी निर्विशेषवादी जो अपने को भगवान् से एकाकार होने की डींग मारते रहते हैं, न तो अभिज्ञः हैं, न स्वराट्। ऐसे निर्विशेषवादी भगवान् का तादात्म्य प्राप्त करने के लिए ज्ञानार्जन हेतु कठिन तपस्या करते हैं। किन्तु अन्ततः वे किसी ऐसे धनी शिष्य पर आश्रित हो जाते हैं जो मठ तथा मन्दिर बनवाने के लिए उन्हें धन प्रदान करता है। रावण या हिरण्यकशिपु जैसे नास्तिकों को भगवान् की सत्ता का विरोध करने के पूर्व कठिन तपस्या करनी पड़ी थी, किन्तु अन्ततोगत्वा वे असहाय बन गये और जब भगवान् कालरूप में उनके समक्ष प्रकट हुए, तो वे अपने आपको बचा नहीं पाये।
यही हाल उन आधुनिक नास्तिकों का है जो भगवान् की सत्ता की अवमानना करते हैं। ऐसे नास्तिकों को वैसा ही दण्ड मिलेगा, क्योंकि इतिहास की पुनरावृत्ति होती है। जब-जब लोग ईश्वर की सत्ता की उपेक्षा करते हैं, तब-तब प्रकृति तथा उसके नियम उन्हें दण्ड देते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता के इस सुप्रसिद्ध श्लोक द्वारा भी होती है- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तब-तब हे अर्जुन ! मैं स्वयं अवतार लेता हूँ (भगवद्गीता ४.७) । आगे . . . .
* * * * * * * * * * * * * * * *
मधुर-रसाश्रित भजनकारी की निष्ठा-
न धर्म नाधर्मं श्रुतिगणनिरुक्तं किल कुरु
व्रजे राधाकृष्णप्रचुरपरिचर्यामिह तनु।
शचीसूनुं नन्दीश्वरपतिसुतत्वे गुरुवरं
मुकुन्दप्रेष्ठत्वे स्मर परमजस्रं ननु मनः ॥
(मनःशिक्षा २ श्लोक)
हे मेरे प्यारे मन ! श्रुतियोंमें कथित धर्म और अधर्म कुछ भी मत करो, बल्कि श्रुतियोंने चरम सिद्धान्तके रूपमें जिनको सर्वोपादेय चरम उपास्य एवं सर्वोपरि परम तत्त्व निर्धारित किया है, उन श्रीराधाकृष्ण युगलकी प्रेममयी प्रचुर परिचर्या करो। श्रीराधाभाव-कान्ति सुवलित शचीनन्दन श्रीचैतन्य महाप्रभुको श्रीनन्दनन्दनसे अभिन्न तथा श्रीगुरुदेवको श्रीमुकुन्दप्रेष्ठ (प्रिय) जानकर उनका सर्वदा स्मरण करो ।
गौड़ीय कण्ठहार
* * * * * * * * * * * * * * *

श्रीचैतन्य महाप्रभु
एक ऐसा समय था जब पतिव्रता स्त्री के लिए अपने सतीत्व की रक्षा करना तथा प्रतिष्ठित पुरुष के लिए अपनी मान-मर्यादा के साथ निरापद रहना बहुत कठिन था क्योंकि राजा लोग अपनी प्रजा को अपने बलि के बकरे के समान समझते थे। वे कभी भी किसी के धन, स्त्री, परिवार, व इज्ज़त को हड़प सकते थे। भारत वर्ष में मुसलमानों के आक्रमणों से हिंसा की भड़कती आग में चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था। भागवत धर्म, भक्ति धर्म या सनातन धर्म लगभग लुप्त सा हो गया था। धर्म के स्थानों पर व्यभिचार, कपट, लूटपाट व हत्याओं के द्वारा ही इतिहास के पन्ने भरे जा रहे थे। सभी लोग विषय भोगों में लिप्त थे। हिन्दु-मुसलमान एक दूसरे के प्रति घृणा एवं विरोध करते थे। चतुर्वेदी, भटटाचार्य, अथवा चक्रवर्ती ही क्यों न थे, वे शास्त्र के मर्म को नहीं जानते थे। लोग मंगल चण्डी इत्यादि देवी-देवताओं के गीत गाने-बजाने में जागरण कर लेते थे। बस धर्म-कर्म के नाम पर इतना ही जानते थे। यदि किसी ने स्नान करते समय गोविन्द, पुण्डरीकाक्ष आदि नाम ले लिया तो वे ही पुण्यात्मा माने जाते थे । लोगों के पास धन का अभाव नहीं था। वे लड़के-लड़कियों के विवाह में, मिटटी की गुड़िया या पालतु कुत्ते-बिल्लियों के विवाह में बहुत रुपया खर्च करते थे लेकिन भक्त – भगवान की सेवा में एक पैसा लगाना भी व्यर्थ समझते थे । पडित – मूर्ख, बच्चा-बूढ़ा, किसी के मुख से भी ‘हरिनाम’ नहीं सुनाई देता था । सभी लोग विष्णु -भक्ति से शून्य थे। मूर्ख, पापी लोग स्वयं तो कुछ साधन भजन करते नहीं थे परन्तु कोई इक्के-दुक्के साधु आपस में ताली बजाकर कृष्ण नाम कर रहे हों तो ये दुष्ट उन पर भी क्रोध करते और उनके प्रति नाना प्रकार के कटु वाक्यों का प्रयोग करते थे। कोई कहते कि ये लोग हमेशा चिल्ला चिल्ला कर भगवान का कीर्तन करते हैं; लेकिन बरसात के चार महीने तो भगवान सोते हैं और इनके चिल्लाने से भगवान की नींद टूट जाएगी, वे क्रुद्ध हो जाएँगे और देश में दुर्भिक्ष हो जाएगा। कोई कहता ये सब माँगने- खाने के धन्धे हैं। इनका घर द्वार सब तोड़-फोड़ कर नदी में फेंक देना चाहिए। मध्यकालीन युग में अर्थात् 11वीं शताब्दी के मध्य, भारत की ऐसी भी अवस्था हुई जब हमारे देश में हिन्दू व इस्लाम आदि धर्मों में अनेक प्रकार की कुरीतियाँ आ गयीं। हिन्दू धर्म का प्राचीन गौरव नष्ट होने लगा। सच्चाई का स्थान झूठ व पाखण्ड ने ले लिया था । छुआछूत की भावना ने प्रबल रूप धारण कर लिया था। निम्न जाति के लोगों को छूना भी पाप समझा जाने लगा था। सार्वजनिक कुओं से पानी लेना तो दूर, वे मंदिरों में जाकर देवी, देवताओं के चरणों में पुष्प भी नहीं चढ़ा सकते थे । मुसलमान लोग खुदा की सच्ची इबादत की ओर ज्यादा ध्यान न देकर सिर्फ हिन्दुओं को मुसलमान बनाने को ही धर्म मानने लगे थे। धर्म – प्रचार की अंधभावना से प्रेरित होकर छल से या तलवार की नोक पर अथवा धन का प्रलोभनादि देकर वे हिन्दुओं को मुसलमान बनाने को ही परम-धर्म समझने लगे थे। मनुष्यों को उनकी मनुष्यता से न तोलकर उनकी जाति से तोला जाता था ।
लेकिन अत्याचार – अनाचार की भी एक सीमा होती है। पाप का घड़ा भी एक न एक दिन भर जाता है। पाप का फल तो दुःख होता ही है, ये तो पत्थर की लकीर है सभी शास्त्र इसका समर्थन करते हैं। किन्तु, जीव दुःखों के दावानल में जलते रहें और दयामय भगवान तमाशा देखते रहें, ये तो कभी भी सम्भव नहीं है। इसीलिए तो भक्तवत्सल श्रीगौरसुन्दर श्रीअद्वैत – आचार्य आदि भक्तों की पुकार पर दहकते दुःखों के दावानल में जलते हुए जीवों पर दया करने के लिए, अपने निज धाम ‘गोलोक’ के ‘प्रेम-धन’ – ‘श्री हरिनाम’ की वर्षा करने के लिए श्रीधाम मायापुर (नदिया) में फाल्गुनी पूर्णिमा तिथि के अति शुभ लग्न में अर्थात 18 फरवरी 1486 (1406 शकाब्द) को सन्ध्या के समय प्रकट हुए। और देखो भगवान की कैसी अद्भुत लीला आस्तिक नास्तिक सभी लोग परम्परानुसार उस समय, जब श्रीगौरसुन्दर जी का आविर्भाव हुआ, उच्च स्वर से “हरिबोल” “हरिबोल” पुकार रहे थे। कोई शंख इत्यादि बजाकर शुभ ध्वनि कर रहे थे तो कोई गंगा में स्नान करने जा रहे थे, क्योंकि प्राकट्य अवसर पर चन्द्रग्रहण लगा हुआ था। भगवान की इस लीला में इनकी माता का नाम श्रीशची देवी व पिता का नाम श्रीजगन्नाथ मिश्र था। श्रीगौरसुन्दर के प्रकट होने से पूर्व शची देवी के आठ कन्याएँ हुई थीं, लेकिन सभी एक-एक करके मृत्यु के मुँह में जाकर समा गयीं। उसके बाद इनके घर एक पुत्र-धन आया, जिसका नाम विश्वरूप था। ये छोटी उम्र से ही सब विद्याओं में पारंगत हो गये और इन्हें संसार से वैराग्य हो गया। श्रीविश्वरूप एक दिन माता पिता और छोटे भाई को छोड़ कर घर से चल पड़े और सन्यासी हो गये थे। श्रीगौरसुन्दर के आविर्भाव के समय इनके नाना प्रसिद्ध ज्योतिषी, पंडित नीलाम्बर चक्रवर्ती जी ने भविष्यवाणी की कि अवश्य ही यह बालक युग पुरुष होगा । ये समस्त विश्व का अनन्तकाल तक भरण-पोषण करेगा, इसीलिए उन्होंने इनका नाम विश्वम्भर रखा। श्रीअद्वैत आचार्य की पत्नी सीता ठाकुरानी ने नीम वृक्ष के नीचे जन्म होने के कारण इनका नाम ‘निमाई’ रखा । बालक अति सुन्दर व गौर वर्ण का होने के कारण स्त्रियाँ इन्हें गौर, गौराँग या गौरसुन्दर नाम से पुकारती थीं। सन्यास लीला के बाद यह श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु नाम से विख्यात हुए ।
* * * * * * * * * * * * * * *
हे मर्त्याः ! परमं हितं श्रृणुत वो वक्ष्यामि संक्षेपतः,
संसारार्णव – मापदूर्मि बहूलं सम्यक् प्रविश्य स्थिताः।
नानाज्ञानमपास्य चेतसि नमो नारायणायेत्यमुं,
मन्त्रं सप्रणवं प्रणाम सहितं प्रावर्त्तयधवं मुहुः ।।13 ।।
यह संसार एक समुद्र के समान है, जिसमें लहरों के समान विपदायें तो आती ही रहती हैं। अतः संसार रूपी समुद्र में विपत्तियों के थपेड़ों को खाते रहने वाले हे मरणशील मनुष्यो ! परम हितकारी यह बात सुनो। मैं तुम्हें संक्षेप में बता रहा हूँ कि बहुत तरह के ज्ञान की गठरी को दूर फेंककर, श्रद्धा के साथ भगवान श्रीहरि को प्रणाम करते हुए प्रणव युक्त अर्थात्, ‘ॐ नमो नारायणाय’ मन्त्र का मन ही मन में बार-बार जप करते रहो।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
* * * * * * * * * * * * * * *

भक्तिरसामृतसिन्धुः पूर्व विभाग (२.२३४)-
अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः।
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ।।
श्रीकृष्णनामादि प्राकृत जिह्वादि इन्द्रियोंसे ग्रहणीय नहीं हैं। वे तो केवल भक्तों की सेवोन्मुख अप्राकृत जिह्वादि इन्द्रियोंमें स्वयं ही स्फुरित होते हैं।
नाम, रूप, गुण, लीला इन्द्रियग्राह्य नय।
सेवामुखे कृपा करि इन्द्रिये उदय ।।
भजनरहस्यवृत्ति – भगवत्स्वरूप भगवन्नाम-ग्रहण करनेमें प्रवृत्त होना ही सेवोन्मुखी वृत्ति है। जो जिह्वादि इन्द्रियाँ श्रीनामसेवाके लिए उन्मुख होती हैं अर्थात् ग्रहण करनेके लिए प्रवृत्त होती हैं, नाम उनपर स्वयं ही आविर्भूत होकर नृत्य करने लगते हैं। उदाहरणके लिए भरत महाराज जब मृग शरीर छोड़ने लगे तथा गजेन्द्र भी जब जलमें डूबने लगा, तब पशु होते हुए भी भगवन्नाम उनकी जिह्वापर स्वयं आविर्भूत हो उठा।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
* * * * * * * * * * * * * * * *

पैसा होने से ही भगवत् सेवा होगी ऐसा नहीं; परन्तु हरिकथा-प्रचार एवं हरिसेवा के लिए निर्बन्धिनी मति, दृढ़ संकल्प एवं अकपट सेवामय प्राण रहने से ही भगवत् सेवा कार्य होगा । तुम लोग पैसे के लिए चिन्ता मत करना । अर्थ या पैसे के द्वारा मठ आदि की रक्षा नहीं होती, परन्तु विषयों का स्वभाव ही ऐसा है, जो कि हरिसेवा में अयुक्त व्यक्ति को विषय – भोग में ही प्रमत्त करा देता है ।
श्रीलप्रभुपाद
* * * * * * * * * * * * * * * *

उपवास का वास्तविक तात्पर्य
हरिभक्तिविलास में एक स्थान पर उपवास का लक्षण क्या है उसे बतलाते हुये कहा गया है- “नोपवासस्तु लङ्घनम्”, अर्थात् केवल आहार नहीं करना ही उपवास नहीं है। बात अत्यन्त महत्वपूर्ण है। पेट में दर्द होने पर भी बहुत बार खाना-पीना बन्द कर देना पड़ता है – किन्तु शास्त्र के अनुसार वह कभी भी उपवास की मर्यादा प्राप्त नहीं करता। यद्यपि साधारण समाज में सभी निराहार रहने को ही ‘उपवास’ समझते हैं, किन्तु उपवास का जो वास्तविक तात्पर्य है, उस तात्पर्य से दूर रहने पर वह ‘उपवास” (निकट वास) नहीं होकर प्रवास अर्थात् दूर वास हो जायेगा। अतएव विचार यह है कि, भगवद् सेवामय श्रवण-कीर्त्तन में विभोर होकर आहार-निद्रा को भूल जाने का नाम ही उपवास अथवा भगवान् के सान्निध्य नज़दीक) में वास है। हम इसी प्रकार से ही समस्त व्रतोपवासों का पालन करते हैं। आज सुबह से ही श्रीभागवताचार्य द्वारा रचित श्रीकृष्णप्रेम तरंगिनी से श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध की चर्चा कर रहा हूँ। आप सभी ने उसे श्रवण किया है व कर रहे हैं। देवक्रम से एक विशेष घटना की चर्चा करना आवश्यक हो गया है। वह यह है, लीलापुरुषोत्तम स्वयंरूप श्रीकृष्ण 64 गुण-कलाओं में परिपूर्ण हैं। आज सुबह से भागवत के दशम स्कन्ध का पारायण करते हुए, 64 अध्यायों के पूरे होने के साथ साथ श्रीकृष्णचन्द्र के आविर्भाव का समय भी हो गया है। इससे आज इस व्रत-उत्सव की सफलता और शुभ सूचना का ही पता चलता है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *

महाप्रभुर भक्तगणेर वैराग्यप्रधान ।
याहा देखि तुष्ट हन गौर भगवान् ।’
(चे.च.अ. 6/220)
महाप्रभु जी के भक्तों का वैराग्य ही प्रधान होता है जिसे देखकर भगवान् श्रीगौरहरि अत्यन्त सन्तुष्ट होते हैं। इनमें से किसी ने भी संन्यास ग्रहण नहीं किया, परमहंस वेश धारण किया था। परमहंस वेश वर्णाश्रमातीत सर्वोत्तम वेश है। परन्तु समयान्तराल में परमहंस वेश की अवमानना होने लगी, योग्यता-अयोग्यता का विचार न कर अधिकतर लोग परमहंस वेश धारण कर व्यभिचार दोष से दूषित होने लगे। इस दोष से दुष्ट लोग गोस्वामियों के वेश की अमर्यादा करने लगे, जिसे देखकर मेरे गुरुदेव (श्रील भक्ति सिद्धान्त प्रभुपाद जी) ने परमहंस वेश नहीं लिया। अपितु अपने आपको वर्णाश्रम के अन्तर्गत जान संन्यास वेश धारण किया। गुरु- वर्ग के परमहंस वेश की अमर्यादा रूपी गुरुतर अपराध करने के स्थान पर वर्णाश्रम के अन्तर्गत नियन्त्रित जीवन यापन करना ही अनर्थ युक्त जीवों के लिये अधिक मंगलकारी है। यही दिखाने के लिये श्रील प्रभुपाद जी ने स्वयं आचरण करके शिक्षा दी। परमहंस वेश की सेवा करने के लिये मेरे गुरुदेव जी ने त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण किया। यद्यपि मेरे गुरुदेव परमहंस कुल चूड़ामणि थे तथापि अपने आपको विधि के अन्तर्गत समझ कर दीनता वश उन्होंने संन्यास आश्रम के चिन्ह धारण किये। आचार्यों के सारे आचरण ही जगत के जीवों को शिक्षा देने के लिये होते हैं। निर्गुण व्यक्ति का गुणों के अन्तर्गत कार्य करना दीनता को प्रकाश करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। त्रिदण्ड् शब्द का अर्थ है- कायदण्ड, वाक् दण्ड व मनोदण्ड। शरीर के द्वारा विषय के काम नहीं करूँगा, बल्कि केवल श्रीकृष्ण की सेवा ही करूँगा, मैं अपने वाक्यों को केवल श्रीकृष्ण सेवा में नियोजित करूँगा, मन को केवल श्रीकृष्ण की सेवा-चिन्तन में नियोजित करूँगा इस प्रकार का संकल्प ग्रहण करने वाले को त्रिदण्डि कहते हैं। मेरी काया, मेरा मन व मेरे वाक्य संयत नहीं हैं किन्तु मैंने प्रतिज्ञा की है कि मैं इनको किसी और कार्यों में नहीं लगाऊँगा, इन्हें केवल मात्र श्रीकृष्ण सेवा में लगाऊँगा – जैसे श्रीमद् भागवत में अवन्ति नगर के ब्राह्मण ने संकल्प लिया था। त्रिदण्ड-संन्यास ग्रहण करते समय उपरोक्त त्रिदण्डिभिक्षु गीति को पाठ करने का विधान दिया गया है। त्रिदण्ड वेष पूज्यतम् वेष है- स्मार्तों के स्मृति शास्त्र में भी त्रिदण्ड वेश की पूज्यतमता प्रदर्शित हुई है।
“देवता-प्रतिमा दृष्टवा यतिं चैव त्रिदण्डिनम् ।
नमस्कार न कुर्याच्चेदुपवासेन शुद्धतिः ॥”
(स्मृति वाक्य)
उपरोक्त त्रिदण्ड वेष की पूज्यतमता का लाभ उठा कर ही रावण ने त्रिदण्ड वेष की अवमानना कर सीता का हरण किया था। रावण ने व्यक्त रूप से सीता हरण किया था। किन्तु कोई-कोई छिप कर सीता का हरण करता है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *

जो लोग गुरु-वैष्णवों की सेवा से वंचित हैं, वे ही वृथा समालोचक हैं। उनका कभी कल्याण नहीं हो सकता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *

गीता का वास्तव अध्ययन
अमेरिका यात्रा के समय, मैं फीनिक्स नाम के एक स्थान पर गया था। वहाँ एक चर्च में सभा (हरिकथा) का आयोजन किया गया था। क्योंकि वहाँ के लोगों को ज़मीन पर बैठने का अभ्यास नहीं है, बैठने के लिए कुर्सियों की व्यवस्था की गई थी। मेरे लिए एक छोटा मंच बनाया गया था। अनेक स्थानीय व्यक्ति उस सभा में उपस्थित हुए थे। सभा के बाद प्रसाद की व्यवस्था भी की गई थी। सभा की समाप्ति के बाद जब हम वहाँ से निकलने लगे, एक व्यक्ति मेरे पास आए और मुझसे कहने लगे, “स्वामी जी, मुझे श्रीमद् भगवद् गीता पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। मैं सुबह सबसे पहले श्रीमद् भगवद् गीता की शिक्षा को पढ़ता हूँ और उसके बाद ही अपना कार्य शुरू करता हूँ।”
पाश्चात्य देश (Western Country) में रहते हुए भी श्रीमद् भगवद् गीता के प्रति उनका इतना आदर देख मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। भारत में भी श्रीमद् भगवद् गीता को प्रतिदिन श्रद्धा के साथ पढ़नेवाले व्यक्ति मैंने बहुत कम ही देखे हैं। मैंने श्रीमद् भगवद् गीता के प्रति उनके आदर और सम्मान की प्रशंसा की। उसके बाद वे कहने लगे, “स्वामी जी, यद्यपि मैं श्रीमद् भगवद् गीता का सम्मान करता हूँ, प्रतिदिन श्रीमद् भगवद् गीता का अध्ययन करता हूँ, किन्तु मैं कृष्ण को भगवान् के रूप में स्वीकार नहीं करता। कृष्ण कोई विशेष शक्तिवाले पुरुष, अतिमानव (Super Human Being) या एक बहुत बड़े कूटनीतिज्ञ (Diplomat) अथवा राजनीतिज्ञ (Politician) हो सकते हैं किन्तु मैं उन्हें भगवान् नहीं मानता।”
हम चलते-चलते बात कर रहे थे; अधिक बात करने का समय नहीं था। मैंने उनसे केवल इतना ही कहा, “आपने बताया कि आप श्रीमद् भगवद् गीता का आदर करते हैं और उसे प्रतिदिन पढ़ते हैं। मेरी आपसे एक विनती है, क्या आप श्रीमद् भगवद् गीता से श्रीकृष्ण के अतिमानव, कूटनीतिज्ञ या राजनीतिज्ञ होने का कोई एक भी प्रमाण दे सकते हैं”
जब वे कोई प्रमाण नहीं दे पाए तब मैंने उनसे कहा, “श्रीमद् भगवद् गीता में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है जो श्रीकृष्ण के अतिमानव, कूटनीतिज्ञ या राजनीतिज्ञ होने का प्रमाण देता हो। किन्तु इससे विपरीत, ऐसे अनेक श्लोक हैं जो श्रीकृष्ण के भगवान् होने का प्रमाण देते हैं। श्रीमद् भगवद् गीता में श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन से कहते हैं-
मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।
(श्रीमद् भगवद् गीता ७/७)
‘हे धनञ्जय! मुझसे श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है। धागे में जिस प्रकार मणियाँ गुंथी रहती हैं, उसी प्रकार यह सारा विश्व ओतप्रोत रूप से मेरे ही आश्रित है।’
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्यवन्ति ते ।।
(श्रीमद् भगवद् गीता ९/२४)
‘मैं ही समस्त यज्ञों का भोक्ता और प्रभु हूँ। जो मेरे वास्तव तत्त्व को नहीं जानते वे बार-बार संसार में पतित होते हैं।’
यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।।
(श्रीमद् भगवद् गीता १५/१८)
‘मैं क्षर (जीव) से अतीत हूँ और अक्षर (ब्रह्म और परमात्मा) से भी उत्तम हूँ। इसलिए सभी लोकों में तथा वेदों में मुझे पुरुषोत्तम कहते हैं।’
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ।।
(श्रीमद् भगवद् गीता १४/२७)
‘मैं ब्रह्म की प्रतिष्ठा हूँ अर्थात् ब्रह्म का मूल कारण हूँ। मैं ही नित्य-सुख का एकमात्र आश्रय हूँ।’
इन प्रमाणों को सुनने के बाद वह व्यक्ति बोले, “श्रीकृष्ण एक साधारण मनुष्य के जैसे जन्म ग्रहण करते हैं, उनके भी माता-पिता हैं, उन्हें हम भगवान् कैसे मानें?”
मैंने कहा, “श्रीमद् भगवद् गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं-
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।
(श्रीमद् भगवद् गीता ४/९)
‘मेरे जन्म और कर्म दोनों दिव्य हैं। जो मेरे इस दिव्य जन्म और कर्म के तत्त्व को जानते हैं, वे देह त्याग करने के बाद पुनः जन्म ग्रहण नहीं करते।’
श्रीकृष्ण का जन्म और कर्म साधारण मनुष्यों के जैसे नहीं हैं। देवकी और वसुदेव को वात्सल्य रस की सेवा प्रदान करने के लिए और उनकी इच्छा पूर्ति के लिए, श्रीकृष्ण ने उन्हें माता-पिता के रूप में ग्रहण किया। श्रीमद् भागवतम् में लिखा है कि कंस के कारागार में श्रीकृष्ण शंख, चक्र, गदा और पद्म लेकर चतुर्भुज रूप से आविर्भूत हुए। देवकी और वसुदेव उनके इस रूप को देखकर सोचने लगे कि यदि भगवान् छोटे बालक के रूप में आते तो वे उन्हें कंस से छिपा सकते थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से छोटे बालक के रूप में आने की विनती की। कृष्ण उनकी विनती सुनकर हँस दिए और बोले, “मैं एक साधारण बालक के रूप में ही आ सकता था, किन्तु उससे आपका भय दूर नहीं होता। आपको यह विश्वास नहीं होता कि मैं भगवान् हूँ और मैं कंस का वध करूँगा।”
श्रीकृष्ण ने उनकी विनती स्वीकार करते हुए एक साधारण बालक का रूप धारण किया। उसी समय कारगार के द्वार और श्रृंखलाएँ अपने आप ही खुल गईं और वसुदेव यमुना पार करके श्रीकृष्ण को गोकुल ले गए। इस प्रकार श्रीकृष्ण के जन्म और कर्म दोनों दिव्य हैं। मूर्ख व्यक्ति उनके वास्तव स्वरूप को न जानकर उन्हें एक साधारण मनुष्य समझते हैं।
कोई शास्त्रों का बहुत बड़ा पंडित ही क्यों न हो किन्तु यदि गीता अध्ययन के बाद वह श्रीकृष्ण को भगवान् न मानकर एक अतिमानव, कूटनीतिज्ञ या राजनीतिज्ञ माने, तो इस प्रकार के गीता पाठ से क्या कोई लाभ होगा? गीता को मानने का अर्थ है गीता की शिक्षाओं को स्वीकार करना, उनका पालन करना। अपने निजी लाभ के लिए अपनी रुचि के अनुरूप गीता का अर्थ करना गीता को मानना नहीं है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * *
* * * * * * * * * *