श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
(1/2/11)
वदन्ति कहते हैं; तत्वह; तत्त्व-विदः = विद्वान लोग; तत्त्वम् परमसत्य को; यत्-जो; ज्ञानम् ज्ञान; अद्वयम् अद्वैत; ब्रह्म इति ब्रह्म नामः परमात्मा इति परमात्मा नाम; भगवान् इति भगवान् नाम; शब्द्यते कहलाने वाले हैं।
अनुवाद – परमसत्य को जानने वाले विद्वान अध्यात्मवादी (तत्त्वेत्ता) इस अद्वय तत्व को ब्रह्म, परमात्मा या भगवान् के नाम से पुकारते हैं। तात्पर्य परमसत्य ज्ञाता तथा ज्ञेय दोनों हैं। इनमें कोई गुणात्मक भेद नहीं है। अतः ब्रहा, परमात्मा तथा भगवान्, गुणात्मक रूप से एक ही हैं। इसी को उपनिषदों के जिज्ञासु निर्विशेष ब्रह्म के रूप में, हिरण्यगर्भ या योगीजन अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में तथा भक्तगण भगवान् के रूप में अनुभव करते हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान् परमसत्य का अन्तिम नाम है। परमात्मा भगवान् का आंशिक स्वरूप है और निर्विशेष ब्रह्म भगवान् का वैसा ही तेज है जैसे कि सूर्यदेव की किरणें सूर्य के लिए हैं। कभी-कभी उपर्युक्त दोनों सम्प्रदायों के अल्पज्ञ जिज्ञासु अपनी-अपनी अनुभूति के पक्ष में तर्क करते हैं, किन्तु जो लोग परमसत्य के वास्तविक द्रष्टा हैं, वे अच्छी प्रकार जानते हैं कि एक ही परमसत्य के ये तीन गुण भिन्न भिन्न दृष्टिकोणों से भिन्न-भिन्न दिखते हैं।
भागवत के प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक में कहा गया है कि परमसत्य परम-स्वतन्त्र, सर्वज्ञ तथा मोह से सर्वथा मुक्त हैं। इस जगत में ज्ञाता ज्ञेय से भिन्न हैं, किन्तु परमसत्य में ज्ञाता और ज्ञेय एक हो जाते हैं। इस जगत में ज्ञाता जीवात्मा या पराशक्ति है जबकि ज्ञेय निष्क्रिय पदार्थ या अपरा शक्ति के रूप में होता है। अतः यहाँ परा तथा अपरा शक्ति का द्वैत है, किन्तु परम जगत में ज्ञाता तथा ज्ञेय एक ही परा शक्ति हैं। परम शक्तिमान की शक्तियाँ तीन प्रकार की हैं। शक्ति तथा शक्तिमान में कोई अन्तर नहीं होता, लेकिन शक्तियों की गुणवत्ता में अन्तर होता है। परम, जगत तथा जीवात्माएँ एक ही पराशक्ति से बने हैं, लेकिन यह भौतिक जगत अपरा शक्ति है। जीव अपरा शक्ति के सम्पर्क में रहने से मोहग्रस्त हो जाता है और यह सोचता है कि वह अपरा शक्ति से सम्बन्धित है। अतः भौतिक जगत में सापेक्षता का भाव है। किन्तु परम में ज्ञाता तथा ज्ञेय में अन्तर नहीं होता और प्रत्येक वस्तु पूर्ण (परम) होती है।
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श्रेयः और प्रेयः- दो मार्ग हैं-
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमान् वृणीते ॥
(कठ १/२/२)
श्रेयः और प्रेयः- मनुष्य इन दोनों मार्गोंका ही आश्रय करते हैं। किन्तु बुद्धिमान् व्यक्ति इन दो तत्त्वोंसे उचितरूपसे अवगत होकर पहला मुक्तिका कारण, दूसरा बन्धनका कारण है- इस प्रकार सोचते हैं। वे प्रेयः का परित्याग कर श्रेयः को ग्रहण करते हैं और विवेकहीन मन्द व्यक्ति योग अर्थात् अप्राप्त वस्तुका लाभ और उसकी सुरक्षा अर्थात् प्राप्त वस्तुका संरक्षण-इन दोनों प्रेयःकी ही प्रार्थना करते हैं ।
गौड़ीय कण्ठहार
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

नाम-प्रचारक के रूप में श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीहरिदास ठाकुर
सर्वप्रथम श्रीनित्यानन्द प्रभु और नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर को महाप्रभु जी ने आदेश दिया कि जाओ नगर नगर में, गाँव-गाँव में लोगों के द्वार- द्वार पर जाकर सबसे कृष्ण भजन, कृष्ण – कीर्तन तथा पवित्रता पूर्वक हरिनाम ग्रहण करने की प्रार्थना करो। कोई भी इस नाम-प्रेम से वैचित न रह जाये और नित्य प्रचार कार्य के सम्बन्ध में मुझे सूचित करो । एक दिन उनकी भेंट दो मतवाले शराबियों से हुई, जिनके बारे में कहा जाता है कि संसार में कोई ऐसा पाप नहीं था जो उन्होंने (जगाई-मधाई) न किया हो । लेकिन शराब के नशे में मस्त रहने के कारण उन्होंने साधु-निन्दा या वैष्णव – अपराध नहीं किया था। इसीलिए पतितपावन श्रीनित्यानन्द प्रभु ने स्वयं मार खाकर भी महाप्रभु जी से उन पर कृपा करवायी और बाद में वे श्रीमन् महाप्रभु व नित्यानन्द प्रभु की कृपा से परम भक्त बन गये ।
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मदन परिहर स्थितिं मदीये,
मनसि मुकुन्दपदारविन्द – धाम्नि ।
हरनयन – कृशानुना कृशोऽसि,
स्मरसि न चक्रपराक्रमं मुरारेः ।।29।।
हे कामदेव जी! सुनिये, मेरे मन का घर तो भगवान मुकुन्द जी के चरणकमल ही हैं। अतः उस घर में रहने की इच्छा का परित्याग कर दो। कारण, जब तुम केवलमात्र महादेव जी के नेत्रों की आग से ही झुलस गये हो और साथ ही कमज़ोर हो गये हो तो फिर क्या, तुम्हें भगवान मुरारि श्रीकृष्णजी के सुदर्शन- चक्र के पराक्रम की याद नहीं आ रही है अर्थात् मेरे हृदय में भगवान श्रीहरि के दिव्य पादपद्म विराजमान हैं अतः तुम यहाँ आने का दुःसाहस भी मत करना।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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भक्तिरहित कर्म, योग और ज्ञान निष्फल हैं
श्रीमन्महाप्रभुने कहा है कि कर्म, अष्टाङ्गयोग और ज्ञानको किन्हीं किन्हीं शास्त्रोंमें साधन कहा गया है; इसलिए अल्प बुद्धिवाले व्यक्ति इन शास्त्रोंका तात्पर्य हृदयंगम न कर पानेके कारण उनको मुख्य अभिधेय या साधन मान बैठते हैं। अधिकार भेदसे मनुष्य अनेक प्रकारके हैं और प्रवृत्त निवृत्त भेदसे वे दो प्रकारके हैं। उन अधिकारोंमें स्थित व्यक्ति उससे ऊपरके स्थानको प्राप्त करनेके लिए जो साधन करते हैं, वे साधन गौण मात्र हैं, मुख्य साधन या अभिधेय नहीं। उन साधनोंका फल केवल एक सोपान आगे बढ़ा देना मात्र है। अतएव बृहत् तत्त्वकी प्राप्तिमें उन साधनोंका स्थान अतीव तुच्छ या गौण है। कर्म, योग, ज्ञान और उन पथोंका उद्देश्य भक्ति न होनेसे उनमें स्वतन्त्ररूपसे कोई भी फल देनेकी शक्ति नहीं होती। यदि उन-उन साधनोंका चरम उद्देश्य कृष्णभक्ति हो, तो वे कुछ-कुछ गौण फल प्रदान करते हैं। केवल ज्ञानसे मुक्ति नहीं होती। भक्तिके उद्देश्यसे जो सम्बन्धज्ञान होता है, उसका प्राथमिक फल ही मुक्ति है। भक्ति ही उस ज्ञानके भीतरसे अनायास ही गौण तथा क्षुद्र फलस्वरूप मुक्ति प्रदान करती है। कर्मके सम्बन्धमें यह विचार है कि चारों वर्णों और चारों आश्रमोंके उपयोगी जिन कर्मोंका शास्त्रोंमें विधान है, उनका ही नाम धर्म है। इसे त्रैवर्गिक धर्म कहा जा सकता है। इस ग्रन्थकी द्वितीय वृष्टिमें त्रैवर्गिक विषयका विवेचन किया जाएगा। उस विषयमें महाप्रभुजीका उपदेश है कि देह-यात्रा, संसार-यात्रा आदिका स्वच्छन्दतासे निर्वाह करते हुए प्रवृत्त पुरुष मुख्य वैध (भक्ति) साधनमें बल प्राप्त करते हैं। अतएव वर्णाश्रमधर्मको कृष्णभक्तिके उपयोगी बनाकर प्रतिपालन करनेके लिए अति प्रवृत्त पुरुषगण ही शुद्धभक्तिके अधिकारी हैं। परन्तु जो लोग भक्तिका आचरण न करके वर्णाश्रमधर्ममें अवस्थित हैं, वे वर्णाश्रमधर्मरूप स्वधर्मका साधन करके भी नरकगामी होते हैं।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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शान्ति – अशान्ति या सुख दुःख दोनों ही परिवर्तनशील हैं । दुख का अनुभव कम होने पर सुख की उपलब्धि होती है, तथा सुख की अनुभूति कम होने के कारण दुःख का अनुभव होता है। अनेक लोग यह देखते या जानते हुए भी कि सुख के भीतर दुःख छिपा हुआ है, प्राप्त हुए भोगों को भोग ही लूँ-ऐसी कामना से प्रेरित होकर दुःख या अशान्ति के यूपकाष्ठ पर (जिसमें बकरे की गर्दन फँसाकर उसकी बलि दी जाती है) अपनी बलि दे देते हैं। इस प्रकार की असहिष्णुता या धैर्य-शून्यता ही हमारे लिए अनेक प्रकार की असुविधाएँ उत्पन्न कर देती है। इसलिए हमें सहिष्णु और धैर्यशील होना आवश्यक है । कैसी भी विपत्ति क्यों न आ जाय, मन में खूब धैर्य रखना चाहिए। मार्ग में जाते समय शराब की दुकान देखने पर शराब पीने के लिए उस ओर दौड़ना, किसी धनी व्यक्ति का धन देखकर धनी होने का यत्न करना, सुन्दर रूप देखकर उस रूप को भोगने के लिए उसके पीछे दौड़ना, किसी का पाण्डित्य देखकर पण्डित होने के लिए उत्कण्ठित हो जाना, ये सब अधैर्य के लक्षण हैं ।
श्रीलप्रभुपाद
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श्रीभागवत धर्म
श्रीभागवत् शास्त्र में वर्णित धर्म को भागवत-धर्म कहते हैं या यूँ कहें कि भगवान् से सम्बन्धित जो जो भी धर्म हैं, उन्हें भागवत धर्म कहते हैं, इसीलिये भगवान् के भक्तों के धर्म को भी भागवत धर्म कहते हैं। सद्धर्म, आत्म-धर्म, सनातन धर्म और भक्ति-धर्म भी इसी के अन्य नाम हैं। श्रीभागवत् के 11 वें स्कन्ध में महाराज निमि और नवयोगेन्द्रों के संवाद में भागवत धर्म का स्वरूप और उसका आचरण विस्तार रूप से वर्णित हुआ है। नवयोगेन्द्रों में से एक कवि नामक मुनि भागवत धर्म के स्वरूप का वर्णन करते हुये कहते हैं ‘ये वै भगवता प्रोक्ता उपाया ह्यात्मलब्धये। अजः पुंसामविदुषां विद्धि भागवतान् हितान् ॥’ (भा.11/2/34)
अर्थात् कवि मुनि कहते है कि भगवान ने स्वयं अपने मुख से नासमझ व्यक्तियों को भी अनायास आत्मलाभ अर्थात् अपनी प्राप्ति के जो तमाम आसान-आसान उपाय बताये हैं, उन्हीं को भागवत धर्म समझना। मनु आदि ऋषियों द्वारा प्रणीत धर्म को वर्णाश्रम-धर्म कहते हैं। भागवत् धर्म के वक्ता स्वयं भगवान् हैं, इसलिये भगवान् की प्राप्ति का इससे सुन्दर, सहज व सुगम मार्ग और कोई नहीं हो सकता। आँखें बन्द करके दौड़ने से भी इस राह में न फिसलन है और न पतन ही। कारण, भागवत धर्म के आरम्भ में ही भगवान के चरणों में ली गयी शरणागति की बात है। सर्वशक्तिमान भगवान् जिनके रक्षक और पालक होते हैं, उनके पतन की आशंका भला कहाँ रह जाती है।
भागवत धर्म का अनुशीलन कैसे करूँ? Practical Side क्या है, उसके सम्बन्ध में कहते हैं-
श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरूद्भुतकर्मणः ।
जन्मकर्मगुणानान्च तदर्थे अखिल चेष्टितम् ॥
इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियम् ।
दारान् सुतान् गृहाण प्राणान् यत् परस्मै निवेदनम् ॥
(भा.11/3/27-28)
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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भगवद्-भक्ति में प्रगाढ़ निष्ठा ही साधक-जीवन की रक्षा करती है। श्रीभगवान् साधक की निष्ठा को और बढ़ाने के लिए ही इस प्रकार की स्थिति उपस्थित करके परीक्षा लेते हैं। परीक्षा के प्रश्न कितने ही कठिन क्यों न हो, उत्तम पठित छात्र उनमें कभी असफल नहीं होता। मुझे विश्वास है कि, इस भगवद् परीक्षा में तुम अवश्य सफलता प्राप्त करोगे। विपत्ति ही सम्पत्ति की मुख्य नींव है। दुर्बल हृदय वाला व्यक्ति विपत्ति को अशुभ मानकर उससे निवृत्ति या मुक्ति पाने की चेष्टा करता है। सबल व्यक्ति विपत्ति आने पर उसे मंगल का कारण मानकर उसको आलिंगन कर लेता है। इसलिए तुम विपत्ति को सम्पत्ति समझना एवं उसको दृढ़ता के साथ आलिंगन करके जय कर लेना।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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भगवान् के हृदय स्वरूप साधुगण ही समस्त भगवत् उपदेश-तात्पर्य के ज्ञाता
श्रीमठ में नियमित रूप से जाकर हरिकथा, पाठ-कीर्तन आदि श्रवण-स्मरण का सुयोग लाभ करना। स्वयं ग्रन्थ अध्ययन कर जो नहीं समझोगी, वैष्णवों के श्रीमुख से वह सहज ही समझ आ जायेगा। कारण उस वाक्य या वाणी में विशेष शक्ति निहित है। जब साक्षात् सत्संग का अभाव होता है, तभी ग्रन्थ रूपी साधुसंग का विचार शास्त्रों में उपदिष्ट है। साधु-गुरु-वैष्णवगण भगवान् को हृदय में धारण करते हैं। साधुगण भगवान् के हृदय हैं एवं भगवान् ही साधुओं के हृदय हैं, इसलिए वैष्णवगण ही समस्त भगवत्-उपदेशों के आकर (मूल) मर्मी एवं Encyclopedia (विश्वकोष) हैं। इस संसार में अधिक रूप से आबद्ध या आकृष्ट हो जाने पर भजन-साधन में बाधा होती है, यह अत्यन्त सत्य बात है। इसीलिए वैष्णव या भक्त के सान्निध्य में रहने के लिए विशेष उपदेश दिया गया है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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भगवान जो करते हैं, मंगल के लिए ही करते हैं। हम ये बात समझते नहीं, इसलिए दुःखी होते हैं। जिनको ये बात समझ में आ गयी है वे किसी भी हालत में दुःखी नहीं होते।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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