श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

दिव्यता तथा दिव्य सेवा

धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः ।
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ।।
(1/2/8)

धर्मः = वृत्ति; स्वनुष्ठितः = अपने पद के अनुसार सम्पन्नः पुंसाम् मनुष्यों का; विष्वक्सेन भगवान् (पूर्ण अंश) की; कथासु कथा में; यः जो है; न नहीं; उत्पादयेत् उत्पन्न करता है; यदि यदि; रतिम् आसक्ति; श्रमः व्यर्थ श्रमः एव निरा; हि-निश्चय ही; केवलम् पूर्णतया ।

अनुवाद – अपने पद के अनुसार सम्पन्न की गई वृत्तियाँ यदि भगवान् के सन्देश के प्रति आकर्षण न उत्पन्न कर सकें, तो वे निरी व्यर्थ का श्रम होती हैं।

तात्पर्य – मनुष्य की विभिन्न जीवन विचारधाराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न वृत्तियाँ हैं। निपट भौतिकतावादी के लिए, जो स्थूल शरीर से परे कुछ भी नहीं देख सकता, इन्द्रियों से परे कुछ भी नहीं है। अतएव उसकी वृत्तियाँ केन्द्रित और विस्तृत स्वार्थ तक ही सीमित रहती हैं। यह केन्द्रित स्वार्थ अपने ही शरीर के चारों ओर केन्द्रित रहता है- सामान्यतः यह निम्न पशुओं में देखा जा सकता है। विकसित स्वार्थ मानव समाज में दिखता है और यह परिवार, समाज, समुदाय, राष्ट्र तथा विश्व के चारों ओर शारीरिक सुख को केन्द्र मानकर चलता है। इन निपट भौतिकतावादियों के ऊपर ज्ञानी होते हैं जो मनोजगत में उड़ते रहते हैं और उनकी वृत्तियों में कविता बनाना तथा दर्शन या शरीर तथा मन के सीमित स्वार्थ के उद्देश्य से कोई वाद चलाना सम्मिलित होते हैं। किन्तु शरीर तथा मन के ऊपर सुप्त आत्मा है जो यदि शरीर में न रहे तो सारे शारीरिक तथा मानसिक स्वार्थ व्यर्थ हो जायें। किन्तु अल्पज्ञों को आत्मा की आवश्यकताओं की कोई जानकारी नहीं होती।

चूँकि मूर्ख लोगों को न तो आत्मा की सूचना होती है और न इसकी ही कि वह शरीर तथा मन के क्षेत्र से किस तरह परे है, फलस्वरूप वे अपनी-अपनी वृत्तियों से संतुष्ट नहीं रहते। यहाँ पर आत्म-संतुष्टि का प्रश्न उठाया गया है। आत्मा स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म मन से परे है। वह शरीर तथा मन का सशक्त सक्रिय तत्त्व है। सुप्त आत्मा की आवश्यकता को जाने बिना केवल शरीर तथा मन को तुष्ट करके कोई सुखी नहीं रह सकता। शरीर तथा मन तो आत्मा के व्यर्थ के बाह्य आवरण हैं; आत्मा की आवश्यकताएँ पूरी होनी ही चाहिए। केवल पंछी के पिंजड़े की सफाई करके पंछी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। मनुष्य को पंछी की आवश्यकताएँ जाननी चाहिए।

आत्मा की आवश्यकता यह है कि वह भवबन्धन के संकुचित क्षेत्र से निकलना चाहता है और पूर्ण स्वतन्त्रता की अपनी इच्छा को पूरा करना चाहता है। वह विशालतर ब्रह्माण्ड की आच्छादित दीवालों के बाहर जाना चाहता है। वह स्वतन्त्र प्रकाश तथा आत्मा को देखना चाहता है। उसे पूरी स्वतन्त्रता तब प्राप्त होती है जब वह पूर्ण आत्मा, भगवान्, से मिल जाता है। प्रत्येक प्राणी में ईश्वर के लिए प्रच्छन्न स्नेह रहता है; आध्यात्मिक जीवन का प्राकट्य स्थूल शरीर तथा मन के माध्यम से स्थूल तथा पदार्थ के विकृत प्रेम के रूप में होता है। अतएव हमें उन वृत्तियों (धर्म) में लगना होता है जिनसे हमारी दैवी चेतना जगे। ऐसा परमेश्वर की दिव्य लीलाओं के श्रवण एवं कीर्तन द्वारा ही सम्भव है और ऐसी कोई भी वृत्ति जिससे ऐसा नहीं होता, उसे यहाँ पर समय का अपव्यय बताया गया है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अन्य वृत्तियाँ (चाहे वे किसी भी वाद के रूप में हों) आत्मा को मुक्ति नहीं दिला सकतीं। यहाँ तक कि मोक्षकामियों के कर्म भी व्यर्थ माने जाते हैं, क्योंकि वे समस्त स्वतन्त्रताओं के मूल उत्स को नहीं जान पाते। निपट भौतिकतावादी व्यावहारिक रूप से देख सकता है कि उसका भौतिक लाभ काल तथा दिक् से बंधा है, चाहे वह इस लोक में हो या अन्यत्र। यदि वह स्वर्गलोक में भी चला जाये तो उसकी लालायित आत्मा को वहाँ भी स्थायी वास नहीं मिलेगा। इस लालायित आत्मा को पूर्ण भक्ति की पूर्ण वैज्ञानिक विधि द्वारा तुष्ट किया जाना चाहिए।

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कृष्ण भूलि सेइ जीव – अनादि बहिर्मुख।
अतएव माया तारे देय संसार दुःख ॥
कभु स्वर्गे उठाय, कभु नरके डुबाय।
दण्ड्य जने राजा जेन नदीते चुबाय ॥

(चै. च. म. २०/११७-११८)

जीव कृष्णको भूलकर अनादि कालसे ही बहिर्मुख है। इसीलिए माया जीवोंको विविध प्रकारके सांसारिक दुःख प्रदान करती है। वह उसे कभी स्वर्ग ले जाती है तो कभी नरकमें डुबाती है, जिस प्रकार राजा किसी अपराधी व्यक्तिको नदीमें डुबा देता है, उसी प्रकार माया जीवोंको भव सागरमें डुबा देती है ।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

 

श्रीगौराँग देव का संकीर्तन आन्दोलन

श्रीगौराँग देव का इस जगत् में अवतीर्ण होने का एक कारण था कलिहत जीवों के परम कल्याण के लिए युगधर्म ‘हरिनाम – संकीर्तन’ का प्रचार करना । इस योजना का प्रथम चरण नवद्वीप से प्रारम्भ हुआ था। बस प्रारम्भ होने की देर थी कि यह प्रचार इस प्रकार फैला जैसे भीषण बाढ़ अपने जल के प्रवाह से गाँव के गाँवों को डुबा देती है। इसमें मुख्य रूप से श्रीवास पडित का भवन श्रीमहाप्रभु के संकीर्तन प्रचार का प्रधान केन्द्र बना। इसीलिए ‘श्रीवास आंगन’ का नाम अब भी “संकीर्तन रासस्थली” नाम से प्रसिद्ध है। श्रीवास के घर में अपने शत-शत भक्तों के मध्य महाप्रभु जी ने अपनी भगवद् शक्तियों का प्रकाश किया। वहाँ वे प्रवचन करते, गाते, नृत्य करते और नाना भावों का प्रकाश करते । वैष्णव उपदेशक के रूप में कुछ बाधाएँ भी आयीं, लेकिन वे सब सहज में ही दूर हो गईं।

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आम्नायाभ्यसनान्यरण्यरूदितं वेदवतान्यन्वहं,
मेदश्छेद – फलानि पूर्त्तविधयः सर्वे हुतं भस्मनि।
तीर्थानामवगाहनानि च गजस्नानं बिना यत्पदद्वन्द्वाम्भोरुह –
संस्मृतिं विजयते देवः स नारायणः ।।28।।

जिनके चरण कमलों के स्मरण को छोड़कर वेदाभ्यास, ऐसे वन में रोने की भाँति व्यर्थ है जहाँ तुम्हारे रोने-चीखने को कोई न सुन पाये। भगवान के पादपद्मों के स्मरण को छोड़कर सभी व्रतों का अनुष्ठान शरीर के टुकड़े-टुकड़े करने की तरह कष्ट देना ही है। भगवान के चरणों के स्मरण के बिना तमाम शुभ कर्म करना भी राख में आहूति देने की तरह निष्फल है तथा भगवान के स्मरण के बगैर तीर्थों में स्नान हाथी – स्नान की भाँति निरर्थक है. जिनके स्मरण के बिना सब कुछ ही व्यर्थ है, उन श्रीनारायण देव जी की बार-बार जय हो। (अर्थात् भगवान के स्मरण के बिना ज्ञान और कर्मादि स्वतन्त्र रूप से कोई सुफल देने में समर्थ नहीं हैं, अतएव भक्तिभाव से भगवान नारायण जी का ही स्मरण करें।)

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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बद्धजीवकी दुरावस्था

बद्धजीव नाना प्रकारके आकारोंमें लक्षित होते हैं। ऐसा होनेका कारण, जीवोंके अपने-अपने कर्मफल ही हैं। जीवका गठन शुद्ध चित्-तत्त्वसे हुआ है। उसके गठनमें किसी मायिक गुण या मायिक धर्मका मिश्रण नहीं है। यदि हम ऐसा मान लें कि जीवका गठन मायिक धर्मसे हुआ है, तो इस तरहके विचारमें मायावाद स्थान ग्रहण कर लेता है अर्थात् इससे मायावाद स्वीकारका दोष उपस्थित होता है। जीव वास्तवमें शुद्ध चित्-वस्तु है तथा चिद्धर्मसे गठित है। तटस्थ-धर्म वशतः जीव मायिक धर्ममें आबद्ध होने योग्य होता है; वह भी केवल उस अवस्थामें ही जब वह कृष्णदास्यरूप अपना स्वधर्म भूल जाता है। शुद्ध जीवकी सत्ता, उसका आकार और विकार-सब कुछ चिन्मय होता है। किन्तु जीव अणुचैतन्य होनेके कारण उसकी सत्ता और उसके आकार आदि भी अणु होते हैं। इसलिए जब जीव मायाबद्ध होता है, तब सबसे पहले माया निर्मित मनोमय लिङ्गदेह जीवके शुद्ध आकारको आच्छादित करता है और कर्मक्षेत्रमें उपस्थित होनेपर स्थूलदेह उस लिङ्गदेहको भी ढककर उसे जड़कर्मोंके लिए उपयोगी बना देता है। पर स्मरण रहे कि शुद्धस्वरूपको ऊपरसे ढकनेवाले स्थूल और लिङ्गशरीर मायिक विकार हैं, आत्मस्वरूप नहीं। परन्तु दोनोंमें सौसादृश्य है। भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँच मायिक स्थूलतत्त्वोंसे बद्धजीवका स्थूलशरीर गठित होता है तथा मन, बुद्धि. और अहङ्कार-इन तीन लिङ्गतत्त्वोंसे लिङ्गशरीर गठित होता है। इन दोनों आच्छादनोंके दूर होनेपर जीव मायासे मुक्त हो जाता है तथा तब जीवका आत्ममय चित्-शरीर प्रकाशित होता है। मुक्तपुरुष अपने आत्मशरीरकी इन्द्रियोंसे कार्य करते हैं। स्थूलजगतका आहार, विहार, स्त्रीसङ्ग, मलमूत्रत्याग, शारीरिक आघात, पीड़ा और वियोगका क्लेश- वह कुछ भी चित्-शरीरमें नहीं होता। जीव देहात्माभिमानरूप विवर्त्त धर्ममें स्थूलशरीर द्वारा जो कार्य करते हैं, उसे भ्रमसे स्वीकारकर सुख-दुःखका अनुभव करते हैं। मुक्तपुरुषोंके सम्बन्धमें और भी एक गूढ़ रहस्य है, वह यह कि मुक्त होनेपर भी जब तक जड़-ज्ञानाभिमान रहता है या जड़-व्यतिरेक निर्वाणबुद्धि रहती है, तब तक भक्तिके उपयोगी भागवती तनु (देह) प्राप्त नहीं होता। भक्त-साधुसङ्गके फलस्वरूप जो गौण मुक्तिदशा उपस्थित होती है, वही शुद्ध भागवती तनुका उदय करा सकती है। ज्ञानी-जनोंके सङ्गसे जो मुक्ति होती है, वह ‘यथार्थ मुक्ति नहीं, बल्कि मुक्तिका अभिमानमात्र है। वह भी जीवोंके लिए केवल एक दुर्गतिमात्र है। यहाँ संक्षेपमें जीवका शुद्धस्वरूप, बद्धस्वरूप और मुक्तस्वरूप-इन विषयोंकी आलोचना की गयी है, जीवके कर्त्तव्याकर्त्तव्यका विचार अन्यत्र किया जाएगा।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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अनन्त जीवन वेदान्त पढ़ने से मुक्ति नहीं होगी । अनन्त काल नाक दबाकर जमीन से दस बीस हाथ ऊपर उठने पर भी मंगल नहीं होगा, परन्तु स्वयं भागवत स्वरूप भक्तों के मुख से श्रीमद्भागवत कथा श्रवण करने से संसार के सभी जीवों का मंगल निश्चित रूप से होगा ।

श्रीलप्रभुपाद

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भगवान ये कर सकते हैं और ये नहीं कर सकते, सर्वशक्तिमान के सम्बन्ध में ये बात कहने का हमारा कोई भी अधिकार नहीं है। He can manifest Himself in any way He likes. सनातन धर्म को मानने वाले पुतुल- पुजारी (Idolators) नहीं हैं, अर्थात बुत-परस्त नहीं हैं। वे श्रीविग्रह की सेवा करते हैं। मनुष्य कर्तापन के भाव में अधिष्ठित होकर जिस निराकार या साकार की चिन्ता करते हैं या सांसारिक वस्तुओं द्वारा जो मूर्तियाँ बनायी जाती हैं वे सभी पुतले या बुत ही होते हैं। किन्तु जब भगवान स्वयं भक्त के विरह दुःख को दूर करने के लिए गुरु, पुरोहित या भास्कर अर्थात मूर्ति बनाने वाले को सेवा का सुयोग प्रदान कर जगत् में अवतीर्ण होते हैं, तब वह श्रीविग्रह, अर्चावतार कहलाता है, पुतला या बुत नहीं। अर्चावतार प्रेमिक भक्तों को साक्षात दर्शन देते हैं। वे उन्हें अपनी साक्षात सेवा देकर उन्हें कृतार्थ करते हैं; किन्तु कामुक व्यक्ति अपने कामनेत्रों से दर्शन करने के कारण वन्चित रह जाते हैं। वे भगवान के अप्राकृत विग्रह को भी दुनियावी बुत या पुतला ही देखते हैं, निर्गुण भगवत्-स्वरूप उनके लिए अप्रकाशित रहता है।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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हरि-गुरु-वैष्णवों की सेवा नहीं करने से विद्या, अविद्या के रूप में गणित होती है। उसके द्वारा विद्यार्थियों का अधःपतन अनिवार्य है। ‘ज्ञान’ एक वस्तु है और उपाधि अलग वस्तु है। उपाधि में दंभ-अहंकार आदि मनुष्य को नीचे गिराकर भक्ति-विरोधी बना देता है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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श्रीराधाकृष्ण को केन्द्रित करके ही समस्त श्रेष्ठत्व

कृष्ण-भक्ति प्राप्त कर जो धन्य हुए हैं, वे ही श्रेष्ठ कीर्तिमान् या कीर्तिमती हैं। कृष्ण-भक्ति प्राप्त करना ही श्रेष्ठ विद्याअर्जन है, राधाकृष्ण के प्रेम-धन से धनी व्यक्ति ही वास्तव धन-सम्पत्ति के अधिकारी हैं; कृष्णनाम-गुण-लीला ही श्रेष्ठ श्रवण-कीर्तन-स्मरण है, राधाकृष्ण के चरणकमल का ध्यान ही जीवों की श्रेष्ठ ध्येय वस्तु है; श्रीराधाकृष्ण का युगलनाम ही सर्वश्रेष्ठ उपास्य है। भाग्यवान्-भाग्यवतीगण ही कृष्णभक्त के संग में कृष्णप्रेमामृत रूपी परमश्रेयः वस्तु को लाभ करके धन्य होते हैं। श्रीगौरधाम की संकीर्तनरासस्थली के आनुगत्य में ही नित्यलीलारासस्थली श्रीवृन्दावन भूमि में निवास और लीला स्मरण का अधिकार प्राप्त होता है। श्रील नरोत्तम ठाकुर महाशय ने भी गान किया है-

“गौरांगेर संगिगणे, नित्यसिद्ध करि माने,
से जाय ब्रजेन्द्रसुत-पाश।

श्रीगौड़मण्डल-भूमि, जे बा जाने चिंतामणि,
तार हय ब्रजभूमे वास।।”

“गौरप्रेम रसार्णवे, से-तरंगे जे बा डुबे,
से राधामाधव-अंतरंग ।।”

(जो गौरांग के परिकरों को नित्यसिद्ध मानते हैं, वे ब्रजेन्दनन्दन के पास जाते हैं। श्रीगौड़मण्डल भूमि को जो लोग चिन्तामणि समझते हैं, उनका ब्रजभूमि में निवास होता है। गौरप्रेम के रससमुद्र में जो निमज्जित हो जाते हैं, वे राधामाधव के अंतरंग सेवक बनते हैं)।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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प्रीति-युक्त सेवा कष्ट दायक नहीं

यह घटना द्वितीय विश्वयुद्ध अंतर्गत जापान और चीन के बीच हुए युद्ध के समय की है। उस समय जापान की सहायता प्राप्त, सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली ‘आज़ाद हिन्द फौज’ (Indian National Army) का बर्मा में आगमन हुआ। बर्मा की उस समय की राजधानी रंगून पर बमों से हमले होने लगे। इस युद्ध से उत्पन्न कठिन परिस्थिति के कारण, रंगून में रह रहे अनेक भारतीय अपने देश वापस जाने लगे। भारत आते समय कई लोग भूख से रास्ते में ही मर रहे थे।

भारत लौट रहे लोगों में एक व्यक्ति था, जो अपना घर और संपत्ति छोड़कर पत्नी और नवजात पुत्र के साथ भारत आ रहा था। मणिपुर तक आते-आते दंपत्ति की भूख-प्यास के कारण शारीरिक स्थिति इतनी ख़राब हो चुकी थी कि वे अपने पुत्र को उठाकर चलने में असमर्थ हो रहे थे। पुत्र के प्रति उनकी बहुत आसक्ति थी। उन्होंने सोचा, “यदि हम पुत्र को अपने साथ लेकर आगे बढ़े और रास्ते में हमें कुछ हो गया तो उसे देखनेवाला कोई नहीं रहेगा, पुत्र भी बच नहीं पाएगा। किन्तु यदि हम इसे मणिपुर शहर में ही कहीं छोड़कर जाएँ तो कोई न कोई उसका लालन-पालन कर लेगा और वह बच जाएगा। इस आशा से पति-पत्नी अत्यंत दुःखी मन से, पुत्र को मणिपुर में ही एक स्थान पर छोड़कर आगे चले गए।

भारतवर्ष के अनेकों स्थानों से होते हुए अंत में वे दोनों मद्रास पहुँचे और वहाँ रहने लगे। भारत सरकार द्वारा मिली आर्थिक सहायता से उन्होंने वहाँ एक व्यवसाय शुरू किया जिसमें उन्हें सफलता मिली और वे फिर धन सम्पन्न हो गए। उन्होंने मद्रास में अपना एक घर बनाया और यात्रियों के रहने के लिए एक धर्मशाला भी बनवाई।

दूसरी ओर, मणिपुर में वे जिस पुत्र को छोड़ आए थे, उसे वहाँ के एक स्थानीय व्यक्ति ने देखा। बच्चे को रोते हुए देख उसे उस पर दया आई। वह उसे अपने घर ले गया और उसका पालन-पोषण करने लगा। बच्चा अब उसी व्यक्ति को अपना पिता और उसकी पत्नी को अपनी माता समझने लगा। समय बीतता गया। बच्चा अब बड़ा हो गया और एक दुकान में काम करने लगा। उसका विवाह हुआ और उसे एक पुत्र प्राप्त हुआ।

लालन-पालन करनेवाले माता-पिता ने एक दिन उसे बता दिया, “हम दोनों तुम्हारे माता-पिता नहीं हैं। तुम हमें रास्ते में मिले थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब रंगून पर हमला हुआ था, तब वहाँ से अनेक भारतीय अपने देश वापस आ रहे थे। उसी समय कोई तुम्हें यहाँ छोड़ गया था।”

यह बात सुनकर वह व्यक्ति आश्चर्यचकित हो गया। उसे अब अपने जन्म देनेवाले माता-पिता से मिलने की तीव्र इच्छा होने लगी। वह उन्हें ढूँढ़ने के लिए अपने पालक माता-पिता से आज्ञा लेकर, पत्नी और पुत्र के साथ घर से निकल पड़ा। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वह मद्रास आया। भाग्यक्रम से मद्रास में वह उसी धर्मशाला में रुका जो उसके पिता ने बनवाई थी। कमरे का किराया देने में असमर्थ होने के कारण धर्मशाला के मैनेजर ने उसे बरामदे में रहने के लिए स्थान दिया।

वह व्यक्ति मद्रास के विभिन्न स्थानों पर अपने माता-पिता को ढूँढ़ने लगा। इसी बीच उसे हैजा हो गया। बीमारी के संक्रमण के भय से धर्मशाला के मैनेजर ने उसकी पत्नी से कहा कि अपने पति को लेकर कहीं और चली जाए। पत्नी निवेदन करने लगी, “इस स्थिति में हम कहाँ जाएँगे? कौन हमें आश्रय देगा?”

मैनेजर के बार-बार कहने पर भी जब वे नहीं गए तो धर्मशाला का मालिक स्वयं वहाँ आया। हैजे से पीड़ित व्यक्ति और उसके परिवार को बरामदे में देखकर मालिक ने मैनेजर को डाँटते हुए कहा, “उन्हें यहाँ क्यों रहने दिया? ऐसा किससे पूछ कर किया? उन्हें अभी यहाँ से निकाल दो।”

मालिक की बात सुनकर पति-पत्नी रोने लगे। मालिक ने बहुत गुस्से से उस व्यक्ति से कहा, “तुम्हें हैजा हुआ है। अपने परिवार को लेकर इसी वक्त यहाँ से चले जाओ।”

वह व्यक्ति रोते-रोते अपनी स्थिति बताते हुए कहने लगा, “मैं मणिपुर से अपने माता-पिता को ढूँढ़ने के लिए यहाँ आया हूँ। बचपन में मेरे माता-पिता मुझे मणिपुर में छोड़कर कहीं चले गए थे। ऐसी बीमारीवाली स्थिति में अब हमें कौन आश्रय देगा? कृपया और कुछ दिन हमें यहाँ रहने दीजिए।”

उस व्यक्ति की बात सुनकर धर्मशाला के मालिक को अपने पुत्र का स्मरण हुआ। वह सोचने लगा, “अरे कौन हैं ये लोग? कहीं यह मेरा पुत्र तो नहीं है? शायद मेरी पत्नी पहचान ले!”

उसने अपनी पत्नी को पूरी बात बताई और उसे धर्मशाला ले आया। माता ने पुत्र को पहचान लिया और रोते-रोते कहने लगी, “अरे! यह तो हमारा पुत्र है।”

जैसे ही पति-पत्नी को उस व्यक्ति के साथ अपने सम्बन्ध का पता चला उन्होंने उसे गले लगा लिया। तब वे यह भी भूल गए कि उसे हैजा हुआ है। पहले जो उसे धर्मशाला से जाने के लिए कह रहे थे, वे ही अब उसे अस्पताल ले जाकर उसकी देखभाल करने लगे ! अब उन्हें हैजे से संक्रमित होने का डर नहीं था, क्योंकि जहाँ सम्बन्ध है वहाँ प्रीति और सेवा स्वाभाविक है।

व्यक्ति जहाँ अपना सम्बन्ध मानता है, वहाँ सेवा करने के लिए दिन-रात एक कर देता है। ऐसा करने में उसे कितना भी कष्ट हो, उसे कष्ट का अनुभव नहीं होता।

मठ में एक व्यक्ति था जो भगवान् के लिए एक समय की रसोई करने में भी बहुत कष्ट अनुभव करता था, किन्तु विवाह के बाद वही व्यक्ति परिवार के सभी कार्य करने लगा, जैसे बीमार पत्नी की सेवा, खरीदारी, रसोई, यहाँ तक कि बच्चों के मल-मूत्र की सफाई भी। भगवान् की सेवा करने में उसे कष्ट होता था, किन्तु परिवार की सेवा करने में उसे कोई कष्ट नहीं होता था, ऐसा क्यों?

भगवान् के साथ हमारे सम्बन्ध को न जानना ही इसका मूल कारण है। जिनके साथ हम अपना सम्बन्ध नहीं मानते, उनके साथ हमारी प्रीति भी नहीं होती और जहाँ प्रीति नहीं है, वहाँ थोड़ा कुछ कर लेने से ही लगता है जैसे बहुत कुछ कर लिया!

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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