श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

दिव्यता तथा दिव्य सेवा
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः ।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहेतुकम् ।।
(1/2/7)
वासुदेवे कृष्ण के प्रति; भगवति भगवान् के प्रति; प्रायोजितः = व्यवहृत; जनयति उत्पन्न करता है; भक्ति योगः भक्ति सम्बन्ध; आशु तुरन्त ही; वैराग्यम् = वैराग्य, विरक्ति; ज्ञानम् ज्ञान; च तथा; यत् जो; अहैतुकम् अकारण।
अनुवाद – भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति करने से मनुष्य तुरन्त ही अहैतुक ज्ञान तथा संसार से वैराग्य प्राप्त कर लेता है।
तात्पर्य – जो लोग भगवान् कृष्ण की भक्ति को भौतिक भावात्मक व्यापार की भाँति मानते हैं वे यह तर्क कर सकते हैं कि शास्त्रों में तो यज्ञ, दान, तपस्या, ज्ञान, योग तथा इसी प्रकार की दिव्य साक्षात्कार की विधियों की संस्तुति की गई है। उनके अनुसार भगवद्भक्ति तो उन लोगों के लिए है जो उच्चकोटि के कर्म नहीं कर पाते। सामान्यतया यह कहा जाता है कि भक्ति सम्प्रदाय तो शूद्रों, वैश्यों तथा अल्पबुद्धिमान स्त्री जाति के लिए है। किन्तु यह वास्तविक तथ्य नहीं है। भक्ति समस्त दिव्य कर्मों में सर्वोपरि है। फलतः यह दैवी होने के साथ ही साथ सरल है। यह उन शुद्ध भक्तों के लिए दैवी है जो परमेश्वर से सम्पर्क स्थापित करना चाहते हैं, और यह उन नवदीक्षितों के लिए सुगम है जो भक्ति रूपी घर की दहलीज पर हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का सान्निध्य प्राप्त करना एक महान् विज्ञान है 1 और यह सबों के लिए खुला हुआ है जिसमें शूद्र, वैश्य, स्त्रियाँ तथा शूद्र से भी निम्नकुल में उत्पन्न सम्मिलित हैं तो फिर गुणसम्पन्न ब्राह्मणों तथा महान स्वरूपसिद्ध राजाओं जैसे उच्चकोटि के लोगों के विषय में क्या कहा जाय ? अन्य उच्चकोटि के कार्य जिन्हें यज्ञ, दान, तप आदि कहा जाता है वे शुद्ध तथा वैज्ञानिक भक्ति सम्प्रदाय का अनुगमन करने पर गौण कारक के रूप में आते हैं।
दिव्य अनुभूति के मार्ग में ज्ञान तथा वैराग्य के सिद्धान्त दो महत्त्वपूर्ण कारक हैं। सम्पूर्ण आध्यात्मिक विधि प्रत्येक भौतिक तथा आध्यात्मिक वस्तु के पूर्ण ज्ञान तक पहुँचाती है और इस पूर्णज्ञान का फल यह होता है कि मनुष्य भौतिक राग से विरक्त होकर आध्यात्मिक कार्यों में लिप्त होता है। भौतिक राग से विरक्त होने का अर्थ पूर्णतया निष्क्रिय होना नहीं है, जैसा कि अल्पज्ञान वाले पुरुष सोचते हैं। नैष्कर्म का अर्थ है ऐसे कर्म न करना जिनका अच्छा या बुरा प्रभाव पड़े। निषेध का अर्थ सकारात्मक का निषेध नहीं। अवांछित तथा अनावश्यक वस्तुओं का निषेध अनिवार्य का निषेध नहीं। इसी प्रकार भौतिक रूपों से विरक्ति का अर्थ सकारात्मक रूप को नकारना नहीं है। भक्ति सम्प्रदाय तो सकारात्मक रूप की अनुभूति के लिए है। जब सकारात्मक रूप का साक्षात्कार हो जाता है तो नकारात्मक रूप स्वतः विलग हो जाते हैं। अतः भक्ति सम्प्रदाय के विकास के साथ-साथ मनुष्य निम्न वस्तुओं से विलग होता जाता है और श्रेष्ठ वस्तुओं से जुड़ता रहता है। इसी प्रकार भक्ति सम्प्रदाय भी जीव का सर्वोच्च धर्म है और उसे भौतिक इन्द्रिय सुख से बाहर निकालता है। यही शुद्ध भक्त का चिह्न है। वह न तो मूर्ख होता है, न ही निकृष्ट शक्तियों में लगा रहता है, न ही उसके पास भौतिक मूल्य होते हैं। केवल शुष्क चिन्तन से काम चलने वाला नहीं। यह तो भगवत्कृपा से ही सम्भव हो पाता है। अन्त में, जो शुद्ध भक्त है वह अन्य सभी उत्तम गुणों से पूर्ण होता है यथा-ज्ञान, वैराग्य, आदि, किन्तु जिसमें केवल ज्ञान तथा वैराग्य होता है वह भक्ति सम्प्रदाय के नियमों को जाने, यह आवश्यक नहीं है। भक्ति मानवजाति का सर्वश्रेष्ठ धर्म है।
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बद्ध और मुक्त भेदसे जीव दो प्रकारके हैं-
सेइ विभिन्नांश जीव-दुइ त प्रकार।
एक-नित्यमुक्त’, एक- ‘नित्य संसार’ ॥
‘नित्यमुक्त’ – नित्य कृष्ण चरणे उन्मुख ।’
‘कृष्णपारिषद’- नाम, भुञ्ज सेवासुख ॥
‘नित्यबद्ध’- कृष्ण हैते नित्य-बहिर्मुख।
नित्यसंसार, भुञ्ज, नरकादि-दुःख ॥
सेइ दोषे माया-पिशाची दण्ड करे तारे।
आध्यात्मिकादि तापत्रय तारे जारि’ मारे ॥
(चै. च. म. २२/१०-१३)
विभिन्त्रांश जीव दो प्रकारके होते हैं- प्रथम नित्यमुक्त और द्वितीय नित्यसंसार अर्थात् नित्यबद्ध। नित्यमुक्त जीव नित्यकाल कृष्णकी सेवामें उन्मुख रहते हैं तथा सेवासुखका आस्वादन करते हैं, वे कृष्णके परिकर (पार्षद) कहलाते हैं। नित्यबद्ध जीव कृष्णसे नित्य बहिर्मुख रहकर संसारमें स्वर्ग और नरक आदि सुख-दुःखका भोग करते हैं। कृष्ण बहिर्मुखतारूप दोषके कारण पिशाची माया उनको स्थूल और लिङ्ग आवरणोंसे बद्धकर दण्ड प्रदान करती है, अर्थात् आध्यात्मिक आदि त्रितापोंसे दग्ध करती है। [यहाँ विभिन्नांशका तात्पर्य समझ लेना चाहिए-सर्वशक्ति समन्वित कृष्णके अंश स्वांश कहलाते हैं। केवलमात्र तटस्थाशक्तियुक्त भगवान्के अंश विभिन्त्रांश कहलाते हैं। जीव सीधा कृष्णका अंश नहीं है, बल्कि कृष्णकी तटस्थाशक्ति जीवोंके रूपमें परिणत होती है। इसलिए वे तटस्थाशक्तिके परिणाम होनेसे विभिन्त्रांश कहलाते हैं। स्वांश भगवत् तत्त्व हैं, जीव भगवत् तत्त्व नहीं है, शक्ति तत्त्व है ] ।
गौड़ीय कण्ठहार
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

श्रीगौराँग देव अब वे गौरांग देव न रहे’
गया तीर्थ से लौटने के बाद श्रीगौराँग का भाव एकदम बदल गया। अब तो गौराँग देव हर समय श्रीकृष्ण विरह में उन्मत्त रहने लगे । हे कृष्ण ! तुम कहाँ हो ? ऐसा बार-2 कहकर मूच्छित हो जाते; पढ़ना – पढ़ाना तो अब बिल्कुल छूट गया । छात्रों, के बार-बार अनुरोध पर श्रीगौराँग पढ़ाने लगे परन्तु उन्हें श्रीकृष्ण के सिवा कुछ भी स्फूर्ति नहीं होती थी । वे कहते, श्रीकृष्ण नाम छोड़कर और कहीं कुछ भी नहीं है। वे व्याकरण के प्रत्येक सूत्र की व्याख्या कृष्ण सम्बन्धी करते । अन्त में उन्होंने छात्रों को सदा के लिए विदा करते हुए कहा- इतने दिन पढ़ा-सुना, अब आप पूर्ण रूप से कृष्ण भजन करो ।
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जिल्हे कीर्त्तय केशवं मुररिपुं चेतो भज श्रीधरं
पाणिद्वन्द्व समर्चयाच्युतकथाः श्रोत्रद्वय त्वं श्रुणु।
कृष्णं लोकय लोचनद्वय हरेर्गच्छांघ्रियुग्ममालयं
जिघ्र घ्राण मुकुन्द – पाद – तुलसीं मूर्द्धन्नमाधोक्षजम् ।।27।।
हे मेरी जिहे! तुम केशव का कीर्तन करो, हे मेरे मन ! तुम भगवान मुरारि का भजन करो, हे मेरे दोनों हाथ! तुम भगवान श्रीधर की अर्चना करो, हे मेरे दोनों कान! तुम अच्युत भगवान श्रीकृष्ण जी की कथा सुनो, हे मेरे नेत्रयुगल ! तुम भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करो, हे मेरे दोनों पैर ! तुम भगवान श्रीहरि के मन्दिर में जाओ, हे मेरी नासिका ! तुम भगवान मुकुन्द जी के चरणों की तुलसी की सुगन्ध ग्रहण करो और हे मेरे मस्तक ! तुम अधोक्षज भगवान श्रीहरि को प्रणाम करो। (इस प्रकार इस श्लोक में सभी इन्द्रियों से भगवान श्रीगोविन्द जी की सेवा करने की अभिलाषा ही व्यक्त की गयी है।)
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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जीवका स्वरूप

अणुचैतन्य जीव स्वभावतः पूर्ण चैतन्यरूप कृष्णका दास है। कृष्णदास्य ही जीवका स्वरूप है। अपने उस नित्य स्वरूपको भूलकर जीव माया द्वारा बँधा हुआ है। परन्तु अपने नित्य स्वरूपका स्मरण होनेपर जीव मायासे मुक्त होकर अपने नित्य स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाता है। चैतन्यवस्तुका जो स्वाभाविक शक्ति-धर्म है, वह अणुचैतन्य जीवमें अणुमात्रामें विद्यमान होता है। इसलिए जीव प्रायः स्वभावतः निःशक्तिक होता है-मुक्तावस्थामें कृष्णशक्ति प्राप्तकर उसी अनुपातमें शक्तियुक्त होता है। “मैं चैतन्य वस्तु हूँ”- ऐसा अध्यास करके जीवको शक्ति प्राप्त नहीं होती, वरन् वैसे अध्याससे जो मुक्ति होती है, उसे निर्वाण मुक्ति कह सकते हैं। परन्तु “मैं कृष्ण दास हैं- इस अध्यास से जीव कृष्णशक्ति प्राप्तकर उसके द्वारा नित्य आनन्दको प्राप्त हो जाता है। इससे आनुषंगिक रूपमें मायाध्यासरूप भय भी दूर हो जाता है।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि लाखों योनियों में रहना अच्छा है; तथापि कपट का आश्रय लेना अच्छा नहीं है । कपटरहित – व्यक्ति का ही मंगल होता है ।
श्रीलप्रभुपाद
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भगवान् ही सबके पालनकर्त्ता
गुरु महाराज के श्रीहरिदास नामक एक बन्धु थे जो कभी-कभी गुरु महाराज के मठ में योगदान से पूर्व के किराए वाले घर में उनके साथ बैठकर कीर्त्तन किया करते थे। गुरु महाराज ने कोलकाता में कुछ समय रहने के पश्चात् सम्पूर्ण रूप से गौड़ीय मठ में योगदान दिया।
वहाँ से श्रील प्रभुपाद के निर्देशानुसार वे प्रचार पार्टी के साथ मद्रास चले गए तथा वहाँ का प्रचार कार्य सम्पन्न होने पर कोलकाता वापस आए।
एक बार श्रील प्रभुपाद की कथा हेतु कोलकाता विश्वविद्यालय के दरभङ्गा हॉल में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। उसी उपलक्ष्य में गुरु महाराज ने अपने बन्धु श्रीहरिदास को भी श्रील प्रभुपाद की कथा श्रवण करने के लिए साथ में जाने के लिए कहा। किन्तु श्रीहरिदास ने उत्तर दिया, “आपके पीछे तो कोई क्रन्दन करने वाला नहीं है। कारण, आपने विवाह नहीं किया, आपकी कोई सन्तान आदि नहीं है। किन्तु मैंने तो विवाह किया है।
मेरी पत्नी है, सन्तान है, मुझे तो उनका पालन करना है। मैं यदि उनके पालन की चिन्ता नहीं करूँगा तो अन्य कौन करेगा, वे कैसे अच्छे से पालित होंगे?
आपके साथ कथा सुनने हेतु आने-जाने में समय व्यय होगा। इसकी अपेक्षा यही समय यदि मैं अपने परिवार के लिए काम करके धन अर्जन करने में लगाऊँ तो अच्छी तरह से उनका पालन कर पाऊँगा।” गुरु महाराज ने उस समय उन्हें कुछ भी नहीं कहा तथा स्वयं ही श्रील प्रभुपाद की कथा सुनने हेतु चले गए।
कुछ समय के पश्चात् उन्हें अपने बन्धु तथा गुरुभ्राता श्रीनारायण मुखर्जी के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि कार दुर्घटना में श्रीहरिदास की मृत्यु हो गई है। समय के फेर से जब गुरु महाराज ने कोलकाता में श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ की स्थापना की, तब उन्हीं श्रीहरिदास का पुत्र गुरु महाराज के दर्शन के लिए आया। उनकी अत्यन्त श्रद्धासहित की जा रही प्रणाम आदि क्रियाओं को देखकर गुरु महाराज ने उनसे उनका परिचय पूछते हुए कहा, “आप कौन हैं और कहाँ से आए हैं?” उन्होंने उत्तर दिया, “मैं आपके बन्धु श्रीहरिदास का पुत्र हूँ।” परिचय सुनकर गुरु महाराज ने उनसे उनके घर, परिवार, कार्य आदि के विषय में भी सब जानकारी ली तथा अन्त में उन्हें प्रसाद आदि देकर तृप्त किया।
उनके जाने के बाद गुरु महाराज ने हम लोगों को उपलक्ष्य करके शिक्षा देते हुए कहा, “हरिदास कहता था कि वह इनका पालन नहीं करेगा तो अन्य कौन करेगा। देखो! उसके नहीं रहने पर भी इन का पालन तो हो ही गया न। किसी के रहने नहीं रहने पर भी पढ़ना-लिखना, पालन होना इत्यादि भगवान् के द्वारा ही होता है, अन्य किसी के द्वारा नहीं।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकरविमूढात्मा कत्र्ताहमिति मन्यते ॥
श्रीमद्भगवद्रीता (3.27)
[सभी प्रकार के कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा किए जाते हैं, परन्तु अहंकार से मोहित चित्त वाला व्यक्ति ऐसा मान लेता है कि मैं कर्ता हैं।]
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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इस समय मठ की रक्षा करने वाले लोगों का बहुत अभाव है। सभी सुख चाहते हैं। अगर बिस्तर पर लेटकर खा पाते तो उठकर बैठकर खाना कष्टदायक लगता है। अगर कोई चबा देता तो दांतों का परिश्रम भी कम होता।
आजकल क्रोधी व्यक्तियों की संख्या अधिक है। क्रोध के कारण वह माता-पिता एवं स्त्री-पुत्र के साथ नहीं रह पाया। काम-क्रोध सभी को पकड़कर बैठा है। आप भी क्या करेंगे, और मैं भी क्या कर सकता हूँ? [वह] संसार के काम को कर पाता तो मठ में क्यों आता? बहुत लोग संसार में नहीं चल पाने के कारण ही मठ में चले आते हैं। ‘पि-पु-फि-शो का दल ही बड़ा है।
‘पि-पु-फि-शो’ के दल का अर्थ है अत्यन्त आलसी गोष्ठी; बहुत देर तक सोये रहने से सूर्य के ताप से पीठ जलने लगती है। यह देखकर एक व्यक्ति ने किसी प्रकार मुँह खोलकर कहा-‘पि पु’ (अर्थात् ‘पीठ पुड़छे’) पीठ जल रही है। यह बात पूरी तरह से बोलने में भी उसको आलस हो रहा है। दूसरे व्यक्ति ने भी उसी प्रकार उत्तर दिया ‘फि शो’ (अर्थात् ‘फिरे शो’) करवट बदलकर सो जाओ।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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गुरु-वैष्णव-स्नेह-वत्सल और अदोषदर्शी

श्रीगुरु-वैष्णवों का स्नेह्त्वात्सल्य, आश्रितजनों के प्रति हमेशा रहा है और रहेगा भी। वे अनुग्रहीतजनों को सेवा का अवसर प्रदान कर अपनी उदारता-वदान्यता का परिचय दिया करते हैं। कौन भाग्यवान् भाग्यवती है, कौन अभागा है, इसका एक मापदण्ड है। पारमार्थिक विचार में जो गुरु-वैष्णवों से स्नेह-प्रीति करते हैं, वे ही वास्तविक भाग्यवान् या भाग्यवती हैं। लौकिक-व्यवहारिक जगत में, क्षणिक भाग्य और पारमार्थिक कल्याण में आकाश-पाताल का अंतर है। जो लोग अंत में वर्णित श्रेयः वस्तु को प्राप्त करके धन्य हुए हैं, वे वास्तव में धन्यातिधन्य हैं। सेवानिष्ठा क्या वस्तु है और उसमें कितना आनन्द है, वह सच में अनुभव का विषय है। साधारण लोगों की अनुभूति में यह कभी नहीं आता है। गुरु-वैष्णवों की कृपा से साधक-साधिकाओं की सब प्रकार की अयोग्यता, दुर्भाग्य, चंचलता, कपटता सम्पूर्ण रूप से दूर हो जाती है। श्रीगुरुपादपद्म अदोषदर्शी हैं, इसीलिए वे आश्रितों की सभी प्रकार की अयोग्यताओं एवं दोषत्रुटियों को क्षमा करने में समर्थ हैं। आश्रय और विषय-विग्रह की सेवा करते समय दोष-त्रुटि हो ही सकती है। इस सम्बन्ध में आश्रितों के प्रति क्षमागुण रहने के कारण सेवक-सेविका निश्चिन्त रह सकते हैं। फिर भी “वन्दो मुईं सावधान मते” (सावधान होकर मैं वन्दना करता हूँ) – पद गाकर सावधान किया गया है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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ईश्वर को सभी मानते हैं
गुरु महाराज (श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज) कुछ दिनों के लिए कृष्णनगर मठ में आए हुए थे। मैं भी उनके साथ वहाँ पर था। एक दिन गुरु महाराज पहली मंज़िल पर बैठे हुए थे व मुझसे कुछ लिखवा रहे थे। उसी समय एक युवक वहाँ आया और सीढ़ी पर खड़े-खड़े ही गुरुजी से कहने लगा, “स्वामी जी, क्या ईश्वर का अस्तित्व है? क्या किसी ने ईश्वर को देखा है? मैंने तो कभी नहीं देखा। आप लोग साधु वेश धारण करके लोगों के साथ छल-कपट करते हैं। ईश्वर के नाम पर पेट-पूजा करते हैं। एक सज्जन व्यक्ति को इस प्रकार नहीं करना चाहिए।”
उस लड़के की ऐसी बात सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा। किन्तु गुरु महाराज शांत और धीर-स्थिर थे। उन्होंने उस लड़के से प्रीति-पूर्वक कहा, “तुम वहाँ खड़े होकर क्यों बात कर रहे हो? यहाँ मेरे पास आकर बैठो, हम बैठकर बात कर सकते हैं।”
वह बैठकर बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ और वहीं से बोलने लगा, “आप लोग सबको अफ़ीम पिलाकर उनसे अपना काम करवा लेते हो। क्या एक सज्जन व्यक्ति का इस प्रकार के कार्य करना उचित है?”
सीढ़ी पर खड़े रहकर कुछ समय तक वह इस प्रकार बोलता रहा। गुरुजी ने उसकी बातों को सुनने के बाद उससे पूछा, “तुम्हें देखने से लगता है कि तुम किसी कॉलेज के विद्यार्थी हो।”
उसने उत्तर दिया, “हाँ, मैं कॉलेज का विद्यार्थी हूँ।”
गुरु महाराजः “किस कॉलेज में पढ़ाई करते हो?”
लड़का: “कृष्णनगर कॉलेज।”
गुरु महाराजः “कृष्णनगर कॉलेज में ही क्यों?”
लड़का: “क्योंकि कृष्णनगर कॉलेज के प्रोफेसर विद्वान हैं, पिताजी ने मेरा प्रवेश (admission) उसी कॉलेज में करवाया है।”
गुरु महाराजः “क्या अपने घर पर रहकर पढ़ाई नहीं कर सकते? पढ़ाई के लिए कॉलेज जाने की क्या आवश्यकता है?”
लड़का: “किसी के पास यदि विद्या है तो क्या हम उसका लाभ नहीं लेंगे?”
गुरु महाराजः “तुम स्वयं एक शिक्षित व्यक्ति होते हुए भी विद्या प्राप्त करने के लिए किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के पास जाते हो। Dictionary में ‘ईश्वर’ शब्द का अर्थ है ‘श्रेष्ठ’ या ‘समर्थ’। कृष्णनगर कॉलेज के प्रोफेसर तुम्हें विद्या देने में समर्थ हैं इसलिए तुमने उनकी शरण ग्रहण की। इसका अर्थ यह है कि तुम यह मानते हो कि कोई व्यक्ति तुमसे श्रेष्ठ है। जिनके पास कोई विशेष योग्यता (ईशिता) है वह ईश्वर है। क्या तुमने ईश्वर को नहीं माना? धन प्राप्ति की इच्छा रखनेवाला व्यक्ति किसी धनी व्यक्ति की शरण ग्रहण करता है। कोई समस्या होने पर व्यक्ति किसी प्रभावशाली व्यक्ति के पास जाकर उससे अपनी समस्या के समाधान के लिए प्रार्थना करता है। कौन ईश्वर को नहीं मानता? यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी ईश्वर को मानते हैं। यदि किसी कुत्ते के पास उससे बलवान कुत्ता आ जाए तो वह उस बलवान कुत्ते के शरणागत हो जाता है। बड़ी चींटी के आने पर छोटी चींटी उसे रास्ता दे देती है। प्रत्येक जीव का स्वयं से श्रेष्ठ एवं योग्य व्यक्ति के प्रति स्वाभाविक विश्वास है। प्रत्येक क्षेत्र में कोई न कोई ईश्वर है। विभिन्न क्षेत्रों में क्या लोग स्वयं से श्रेष्ठ एवं योग्य व्यक्ति की बात नहीं मानते? जैन धर्म और बौद्ध धर्म के लोग कहते हैं, ‘हम ईश्वर को नहीं मानते’, किन्तु जैन धर्म के लोग महावीर की शिक्षा और बौद्ध धर्म के लोग बुद्धदेव की शिक्षा को मानते हैं। क्या उन्होंने ‘महावीर’ और ‘बुद्धदेव’ को ईश्वर नहीं माना? ईश्वर को कौन नहीं मानता?”
इस जगत् में जब हम छोटे-छोटे ईश्वरों को मानते हैं तो उन परमेश्वर को मानने में क्या आपत्ति है? छोटे-छोटे ईश्वरों को हम देख सकते हैं इसलिए मानते हैं; परमेश्वर को देखा नहीं जाता, अतएव हम नहीं मानते- यदि इस प्रकार तर्क हो तो उसका उत्तर यह है कि अपनी सीमित सामर्थ्यवाली नाशवान इन्द्रियों (आँख, कान, नाक आदि) के द्वारा हम कितना अनुभव कर सकते हैं? जो वस्तुएँ हमारी आँखों के द्वारा देखी नहीं जा सकती, क्या उनका अस्तित्त्व नहीं है?
अलग-अलग विषय को समझने के लिए अलग-अलग प्रकार की योग्यता की आवश्यकता होती है। जब तक वह योग्यता प्राप्त न हो, तब तक हम उस विषय को समझ नहीं सकते। उदाहरण के लिए, कई भाषाओं का ज्ञान होने पर भी यदि हम उर्दू भाषा नहीं जानते, तो उन अन्य भाषाओं के ज्ञान के द्वारा हम उर्दू भाषा में लिखित शब्द को नहीं समझ सकते। जैसे उर्दू भाषा के शब्द को समझने के लिए उर्दू भाषा के ज्ञान की आवश्यकता है, उसी प्रकार परमेश्वर की उपलब्धि के लिए जो अधिकार या योग्यता चाहिए, जब तक वह अर्जित न हो तब तक कितनी भी जागतिक योग्यता या ज्ञान क्यों न हो, हम परमेश्वर के सम्बन्ध में कुछ समझने या अनुभव करने में समर्थ नहीं हो सकते।
परमेश्वर स्वतः सिद्ध वस्तु हैं, इसलिए उनके शरणागत हुए बिना, उनकी कृपा के बिना कोई भी उन्हें जानने या अनुभव करने में समर्थ नहीं हो सकता।
यदि हम परमेश्वर को न मानें तो क्या परमेश्वर का कोई नुकसान होगा?
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
(ईशोपनिषद्)
पूर्ण से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही रह जाता है, शून्य नहीं होता। गणित शास्त्र के अनुसार infinite से infinite निकालने पर infinite ही रहता है। भगवान् पूर्ण वस्तु हैं और वे ही पूर्ण वस्तु दे सकते हैं। इसलिए हम यदि भगवान् को नहीं मानें तो भगवान् की कोई हानि नहीं है। इससे विपरीत हम ही भगवान् की कृपा से और उनसे होनेवाले लाभसे वंचित रह जाएँगे। यदि हम यह कहकर कि, ‘मैं आग के अस्तित्व को नहीं मानता’, अपने हाथ से आग को थप्पड़ मारें तो क्या आग का कोई नुकसान होगा? उल्टा हमारा हाथ ही जलेगा। आग को न मानने से आग से होनेवाले लाभ से हम वंचित रह जाएँगे; प्रकाश नहीं मिलेगा, रसोई नहीं होगी, industries नहीं चलेंगीं। नुकसान किसका है? भगवान् सर्व-शक्तिमान और सभी का रक्षण एवं पालन करनेवाले हैं। यदि हम उन्हें मानेंगे तो हमारा ही लाभ होगा और यदि नहीं मानेंगे तो उन्हें कोई हानि नहीं होगी।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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