श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

दिव्यता तथा दिव्य सेवा

मुनयः साधु पृष्टोऽहं भवद्भिर्लोकमङ्गलम् ।
यत्कृतः कृष्णसंप्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति ॥
(१/२/५)

मुनयः = हे मुनियों; साधु प्रासंगिक है; पृष्टः पूछा गया; अहम् मैं; भवद्भिः =आप लोगों के द्वारा; लोक संसार; मङ्गलम् मंगल, कल्याण; यत्-क्योंकि; कृतः = बनाया गया; कृष्ण भगवान्; संप्रश्नः संगत प्रश्न; येन जिससे; आत्मा = स्वः सुप्रसीदति पूर्णतया प्रसन्न होता है।

अनुवाद – हे सुनियो ! आपने ठीक ही प्रश्न किया है। आपके प्रश्न श्लाघनीय हैं, क्योंकि उनका सम्बन्ध भगवान् कृष्ण से है और इस प्रकार वे विश्व-कल्याण के लिए हैं। ऐसे प्रश्नों से ही पूर्ण आत्मतुष्टि हो सकती है।

तात्पर्य – चूँकि पहले कहा जा चुका है कि भागवत द्वारा परम सत्य को जाना जा सकता है, अतएव नैमिषारण्य के ऋषियों के प्रश्न उचित हैं, क्योंकि उनका सम्बन्ध परम सत्य भगवान् श्रीकृष्ण से है। भगवद्‌गीता में (१५.१५) भगवान् कहते हैं कि सारे वेदों में भगवान् कृष्ण की खोज की उत्कंठा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। इस तरह कृष्ण सम्बन्धी प्रश्न वैदिक जिज्ञासाओं के सार-समाहार हैं।

सारा संसार प्रश्नों तथा उत्तरों से परिपूर्ण है। सारे पक्षी, पशु, तथा मनुष्य शाश्वत प्रश्नों एवं उत्तरों में व्यस्त हैं। भोर होते ही सारे पक्षी अपने-अपने नीडों में प्रश्नों तथा उत्तरों में लग जाते हैं और शाम होते ही वही पक्षी वापस आकर पुनः प्रश्नोत्तर में व्यस्त हो जाते हैं। मनुष्य भी, जब तक प्रगाढ़ निद्रा में न हो, प्रश्नोत्तर में व्यस्त रहता है। व्यापारी बाजारों में प्रश्नोत्तर में लगे रहते हैं और इसी प्रकार वकील तथा विद्यार्थी भी क्रमशः कचहरियों तथा विद्यालयों और महाविद्यालयों में व्यस्त रहते हैं। सांसद भी संसद में प्रश्नोत्तर में ही लगे होते हैं और राजनीतिज्ञ तथा प्रेस-प्रतिनिधि भी प्रश्नोत्तर में मशगूल दिखते हैं। यद्यपि ये लोग जीवन भर ऐसे प्रश्न तथा उत्तर करते रहते हैं, किन्तु रंचमात्र तुष्ट नहीं होते। आत्मा की तुष्टि तो केवल कृष्ण विषयक प्रश्नोत्तरों से हो सकती है।

कृष्ण हमारे अंतरंग स्वामी, मित्र, पिता या पुत्र तथा माधुर्य प्रेम के लक्ष्य (प्रियतम) हैं। कृष्ण को भूल कर हमने प्रश्नों तथा उत्तरों के अनेक लक्ष्य बना लिये हैं, किन्तु इनमें से किसी से भी हमें पूर्ण तुष्टि नहीं हो पाती। कृष्ण के अतिरिक्त सारी वस्तुएँ क्षणिक तुष्टि प्रदान करने वाली हैं, अतः यदि हम पूर्ण तुष्टि चाहते हैं तो हमें कृष्ण विषयक प्रश्नों तथा उत्तरों को ग्रहण करना होगा। बिना प्रश्न किये या उत्तर दिये हम क्षण भर भी जीवित नहीं रह सकते। चूँकि श्रीमद्भागवत कृष्ण विषयक प्रश्नों तथा उत्तरों को बताने वाला ग्रंथ है, अतएव हम इस दिव्य साहित्य के पठन तथा श्रवण मात्र से परम तुष्टि प्राप्त कर सकते हैं। मनुष्य को चाहिए कि श्रीमद्भागवत को समझ कर समस्त सामाजिक, राजनैतिक या धार्मिक विषयों से सम्बद्ध समस्याओं का हल खोज निकाले। श्रीम‌द्भागवत तथा कृष्ण समस्त वस्तुओं के सार हैं।

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तीन शक्तियों का परिचय-

कृष्णेर अनन्तशक्ति, ता’ते तिन प्रधान।
चिच्छक्ति, मायाशक्ति, जीवशक्ति नाम ॥
अन्तरङ्गा, बहिरङ्गा, तटस्था कहि जारे।
अन्तरङ्गा स्वरूपशक्ति सबार उपरे ॥४॥

(चै. च. म. ८/१५१-१५२)

कृष्णकी अनन्त शक्तियोंमें तीन प्रधान हैं- चित्रशक्ति, जीवशक्ति और मायाशक्ति। इनको क्रमशः अन्तरङ्गा, बहिरङ्गा और तटस्थाशक्ति भी कहते हैं। इनमें अन्तरङ्गा स्वरूपशक्ति सर्वश्रेष्ठ है।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

शुभ विवाह

श्रीविश्वम्भर जब 18 वर्ष के हो गए तो इनकी माता इनके विवाह के लिए योग्य कन्या की खोज करने लगी। नवद्वीप वासी पँडितप्रवर श्री वल्लभाचार्य ने अपनी इकलौती कन्या लक्ष्मीप्रिया के लिए अपनी स्त्री को शचीमाता के पास भेजा तो शचीमाता ने सहर्ष स्वीकृति दे दी और शुभ दिन आने पर शचीदेवी के घर ही नहीं अपितु ऐसा लगता था कि समस्त नवद्वीप वासियों के घर लक्ष्मी देवी विराजमान हो गयीं। लेकिन निमाई पंडित जब छात्रों को लेकर प‌द्मा नदी के किनारे पूर्व बंगाल में भ्रमण करने गए तो उनके बहुत देर तक लौट कर न आने के कारण उनके विरह में लक्ष्मी प्रिया जी ने शरीर छोड़ दिया। जब श्रीशचीदेवी अति दुःखी रहने लगीं तो माता की प्रसन्नता के लिए गौरहरि जी ने माता के आग्रह पर परम उदार विष्णुभक्त राज-पण्डित श्री सनातन मिश्र की कन्या विष्णुप्रिया जी का पाणि ग्रहण स्वीकार किया। इस अवसर पर बहुत बड़ा समारोह हुआ जिसका सारा खर्चा भाग्यवान श्री बुद्धिमन्त खान ने दिया ।

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बद्धेनान्जलिना नतेन शिरसा गात्रैः सरोमोद्गमैः, कण्ठेन स्वर – गद्गदेन नयनेनोद्गीर्ण- वाष्पाम्बुना।
नित्यं त्वच्चरणारविन्द – युगल – ध्यानामृतास्वादिना -मस्माकं सरसीरूहाक्ष ! सततं सम्पद्यतां जीवितम् ।।25।।

हे कमललोचन ! हम जैसे लोगों को जीवन प्रदान करें जिनके हमेशा ही आपके आगे दोनों हाथ जुड़े हुये रहते हैं, मस्तक झुका हुआ रहता है, शरीर पुलकित हो रहा होता है, जिनका कण्ठ भी गद्गद् हुआ रहता है, अर्थात् हे प्रभु! आप कृपा करके हमें ऐसी योग्यता प्रदान करें जैसे हम निरन्तर आपका ध्यान कर सकें क्योंकि आपका ध्यान ही हमारा जीवन है।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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प्राकृत विज्ञान द्वारा अप्राकृत वस्तुको कदापि नहीं जाना जा सकता

प्राकृत विज्ञानका सबसे बड़ा दोष यह है कि वह अपने अधिकारसे बाहरके भी सब तत्त्वोंको जानना चाहता है। अप्राकृत तत्त्वमें उसका अधिकार नहीं है, तथापि वह निर्लज्जकी भाँति उस दिशामें भी अपनी टाँग अड़ाता है तथा उसके सम्बन्धमें अतिशय क्षुद्र एवं भ्रमपूर्ण सिद्धान्त अपनाता है और अन्तमें स्वयं भी विकृत होकर अर्थात् अप्राकृत तत्त्व नामक कुछ है ही नहीं-ऐसी धारणा बनाकर उस विषयसे सर्वथा अलग हो जाता है। सत्सङ्गके प्रभावसे जीवके हृदयमें स्वाभाविक दैन्यका प्रकाश होता है। दैन्यरूप आधारपर ही कृष्णकी कृपा होती है। इस कृष्णकृपासे ही अप्राकृत तत्त्वमें अधिकार पैदा होता है। केवल भौतिक विचार या भौतिक ज्ञानके द्वारा अप्राकृत तत्त्वको कदापि नहीं जाना जा सकता।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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वैष्णवगुरु की आज्ञा – पालन करने पर यदि मुझको ‘दाम्भिक’ होना पड़े, पशु होना पड़े और अनन्तकाल तक नरक में जाना पड़े तो मैं अनन्तकाल के लिए इस प्रकार के नरक में चला जाऊँगा । दुनियाँ के और सब लोगों के विचारों को श्रीगुरुपादपद्म की शक्ति से मुष्टिकाघात द्वारा विदूरित करूँगा । मैं इतना बड़ा दाम्भिक हूँ ।

श्रीलप्रभुपाद

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भगवान् के अदर्शन से जब प्रेमिक-भक्त अत्यन्त विह्वल हो उठते हैं, तब भक्त-दुःखहारी भगवान्, उनके हृदय में आविर्भूत हो जाते हैं। भगवान् के स्वरूप का दर्शन कर भक्त को परम सुख होता है। पुनः, भगवान् के अदृश्य हो जाने पर भक्त, विरह में रोते रहते हैं एवं अपने प्रेमास्पद के दर्शनों की उत्कण्ठा से अदृश्य भगवान् के स्वरूप को बाहर प्रकट करते हैं। भक्त द्वारा बाहरी प्रकटित इसी रूप को ‘प्रतिमा’ कहते हैं। चूँकि ये प्रतिमा या श्रीमूर्ति अवरोह मार्ग से प्रकट हुई, इसीलिये यह ‘श्रीविग्रह’ है।

निम्नाधिकारी व्यक्ति इस मूर्ति को प्रथमतः जड़मय, मध्यम् अधिकारी मनोमय और उत्तम अधिकारी व्यक्ति चिन्मय स्वरूप में दर्शन करते हैं। प्रेमिक भक्तों के प्रेम नेत्रों में- ‘प्रतिमा नहिं, तुमि साक्षात् ब्रजेन्द्रनन्दन’- प्रतीत होते हैं। कोई कह सकता है कि हमने स्वयं देखा है कि मूर्तिकार ने मिट्टी आदि के साथ वह मूर्ति तैयार की है, वह भगवान् कैसे हो सकती है? सूक्ष्म रूप से विचार किये बिना इस विषय को हम समझ नहीं पायेंगे। एक दृष्टान्त द्वारा समझाने का प्रयास करता हूँ। मान लीजिए कि एक व्यक्ति पालकी में चढ़कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहा है। इसको दो दृष्टियों से देखा जा सकता है –

1) पालकी – वाहक, एक व्यक्ति को बक्से में बन्द कर के ले जा रहे हैं या 2) पालकी में बैठा व्यक्ति चार व्यक्तियों (वाहकों) के कन्धों पर चढ़ कर जा रहा है। एक दृष्टि से, वाहक कर्त्ता लगते हैं तो दूसरे मे पालकी में बैठा व्यक्ति। यदि वाहक को कर्त्ता मानें तो पालकी में बैठा कर्म हो जाता है और इस प्रकार वाहकों से निकृष्ट हो जाता है। यदि पालकी में बैठा व्यक्ति कर्त्ता व मालिक हो, तो ऐसा माना जायेगा कि मालिक के हुक्म से कुछ सेवक उन्हें पालकी में ले जा रहे हैं एवं अपने को धन्य समझ रहे हैं। यहाँ पर वहन करने वाले, पालकी में बैठने वाले का कर्म हैं व उसके अधीन हैं तथा उससे निकृष्ट हैं।

बाहरी दर्शन से दोनों बातें एक जैसी दिखने पर भी एक दूसरे से पूरी तरह विपरीत हैं। जब जगत के लोग कर्त्ता होकर कुछ तैयार करते हैं, तो वह तैयार की गयी वस्तु उनसे निकृष्ट अर्थात् छोटी होती है, पुतला होती है, बुत होती है और जब भगवान् कर्त्ता होकर गुरु, पुरोहित, ऋत्विक और मूर्तिकार रूपी वाहक के कन्धों पर चढ़ कर उनको सेवा का सौभाग्य प्रदान करते हुये जगत् में अवतीर्ण होते हैं, तब वे साक्षात् भगवान होते हैं, पुतला नहीं।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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सदैव सत्यकथा के प्रचार में व्रती रहना। सत्-साहसी व्यक्तियों के भगवान् ही सहायक होते हैं। यदि सम्पूर्ण पृथ्वी असत् मार्ग पर चलने लग जाये तब भी हम उसका दासत्व नहीं करेंगे। पाप-प्रवृत्ति या असत्-कथा को किसी प्रकार का प्रश्रय देने के लिए जन्म नहीं ग्रहण किया है। आज भी हम वर्तमान विश्वविद्यालय की आसुरिक शिक्षा को प्रश्रय देने के लिए तैयार नहीं हैं। कलि की प्रबलता से जो विश्व की प्रगति [के नाम पर दुर्गति] हो रही है, उसे रोकना होगा। विश्व का मंगल चाहने वाले व्यक्तियों का यही एकमात्र व्रत होना चाहिए। इसी का नाम है महावदान्य एवं इसी को जीवों के प्रति दया कहते हैं। तुम निर्भीक होकर सत्य बात कहना। सत्य के प्रचार के लिए नित्यानन्द प्रभु, हरिदास ठाकुर आदि वैष्णवगण पाखण्डियों के द्वारा प्रताड़ित हुए थे। यहाँ तक कि, अनेक महाजनों को सत्य के लिए प्राण त्याग करने पड़े हैं। इसलिए डरने से नहीं चलेगा। महाप्रभु की Policy है-तृणादपि सुनीच होकर एवं वृक्ष की अपेक्षा सहनशील होकर जीवों पर दया अथवा प्रचार करना होगा। भगवान् की कथा का प्रचार ही जीवों के प्रति दया है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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चालाक और सुविधावादी का नहीं, बल्कि सीधे-सरल का ही मंगल संभव

मेरी हार्दिक इच्छा है कि तुम हमेशा ही नादान, मूर्ख, अर्वाचीन (अनाड़ी), बुद्धिहीन होकर रहो। “अति चालाकेर गलाय दड़ि” (ज्यादा चालाक ही फँसता है) कहावत को तुम निश्यच ही समझने का प्रयास करना। गुरु-वैष्णवों के समीप नादान, पगला, आत्महारा, सरल व्यक्ति को ही कल्याण (कृपा) प्राप्त होता है। कौओ की तरह चतुर होने से वंचित होना पड़ता है। जो लोग सभी दलों में समान रूप से घुलमिल सकते हैं, उनका मंगल नहीं होता है, उन्हें सुविधावादी कहा जाता है। वे अपने स्वार्थ को ही प्रमुखता देते हैं। उन्हें कपटी और कूटनीतिज्ञ कहा जा सकता है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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नाम संकीर्तन कलौ परम उपाय

एक सज्जन मारवाड़ी व्यक्ति हमारे हैदराबाद मठ में आया करते थे। एक दिन उन्होंने मुझे अपने निवास स्थान पर होनेवाले एक यज्ञ के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि वे उस यज्ञ में १०० मन (~४००० किलोग्राम) घी की आहुति देनेवाले हैं। मैंने उन्हें बताया कि आजकल गाय के दूध से बना शुद्ध घी उपलब्ध नहीं है और यदि वे यज्ञ में शुद्ध घी का उपयोग नहीं करेंगे तो उन्हें पाप लगेगा। मैंने उन्हें यह भी समझाने का प्रयास किया कि कलियुग के लोगों के लिए यज्ञ निर्धारित साधन नहीं है। कलियुग के लोगों के लिए एकमात्र निर्धारित साधन है-हरिनाम संकीर्तन। यह सुनकर उन्होंने मुझे बताया कि यज्ञ के समय वहाँ हरिनाम संकीर्तन भी किया जाएगा।

वे मुझे यज्ञ में ले जाने के लिए इतने उत्सुक थे कि उन्होंने मेरे लिए एक कार की व्यवस्था भी की। उनके द्वारा बार-बार अनुरोध किए जाने पर मुझे वहाँ जाना पड़ा। वहाँ पहुँचने पर वे मुझे यज्ञ के लिए की गई सारी व्यवस्था दिखाने लगे। व्यवस्था देखने के बाद मैंने उनसे पूछा, “हरिनाम संकीर्तन कहाँ किया जा रहा है?”

उन्होंने कहा, “हाँ, आइए मैं आपको वहाँ ले चलता हूँ।”

वे मुझे एक छोटे से कोने में ले गए जहाँ मैंने देखा कि दो-तीन व्यक्ति बैठकर कीर्तन कर रहे थे। उनके लिए महत्वपूर्ण बात यह थी कि यज्ञ में कितना घी लगनेवाला था, न कि हरिनाम संकीर्तन। मैंने उनसे कहा कि यदि उनका झुकाव यज्ञ करने की ओर ही है तो उन्हें कुछ गायें रखनी चाहिए और उनके दूध से तैयार किए गए घी के द्वारा यज्ञ करना चाहिए। किन्तु क्योंकि कलियुग में यह संभव नहीं है, कलियुग के जीव के लिए भगवान् के नाम-जप या हरिनाम संकीर्तन को ही साधन के रूप में निर्धारित किया गया है।

बृहद्-नारदीय पुराण (३८/१२६) में दिया गया है-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥

कलियुग में हरिनाम के बिना और गति नहीं है, नहीं है, नहीं है; हरिनाम ही एकमात्र गति है।

इस सिद्धांत को दृढ़ता से स्थापित करने के लिए यहाँ ‘हरेर्नाम’ तीन बार कहा गया है। इतने पर भी जिनको विश्वास न हो, ऐसे जड़ लोगों को समझाने के लिए पुनः ‘एव’ शब्द का प्रयोग किया गया है।

संत तुलसीदास जी ने भी लिखा है, “कलियुग केवल नाम आधारा, सुमिर-सुमिर नर उतरहि पारा।” अर्थात् कलियुग के जीव के लिए केवल भगवान् का नाम ही एकमात्र आधार है।

कलियुग में व्यक्ति कितना भी बड़ा यज्ञ करे, कितनी ही तपस्या करे या कोई और साधन करे किन्तु, शास्त्रों के निर्देशानुसार उसे सर्वोत्तम लाभ केवल हरिनाम संकीर्तन से ही होगा। शास्त्रों में सतयुग के लिए ध्यान, त्रेतायुग के लिए यज्ञ, द्वापरयुग के लिए अर्चन और कलियुग के लिए हरिनाम संकीर्तन को सर्वोत्तम साधन बताया गया है। हमारे पूर्वाचार्यों ने भी कर्म, ज्ञान, योग, त्याग, व्रत व तपस्यादि का परित्याग करके हरिनाम करने का ही उपदेश दिया है। अतः अन्य सभी प्रकार के साधनों का मोह छोड़कर, भगवान् के नाम को भगवान् से अभिन्न मानकर, एकान्त भाव से उसका जप करना ही परम लाभदायक है। इससे बड़ा साधन और कोई नहीं है। हज़ारों प्रकार के भक्ति-अंगों में श्रीनाम-भजन ही सर्वेश्रेष्ठ है। श्रीनाम भजन ही श्रीचैतन्यदेव की शिक्षाओं का सार है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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