श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

मुनियों की जिज्ञासा

आगे …….. इस जगत में उत्पन्न होने वाले प्रथम प्राणी ब्रह्मा से लेकर एक क्षुद्र चींटी तक, सारे जीव ज्ञानेन्द्रियों द्वारा कोई न कोई रस प्राप्त करने के इच्छुक रहते हैं। इन इन्द्रिय सुखों को तकनीकी भाषा में रस कहा जाता है। रस कई प्रकार के होते हैं। शास्त्रों में बारह रसों के नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं-(१) रौद्र (क्रोध), (२) अद्भुत (आश्चर्य), (३) श्रृंगार (दाम्पत्य प्रेम), (४) हास्य (प्रहसन), (५) वीर (शौर्य), (६) दया (करुणा), (७) दास्य (दासता), (८) सख्य (मैत्रीभाव), (९) भयानक (भय), (१०) बीभत्स (आघात्), (११) शान्त (उदासीनता) तथा (१२) वात्सल्य (माता पिता का स्नेह)।

इन समस्त रसों का सार प्यार या प्रेम है। मूलतः प्रेम के ऐसे लक्षण उपासना, सेवा, मैत्री, वात्सल्य तथा दाम्पत्य प्रेम के रूप में प्रकट होते हैं। जब ये पाँच अनुपस्थित होते हैं तो प्रेम अप्रत्यक्ष रूप में क्रोध, आश्वर्य, हास्य, वीर, भय, बीभत्स आदि में प्रकट होता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई पुरुष किसी स्त्री से प्रेम करता है तो यह श्रृंगार रस हुआ। किन्तु यदि ऐसे प्रेम में बाधा पहुँचती है तो आश्चर्य, क्रोध, आघात या भय तक उत्पन्न हो सकता है। कभी-कभी दो व्यक्तियों के प्रेम का अन्त नृशंस हत्या में होता है। ऐसे रसों का प्रदर्शन मनुष्य तथा मनुष्य के मध्य और पशु तथा पशु के बीच होता है। इस जगत में रस का ऐसा आदान-प्रदान न तो मनुष्य तथा पशु के बीच हो पाता है, न ही मनुष्य तथा अन्य किसी योनि के साथ। ऐसे रस का आदान-प्रदान तो एकजैसी योनि के जीवों में ही होता है। किन्तु जहाँ तक आत्माओं का प्रश्न है, वे गुणात्मक रूप से परमेश्वर के समरूप हैं। इसीलिए प्रारम्भ में रसों का आदान-प्रदान आध्यात्मिक जीव (जीवात्मा) तथा आध्यात्मिक परमपूर्ण भगवान् के साथ होता था। यह आध्यात्मिक आदान-प्रदान या रस, आध्यात्मिक जगत में जीवों तथा परमेश्वर के बीच, पूरी तरह पाया जाता है।

इसीलिए श्रुति मन्त्रों में भगवान् को “समस्त रसों का उत्स” कहा गया है। जब जीव परमेश्वर की संगति करता है और उनके साथ स्वाभाविक रस का आदान-प्रदान करता है तो वह सचमुच सुखी होता है।

ये श्रुतिमन्त्र बताते हैं कि प्रत्येक जीव का एक मूल स्वरूप होता है जिसमें भगवान् के साथ एक विशेष प्रकार के ‘रस’ का आदान-प्रदान किया जाता है। केवल मुक्त अवस्था में इस मूल ‘रस’ का पूर्णतया अनुभव हो पाता है। भौतिक जगत में ‘रस’ अपने अस्थायी विकृत रूप में रौद्र तथा अन्य रूपों में व्यक्त होते हैं। आगे ……..

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छह प्रकारके अवतार-

अवतार हय कृष्णेर ष‌ड्विध प्रकार।
पुरुषावतार एक, लीलावतार आर ॥
गुणावतार, आर मन्वन्तरावतार ।
युगावतार, आर शक्त्यावेशावतार ॥

(चै. च. म. २०/२४५-२४६)

कृष्ण के छ प्रकार के अवतार हैं- पुरुषावतार, लीलावतार, गुणावतार, मन्वन्तरावतार, युगावतार, शक्त्यावेशावतार। पुरुषावतार तीन होते हैं, लीलावतार-मत्स्य, कूर्म, वराह आदि प्रधानतः चौबीस अवतार हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ये तीनों गुणावतार हैं। मन्वन्तरावतार चौदह हैं। युगावतार चार हैं। श्रीनारद, कपिल, पृथु महाराज, परशुराम आदि शक्त्यावेश अवतार हैं।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

निमाई का विद्यारम्भ और चंचलता

अब जगन्नाथ मिश्र जी ने गौर गोपाल के हाथ में खड़िया दी तथा कर्णवद्य, चूड़ा संस्कार इत्यादि सम्पन्न कराया। लेकिन निमाई को पढ़ना लिखना सिखाने का मतलब सूर्य को दीपक दिखाना था। निमाई तो एकबार देखकर ही सब अक्षर लिख जाते। केवल दो दिन में ही समस्त संयुक्त वर्ण और वर्ण विन्यास इत्यादि को निमाई ने याद कर लिया तथा राम, कृष्ण, मुरारी, मुकुन्द, वनमाली आदि नामों को लिखने लगे। निमाई जब मधुर स्वर से ‘क’ ‘ख’ ‘ग’घ’ उच्चारण करते थे तो सबके प्राण मोह लेते थे।

सखाओं के साथ जब निमाई गंगा स्नान के लिए जाते तो शायद ही कोई होगा जो इनकी चंचलता से परेशान न हो। वे लोगों के वस्त्रों को उठाकर इधर-उधर छुपा देते। गंगा जी में खड़े ध्यान करते हुये व्यक्तियों की नहाते – नहाते टांग पकड़ कर खींच कर ले जाते, किसी के ऊपर, जो नहा चुका हो, रेत डाल देते । कुमारियाँ जब गंगा पूजा के लिए आतीं तो बालक निमाई कहते कि तुम गंगा या दुर्गा की पूजा क्यों करती हो? मेरी पूजा करो, जो वर चाहोगी मैं दूँगा । गंगा और दुर्गा तो मेरी दासी हैं। शिव मेरे सेवक हैं। इनता कहकर बालक रूपी स्वयं भगवान श्रीगौरहरि अपने आप ही कुमारियों की पूजा की सामग्री चन्दन, पुष्पमाला आदि धारण कर लेते तथा सन्देश, चावल, केला आदि छीनकर खाने लगते और कहते “मैं तुम लोगों को वर देता हूँ कि तुम्हें परम सुन्दर, पण्डित, धनवान, युवक और रसिक पति मिलेंगे, दीर्घायु होंगे तथा तुम्हारे सात-सात पुत्र होंगे। वरदान सुनकर कुमारियाँ ऊपर से रोषाभास दिखलातीं पर भीतर-ही- भीतर उनको सन्तोष ही मिलता था । यदि कोई कुमारी निमाई के डर से देवता का नैवेद्य लेकर भागना चाहती तो चंचल निमाई उसे पुकार कर कहते “तुमको बूढ़ा पति मिलेगा और बहुत ही सौतें होंगी।” तब कुमारियाँ निमाई को देवाविष्ट पुरुष समझ कर सारा नैवेद्य उन्हीं को प्रदान कर देतीं। इस प्रकार गौरहरि हंसी-मज़ाक में अपना तत्व लोगों को बताते लेकिन भगवान की माया से कोई नहीं समझ पाता ।

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भवजलधिमगाधं दुस्तरं निस्तरेयं, कथमहमिति चेतो मास्म गाः कातरत्वम्।
सरसिज – दृशि देवे तावकी भक्तिरेका, नरकभिदि निषण्णा तारयिष्यत्यवश्यम् ।।21।।

हे मन ! तुम ये सोच-सोचकर परेशान मत होओ कि मैं इस दुस्तर व अगाध संसार को भला कैसे पार होऊँगा, क्योंकि नरकासुर का वध करने वाले नरकारि-कमललोचन भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में तो तुम टिक गये हो, अब कोई चिन्ता नहीं क्योकि श्रीकृष्ण के प्रति तुम्हारी अनन्य भक्ति तुमको अवश्य ही पार करा देगी।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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श्रीमन्महाप्रभु एवं गोस्वामीवर्ग के सिद्धान्त के अनुसार श्रीनाम – संकीर्त्तन ही मुख्य भजन है। भक्ति के जितने भी श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वन्दन, अर्चन आदि अंग हैं, उनमें कृष्ण नाम-संकीर्तन ही श्रेष्ठतम है। श्रवण, स्मरण आदि अन्यान्य भक्ति के अंग नाम संकीर्त्तन के अधीन ही हैं। श्रीनाम की कृपा न होने पर लीलाओं की स्फूर्त्ति नहीं होती। कीर्तन का त्यागकर केवल स्मरण आदि की चेष्टा तो केवल जड़प्रतिष्ठा मात्र है। साधारण मनुष्य के द्वारा रचित या कल्पित कीर्तन, कीर्तन नहीं होता, अपितु वह तो नामापराध युक्त कीर्तन होता है। ऐसा कीर्तन कृष्ण की इन्द्रियों को तृप्त नहीं कर सकता। उससे तो केवल अपनी इन्द्रियाँ ही तृप्त होती हैं। यह भजन के नाम पर भोग या अपराध ही है । श्रीचैतन्य महाप्रभु के मुखनिःसृत श्रीनाम संकीर्तन ही भजन है। उस नाम – संकीर्तन के द्वारा ही कृष्ण प्रेम प्राप्त होता है। इसीलिए नाम संकीर्तनको साधुओं ने श्रेष्ठतम भजन बताया है । वह स्वयं प्रकाशित नाम-रूपी अमृत सेवोन्मुख किसी एक ही इन्द्रिय में आविर्भूत होकर अपने मधुर रस से समस्त इन्द्रियों को तृप्त कर देता है। भगवान श्री गौरांगदेव ने ऐसा ही बताया है ।

भजनेर मध्ये श्रेष्ठ नवविधा भक्ति।
कृष्णप्रेम, कृष्ण दिते धरे महाशक्ति ।।
तार मध्ये सर्वश्रेष्ठ नाम संकीर्तन ।
निरपराधे नाम लइले पाय प्रेमधन ।।

अर्थ-भक्ति के समस्त अंगों में नवविधा भक्ति (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, वन्दन, अर्चन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन) श्रेष्ठ है, जो कृष्ण एवं कृष्ण-प्रेम को देने में समर्थ है। परन्तु इन नौ प्रकार की भक्ति के अंगों में नाम कीर्तन ही सर्वश्रेष्ठ है। अपराधों को त्यागकर नाम लेने पर अतिशीघ्र कृष्ण-प्रेम धन प्राप्त हो जाता है।

श्रीलप्रभुपाद

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मठ में बैठकर सेवाकार्य के प्रति उदासीन होने से ही विभिन्न प्रकार की परनिन्दा एवं परचर्चा की उत्पत्ति होती है। इसलिए प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति को भिक्षा माँगकर लाने का व्रत ग्रहण करना चाहिए। सेवाकार्य नहीं होने से ही मनुष्य का चित्त अधोगामी होता है। जिन्हें समय बर्बाद करने का अभ्यास है, वे कैसे उन्नति करेंगे? अंग्रेज़ी में एक कहावत है-“A vacant mind is the devil’s workshop.” अर्थात् ‘खाली दिमाग शैतान का घर होता है।’ अतः जिस मन में कोई सेवा करने की भावना नहीं है, वह मन अधोगामी होकर शैतानी विचारों से भर जाता है। इसीलिए महाप्रभु ने आदेश दिया है “कीर्तनीयः सदा हरिः” अर्थात् सदैव श्रीहरि का कीर्तन करो। हरिसेवा करने से श्रीहरि का चिंतन होता ही रहता है। इसलिए प्रतिक्षण हरिनाम करने की विधि है। हरिनाम और हरिसेवा एक ही बात है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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सेवा ही सन्यास का सार

एक बार श्रील प्रभुपाद ने गुरु महाराज को उनकी ब्रह्मचारी ए अवस्था में सन्यास ग्रहण करने हेतु कहा। गुरु महाराज ने श्रील प्रभुपाद से पूछा, “सन्यास ग्रहण करने के उपरान्त क्या करना पड़ेगा?”

श्रील प्रभुपाद ने कहा, “जो सेवा-कार्य आप अभी कर रहे हैं, वही सेवा कार्य ही करना पड़ेगा।”

गुरु महाराज ने उत्तर दिया, “यदि ऐसी बात है तो मेरे सेवा कार्य के लिए तो ब्रह्मचारी वेश ही अधिक अनुकूल है, कारण, जब मैं भिक्षा इत्यादि करने के लिए जाता हूँ, तो छोटे-छोटे ब्रह्मचारी बालकों को अपने से ऊपर वाले आसन पर बैठाकर सेवा हेतु भिक्षा देने वाले व्यक्तियों से कहता हूँ- ‘इन बालकों को

साधारण व्यक्ति नहीं समझना, यह मेरे भी सेव्य हैं, अतएव इनकी सेवा के अवसर का सुयोग प्राप्त करके आप लोग अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं, इस अवसर का सम्पूर्ण लाभ उठाइए।’ ऐसा कहकर मैं हरि-गुरु-वैष्णव सेवा के लिए अधिक अर्थ संग्रह कर पाता हूँ। यदि मैं सन्यास ग्रहण कर लूँगा, तब फिर यह बालक जो कि अभी भी मुझसे ऊपर वाले आसन पर बैठकर सङ्कोच का अनुभव करते हैं, मेरे सन्यास के पश्चात् तो कदापि ऊपर वाले आसन पर नहीं बैठेंगे और उससे मेरी सेवा में बाधा आएगी। अतएव सेवा-कार्य को ही सबसे अधिक गुरुत्व प्रदान करने वाले आपके आदर्श चरित्र का अनुसरण करने का अभिलाषी मैं आपसे मुझे सन्यास नहीं प्रदान करने की ही प्रार्थना करता हूँ।”

गुरु महाराज के मुख से ऐसा सुनकर श्रील प्रभुपाद ने कहा, “आप प्रकृत त्रिदण्डी सन्यासी हैं। केवल वेश से ही कोई सन्यासी नहीं होता, उसकी सेवा-प्रवृत्ति ही उसे छोटा-बड़ा बनाती है। ब्रह्मचारी के वेश में होने पर भी कोई गृहस्थ, कोई वानप्रस्थी, कोई सन्यासी तथा सन्यासी के वेश में होने पर भी कोई अपनी चित्तवृत्ति के अनुसार ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी आदि हो सकता है।”

जेइ भजे, सेह बड़, अभक्त-हीन, छार।
कृष्णभजने नाहि जाति-कुलादि विचार ॥

चै च (अन्त्य-लीला ४.६७)

[वास्तव में जो कृष्ण का भजन करता है, वही बड़ा है। अभक्त तो हीन है, घृणित है। कृष्ण भजन में जाति तथा कुल आदि का कोई विचार ही नहीं है।]

श्रील प्रभुपाद की अप्रकट-लीला के पश्चात् जब मठ में असुविधाएँ हुई, तब गुरु महाराज ने श्रील प्रभुपाद के आचार-विचार, उनकी धारा तथा उनके द्वारा स्थापित मठ-मन्दिरों, श्रीविग्रहों की सेवा एवं श्रील प्रभुपाद के वैभव उनके आश्रित जनों के श्रीचरणकमलों की जो प्राण-पर सेवा की, वह भाषा के द्वारा व्यक्त नहीं की जा सकती।

श्रीकुञ्जबिहारी विद्याभूषण, श्रील भक्तिसर्वस्व गिरि महाराज आदि गुरुभ्राताओं ने गुरु महाराज को पुनः पुनः बलपूर्वक कहा, “श्रील प्रभुपाद का इतना बड़ा मिशन है और वे हम लोगों के लिए कई महत्त्वपूर्ण सेवाएँ पूर्ण करने हेतु रख कर गए हैं। आपके जैसे सुयोग्य व्यक्ति यदि सन्यास ग्रहण करके गुरुत्वपूर्ण सेवाओं का दायित्व ग्रहण नहीं करेंगे तो भविष्य में सेवाएँ कैसे पूर्ण होंगी।”

अपने गुरुभ्राताओं की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए गुरु महाराज ने अपने ज्येष्ठ गुरुभ्राता श्रील भक्तिगौरव वैखानस गोस्वामी महाराज से श्रीजगन्नाथपुरी धाम स्थित श्रीटोटा गोपीनाथ मन्दिर में गुरुवार, ९ मार्च १९४४, श्रीगौरपूर्णिमा तिथि को वैष्णव-विधि अनुसार त्रिदण्ड सन्यास ग्रहण किया तथा तभी से वे श्रीभक्तिदयित माधव गोस्वामी महाराज के नाम से परिचित हुए।

“केवल वेश से ही कोई सन्यासी नहीं होता, उसकी सेवा-प्रवृत्ति ही उसे छोटा-बड़ा बनाती है।”

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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श्रीगुरु और भगवान् के अलावा जिनका इस पृथ्वी पर और कोई नहीं है, वे ही पूर्ण शरणागत और वास्तविक त्यागी हैं।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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पैसों के लिए की गई कथा हरिकथा नहीं

चंडीगढ़ में हमारा एक बड़ा मठ है। वहाँ बहुत गृहस्थ भक्त आते हैं। एक दिन एक माताजी मठ में आईं और एक ब्रह्मचारी भक्त से कहने लगीं, “हमारे शहर में एक प्रसिद्ध भागवत्-वक्ता आए हुए हैं। वे भागवत् की बहुत सुन्दर व्याख्या करते हैं। आपको भी जाकर उनके प्रवचन सुनने चाहिए।”

ब्रह्मचारी ने उत्तर दिया, “मठ-रक्षक ने मुझे कुछ सेवा दी हुई है, मैं अभी व्यस्त हूँ। यदि सेवा के बाद मुझे समय मिला तो मैं जा सकता हूँ।”

उस दिन वे नहीं गए। अगले दिन फिर से वह माताजी उनसे कहने लगी, “आप भागवत् कथा सुनने गए नहीं? वह वक्ता हमारे शहर में अधिक दिन नहीं रुकेंगे, आपको वहाँ जाना चाहिए और उनकी कथा सुननी चाहिए।”

ब्रह्मचारी ने उत्तर दिया, “कल मुझे समय नहीं मिला, आज जाने का प्रयास करता हूँ।”

उस दिन भी वे वहाँ नहीं गए। अगले दिन, माताजी ने फिर एक बार उनसे पूछा, “क्या आप गए थे?”

इस बार उस ब्रह्मचारी ने माताजी से प्रश्न किया, “आप ऐसा क्यों सोचती हैं कि उनकी कथा सुनने से मुझे लाभ होगा?”

माताजी ने कहा, “मुझे ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि बहुत लोग उनकी कथा सुनने आते हैं। और तो और वे कथा सुनाने के दस हज़ार रुपए भी लेते हैं।”

इतना सुनते ही ब्रह्मचारी ने उत्तर दिया, “मुझे ऐसे वक्ता की कथा नहीं सुननी जो भगवान् की कथा के नाम पर व्यवसाय करता हो।”

जो व्यक्ति भागवत् को अपनी जीविका बनाता है उससे भागवत् श्रवण करके किसी का मंगल नहीं हो सकता। कारण, वक्ता जिस इच्छा के साथ कथा कहेंगे वही इच्छा श्रोता में जागृत होगी। यदि वक्ता धन की इच्छा से कथा कहेंगे तो श्रोता में भी धन पाने की इच्छा उदित होगी, न कि भगवान् को पाने की।

ऐसे भागवत् वक्ताओं को यह विश्वास नहीं है कि यदि हम भगवान् की सेवा के लिए भगवान् की कथा कहेंगे तो भगवान् अवश्य हमारी रक्षा और पालन करेंगे।

यदि इस जगत् में भी हम किसी व्यक्ति के पास जाएँ जो संभवतः सज्जन भी नहीं है और उससे बिना कुछ माँगे उसकी सेवा करते रहें, तो वह व्यक्ति कितने दिन तक इस प्रकार की सेवा को स्वीकार करता रहेगा? वह सोचेगा, “यह व्यक्ति मेरी इतनी सेवा करता है, उसे खिलाए बिना मैं कैसे खा सकता हूँ? उसे कपड़े दिए बिना में कैसे कपड़े पहन सकता हूँ?” एक असज्जन व्यक्ति भी अयाचक वृत्ति से सेवा करनेवाले को कुछ देने के लिए बाध्य हो जाएगा। जब एक साधारण जीव कुछ दिए बिना सेवा स्वीकार नहीं कर सकता, तो भगवान्, जो अनंत ब्रह्माण्डों के रक्षक और पालक हैं, यदि हम उनकी सेवा करेंगे तो क्या वे हमारी रक्षा और पालन नहीं करेंगे? उनकी सेवा के बदले में क्या हमें पैसे लेने की आवश्यकता है? क्या हमें उन पर विश्वास नहीं है?

जैसे सर्प के द्वारा पिया हुआ दूध ज़हरीला हो जाता है, उसी प्रकार जो व्यक्ति स्वयं भागवत् की शिक्षाओं पर नहीं चलता, उसके मुख से सुनी गई भगवान् की कथा भी उल्टा फल देनेवाली होती है। भगवान् की कथा कहने का एकमात्र उद्देश्य भगवान् की प्रसन्नता होना चाहिए। कार्य के उद्देश्य से यह पता चलता है कि कार्य ठीक है या नहीं। यदि उद्देश्य ठीक है तो सब कुछ ठीक है, किन्तु यदि उद्देश्य ठीक नहीं है तो कार्य कितना भी अच्छा हो उसे अच्छा नहीं माना जाएगा। वक्ता, भगवान् की प्रसन्नता को छोड़कर किसी और उद्देश्य से भगवान् का कीर्ति-गान करेगा तो भगवान् वहाँ नहीं आएँगे, भगवान् की माया आएगी। वर्तमान समय में अनेकों व्यक्ति अपने किसी सांसारिक लाभ के लिए साधु का वेश धारण करते हैं और अपनी इन्द्रियों के सुख के लिए कार्य करते हैं। उन्हें साधु कैसे कहा जा सकता है? वास्तविक साधु का प्रत्येक कार्य भगवान् के लिए होता है, उनका संपूर्ण जीवन भगवान् की सेवा में समर्पित है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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