मुनियों की जिज्ञासा

आगे . . . . श्रीमद्भागवत भगवान् की अन्तरंगा शक्ति द्वारा प्रदर्शित उनके स्वरूप का आख्यान है और यह अन्तरंगा शक्ति हमारे अनुभवगम्य दृश्य जगत को उत्पन्न करने वाली बहिरंगा शक्ति से भिन्न है। श्रील व्यासदेव ने इस श्लोक में इन दोनों शक्तियों में अन्तर स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि प्रकट होने वाली अंतरंगा शक्ति वास्तविक है जब कि भौतिक जगत के रूप में प्रकट होने वाली बहिरंगा शक्ति अनित्य है और मृग-मरीचिका जैसी है। मृगमरीचिका में वास्तविक जल नहीं रहता, केवल जल का आभास (प्रतीति) रहता है। वास्तविक जल तो कहीं अन्यत्र रहता है। यह दृश्य जगत एक वास्तविकता प्रतीत होता है, किन्तु वास्तविकता तो आध्यात्मिक जगत में होती है और यह तो उसकी छाया (प्रतिबिम्ब) मात्र है। परम सत्य तो वैकुण्ठलोक (चिदाकाश) में हैं, भौतिक आकाश में नहीं। भौतिक आकाश में प्रत्येक वस्तु सापेक्ष सत्य है। कहने का तात्पर्य यह है कि यह सत्य किसी अन्य पर आश्रित है। यह दृश्य जगत प्रकृति के तीनों गुणों की अन्तः क्रिया से बनता है और यह अनित्य जगत बद्धजीव के मोहग्रस्त मन को वास्तविकता का भ्रम प्रस्तुत करने वाला होता है। बद्धजीव अनेकानेक योनियों में प्रकट होते हैं जिनमें ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्र जैसे उच्चतर देवता भी सम्मिलित हैं। वास्तव में प्रकट जगत में कोई वास्तविकता नहीं है। किन्तु यह वास्तविक जैसा प्रतीत होता है। वास्तविकता का अस्तित्व तो वैकुण्ठलोक में है, जहाँ भगवान् अपनी. दिव्य सामग्री के साथ नित्य विद्यमान रहते हैं।

जटिल निर्माण कार्य का मुख्य इंजीनियर (शिल्पी) निर्माण कार्य में स्वयं भाग नहीं लेता, किन्तु वह इसके कोने-कोने से परिचित रहता है, क्योंकि सारा कार्य उसी के निर्देशन में होता रहता है। वह प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से निर्माण कार्य के विषय में हर बात जानता रहता है। इसी प्रकार, भगवान् भी इस दृश्य जगत के परम इंजीनियर (शिल्पी) होने के कारण इसके कोने-कोने से परिचित हैं, भले ही सारा कार्य देवताओं द्वारा क्यों न सम्पन्न होता हो। इस भौतिक सृष्टि में ब्रह्मा से लेकर एक क्षुद्र चींटी तक कोई भी स्वतंत्र नहीं है। हर स्थान पर भगवान् का हाथ देखने में आता है। सभी भौतिक तत्व तथा आध्यात्मिक स्फुलिंग उन्हीं से उद्भूत हैं और जो कुछ भी इस जगत में उत्पन्न होता है, वह भौतिक तथा आध्यात्मिक (अपरा तथा परा) शक्तियों की ही अन्तः क्रियाओं से होता है, जो परम सत्य भगवान् श्रीकृष्ण से उद्भासित होती हैं। एक रसायन शास्त्री अपनी प्रयोगशाला में बैठे-बैठे हाइड्रोजन तथा आक्सीजन मिलाकर जल उत्पन्न कर सकता है, किन्तु वास्तव में जीव तो परमेश्वर के निर्देशानुसार प्रयोगशाला में कार्य करता है और वह रसायनवेत्ता जिन सामग्रियों से कार्य सम्पन्न करता है वे भगवान् द्वारा प्रदत्त हैं। भगवान् प्रत्येक वस्तु को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से जानते हैं। वे सूक्ष्म बातों को जानने वाले हैं तथा पूर्ण स्वतन्त्र हैं। उनकी तुलना सोने की खान से की जा सकती है जबकि विभिन्न रूपों वाले दृश्य जगत सोने से बनी विविध वस्तुओं यथा सोने की अंगूठी, हार इत्यादि के समान हैं। सोने की अंगूठी तथा सोने के हार के गुण, खान में पाये जाने वाले सोने के ही समान हैं, किन्तु खान का सोना परिमाण में भिन्न है। अतः परमसत्य एकसाथ समान तथा भिन्न है। परम सत्य के तुल्य पूरी तरह से कुछ भी नहीं है, किन्तु साथ ही, परम सत्य से स्वतन्त्र भी कुछ नहीं है। आगे . . . .

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नाहं बसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ॥

(भक्तिसन्दर्भ २६९)

पद्मपुराणान्तर्गत कार्त्तिक माहात्म्यमें श्रीभगवान्‌के वचन हैं-हे नारद ! मैं वैकुण्ठमें अथवा योगियोंके हृदयमें वास नहीं करता हूँ (कभी वास करता है कभी वहाँसे चला भी जाता हैं) किन्तु जहाँ मेरे भक्त मेरे नाम-गुण-लीलाका गान करते हैं, वहाँ मैं बैठा ही रहता हैं-निरन्तर वहाँ वास करता हूँ ।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीचैतन्य चरित सुनने की अद्भुत विशेषता

येवा नाहि बूझे केह, शुनिते शुनिते सेह कि अद्भुत् चैतन्य चरित ।
कृष्णे उपजिवे प्रीति, जानिवे रसेर रीति, शुनिलेइ हय बड़ हित ।।

श्रीकृष्णदास गोस्वामी जी कहते हैं कि चाहे आप परमार्थ सम्दन्धित कुछ भी नहीं जानते तब भी घबराने की कोई बात नहीं । आप सिर्फ श्रीचैतन्य चरित्र का श्रवण करें। इस अद्भुत चैतन्य चरित को सुनते सुनते आपकी कृष्ण में स्वाभाविक प्रीति उदय हो जायेगी तथा रसराज शिरोमणि श्रीश्रीराधाकृष्ण के पादप‌द्मों की सेवा के अधिकारी हो जावोगे जो कि जीव मात्र की सर्वोत्तम प्रयोजनीय वस्तु है ।

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हे लोकाः ! श्रृणुत प्रसूति – मरण- व्याधेश्चिकित्सामिमां,
योगज्ञाः समुदाहरन्ति मुनयो यां याज्ञवल्क्यादयः ।
अन्तज्योति – रमेयमेक ममृतं कृष्णाख्य – मापीयतां,
तत्पीतं परमौषधं वितनुते निर्वाण – मात्यन्तिकम् ।।12।।

हे दुनियाँ के मनुष्यो ! जन्म-मरण रूपी बीमारी के इलाज व इसकी औषधि के बारे में सुनो। इस औषधि के बारे में योग के ज्ञाता याज्ञवल्क्य आदि मुनियों ने सोच समझकर व बहुत कुछ अनुभव करने के बाद बताया है।

क्या बताया?

उन्होंने कहा कि हे मनुष्यो ! आप अमृत के समान ‘श्रीकृष्ण’ नाम का पान करो। ये आपके हृदय में असीम आनन्द और दिव्य प्रकाश को फैला देगा। यही नहीं, इस श्रीकृष्ण नाम का पान करके आप सांसारिक दुःखों से हमेशा-हमेशा के लिए छुटकारा पा लोगे।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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कृष्ण छाड़ि जीव कैल अन्याभिनिवेश।
ताई तार विपर्यय स्मृति आर क्लेश।।
सद्‌गुरु आश्रय करि कृष्णकृपा आशे।
अनन्य भजन करे याय कृष्ण पाशे ।।

भजनरहस्यवृत्ति-जीवोंका भगवानसे विमुख होकर महामायामें अभिनिवेश ही उसकी जड़बद्धताका कारण है। मायादेवी अपनी आवरणात्मिका और विक्षेपात्मिका वृत्तिके द्वारा जीवको संसार रूपी कारागारमें भ्रमण कराती है। संसारमें जीव सुख-दुःख भोक्ताका अभिमान करता है तथा संसारकी यंत्रणा भोगता है। धीर व्यक्ति सद्‌गुरुका चरणाश्रय कर इससे निस्तार पाते हैं। भगवद् अनुभव सम्पन्न गुरुका आनुगत्य स्वीकारकर उनकी विश्रम्भ सेवा में संलग्न होनेसे भगवद् कृपा प्राप्त होती है तथा जड़ाभिमान दूर होने लगता है। गुरुदेवको आत्मवत् जानकर, उनकी सेवा करते हुए स्वयंके स्वरूप, भगवद्-स्वरूप तथा माया-स्वरूपकी उपलब्धि होती है तथा गुरु-कृपासे जीव भगवद्-धाममें नित्य सेवामें नियुक्त हो जाता है।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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इस जगत में आसक्ति के साथ वास या आसक्तिरहित होकर अति वैराग्य का प्रदर्शन, इन दोनों में से किसी से भी मंगल नहीं होने वाला। जगत में बहुत से ठग लोग साधु के वेष में जीवों को धर्म – अर्थ-काम-मोक्ष के लिए प्रेरितकर तथाकथित धार्मिक करने के लिए व्यस्त हैं। ऐसे ठगों के चंगुल से छुटकारा पाने के लिए चतुर होना आवश्यक है और चतुर होने के लिए श्रीचैतन्यदेव की बातों में मन को लगाना होगा ।

श्रीलप्रभुपाद

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शिष्य उसे ही कहा जाता है, जो शासन वाक्य सुनने को तैयार हो

भजन की शिक्षा ही श्रील गुरुदेव की वास्तविक कृपा है। जहाँ भजन में त्रुटि है अथवा अपने भौतिक स्वार्थ को पूरा करने का उद्देश्य है, उसे किस तरह से दूर करके भजन में प्रतिष्ठित किया जाय, उस संबंध में कठोर यहाँ तक कि, निर्मम वाक्य ही गुरुदेव की वास्तविक कृपा है। गुरुदेव के उन वाक्यों को जो लोग सुनना नहीं चाहते हैं, उनका मंगल कैसे होगा? शिष्य उसे ही कहा जाता है, जो शासन-वाक्य सुनने को तैयार हो। प्यार-दुलार के वाक्यों से हमें इन्द्रिय सुख मिलता है, किन्तु उसकी अपेक्षा कठोर वाक्य श्रवण करने का अभ्यास बनाना ही शिष्य का प्रधान कर्त्तव्य है। हम सबने मठ में आकर सबसे पहले इस Principle (नीति) को ही ग्रहण किया है। मेरा व्यक्तिगत जीवन श्रील प्रभुपाद की गालियों से ही प्रस्तुत हुआ है। मेरी त्रुटि देखते ही वे कठोर शब्दों में शासन किया करते थे। अक्रोध परमानन्द अभिन्न नित्यानन्द श्रील प्रभुपाद का शासन प्राप्त करके ही, अपने को शिष्य समझकर अभिमान करने की कोशिश करता था। उन सब उपदेश-वाक्यों को सुनकर कितना आनन्दित होता था, उसे मैं भाषा में व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ। भले ही गुरुपादपद्द्म के मधुर वाक्यों से शिष्य को सेवा करने में बहुत अधिक उत्साह मिलता है, फिर भी उसे याद रखना चाहिए कि, साधन अवस्था में, शिष्य को, श्रीगुरुदेव के मुखारविन्द से अपनी प्रशंसा श्रवण करना भी सम्पूर्ण रूप से निषिद्ध है। गुरु के पास अपनी प्रशंसा करना जिस प्रकार निषेध है, उसी प्रकार गुरुदेव के मुख से अपनी प्रशंसा सुनना भी निषेध है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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तुम्हारे गुरु जी की सेवा सारी की सारी तुम्हारी ही है। यदि कोई दूसरा कुछ कर दे तो उसके लिए तुम कृतज्ञ रहना। श्रीकृष्ण के संसार की majordomo (बड़े परिवार की सर्वप्रधान गृहिणी) हैं- श्रीमती राधारानी। वह जानती हैं कि श्रीकृष्ण की समस्त सेवाएं उनकी ही करणीय हैं, दूसरा कोई कैसे भी सेवा कर दे, वह कृतार्थ हो जाती हैं, उसकी कृतज्ञ रहती हैं।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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संसार-समुद्र है, इसका पानी सूख जाने पर ही तुम उस पार जाओगी-यह सोच गलत है। इसी में रहकर ही आत्मकल्याण के बारे में चिंतन करना होगा।संसार-समुद्र है, इसका पानी सूख जाने पर ही तुम उस पार जाओगी-यह सोच गलत है। इसी में रहकर ही आत्मकल्याण के बारे में चिंतन करना होगा।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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धन्य कलि तेरा तमाशा दुःख लगे और हाँसी

आगरा में मथुरा प्रसाद अग्रवाल नाम के एक निष्ठावान भक्त रहते थे। उनके साथ हमारे प्रीति-युक्त सम्बन्ध थे, इसलिए जब भी हम मथुरा-वृन्दावन जाते थे, तब भगवत् नाम प्रचार के लिए आगरा भी जाते थे और उनके घर पर ही रुकते थे। मथुरा प्रसाद, ‘अग्रवाल आयरन रॉड्स’ और ‘अग्रवाल ऑयल मिल्स’ के मालिक थे। उन्हें पूजा-पाठ में बहुत रुचि थी।

एक बार मथुरा प्रसाद जी को बताए बिना ही हम आगरा पहुँच गए। जब हम उनके घर पर गए तो देखा कि वहाँ पहले से ही कोई संकीर्तन मण्डली रुकी हुई थी और कीर्तन-उत्सव चल रहा था। मैंने सोचा, “यदि हम भी यहाँ रुके तो इतने सारे लोगों की व्यवस्था करने में मथुरा प्रसाद जी को असुविधा हो सकती है।”

ऐसा सोचकर जैसे ही हम वहाँ से जाने लगे, मथुरा प्रसाद जी ने अपने घर की दूसरी मंजिल से हमें देख लिया। वे दौड़ते हुए हमारे पास आए और कहने लगे, “स्वामी जी, आप कहाँ जा रहे हैं? कृपया घर में पधारें।”

मैंने उनसे कहा, “आपके घर पर पहले से ही साधु-संत आए हुए हैं। हमारे यहाँ रहने से आपको कठिनाई हो सकती है इसलिए इस बार हम किसी धर्मशाला में रुक जाएँगे। अगली बार जब आएँगे तब आपके घर में रुकेंगे।”

उन्होंने कहा, “आप चिन्ता मत कीजिए। संकीर्तन मण्डली के लोग तो कल चले जाएँगे। हमारे घर में और भी कमरे हैं। आप कहीं नहीं जाएँगे। आप हमारे घर पर ही रहेंगे।”

उनके इस प्रीतियुक्त व्यवहार को देखकर हम उन्हें मना नहीं कर पाए और उनके घर में ही रुक गए।

उनके यहाँ आई हुई संकीर्तन मण्डली में चार बाबाजी और दो मृदंग वादक थे। मृदंग वादक मृदंग बजाने में निपुण थे।

संकीर्तन-मण्डली के लोग निताई-गौरांग एवं राधा-कृष्ण के चित्रपट के आगे कई प्रकार के फल, मिठाइयाँ इत्यादि निवेदित कर अष्टप्रहरिया (अखंड) संकीर्तन कर रहे थे। संध्या के समय मृदंग की धुन पर और भी उच्चस्वर में कीर्तन और नृत्य होने लगा, जिसमें मथुरा प्रसाद जी को बहुत आनन्द आ रहा था। उन्होंने मुझे आवाज़ लगाई, “स्वामी जी, आप भी आ जाइए, बहुत आनन्द आ रहा है।”

उनके द्वारा आग्रह किए जाने पर मैं वहाँ गया। उच्च स्वर में हो रहे कीर्तन को सुनकर मुझे भी अच्छा लग रहा था। लगभग एक घंटे बाद, कीर्तन के बीच में, एक मृदंग वादक अपनी मृदंग छोड़कर मेरी ओर आने लगा। उसे आते देख मैंने सोचा, “मैं तो इससे पहले कभी मिला नहीं हूँ, यह मेरी ओर क्यों आ रहा है?”

मैं समझ नहीं पाया कि बात क्या है। वह मेरे पास आकर धीमी आवाज़ में मेरे कान में बोला, “स्वामी जी, क्या आप बंसी बजाएँगे?”

मैंने कहा, “मुझे बंसी बजानी नहीं आती। आप ही बजाइए।”

वह चुप हो गया और बाहर जाने लगा। दरवाज़े तक जाकर वह लौटकर फिर मेरे पास आया और फिर से मेरे कान में कहने लगा, “स्वामी जी, क्या आप बंसी बजाएँगे?”

मैंने कहा, “नहीं भाई, सच में मुझे बंसी बजानी नहीं आती। आप ही बजाइए।”

इसके बाद वह बाहर चला गया। मैंने सोचा, कदाचित् वह मुझे अपनी बंसी बजाने की कला दिखाना चाहता है। यह सोचकर कि उसे मना करके मैंने ठीक नहीं किया, मैं भी उसके पीछे-पीछे गया। वह सीढ़ी से नीचे उतरकर अन्धेरे की ओर चला गया। वहाँ जाकर उसने अपनी जेब से एक बीड़ी निकाली और उसे जलाकर पीने लगा। अचानक से जब उसकी दृष्टि मुझ पर पड़ी तो वह डर गया। उसने कहा, “मुझे बीड़ी पीने की आदत है। बीड़ी पीने से मुझे शक्ति मिलती है जिससे मैं और अच्छा मृदंग बजा पाता हूँ।”

यह सुनकर मैंने उससे कहा, “आप मुझे बोल सकते थे कि आपको बीड़ी पीने की आदत है और आप बीड़ी पीने जा रहे हैं, पर आपने मुझसे पूछा कि क्या आप बांसी बजाएँगे। मैं तो आपकी बंसी बजाने की कला को देखने के लिए यहाँ आया।

आपने तो बंसी की जगह बीड़ी निकाल कर पीनी शुरू कर दी।”

उनकी भाषा में ‘बांसी बजाने’ का सांकेतिक अर्थ था- बीड़ी पीना। इसी तरह शराब पीने के लिए भी कोई सांकेतिक शब्द रखा होगा। द्यूतं (जुआ), पानं (नशा), स्त्रियः (अवैध स्त्रीसंग), सूना (मांसाहार) आदि कलि (कलह) के रहने के स्थान हैं। इन वस्तुओं के लिए भगवत् सम्बन्धित किसी शब्द या नाम का प्रयोग करना उचित नहीं है। कुछ समय पहले तक जो व्यक्ति मृदंग बजाते हुए कीर्तन कर रहा था, वही अब नशा कर रहा है। ऐसे व्यक्ति से कीर्तन सुनने वाले लोग उससे क्या शिक्षा लेंगे?

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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