संसारी जीव को अवश्य गुरु का आश्रय ग्रहण करना चाहिए

सुबोध ये हय, दुर्लभ नृदेह,
लभिया भव-संसारे।
गुरु कर्णधार, समाश्रय करि,’
कृष्ण – आनुकूल्ये तरे ।।

शान्त कृष्णभक्त – लक्षण ये गुरु,
सदैन्य वचने ताँ रे।
सन्तोष करिया, कृष्णदीक्षा लय,
याय संसारेर पारे ।।

सहजे जीवेर, आछे कृष्णे मति,
वृथा तर्क ताहा याय।

वितर्क छाड़िया, सुमति आश्रये,
गुरु ह’ते मन्त्र पाय ।।

बुद्धिमान व्यक्ति जन्म-मुत्यु रूपी इस संसार में दुर्लभमनुष्य शरीर को पाकर शान्त स्वभाव के श्रीकृष्ण – भजन का गुरु रूप में आश्रय ग्रहण करता है तथा अपने विनम्र वचनों से उन्हें प्रसन्न करता है। भवसागर से पार जाने के लिए सद्‌गुरु रूपी मल्लाह से वह श्रीकृष्ण नाम की दीक्षा प्राप्त करके, प्रीतिपूर्वक श्रीकृष्ण का भजन करते हुये भवसागर पार हो जाता है। वैसे तो स्वाभाविक रूप से जीव की श्रीकृष्ण में रति-मति होती है परन्तु ज्यादा तर्क इत्यादि करने से यह प्रीति नष्ट हो जाती है। इसलिए कुतर्क को छोड़कर जब कोई सुमति का आश्रय लेता है तो वह सद्‌गुरु का चरण – आश्रय लेता है। सद्गुरु का चरणाश्रय ग्रहण करते हुये वह उनसे गुरुमन्त्र प्राप्त करता है। शरीर में आसक्त अथवा विषयों में आसक्त जीव को चाहिए कि वह अपने अपने वर्ण एवं आश्रम के नियमों का पालन करते हुये सद्‌गुरु के चरणों का आश्रय ग्रहण करे।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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वैष्णव-सेवा गुरु-सेवा से अभिन्न

गुरु महाराज जब विभिन्न स्थानों पर प्रचार सेवा के उद्देश्य से जाते थे, तब उनके साथ बहुत से श्रील प्रभुपाद के आश्रित जन भी भिन्न-भिन्न स्थानों पर उपस्थित रहकर सभी का मङ्गल विधान करते थे। जब गुरु महाराज के आश्रित गृहस्थ भक्त उन्हें वस्त्र, प्रणामी आदि देने के लिए आते थे तब गुरु महाराज उनसे कहते थे, “मैं अभी अत्यधिक वृद्ध नहीं हुआ हूँ तथा मैं पुनः पुनः आपके यहाँ पर आऊँगा भी, दूसरी ओर मेरे गुरुभ्राता मुझसे भजन-राज्य में, आयु आदि में ज्येष्ठ हैं तथा कौन जानता है कि आपको पुनः उनके सङ्ग, उनके दर्शन आदि का सुयोग, सौभाग्य प्राप्त भी होगा या नहीं। अतएव उन्हें ही वस्त्र-प्रणामी आदि प्रदान करो। वैष्णव-सेवा गुरु-सेवा से अभिन्न है।”

गुरु महाराज के उपरोक्त वचनों को सुनकर पुनः पुनः यही शिक्षा हृदय में स्फुरित होती है-

‘आमि त’ वैष्णव’, ए बुद्धि हइले,
अमानि ना ह’ब आमि।
प्रतिष्ठाशा आसि’, हृदय दूषिबे,
हइब निरयगामी ॥
कल्याण कल्पतरु (उच्छ्वास २.८.२)

[यदि मेरी ‘मैं वैष्णव हैं’ ऐसी बुद्धि हो जाएगी, तो मैं कदापि अमानी नहीं रह पाऊँगा तथा दूसरों से प्रतिष्ठा प्राप्ति की आशा से मेरा हृदय दूषित हो जाएगा, जिसके फलस्वरूप मैं नरकगामी होऊँगा।]

गुरु महाराज जिन समस्त अपने जीवन में साक्षात् रूप कर गए हैं, काल के प्रभा दुर्भाग्यवशतः वर्त्तमान समया विरले वैष्णवों के अतिरिक्त सभी में उन आदर्शों का स भाव ही दिखलाई देता है।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

श्रील भक्ति विज्ञान भारती गोस्वामी महाराज जी द्वारा सञ्चित

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श्रीमद्भागवतम
११-५-४१

देवर्षिभूताप्तनृणां पितृणां न किंकरो नायमृणी च राजन् ।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम् ।।

हे राजन! जिसने सारे भौतिक कार्यों को त्याग कर मुकुन्द के चरणकमलों में पूरी तरह शरण ले रखी है, जो सबों को शरण देता है, वह देवताओं, ऋषियों, सामान्य जीवों, सम्बन्धियों, मित्रों, मनुष्यों या मृत पितरों का ऋणी नहीं रहता। चूँकि इस सभी श्रेणियों के जीव भगवान् के भिन्नांश हैं, अतः जिसने भगवान् की सेवा में अपने को अर्पित कर दिया है, उसे ऐसे व्यक्तियों की अलग से सेवा करने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
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