एमत अधम आमि, कि बलिते जानि स्वामी,
तबु आज्ञा करिब पालन।
या’ बलावे मोर मुखे, तोमारे बलिब सुखे,
दोष गुण ना करि गणन ।।
आपने जो प्रश्न किया, उस विषय में मैं भला क्या जानता हूँ, जो कुछ कहूँ। मैं तो बस आपकी आज्ञा का पालन करूँगा और आज्ञा पालन करते हुए आप मेरे मुख से जैसा बुलवाओगे, वैसा ही बड़ी खुशी-खुशी बोलता चला जाऊँगा। बस इतनी कृपा करना कि मेरे द्वारा दिये उत्तर के गुण अथवा दोष न देखना।
कृष्णतत्त्व
एकमात्र इच्छामय कृष्ण सर्वेश्वर।
नित्य शक्तियोगे कृष्ण विभु परात्पर ।।
इच्छामय भगवान श्रीकृष्ण ही एकमात्र सर्वेश्वर हैं। वे श्रीकृष्ण नित्य हैं, सर्वशक्तिमान हैं, सर्वव्यापक हैं तथा सर्वश्रेष्ठ तत्त्व हैं। श्रीकृष्ण स्वतन्त्र व स्वेच्छामय पुरुष हैं तथा वे स्वाभाविक रूप से ही अचिन्त्य शक्तियुक्त हैं।
कृष्ण-श्रीकृष्णशक्ति
कृष्णशक्ति कृष्ण हइते ना हय स्वतन्त्र।
येइ शक्ति, सेइ कृष्ण-कहे वेदमन्त्र ।।
कृष्ण विभु, शक्तिं ताँ र वैभव – स्वरूप ।
अनन्त वैभवे कृष्ण हय एक रूप ।।
श्रीकृष्ण की शक्ति श्रीकृष्ण से कभी भी अलग नहीं है। वेदमन्त्रों में कहा गया है कि जो शक्ति है, वे ही श्रीकृष्ण हैं, अन्तर केवल इतना है कि श्रीकृष्ण विभु हैं और शक्ति उनका वैभव स्वरूप है। अनन्त वैभव के द्वारा अर्थात् अनन्त शक्तियों से युक्त होकर भी श्रीकृष्ण ‘एक’ स्वरूप कहे जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण अनन्त शक्ति स्वरूप हैं, इसीलिए उन्हें सर्वशक्तिमान कहा जाता है। शक्ति से श्रीकृष्ण नहीं बल्कि श्रीकृष्ण से अनन्त शक्तियाँ प्रकाशित होती हैं।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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जिनकी इच्छा गृहव्रत धर्म को प्रबल करने की है, हम कभी भी उनके संग की प्रार्थना नहीं करते हैं । जो व्यक्ति हरि – भजन अनुरागी और कृष्णगृहधर्म में अवस्थित है, उनकी सेवा करने के लिए ही हमारी प्रबल इच्छा होना आवश्यक है । दुःसंग परित्याग कर साधु का आश्रय ग्रहण करना ही कर्तव्य है । जो असाधु को साधु जानकर भ्रमित होते हैं, वे सर्वदा ही विपत्तियों में पड़ेंगे।
श्रीलप्रभुपाद
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श्रील सरस्वती ठाकुर के वास्तविक अनुयायी
श्रील भक्ति रक्षक श्रीधर गोस्वामी महाराज
परमाराध्य श्रील प्रभुपाद ने अपने अप्रकटकाल के पूर्वदिवस पूज्यपाद श्रीधर महाराज के श्रीमुख से श्रील नरोत्तम ठाकुर महाशय के द्वारा कीर्त्तित- ‘श्रीरूप मञ्जरीपद, सेइ मोर सम्पद, सेइ मोर भजन-पूजन’ – इत्यादि गीत श्रवण करने की इच्छा प्रकाशित करके उनके प्रति विशेष करुणा प्रकाशित की थी। पूज्यपाद महाराज ने परमाराध्य प्रभुपाद के उस कृपाशीर्वाद को मस्तकपर धारण करके अपने अप्रकटकाल के शेष मुहूर्त तक श्रीस्वरूप-रूपानुगवर श्रील प्रभुपाद का मनोऽभीष्ट पूर्ण करने के लिये सतत यत्न किया।
श्रील प्रभुपाद ने अपने अप्रकटकाल के कुछ दिन पूर्व कहा था-
‘भक्तिविनोद धारा कदापि अवरुद्ध नहीं होगी, आप लोग और अधिक उत्साह के साथ श्रीभक्तिविनोद-मनोऽभीष्ट के प्रचार में व्रती होना।’
ठाकुर श्रील भक्तिविनोद रूपानुगवर महाजन हैं। परमाराध्य श्रील प्रभुपाद ने उनका मनोऽभीष्ट पूर्ण करने का महान आदर्श स्थापित किया है। उनके चरणाश्रित निजजन पूज्यपाद तीर्थ महाराज, गोस्वामी महाराज, माधव महाराज, वन महाराज, यायावर महाराज, कृष्णदास बाबाजी महाराज और श्रीधर महाराज आदि प्रमुख वैष्णवाचार्य उस आदर्श का अनुसरण करते हुए रूपानुग श्रील प्रभुपाद के गणों में गणित हुए हैं। वर्त्तमान में श्रील प्रभुपाद एवं उनके अनेक पार्षद नित्यलीला में प्रविष्ट हो गये हैं, ऐसे में श्रील प्रभुपाद का श्रीचरणाश्रय प्राप्त करने के लिये उनके दासानुदासों को भी उस श्रीगुरु-मनोऽभीष्ट को पूर्ण करने की महती आशा और आकाङ्का हृदय में दृढ़भावसे पोषण करनी होगी। इस विषय में रूपानुग वैष्णवों की पदधूलि, पदजल और अवशिष्ट प्रसाद ही हमारा एकमात्र बल और भरोसा है।
श्रील भक्ति विज्ञान भारती गोस्वामी महाराज
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“वरिष्ठ वैष्णवों से वार्त्तालाप करके अपने संशय का निवारण करने की पद्धति पारमार्थिक राज्य में प्रवेश प्राप्त करने के लिये महाजनों के द्वारा सर्वथा अनुमोदित एवं निज-आचरित पद्धति है।”
श्रील भक्ति विज्ञान भारती गोस्वामी महाराज
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अनर्थ-युक्त साधकों को चाहिए कि वे दूसरों को उपदेश देने का हठ छोड़ दें तथा गुरु-वैष्णवों की कृपा प्रार्थना करते हुए, विष्णु व वैष्णवों की प्रसन्नता के लिए हरि-कीर्त्तन के लिए प्रयास करें। जो खुद को दूसरों की आलोचना करने का अधिकारी मानते हैं, उनकी ये चेष्टा एक तरह से केवल मात्र खुद को लोगों के सामने सर्वश्रेष्ठ गुरु रूप से प्रतिष्ठित करने के लिए ही होती है।
श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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शिष्य उसे ही कहा जाता है, जो शासन वाक्य सुनने को तैयार हो
भजन की शिक्षा ही श्रील गुरुदेव की वास्तविक कृपा है। जहाँ भजन में त्रुटि है अथवा अपने भौतिक स्वार्थ को पूरा करने का उद्देश्य है, उसे किस तरह से दूर करके भजन में प्रतिष्ठित किया जाय, उस संबंध में कठोर यहाँ तक कि, निर्मम वाक्य ही गुरुदेव की वास्तविक कृपा है। गुरुदेव के उन वाक्यों को जो लोग सुनना नहीं चाहते हैं, उनका मंगल कैसे होगा? शिष्य उसे ही कहा जाता है, जो शासन-वाक्य सुनने को तैयार हो। प्यार-दुलार के वाक्यों से हमें इन्द्रिय सुख मिलता है, किन्तु उसकी अपेक्षा कठोर वाक्य श्रवण करने का अभ्यास बनाना ही शिष्य का प्रधान कर्त्तव्य है। हम सबने मठ में आकर सबसे पहले इस Principle (नीति) को ही ग्रहण किया है। मेरा व्यक्तिगत जीवन – श्रील प्रभुपाद की गालियों से ही प्रस्तुत हुआ है। मेरी त्रुटि देखते ही वे कठोर शब्दों में शासन किया करते थे। अक्रोध परमानन्द अभिन्न नित्यानन्द श्रील प्रभुपाद का शासन प्राप्त करके ही, अपने को शिष्य समझकर अभिमान करने की कोशिश करता था। उन सब उपदेश-वाक्यों को सुनकर कितना आनन्दित होता था, उसे मैं भाषा में व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ। भले ही गुरुपादपद्म के मधुर वाक्यों से शिष्य को सेवा करने में बहुत अधिक उत्साह मिलता है, फिर भी उसे याद रखना चाहिए कि, साधन अवस्था में, शिष्य को, श्रीगुरुदेव के मुखारविन्द से अपनी प्रशंसा श्रवण करना भी सम्पूर्ण रूप से निषिद्ध है। गुरु के पास अपनी प्रशंसा करना जिस प्रकार निषेध है, उसी प्रकार गुरुदेव के मुख से अपनी प्रशंसा सुनना भी निषेध है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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श्रीगुरु सभी तीर्थों के आश्रय
श्रीगुरुदेव साक्षात् ईश्वर हैं। गुरुरूपी श्रीभगवान् क्या गृहस्थ, क्या संन्यासी सबके लिए ही एकमात्र आश्रय करने याग्य हैं। सद्गुरु सभी तीर्थों के भी आश्रयस्वरूप हैं, इसीलिए उनकी परिक्रमा कर लेने से ही सभी तीर्थों की परिक्रमा का फल मिल जाता है।
श्रील भक्ति वेदान्त वामन गोस्वामी महाराज