प्रभुर चरण धरि’, अनेक विनय करि’,
गलदश्रु पुलक शरीर।
हरिदास महाशय, काँदिते काँदिते कय,
प्रभु तव लीला सुगंभीर ।।

महाप्रभु जी का प्रश्न सुनकर श्रीहरिदास ठाकुर जी के नेत्रों से आँसुओं की धाराएँ बहने लगीं और उनका सारा शरीर पुलकायमान हो गया। बड़ी श्रद्धा के साथ उन्होंने महाप्रभु जी के चरणों में प्रणाम किया और उनके चरण पकड़ कर अपनी स्वाभाविक दीनता के साथ आँसु बहाते हुए भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी से कहने लगे – हे प्रभु! आपकी लीला सुगम्भीर है।

आमि अति अकिन्चन, नाहि मोर विद्याधन,
तव पद आमार सम्बल।
एहेन अयोग्य जने, प्रश्न करि’ अकारणे,
बल प्रभु ह ‘बे किबा फल ।।

मैं तो अति अकिंचन हूँ, मेरे पास भला विद्यारूपी धन कहाँ! आपके श्रीचरण ही मेरा सहारा हैं व सर्वस्व हैं। ऐसे अयोग्य व्यक्ति को आपने ऐसे ही यह प्रश्न कर दिया। अब आप ही बतायें कि इसका क्या फल होगा।

तुमि कृष्ण स्वयं प्रभो, जीव-उद्घारिते विभो,
नवद्वीप – धामे अवतार।

कृपा करि रांगा पाय, राख मोरे गौरराय, तबे चित्त प्रफुल्ल आमार ।।

हे प्रभो! आप तो स्वयं विभु अर्थात् सर्वव्यापक श्रीकृष्ण ही हो एवं जीवों का उद्धार करने के लिए आपने नवद्वीप धाम में अवतार लिया है। हे गौरचन्द्र ! आप अपने इन लालिमा – युक्त दिव्य चरणों में कृपा करके मुझे स्थान दीजिए, तभी तो मेरा चित्त प्रफुल्लित होगा।

तोमार अनन्त नाम, तवानन्त गुणग्राम,
तव रूप सुखेर सागर।

अनन्त तोमार लीला, कृपा करि’ प्रकाशिला, ताइ आस्वादये ए पामर ।।

हे गौरहरि जी ! आपके अनन्त नाम हैं, आपके गुण भी अनन्त हैं और आपका रूप तो सुखों का सागर है। यही नहीं, आपकी लीलाएँ भी अनन्त हैं। आप मुझ पर कृपा करें, आप अपने श्रीचरणों में मुझे स्थान दें, तभी मेरे जैसा ये पामर जीव आपकी दिव्य लीलाओं का आस्वादन कर सकता है।

चिन्मय भास्कर तुमि, किरणेर कण आमि, तुमि प्रभु, आमि नित्यदास ।

चरण – पीयूष तब, मम सुख सुवैभव, तव नामामृते मोर आश ।।

हे गौरहरि ! आप चिन्मय सूर्य हो, मैं तो उस सूर्य की किरण का एक कणमात्र हूँ। हे गौरहरि ! आप मेरे नित्य प्रभु हो और मैं आपका नित्यदास हूँ। आपके चरणों का अमृत ही मेरा आनन्दमय वैभव है। बस, आपके नामामृत का रसास्वादन करने की मेरी बड़ी इच्छा है तथा आशा है कि कभी तो आप अपने नामामृत का मुझे पान करवाओगे।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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अपनी इच्छानुसार ब्रज में नहीं जाया जा सकता

सब विषयों में कृष्ण की इच्छा ही बलवती है। मेरी कुछ करने की इच्छा होने पर भी यदि कृष्ण की इच्छा न हो, तो वह निश्चय ही बदल जाएगी। उनकी इच्छा से अपनी इच्छा को मिलाना ही शरणागति या शान्ति है। समस्त प्रापञ्चिक विषय ही कृष्णलीला के अनुकूल हैं। संसार में हम सुख प्राप्त करने पर भगवान को भूल जायेंगे, इसीलिए हमारे मन की परीक्षा लेने के लिए ही दयामय भगवान ने इस प्रपञ्च जगत का निर्माण किया है। अतः इस जगत में सुखी रहने पर कृष्ण-विस्मृति अवश्यम्भावी होने के कारण ही यह (उनके द्वारा प्रपञ्च जगत का निर्माण) उनकी दया का परिचय है ।

अपनी इच्छानुसार ब्रज में नहीं जाया जा सकता । राधाकृष्ण की शुभेच्छा और उनकी कृपा होने पर ही ब्रजवास सम्भव होता है। ब्रजयात्रा में हमारी अपनी इच्छा ही कृष्ण के प्रतिकूल अनुशीलन और बाधक स्वरूप है ।

चैत्रमास में हमारी मथुरा जाने की प्रबल इच्छा होने पर भी कृष्ण की इच्छा न होने के कारण ही हमारी इच्छा में बाधा पड़ गयी। अब हमने अगले आश्विन मास में जाने की इच्छा की है। फिर भी यदि कृष्ण की इच्छा दूसरी प्रकार की हुई, तो इसमें हमारा कोई हाथ नहीं है। बल्कि उनकी इच्छा के विरुद्ध चेष्टा करने पर हमें दोषी होना ही पड़ेगा।

हरिभजन करने पर ही शरीर, मन और आत्मा- ये तीनों ठीक रहेंगे, किन्तु मेरी तरह भजन-विमुख होने पर ये तीनों प्रतिकूल होकर खड़े हो जायेंगे ।

प्रभुपाद
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‘ईश्वर भक्ति से आत्मा को सुप्रसन्नता लाभ होती है’

श्रीमद् भागवत में वर्णित, प्रत्यक्ष, अनुमान, इतिहास और शब्द-इन चार प्रमाणों में से, केवल अनुमान प्रमाण ही प्रत्यक्ष ज्ञान की स्थूल सीमा रेखा को निराश करने में समर्थ है। श्रीगौराङ्ग महाप्रभु की जन्म तिथि पर बुलाने पर, मैं एक बार पंजाब के जालन्धर नगर में गया था। वहाँ पर कुछ शिल्पपति और आयकर विभाग के परिदर्शक (Income tax officer) मुझे मिलने के लिए आए। उनमें से एक प्रमुख व्यक्ति मुझसे कहने लगे “महाराज जी! मैं आंखों से जिस वस्तु को नहीं देख सकता, हाथों से जिस वस्तु को स्पर्श नहीं कर सकता, उस वस्तु को मानता नहीं हूँ।”

दैवयोग से और-2 बातें करते हुए उस प्रमुख व्यक्ति ने कहा, ‘महाराज जी, मेरा मन बहुत चंचल है, सर्वदा ही मैं अशान्ति का अनुभव करता हूँ। आप तो साधु पुरुष हैं, आप मुझे ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे मैं मन में शान्ति प्राप्त कर सकूँ। मैंने उसी समय उन्हें मुस्कराते हुए कहा कि आप तो अपने आप को प्रत्यक्षवादी कहते हैं और अब कह रहे हैं कि मेरे मन में बड़ी अशान्ति है।

क्या आपने मन को देखा है? अथवा उसका स्पर्श किया है? यदि ऐसा नहीं कर सके हैं, तब मन स्वीकार करने की क्या आवश्यकता है? उसके उत्तर में उस व्यक्ति ने कहा, नहीं, नहीं। सुख-दुख और संकल्प-विकल्प की अनुभूति द्वारा मन का अस्तित्व स्वीकार होता है।

मैंने कहा कि अपनी बात से आपने स्वीकार कर लिया है कि वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान न होने से भी वस्तु का अस्तित्त्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि वस्तु को न देखने से भी, उसके फल से, फल का कारण मालूम हो जाता है। उसी प्रकार परमात्मा व भगवान का प्रत्यक्ष ज्ञान न होने से भी, ऐसे बहुत से विशेष लक्षण हैं कि जिनसे उनका अस्तित्त्व अस्वीकार करने का कोई उपाय नहीं दीखता। चराचर जगत में, कार्य-चेतन का कारण, कारण- चेतन अवस्थान कर रहा है। वह अनुमान-सिद्ध तो है ही, ऐसा कि उसकी कृपा से वह दर्शन-सिद्ध वस्तु के रूप में भी दिखाई देता है। यह कारण-चेतन ही परमात्मा व भगवान् है। तत्वतः परमात्मा या भगवान् की स्वीकृति के साथ-साथ ही, जीव के हृदय के तमाम अनर्थ, मूल सहित दूर हो जाते हैं एवं क्रमानुसार जीवात्मा की भगवान् के प्रति सेवा-प्रवृत्ति के रहने से वह सुनिर्मल और सुप्रसन्न होती है।

श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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श्रील प्रभुपाद की विरह तिथि में दार्शनिक-चर्चा

स्थान – श्रीउद्धारण गौड़ीय मठ, चुचुड़ा

दिनांक 3 पौष, 1366 बंगाब्द, 19-12-1959

कीर्तन का विग्रह हैं-श्रील प्रभुपाद

आज श्रील प्रभुपाद की विरह-तिथि है। प्रतिवर्ष ही हम इस विरह तिथि पर हरिकथा-कीर्तन किया करते हैं। श्रील प्रभुपाद कीर्तन-विग्रह हैं। जिन्होंने उनका सान्निध्य लाभ किया है, उन्होंने निश्चय ही यह अनुभव किया है। हरिकथा कीर्तन में वे अकेले ही हजारों मुख वाले थे। हम 24 घण्टे में एक दिन की गणना करते हैं। श्रील प्रभुपाद के लिए हरिकथा-कीर्तन के समय एक दिन, हजारों दिनों में परिणत हो (बदल) जाता था। हरिकथा-कीर्तन में वे इतना आनन्द प्राप्त करते थे कि उसकी सीमा किसी भाषा में व्यक्त नहीं की जा सकती है। साधारण मनुष्य को केवल आहार-विहार-निद्रा में आनन्द प्राप्त होता है। परन्तु श्रील प्रभुपाद हरिकथा-कीर्तन में इतना आनन्द प्राप्त करते थे कि आहार-निद्रा छोड़कर भी वे हरिकथा करते थे। हम लोग भौतिक दृष्टिकोण से सोचते थे कि इस प्रकार दिन रात बोलते रहने से स्वास्थ्य की हानि होगी। इसीलिए हरिकथा बन्द करवाकर उनसे भोजन और निद्रा लेने के लिए अनुरोध किया करते थे। इससे वे असंतोष व्यक्त करते ! वे हमेशा कहा करते थे कि, “खाना-पीना ही मनुष्य का प्रधान कार्य नहीं है।”

आमतौर पर देखा जाता है कि, आमोद-प्रमोद प्रिय (भोगी) लोग कई बार खाना-पीना छोड़कर सारी रात जागकर यात्रा-थियेटर, सिनेमा आदि देखा करते हैं। जिस विषय में जिसकी जितनी अधिक प्रीति होती है, वह उसमें उतना ही मस्त होकर रहना चाहता है – साधारण जगत में इस बात को देखा जाता है। अतः श्रील प्रभुपाद के अतिमर्त्य स्वभाव में अप्राकृत हरिकीर्तन-आनन्द में मग्न होकर आहार-निद्रा त्याग करना तो स्वाभाविक है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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सावधानीपूर्वक सेवा ही सुष्ठु-सेवा

सेवक की अक्षमता और अयोग्यता की अनुभूति ही श्रीहरि-गुरु-वैष्णव सेवा के लिए प्रेरित करती है। जड़ भोग परायण विचार द्वारा कभी भी सेवा संभव नहीं है। तब समस्त क्षेत्रों में ‘सावधानी’ अवलम्बन करने पर सेवा उत्तम रूप से होती है, इसीलिए “वन्दो मुत्रि सावधान मते” (मैं सावधानी पूर्वक वन्दना करता हूँ) पद की अवतारणा की गई है। गुरु-वैष्णवों का सेवासुख-तात्पर्य (उन्हें सुख पहुँचाना) ही भक्त का एकमात्र काम्य है एवं वे ही उनके अप्राकृत स्नेहाकर्षण (कृपा) की प्राप्ति का प्रधान योगसूत्र हैं। इसमें प्राकृत लेनदेन का कोई स्थान नहीं है।

श्रील भक्ति वेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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भगवान तथा उनके सभी जीवों से प्रेम करो

मनुष्य के जीवन में भगवत्- प्रेम अति आवश्यक है। श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के अनुसार भगवत् – प्रेम, इस पृथ्वी की सबसे शक्तिशाली ऊर्जा है। यह सभी के हृदयों को निकट लाकर उनमें प्रेम तथा सद्भावना का सम्बंध स्थापित करता है। भगवद् – प्रेम, पूरे विश्व में स्थायी शांति की स्थापना करने में सक्षम है। अगर हम अपने जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं तो हमें किसी भी जीव के प्रति हिंसा करने से बचना होगा। भगवत्- प्रेम का अर्थ है- भगवान से प्रेम तथा सभी जीवों का भगवान से सीधा संबंध होने के कारण, सभी जीवों के प्रति प्रेम।

श्रील चैतन्य महाप्रभु हमें शिक्षा देते हैं की सभी जीवों का उद्गम् स्त्रोत एक ही है, वे हैं भगवान श्रीहरि। यदि हम भगवान से सच्चा प्रेम करते हैं तो हम सभी जीवों से भी स्वाभाविक रूप से प्रेम करेंगे। प्रेम अहिंसा से कहीं श्रेष्ठ है। अहिंसा का अर्थ तो है किसी के प्रति हिंसा से बचना- यह मात्र निषेधात्मक है, जबकि प्रेम का अर्थ है- दूसरों को सुख देना; साथ ही यह सकारात्मक (Positive) भी है। श्रील चैतन्य महाप्रभु के दिव्य- प्रेम के संदेश को वर्तमान में पूरे विश्व में सराहा गया है तथा विभिन्न देशों तथा मान्यताओं के व्यक्तियों ने स्वीकार किया है कि भगवत्- प्रेम के द्वारा ही स्थायी शान्ति की स्थापना हो सकती है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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One gets a guru by the mercy of Sri Hari

Tulasi Dasa says “binu hari krpa milahin nahin santa.” And the other side of this is, “bina santa krpa milahin nahin hari.” In other words, by the grace of the Supreme Lord, one gets a sadhu and by the grace of the sadhu, one gets the Supreme Lord.

Both are interrelated. You see, Dhruva’s mother told him to chant the Name of the Supreme Lord with faith, even though she was not a saint. Yes, she was a patha-pradarsaka guru, not a tattvika guru or srotriya brahmanistha guru. What was the result of that? Dhruva started calling out for the Lord with faith and as a result, he met a sadhu. He met Narada Goswami. Then Narada Goswami gave him a mantra and taught him the process of bhajan. Shortly after that, Dhruva attained the Supreme Lord.

So the conclusion is that one first gets a suddha bhakta or guru by the mercy of Sri Hari and then one gets Sri Hari by the mercy of guru.

Srila Bhakti Ballabh Tirthayatra Goswami Maharaj

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