मुख्य नामों और गौण नामों के फल का भेद
एइ रूप नाम, कर्मज्ञानकाण्डगत ।
पुण्य मोक्ष दान करे शास्त्रेर सम्मत ।।
नामेर ये मुख्य फल कृष्णप्रेमधन ।
तार मुख्य नामे मात्र लभे साधुगण ।।
शास्त्रों के मतानुसार कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड के भीतर जो नाम आते हैं, ये सभी पुण्य और मोक्ष प्रदान करते हैं। हरिनाम का मुख्य फल एकमात्र श्रीकृष्ण – प्रेमधन को प्राप्त करवाना है और मुख्य नाम के द्वारा ही यह फल मिलता है, ऐसा साधुगण कहते हैं।
नाम और नामाभास में फल-भेद
एक कृष्णनाम यदि मुखे बाहिराय।
अथवा श्रवण – पथे अन्तरेते याय ।।
शुद्ध वर्ण हय वा अशुद्ध वर्ण हय।
ता’ते जीव तरे, एइ शास्त्रेर निर्णय ।।
किन्तु एक कथा इथे आछे सुनिश्चित ।
नामाभास हइले विलम्बे हय हित ।।
शास्त्रों के मतानुसार यदि एक कृष्ण नाम किसी के मुख से निकले अथवा कानों के रास्ते से किसी के अन्दर प्रवेश करे तो वह चाहे शुद्ध वर्ण हों या अशुद्ध वर्ण, हरिनाम के प्रभाव से वह जीव भवसागर से पार हो जाता है। किन्तु इसमें एक बात सुनिश्चित है कि नामाभास होने पर वास्तविक फल की प्राप्ति में विलम्ब होता है।
नामाभास हइलेओ अन्य शुभ हय।
प्रेमधन केवल विलम्बे उपजय ।।
नामाभासे पापक्षये शुद्ध नाम हय।
तरखनइ श्रीकृष्ण – प्रेम लभये निश्चय ।।
नामाभास होने पर अन्य शुभ फल तो शीघ्र ही प्राप्त हो जाते हैं लेकिन प्रेमधन की प्राप्ति में विलम्ब होता है। हरिनाम करने वाले के नामाभास द्वारा जब सारे पाप और अनर्थ खत्म हो जाते हैं तब शुद्ध नाम, भक्त की जिह्वा पर नृत्य करता है। उसी समय शुद्धनाम के प्रभाव से जीव को श्रीकृष्ण – प्रेमधन की प्राप्ति होती है।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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वैकुण्ठवार्ता
जब तक अपनी शक्ति के ऊपर, अपनी आत्मम्भरिता के ऊपर, अपनी अभिज्ञता के ऊपर निर्भर रहने की बुद्धि रहती है, तबतक मनुष्य भगवान के चरणों में शरणागत नहीं हो सकता । प्रपत्ति या शरणागति न आनेतक हम आरोहवाद को ही महत्व देंगे । जब हमें अनुभव होगा कि हमारी शक्ति अति तुच्छ है, हमारा अहंकार किसी काम का नहीं है तथा हमारी चेष्टाएँ व्यर्थ हैं, तभी हम शरणागत होकर अवरोहवाद को ग्रहण कर सकेंगे । जब हमारे हृदय में भगवान के आश्रय की महिमा उदित होती है, तभी शरणागति या अवरोहवाद हृदय में उदित होता है । अतः जो जहाँ पर है, वहीं पर रहकर साधु (कृष्णभक्तों के) मुखद्वार से अवतीर्ण वैकुण्ठवार्ता (हरिकथा) को श्रवण करना चाहिए । तभी सभी समस्याओं का समाधान हो सकेगा तथा भगवान के प्रति निर्भरता आ जायेगी ।
श्रीलप्रभुपाद
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विषय-विमूढ़ कपटी-व्यक्ति ही श्रीहरि सेवा के उपकरणों को चालाकी से भोगने की चेष्टा करेंगे
श्रीचैतन्य गौड़ीय मठादि, केवल मात्र भक्ति के अनुकूल अनुशीलन के स्थान ही नहीं बल्कि भक्ति-समृद्धि और विस्तार के स्थान भी हैं। ये मठ-मन्दिरादि अशान्तचित्त, त्रितापदग्ध, साँसारिक विविध ज्वालाओं से जर्जरित व्यक्तियों की अशान्ति को दूर करने, ज्वालाओं को बुझााने तथा सुख की खोज व वास्तविक शान्ति प्राप्ति के आश्रय-स्थल हैं। इसलिये इस प्रकार के मठ-मन्दिरादि की उपयोगिता हर समय और सब स्थानों पर स्वीकृत है। किन्तु जो सब धूर्त व्यक्ति मठ-मन्दिरादि के वास्तविक उद्देश्य को जानने के पश्चात् भी इन्हें अपना भोगागार (अर्थात् अपनी दुनियावी सुख सुविधाओं के स्थान) के रूप में मानते हैं एवं इसे अपने जागतिक इन्द्रियसुख के लिये विषय रूप में प्रयोग करते हैं उनके लिये तो मठ-मन्दिरादि पतन और बन्धन के स्थान ही सिद्ध होंगे।
विषय-विमूढ़ कपटी-व्यक्ति ही श्रीहरि सेवा के उपकरणों को चालाकी से भोगने की चेष्टा करेंगे तथा छलधर्म की अवतारणा करने के कारण स्वयं ही मठ-मन्दिरादि की वास्तविक उपयोगिता से वञ्चित रह जायेंगे। सज्जनों का अथवा सेवा करने के इच्छुक एवं श्रीकृष्ण का अन्वेषण करने वाले साधकों का कभी अमंगल नहीं होता । भक्त-वत्सल श्रीहरि अपना भजन करने वाले साधकों को नाना प्रकार से सतमार्ग का प्रदर्शन करते हुये उन्हें अपने चरणकमलों के मधु पान करने का सुनिश्चित सुयोग प्रदान करते रहते हैं। धूर्त और पाखण्डी व्यक्ति कभी-कभी कहीं पर मठ-मन्दिरादि का अपव्यवहार कर सकते हैं, इस आशंका से यदि हम वास्तविक मंगल प्रदान करने वाले, सर्वजनहित करने वाले प्रतिष्ठान से अलग रहेंगे तो इससे मठ-मन्दिर की कोई हानि नहीं होगी, केवल हम जैसे अज्ञानी व्यक्ति ही उनके सुयोग की सुविधा से वन्चित हो जायेंगे। वर्तमान विश्व में जबकि मनुष्य की जड़-विषयों में लोलुपता सीमाहीन अवस्था में पहुँच गयी है, शास्त्र चर्चा में अति प्रबल उदासीनता दिखाई देती है, नीति पद दलित होती नज़र आती है, परस्पर एक दूसरे की मर्यादा हर समय ही उल्लंघित हो रही है एवं हिंसा आदि अहितकर कार्यों में लोग जिस प्रकार से प्रमत्त हो रहे हैं, ऐसे समय में सर्वजनहितकर, सज्जनों के आश्रय स्थल व शुद्ध भक्ति के अनुकूल अनुशीलन के स्थान, मठ-मन्दिरादि की उपयोगिता कुछ अधिक ही महसूस हो रही है।
श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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