मुख्य और गौण रूप से नाम दो प्रकार के हैं
मुख्य ओ गौण भेदे कृष्णनाम द्विप्रकार।
मुख्य नामाश्रये जीव पाय सर्वसार ।।
चिह्नीला आश्रय करि’ यत कृष्ण – नाम ।
सेइ सेइ मुख्य नाम सर्वगुणधाम ।।
मुख्य और गौण भेद से श्रीकृष्ण के नाम भी दो प्रकार के हैं। मुख्य नाम के आश्रय से ही जीव सभी वस्तुओं को प्राप्त करता है। भगवान की चिन्मय लीलाओं का आश्रय करके जितने भी श्रीकृष्ण के नाम हैं, सभी भगवान के मुख्य नाम हैं तथा ये नाम ही तमाम गुणों की खान हैं।
मुख्य नाम
गोविन्द गोपाल राम श्रीनन्दनन्दन ।
राधानाथ हरि यशोमती प्राणधन ।।
मदनमोहन श्यामसुन्दर माधव ।
गोपीनाथ वजगोप राखाल यादव ।।
एइ रूप नित्यलीला – प्रकाशक नाम।
ए सब कीर्त्तने जीव पाय कृष्णधाम ।।
गोविन्द, गोपाल, राम, श्रीनन्दनन्दन, राधानाथ, हरि, यशोमति -प्राणधन, मदनमोहन, श्यामसुन्दर, माधव, गोपीनाथ, वृजगोप, राखाल तथा यादव यह सब नाम नित्यलीला के प्रकाशक हैं। इनके कीर्तन से जीव श्रीकृष्ण के धाम को प्राप्त करता है।
गौण नाम और उनके लक्षण
जड़ा प्रकृतिर परिचये नाम यत।
प्रकृतिर गुणे गौण वेदेर सम्मत ।।
सृष्टिकर्त्ता परमात्मा ब्रह्म स्थितिकर ।
जगत्संहर्त्ता पाता – यज्ञेश्वर हर ।।
वेदों के अनुसार जड़ प्रकृति के परिचय और गुणों से सम्बन्धित जितने भी भगवान के नाम हैं, उनको गौण नाम कहते हैं। जैसे – सृष्टिकर्ता, परमात्मा, ब्रह्म, स्थितिकर, जगत संहारकर्ता, पालनकर्ता तथा यज्ञेश्वर श्रीहरि आदि।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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चैत्त्यगुरु
भगवान् प्रत्येक जीव के हृदय में चैत्त्यगुरु के रूप में अन्तर्यामीरूप में अवस्थान करते हुए जीव की सत्- असत् वृत्तियों को नियमित करते हैं, ऐसे प्रयोजक कर्त्ता के रूप में चैत्त्यगुरु परिलक्षित होते हैं। चैत्त्यगुरु महान्त गुरु का निर्देश करते हैं। इसके अतिरिक्त महान्तगुरु के सेवक – सम्प्रदाय वर्मप्रदर्शक गुरु का कार्य करते हैं।
शास्त्रकारी, शास्त्रव्याख्याकारी, शास्त्रशासनानुमोदित अनुष्ठानकारी व्यक्ति अनर्थयुक्त, अनभिज्ञ एवं बालिशों के चञ्चल चित्त को सुष्ठुगति प्रदान करते हैं। ऐसे शिक्षागुरु दिव्यज्ञानप्र दाता – गुरु (दीक्षागुरु) की प्राप्ति से पूर्व सहायता करते हैं। इसलिए उन्हें वर्त्म या पथप्रदर्शकगुरु कहते हैं। चैतन्यगुरु की कृपा के बिना वर्त्म प्रदर्शक गुरु, दीक्षागुरु तथा शिक्षागुरुवर्ग की चरणसेवा प्राप्त करने की योग्यता प्राप्त नहीं हो सकती। कृष्णप्रसादज सुकुति अर्थात् कृष्ण की कृपा नहीं होने तक जीव चैत्त्यगुरु की निष्कपट कृपा प्राप्त नहीं कर सकते। जीवों के हृदय में धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की कामना प्रबल होने पर वे भक्तिप्रार्थी नहीं हो सकते। भाग्यक्रम में भगवान् के चरणों में आश्रय ग्रहण करने की इच्छा होने पर चैत्त्यगुरु कृपाकर दीक्षागुरु तथा शिक्षागुरु के प्रति विश्वास प्राप्त करने के लिए कृपा प्रदान करते हैं।
श्रीलप्रभुपाद
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युक्त वैराग्य ही भक्ति का सहायक है
श्रीभगवद-प्रेम की प्राप्ति के लिये जो मठ का आश्रय लेते हैं वे त्याग या भोग की कसरत में अपने मूल्यवान समय और शक्ति का अपव्यय नहीं करते। वे तो श्रीभगवद् प्रीति के अनुकूल और प्रतिकूल को समझकर शास्त्र और महाजनों के द्वारा बताये गये रास्ते के अनुसार विषयों को ग्रहण करते हैं व त्याग करते हैं। वास्तविकता भी यही है कि युक्त वैराग्य ही भक्ति का सहायक है। केवल चिन्मात्र बोध या विषयों में विरक्ति ही भक्ति का हेतु नहीं है। शुद्ध-भक्त का संग ही भक्ति का हेतु एवं पोषक है। भक्ति-साधना करने वाले जिस किसी भी वर्ण या आश्रम में रहकर उस-उस वर्ण व आश्रम के अभिमान को छोड़कर शुद्ध भक्तों के संग के द्वारा भक्ति को पुष्ट करते हुए धीरे-धीरे श्रीभगवद्-प्रेमानन्द को प्राप्त कर सकते हैं। निष्कपट सेवा ही साधुसंग तथा श्रेष्ठसंग की प्राप्ति का अचूक उपाय है।
श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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