हरिनाम ही सभी का मूल

एइ चारि परिचय – मध्ये नाम ताँ ‘र।
सकलेर आदि से प्रतीति सबाकार ।।

अतएव नाम मात्र वैष्णवेर धर्म।
नामे प्रस्फुटित हय रूप, गुण, कर्म ।।

कृष्णेर समय लीला नामे विद्यमान।
नामे से परम तत्त्व तोमार विधान ।।

भगवान के नाम, रूप, गुण व लीला इन चार परिचयों के बीच में उनका नाम सभी का आदि है अर्थात् मूल है। इसलिए हरिनाम करना ही वैष्णवों का एकमात्र धर्म है। हरिनाम करते रहने से उसके अन्दर से ही उनके रूप, गुण और लीला प्रकाशित होती है। श्रीकृष्ण की समस्त लीलाएँ नाम में ही विद्यमान हैं। श्रीहरिदास ठाकुर जी श्रीचैतन्य महाप्रभु को कहते हैं कि हे गौर हरि! आपका ही ये विधान है कि हरिनाम ही सर्वश्रेष्ठ तत्त्व है।

वैष्णव और वैष्णव-प्राय में भेद

सेइ नाम बद्ध जीव श्रद्धा सहकारे।
शुद्ध रूपे लइले वैष्णव बलि ता रे ।।

नामाभास या रे हय, से वैष्णव – प्राय ।
कृष्णकृपा-बले क्रमे शुद्ध भाव पाय ।।

भगवान के उसी सर्वश्रेष्ठ नाम को जो बद्धजीव जब श्रद्धा एवं शुद्ध रूप से करता है तो उसे वैष्णव कहा जाता है। परन्तु जिसका नामाभास हुआ करता है, उस को वैष्णव- प्रायः कहा जाता है। इस प्रकार का वैष्णव – प्रायः व्यक्ति हरिनाम करते-करते धीरे-धीरे शुद्ध वैष्णव बनकर शुद्ध – भाव लाभ करता है।

इस मायिक जगत में कृष्णनाम और जीव दोनों चिन्मय वस्तु हैं

नाम – सम वस्तु नाइ ए भव संसारे।
नाम से परम धन कृष्णेर भण्डारे ।।

जीव निजे चिद्व्यापार, कृष्णनाम आर।
आर सब प्रापन्चिक जगत् संसार।।

श्रीकृष्णनाम के बराबर इस संसार में कोई वस्तु नहीं है। श्रीकृष्ण जी के भंडार में हरिनाम ही परम धन है। इस संसार में एक तो जीव स्वयं चिन्मय है और दूसरा श्रीकृष्णनाम भी चिन्मय वस्तु है तथा बाकी सारा संसार ही मायिक जगत है।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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शिष्यस्तेहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्

सर्वप्रथम शरणागत नहीं होने पर सत्य वस्तु की उपलब्धि नहीं हो सकती । जबतक हम शरणागत नहीं होंगे, तबतक हम धर्मसम्मूढ़चित्त तथा संशयात्मा होकर विनाश के पथ पर ही दौड़ते रहेंगे । इसीलिए अर्जुन कृष्ण से कह रहे हैं – शिष्यस्तेहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।

जिनके चरणों हम शरणागत होंगे, वे यदि मर्त्य व्यक्ति हुए, तो वे पारमार्थिक गुरु कहलाने योग्य नहीं हैं । मर्त्यजीव अर्थात् जिसे हम माप सकते हैं, ऐसे अधीन भोग्यवस्तु पारमार्थिक गुरु नहीं हैं। उसके चरणों में शरणागत होने पर हम कभी भी वास्तव सत्य के निकट नहीं जा सकते । श्रीगुरुदेव कृष्ण की शक्ति – कृष्णतत्त्ववित् – कृष्ण से अभिन्न तथ कृष्ण के ही द्वितीय स्वरूप या प्रकाश हैं ।

श्रीलप्रभुपाद
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अनन्य कृष्ण-भक्ति ही मठ का प्राण है

श्रीकृष्ण ही जिनके साध्य और साधन हैं – ऐसे भक्त ही श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के सेवक हैं। इस मठ के सेवक विश्व के सब जीवों का स्वार्थ श्रीकृष्ण के चरणों में ही समझते हैं। इसलिये कोई कपटता करे तो कहा नहीं जा सकता अन्यथा वे अन्य-अन्य मनुष्यों को श्रीकृष्णेतर विषयों से सम्बन्धित उपदेश कैसे प्रदान कर सकते हैं? श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ, श्रीचैतन्य देव द्वारा आचरित और प्रचारित पथ में तथा श्रीमद्भागवत् और पाँचरात्रिक-मार्ग में नरमात्र का वास्तविक कल्याण सुनिश्चित समझता है इसलिये न तो वह स्वयं किसी अलग अर्थात समय नष्ट करने वाले रास्ते पर चलता है व न ही किसी व्यक्ति को उस पर चलने का उपदेश देता है। संक्षेप में अनन्य कृष्ण-भक्ति ही इस मठ का प्राण है। ऐसे मठों के न होने से हमारे समान कृष्ण-भक्ति से रहित चेष्टाओं में रत व्यक्तियों को श्रीकृष्णोन्मुख होने एवं वास्तविक सुखास्वादन के रास्ते पर चलने का सुयोग प्राप्त ही नहीं होता।

श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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वेदों से भी अधिक वैशिष्ट्यपूर्ण है श्रीमद्भागवत

श्रीमद्भागवत को वेद-कल्पतरू का परिपक्व फल कहा जाता है- “निगमकल्पतरो-र्गलितं फलम्।” वृक्ष के रस से पुष्ट होकर ही वृक्ष का फल स्वादिष्ट होता है – किन्तु फल में जो सुमधुर रस का आस्वादन होता है, किन्तु वह रस किन्तु वृक्ष में नहीं देखा जाता है। इसीलिए, भले ही श्रीमद्भागवत, वेदों से उत्पन्न हुई है, परन्तु वेदों की अपेक्षा श्रीमद्भागवत का वैशिष्ट्य बहुत ज़्यादा है। वेदों में कहा गया है- “रसो वै सः” एवं श्रीमद्भागवत में उसी रसमय मूर्ति का ही नाम-रूप-गुण-परिकर-लीला की अशेष रूप और विशेष रूप से वर्णन किया गया है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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गुरु-वैष्णवों की आज्ञा-लंघन करने वाले का कभी मंगल नहीं होता

सेवक जब गुरुवैष्णवों की आज्ञा का अविचारपूर्वक पालन करने में अक्षम और पराङ्‌मुख (विमुख) है, तब उसके मंगल की सम्भावना कहाँ है? “गुरुर सेवक हय मान्य आपनार” (गुरु के सेवक मेरे सम्माननीय हैं)- यह विचार हृदय में धारण न करने पर मठवास और सेवा नहीं हो सकती। ऐसे व्यक्ति का प्राकृत संसार अवश्यम्भावी है। जो लोग परछिद्रान्वेषी (दूसरों में दोष ढूँढने वाले) और परचर्चाकारी हैं, उनका पतन अतिशीघ्र हो जाता है। उनका इह और पर (इहलोक और परलोक)- दोनों ही विनष्ट हो जाते हैं।

श्रील भक्ति वेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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भगवद्‌गीता को भक्तिभाव से ग्रहण करना चाहिए। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह कृष्ण के तुल्य है, न ही यह सोचना चाहिए कि कृष्ण सामान्य पुरुष हैं या कि एक महान व्यक्तित्व हैं। भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् पुरुषोत्तम भगवान् हैं। अतएव भगवद्‌गीता के कथनानुसार या भगवद्‌गीता को समझने का प्रयत्न करने वाले अर्जुन के कथनानुसार हमें सिद्धान्त रूप में कम से कम इतना तो स्वीकार कर लेना चाहिए कि श्रीकृष्ण भगवान् हैं, और उसी विनीत भाव से हम भगवद्गीता को समझ सकते हैं। जब तक कोई भगवद्‌गीता का पाठ विनम्र भाव से नहीं करता है, तब तक उसे समझ पाना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि यह एक महान रहस्य है।
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कृष्ण भक्त-निष्काम, अतएव ‘शान्त’ ।
भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी-सकली ‘अशान्त’ ।।

(चै० च० म० १९-१४९)

निष्काम शुद्धभक्तगण ही साधु, शान्त एवं सुखी हैं । किन्तु कर्मी, ज्ञानी, योगी इत्यादि सकामी होने से अशान्त चञ्चल एवं दुःखी रहते हैं।

जिनकी कृपा, संग और सेवा द्वारा जीव का नित्य मंगल होता है अर्थात् भगवान् में मति, भगवान् में भक्ति, भगवत्-कथा में रुचि, ‘मैं भगवान् का नित्य सेवक हूँ एवं भगवान् मेरे नित्य प्रभु हैं, ऐसा दिव्यज्ञान लाभ होता है, यथार्थ में वही साधु हैं ।

जिनके संग के प्रभाव से गुरुनिष्ठा और नामनिष्ठा बढ़ती है एवं हरिकथा और सेवा-निष्ठा में रुचि होती है, चित्त भगवान् के प्रति आकृष्ट होता है, जिनकी ओजस्वी वाणी संसार के विषयों में लिप्त चित्त को हठपूर्वक श्रीहरिपादपद्मों में ले जाती है, जिनके संग से नाना प्रकार की दुश्चिन्ताओं से ग्रस्त व्यक्ति निश्चिन्त होते हैं, भीरु व्यक्ति निर्भीक होते हैं, दुःखी व्यक्ति सुखी होते हैं, दुर्बल सबल होते हैं, निराश व्यक्ति आशा पा लेते हैं, ऐसे शुद्ध भगवद्भक्त ही सच्चे साधु हैं।

भगवद् भक्ति केवल साधुसंग के द्वारा ही लाभ होती है । भक्ति लाभ का अन्य कोई उपाय नहीं है।