भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ भी नित्य हैं

सेइ गुण – तरंगेते लीलार विस्तार।
गोलोके वैकुण्ठ व्रज सब चिदाकार ।।

नामाचार्य हरिदास ठाकुर जी भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी को कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण के गुण रूपी सागर की तरंगों से ही उनकी लीलाओं का विस्तार होता है। विशेष ध्यान देने योग्य बात ये है कि गोलोक में, वैकुण्ठ में अथवा व्रज में होने वाली उनकी सभी लीलायें चिन्मय हैं।

चिद् वस्तु के नाम, रूप, गुण, लीला वस्तु से अभिन्न

नाम – रूप – गुण – लीला अभिन्न उदय।
अचित् सम्पर्क बद्ध जीवे भिन्न हय ।।

भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला आदि वस्तुएँ भगवान से पृथक नहीं हैं। भगवान श्रीकृष्णके नाम, रूप, गुण व लीला हमेशा ही श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं तथा इस जगत में भी वे उनसे अभिन्न रहकर ही उदित होती हैं। जबकि जीव जब माया के संसार में फंस जाता है तो उसका नाम, रूप, गुण आदि सब उससे भिन्न होता है।

शुद्ध जीवे नाम, रूप, गुण, क्रिया एक।
जड़ाश्रित देहे भेद एइ से विवेक ।।

कृष्णे नाहि जड़ – गन्ध अतएव ताँय ।
नाम – रूप – गुण लीला एकतत्त्व भाय ।।

माया के संस्पर्श से बद्धजीव के नाम, रूप, गुण व क्रिया- ये सब जीव से अलग होते हैं। जबकि शुद्ध जीव का नाम – रूप – गुण व क्रिया ये सब एक ही तत्त्व हैं। जीव का दुनियावी नाम व दुनियावी रूप इत्यादि जीवात्मा से अलग होता है। माया से बनी देह का अप्राकृत देही से भिन्न ज्ञान होना ही विवेक है, चूँकि श्रीकृष्ण में माया की गन्ध भी नहीं है, इसलिए श्रीकृष्ण के नाम, रूप, गुण व लीला एक ही तत्त्व होते हैं।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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श्रीमद्भागवत में वर्णित प्रणाली के बिना कभी भी त्रितापों का विनाश नहीं हो सकता । इन तापों की अनन्त विचित्रताएँ हैं, हम कभी भी ऐसे कल्पित उपायों के द्वारा अनन्त तापों में से एक को भी जड़ से नाश नहीं कर सकते । भगव‌द्विस्मृतिरूपी आवरणात्मिका तथा विक्षेपात्मिका अविद्या ही हमारे समस्त तापों का मूल कारण है । उस कारण के नाश हुए बिना ताप वैचित्र्यरूप कार्य का भी नाश नहीं होगा । भगवान की सेवा का प्रचार किये बिना कभी भी देश का दुःख नष्ट नहीं होगा। भगवान की सेवा की कथाओं का प्रचार होने पर ही समस्त देशों के समस्त लोगों का सार्वकालिक कल्याण होगा।

श्रीलप्रभुपाद
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सब स्तर के प्राणी दुःख दूर करने और सुख प्राप्ति के लिये ही नाना प्रकार के कानूनों की व्यवस्था, अच्छे या बुरे तरीके से धनोपार्जन, अनेक कष्ट से विद्यार्जन व समाज-सुधारादि के कार्यों में मनोनिवेश करते हैं। वह सुख जिसकी तमन्ना प्रत्येक व्यक्ति कर रहा है इसका वास्तिवक स्वरूप क्या है? इस को जानने की इच्छा होना स्वभाविक ही है। सुख की कोई अपनी वास्तविक सत्ता है भी या वह इन्द्रियों के स्पंदन से जनित एक प्रकार का अनुभव मात्र है।

इसके उत्तर में देवर्षि नारद कहते हैं कि आत्मा का रूप ही सुख स्वरूप है? आत्मा शब्द आत्मा और परमात्मा दोनों को समझाता है; आत्मा के कारण स्वरूप ही परमात्मा या भगवान हैं, इसलिए वे ही मूल सुख-स्वरूप हैं। श्रीभगवान् ही अद्वय ज्ञान तत्त्व हैं। अणुसुख रूप आत्मा ही विभुसुख स्वरूप श्रीभगवान् का अन्वेषण करती है और आस्वादन करती है। अणु-आत्मा और विभु-आत्मा दोनों ही व्यक्ति हैं। इसलिये सुख का व्यक्तित्त्व है। हाँ, ये व्यक्तित्व प्राकृत नहीं है, बल्कि चिन्मय एवं अप्राकृत है। अप्राकृत होने के कारण इसे प्राकृत इन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। जो सुख प्राकृत इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सकता है, वह सुख चिन्मय-सुख की छाया मात्र है। इसलिये जो लोग वास्तविक सुख प्रार्थी हैं अर्थात जो लोग वास्तव सुख चाहते हैं वे ये जान लेने के पश्चात कि सुख की छाया रूपी माया में सुख का आस्वादन सम्भव नहीं है, अप्राकृत निखिल सुख-स्वरूप श्रीकृष्ण का अन्वेषण करते हैं। श्रीकृष्ण का अन्वेषण करना ही उनका साधन है, यही नहीं तमाम सुख-प्रार्थी लोगों को भी वे श्रीकृष्ण का अन्वेषण करने का ही परामर्श देते हैं।

श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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ज्ञान और कर्म, भक्ति के अधीन, किन्तु भक्ति स्वतन्त्र

“येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तिमानिनः”, “नैष्कर्म्यप्यच्युतभाव-वर्जितं”, “ज्ञानेप्रयासमुदपास्य” इत्यादि जैसे श्रीमद्भागवत के श्लोकों में दिखाया गया है कि, भगवद्-भक्ति के बिना, केवल ज्ञान या केवल कर्म से जीवों का किसी प्रकार का मंगल नहीं होता है। भक्ति की सहायता से जो ज्ञान और कर्म का अनुष्ठान किया जाता है, केवल उसी के द्वारा ही उस ज्ञान या उस कर्म का उद्दिष्ट (आकांक्षित) फल जीवों को प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं होता है। लेकिन ज्ञान या कर्म की सहायता के बिना ही भक्ति पूर्ण फल प्रदान करती है, इसमें कोई संदेह नहीं है- “भक्त्याऽमेकया ग्राह्यः”; ‘एकया भक्त्या’ अर्थात् अमिश्रित भक्ति के द्वारा ही मात्र भगवान् को प्राप्त किया जा सकता है। इसी भक्ति को शास्त्रों में कहा गया है – ‘केवला भक्ति’, ‘शुद्धा भक्ति’, ‘आत्मधर्म’ इत्यादि। इसीलिए सभी शास्त्र भक्ति का ही अधिक माहात्म्य कीर्तन करते हैं। भक्ति के द्वारा ही भगवान का दर्शन सम्भव है, नहीं तो खण्ड-दर्शन अवश्यम्भावी है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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मनुष्य जिस स्थान पर निर्भय एवं संकोच रहित होकर श्रवण-कीर्तनादि, दर्शन-सेवादि का सुयोग-सौभाग्य प्राप्त करता है, वैसा परिवेश ही सदैव उसका काम्य होता है।

श्रील भक्ति वेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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जो स्पष्ट रूप से पतित है, वह केवल स्वयं का ही अकल्याण करता है, परन्तु ढोंगी बगला-तपस्वी तो पापों की मूर्ति है, वह स्वयं तो गिरता ही है, औरों को भी ले डूबता है।

श्रील भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज
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