श्रीकृष्ण का रूप नित्य

कृष्णरूप कृष्ण हैते सर्वदा अभेद।
नाम रूप एक वस्तु नाहिक प्रभेद ।।

श्रीनाम स्मरिले रूप आइसे सङ्गे सङ्गे।
रूप नाम भिन्न नय, नाचे नाना रङ्गे ।।

श्रीकृष्ण का रूप श्रीकृष्ण से सर्वदा अभेद है। उनका नाम और उनका रूप एक ही वस्तु हैं, इसमें कोई भेद नहीं है। श्रीनाम का स्मरण करने के साथ – साथ ही उनका रूप प्रकट होता है। श्रीकृष्ण के नाम और श्रीकृष्ण के रूप सर्वदा अभेद होते हैं तथा साधक के हृदय में भगवान के ये नाम व रूप आदि विभिन्न प्रकार से नृत्य करते हैं।

श्रीकृष्ण के गुण भी नित्य हैं

कृष्ण गुण चतुःषष्टि अनन्त अपार ।
याँर निज अंशरूपे सब अवतार ।।

याँर गुण अंशे ब्रह्मा – शिवादि ईश्वर ।
याँर गुणे नारायण षष्टि – गुणेश्वर ।।

सेइ सब नित्यगुणे नित्य नाम ताँर।
अनन्त संख्याय व्याप्त वैकुण्ठ व्यापार ।।

श्रीकृष्ण के सभी गुण नित्य हैं। श्रीकृष्ण के गुण अनन्त व अपार होने पर भी उनके मुख्य 64 गुण हैं। जिनके अपने अंश से तमाम अवतार प्रकट हुये हैं, जिनके गुण अंश से ब्रह्मा जी व शिवादि ईश्वर प्रकट हुए हैं, जिनके गुणों के कारण ही श्रीमन् नारायण 60 गुणों के मालिक हैं- ऐसे भगवान श्रीकृष्ण के अपने अनन्त नित्य गुण व अनन्त नित्य नाम हैं तथा ये सभी दुनियावी नहीं, बल्कि माया के गुणों से रहित वैकुण्ठीय हैं।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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बहिर्मुख व्यक्ति की श्रद्धा, भक्ति तथा रुचि-सभी कुछ बहिर्मुखी होती है । मनुष्य ऐसी श्रद्धा, भक्ति तथा रुचि के माध्यम से कभी भी सत्य वस्तु को नहीं पा सकता । जब वास्तव वस्तु स्वयं ही कृपाकर अवतीर्ण होते हैं, तभी वे स्वयं ही अपने को जना देते हैं । किस वस्तु को प्राप्त करना चाहिए, अकपट सेवोन्मुख व्यक्ति को चैत्यगुरु कृपापूर्वक जना देते हैं । विशुद्ध आम्नायधारा के माध्यम से ही वास्तव सत्य वस्तु प्रवाहित होते हैं।

श्रीलप्रभुपाद
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संग ही मनुष्यों को सुपथ अथवा कुपथ की ओर प्रेरित करता है। संग से ही मनुष्यों की वृत्ति उदित व विकसित होती है। साधु-संग को छोड़कर रुचि परिवर्तन करने का व स्वभाव संगठन करने का कोई और सहज एवं सुनिश्चित रास्ता नहीं है। इसीलिये आर्य-ऋषिगण व आचार्यगण प्राचीन भारत के विभिन्न स्थानों पर आश्रम व मठ-मन्दिर आदि स्थापित कर गये हैं। इन स्थानों पर साधु-संग, शास्त्र-आलोचना व जीवन को नियन्त्रित करते हुए परतत्त्व, अखिल रसामृत मूर्ति, श्रीकृष्ण की सेवा एवं विश्व के सब प्राणियों के सुहित के लिये आत्मनियोग की सुव्यवस्था है।

श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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गुरु-वैष्णवों का पारमार्थिक ऋण कभी भी शोध नहीं जा सकता है। उनके प्रति ऋणी रहने पर अर्थात् सम्बन्ध स्थापित होने पर गोलोक की प्राप्ति अवश्यम्भावी है।

श्रील भक्ति वेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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सद्गुरु शब्द का अर्थ

सद्गुरु के चरणों का आश्रय लेने पर इन तत्त्वों की जानकारी मिलती है। लेकिन ‘सद्गुरु’ शब्द से क्या समझा जाये? ‘सत्’ शब्द का अर्थ है-जो नित्य सत्ताविशिष्ट है अर्थात् नित्य नाम-रूप-गुण-लीला-परिकर आदि विशेषताओं से युक्त। इसलिए ‘सद्गुरु’ का अर्थ है-जिस गुरु में नित्य रूप, गुण इत्यादि वैशिष्ट्य विद्यमान है- जो अपनी नित्य सत्ता से युक्त होते हुए ही नित्य नाम-रूप-गुण-लीला विशेषताओं से युक्त श्रीभगवान की नित्य सेवा करते हैं और माया में आबद्ध सभी जीवों को उनके नित्य अस्तित्व और नित्य स्वभाव में प्रतिष्ठित करने का उपदेश देते हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज