नाम का स्वरूप

कृष्णनाम चिन्तामणि अनादि चिन्मय।
येइ कृष्ण, सेइ नाम – एकतत्त्व हय ।।

चैतन्य – विग्रह नाम नित्यमुक्त तत्त्व।
नाम नामी भिन्न नय, नित्य शुद्ध सत्त्व ।।

श्रीकृष्ण-नाम चिन्तामणि है, अनादि व चिन्मय है। जो श्रीकृष्ण हैं, वही श्रीहरिनाम है। श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णनाम एक ही तत्त्व है। चेतन – विग्रह श्रीहरि का नाम नित्यमुक्त तत्त्व है। हरि नाम और नामी भगवान, भिन्न नहीं हैं, दोनों ही नित्य शुद्ध तत्त्व हैं।

ए जड़ – जगते ताँ ‘र अक्षर आकार।
रसरूपे रसिकेते सत्त्व अवतार ।।

कृष्ण वस्तु हय चारिधर्म परिचित ।
नाम, रूप, गुण, कर्म अनादि विहित ।।

इस जड़ – जगत में श्रीहरि, हरिनाम के अक्षर के आकार में प्रकट हैं। रसिक – भक्तों के हृदयों में ये हरिनाम के अक्षर ही रस से भरे शुद्ध – सात्विक अवतार हैं। जैसे किसी भी वस्तु को उसके नाम, रूप, गुण व कर्मों के द्वारा जाना जाता है, ठीक उसी प्रकार यह अक्षर श्रीकृष्ण के परिचायक अवतार हैं। श्रीकृष्ण नामक वस्तु चार प्रकार से – श्रीकृष्ण के नाम, श्रीकृष्ण के रूप, श्रीकृष्ण के गुण तथा श्रीकृष्ण की लीलाओं के रूप में प्रकाशित है। परन्तु हाँ, चूँकि श्रीकृष्ण अनादि हैं, दिव्य हैं इसलिए उनके नाम, रूप, गुण व लीलायें भी अनादि व दिव्य हैं।

हरिनाम नित्य सिद्ध हैं

नित्य – वस्तु रस – रूप कृष्ण से अद्वय।
सेइ चारि परिचये वस्तु सिद्ध हय ।।

सन्धिनी शक्तिते ताँर चारि परिचय।
नित्यसिद्धरूपे ख्यात सर्वदा चिन्मय ।।

कृष्ण आकर्षये सर्व विश्वगत जन ।
सेइ नित्य धर्मगत कृष्णनाम धन ।।

भगवान श्रीकृष्ण नित्य वस्तु हैं, आनन्द स्वरूप हैं तथा उनके जैसा और दूसरा कोई नहीं है। जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि किसी भी वस्तु का परिचय उसके नाम, रूप, गुण तथा कर्म से जाना जाता है। सन्धिनी शक्ति के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण का इन चारों के रूप में दिव्य व नित्य परिचय मिलता है। भगवान के नाम, रूप व गुण आदि हमेशा से ही चिन्मय व नित्य सिद्ध रूप में प्रसिद्ध हैं। जिस प्रकार श्रीकृष्ण सारे विश्व को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, ठीक उसी प्रकार श्रीकृष्ण – नाम रूपी परम धन में भी यह आकर्षण – धर्म नित्य विराजित है।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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तर्कपन्थी

जो Challenging mood लेकर Absolute Truth पर आक्रमण करते हैं, वे ही तर्कपन्थी हैं। तर्कपन्था तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया – इस विचार का विरुद्ध पन्था है। एक पन्था है- हम वास्तव सत्यकीर्तनकारी गुरुदेव से श्रवण करेंगे तथा भगवान के उन्मुख या उनके सम्मुख होने की चेष्टा करेंगे। दूसरा पन्था है-हम अपने इन्द्रियज ज्ञान के बल से अतीन्द्रिय वास्तव सत्य को प्राप्त कर लेंगे। इनमें से प्रथम श्रौतपन्था है तथा दूसरा तर्कपन्था है । अन्वयभाव से जो गृहीत होता है, वे श्रौतपथ तथा जो व्यतिरेक भाव से गृहीत होता है, वह तर्कपथ है। पाँचों दर्शन ही तर्कपथ में प्रतिष्ठित हैं। केवलमात्र वेदान्तदर्शन ने ही श्रौतपथ ग्रहण किया है। शंकराचार्य ने लोगों को मोहित करने के लिए श्रौतपथ के नाम पर वेदान्त दर्शन में तर्कपथ की ही चर्चा की है। आध्यक्षिक ज्ञान के बढ़ जाने पर वह तर्कपथ को प्राप्त हो जाता है ।

वैष्णवलोग जितनी भी कथाएँ कहते हैं, अपने द्वारा रचित कल्पित कथाएँ नहीं कहते । वे सम्पूर्णरूप से गुरुपादपद्म को दिखा रहे हैं। अर्थात् वे गुरुमुख से श्रवण की हुई कथाओं को ही कहते हैं। गुरु दस-पाँच नहीं होते। मन्नाथः, श्रीजगन्नाथः, मद्गुरु श्रीजगद्‌गुरुः । Absolute Truth requires no challenge from any body.

श्रीलप्रभुपाद
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वस्तु के वास्तविक स्वरूप का निर्णय करने में आलस्य व उदासीनता दिखाने पर उसके प्रयोजन का निर्णय सम्भव नहीं हो सकता

“किसी वस्तु और व्यक्ति की उपयोगिता के सम्बन्ध में विचार करते समय उस व्यक्ति या वस्तु के वास्तविक स्वरूप का निर्णय करना सबसे पहले आवश्यक है। वस्तु के वास्तविक स्वरूप का निर्णय करने में आलस्य व उदासीनता दिखाने पर उसके प्रयोजन का निर्णय सम्भव नहीं हो सकता। केवल बाहर की आकृति की आवश्यकता के पूरा होने से पूरी समस्या का समाधान नहीं होता। आर्य ऋषियों ने इसके निमित्त ही वस्तु की वास्तविक और बाहरी आकृति, दोनों के सम्बन्ध में विचार करके मनुष्य के प्रयोजन आदि के सम्बन्ध में शास्त्र आदि में सुयुक्ति पूर्ण उपदेश किये हैं। यद्यपि आज के समय में इस विश्व में बहुत से मनीषी और वैज्ञानिक हैं, परन्तु वे अधिकतर मनुष्यों की मात्र तात्कालिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनेक तरीके बताते रहते हैं। स्थायी समस्याओं के समाधान के लिए खोजपूर्ण उपदेश बहुत कम व्यक्तियों से मिलते हैं। अधिकांश उपदेशक लाभ, पूजा, प्रतिष्ठा आदि के भूखे होने के कारण मनुष्य के मुख्य प्रयोजन के सम्बन्ध में चुप रहते हैं। स्थूल बुद्धि वाले मनुष्धों को स्थूल वस्तु प्राप्त होने पर आनन्द से नृत्य करते देखकर उपदेशक वर्ग भी उनके प्रयोजन आदि के सम्बन्ध में उसी प्रकार की शिक्षा देते हैं।

श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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श्रील प्रभुपाद द्वारा प्रदत्त बृहद् मृदङ्ग की सेवा

मुक्त महापुरुषों के द्वारा की जाने वाली सेवा जैसे कि श्रील माधवेन्द्र पुरी के द्वारा श्रीगोपाल, श्रील रूप गोस्वामी के द्वारा श्रीगोविन्द, श्रील सनातन गोस्वामी के द्वारा श्रीमदन-मोहन, श्रील लोकनाथ गोस्वामी के द्वारा श्रीराधा-विनोद, श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी के द्वारा श्रीगिरिराज-शिला, श्रील गोपाल भट्ट गोस्वामी के द्वारा श्रीराधा-रमण, श्रील कविराज गोस्वामी के द्वारा श्रीवृन्दावन-चन्द्र, श्रील नरोत्तम दास ठाकुर के द्वारा श्रीमन्महाप्रभु, श्रील श्यामानन्द प्रभु के द्वारा श्रीश्यामसुन्दर, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के द्वारा श्रीराधा-गोकुलानन्द, श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभु के द्वारा श्रीराधा-विजय आदि विग्रहों की सेवा तथा बद्ध जीव के द्वारा किये जाने वाला अर्चन एक नहीं है, उसमें पृथ्वी-आकाश का अन्तर है।

मुक्त पुरुष नाम, विग्रह, स्वरूप- तीनों को अभिन्न तथा चिदानन्द स्वरूप अनुभव करके उनकी भावमयी सेवा करने में समर्थ हैं तथा बद्ध जीव उस अनुभूति के अभाव में शास्त्र-वर्णित विधि-निषेधों के अनुरूप ही उनका अर्चन करने के लिये बाध्य हैं।

श्रील पुरी गोस्वामी महाराज का जीवन वैराग्यमय था, उन्होंने श्रील प्रभुपाद द्वारा प्रदत्त बृहद् मृदङ्ग की सेवा को ही सदैव अपने जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य रखा तथा अन्य किसी भी प्रकार की सेवा के उपस्थित होने अथवा अत्यावश्यक होने पर उसे निष्कपट रूप से कर तो दिया किन्तु उसमें कभी भी उस प्रकार से आसक्त नहीं हुए जैसा कि वे भक्ति-ग्रन्थों का प्रकाशन कर श्रील प्रभुपाद की सेवा करने में आसक्त थे।

श्रील पुरी गोस्वामी महाराज ने धन, जन, लौकिक प्रतिष्ठा की प्राप्ति, मठ मन्दिर आदि के लिये भूमि संग्रह करने, शिष्य स्वीकार करने अथवा अन्य उपाय के द्वारा कुछ भी अर्जित करने के लिये अपनी ऊर्जा को कदापि नियुक्त नहीं किया। वे पुनः-पुनः कहते थे, “जो व्यक्ति जिस ओर अपनी ऊर्जा-शक्ति को लगाता है, वह उस ओर ही चला जाता है।”

श्रील भक्ति विज्ञान भारती गोस्वामी महाराज जी द्वारा सञ्चित
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