श्रीहरिदास की नाम-आचार्यता

नामतत्त्व सर्वसार तोमार विदित ।
आचारे आचार्य तुमि, प्रचारे पण्डित ।।

बल हरिदास, नाममहिमा अपार ।
शुनिया तोमार मुखे आनन्द आमार ।।

हरिदास ! तुम जानते ही हो कि हरिनाम करना ही सभी शास्त्रों का सार है। आचरण की दृष्टि से आप तो श्रीहरिनाम के आचार्य हो और श्रीहरिनाम के प्रचार में भी तुम परम प्रवीण हो। हरिदास ! तुम अपने मुख से हरिनाम की जो अपार महिमा है, उसका वर्णन करो क्योंकि तुम्हारे मुख से श्रीहरिनाम की महिमा सुनकर मुझे बड़ा आनन्द मिलता है।

वैष्णव-लक्षण

एक नाम या’र मुखे वैष्णव से हय।
तारे गृही यत्न करि, मानिबे निश्चय ।।

जिसके मुख से एकमात्र कृष्ण-नाम का उच्चारण होता है उसे वैष्णव समझना चाहिए। गृहस्थ भक्तों को चाहिए कि वह अति यत्न के साथ इस सिद्धान्त को मानें।

वैष्णवतर के लक्षण

निरन्तर या’र मुखे शुनि कृष्णनाम ।
सेइ से वैष्णवतर सर्वगुणधाम ।।

निरन्तर जिसके मुख से कृष्ण-नाम सुनाई पड़ता है अर्थात् जो निरन्तर श्रीकृष्ण – नाम करता रहता है- वह श्रेष्ठ वैष्णव है। ऐसा वैष्णव सभी गुणों की खान होता है।

वैष्णवतम-लक्षण

वैष्णव उत्तम सेइ याहारे देखिले ।
कृष्णनाम आसे मुखे कृष्णभक्ति मिले ।।

हेन कृष्णनाम जीव किरूपे करिबे ।
ताहार विधान तुमि आमारे बलिबे ।।

कर युड़ि’ हरिदास बलेन वचन।
प्रेमे गद – गद स्वर सजल नयन ।।

जिस वैष्णव के दर्शनमात्र से ही जीवों के मुख से श्रीकृष्ण – नाम उदित हो जाता हो तथा जीव को श्रीकृष्ण की भक्ति की प्राप्ति हो, वही उत्तम वैष्णव है। भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी कहते हैं कि जीव किस रूप से श्रीकृष्ण का नाम करे, इस विधान को तुम मुझे विस्तार से बतलाओ। महाप्रभु जी के यह वचन सुनकर श्रीहरिदास ठाकुर जी प्रेम में गद्गद् होकर नेत्रों में आँसु भरकर कहने लगे।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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दो पथ हैं – श्रौतपथ तथा तर्कपथ

श्रौतपथ का नाम अवरोह पन्था है तथा तर्कपन्थ का नाम आरोह पन्था है। श्रौतपथ में कर्ण प्रदान को अधोक्षज सेवा तथा तर्कपथ में इन्द्रिय परिचालना को आध्यक्षिकता कहते हैं । जो अक्ष अर्थात् इन्द्रियों का अवलम्बन किये हुए हैं, जो जागतिक या इन्द्रियों ज्ञान के द्वारा भ्रमित होने पर भी आत्मश्लाघा (अपनी प्रशंसा) की पताका उठा रहे हैं, जो उनके इन्द्रियतर्पण – परता की भूमिका में युक्तिजाल बनाते हैं, वे ही आध्यक्षिक हैं । आरोह प्रणाली ही आध्यक्षिकता है। सूर्य से आयी हुई किरणें जब हमारे नेत्र – गोलकों में पड़ती हैं, तभी हम सूर्य की किरणों की सहायता से सूर्य का दर्शन करते हैं। यह अवरोह प्रणाली में सूर्यदर्शन है। परन्तु जब सूर्य की किरणों की सहायता परित्यागकर स्वाधीनरूप से कृत्रिम आलोक के द्वारा सूर्य दर्शन की चेष्टा करते हैं, तो उस समय सूर्यदर्शन नहीं होता। यह शेषोक्त प्रणाली ही आध्यक्षिकता या आरोहवाद है। आध्यक्षिकता ही रावण के द्वारा अभिनन्दित प्रणाली है । आध्यक्षिकता में बहिर्मुख लोगों का इन्द्रियतर्पण या समर्थन है । आध्यक्षिक लोग हेतुवादी या प्रच्छन्न तार्किक हैं। आध्यक्षिकता का त्यागकर श्रीकृष्ण के पादपद्मों में निष्कपट भाव से शरण ग्रहण करने पर ही हम गुरु – वैष्णवों की कृपा से कृष्णतत्त्व एवं शुद्धभक्ति की बातें समझ सकते हैं।

श्रीलप्रभुपाद
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आत्मा द्वारा ही आत्मा का तोषण, पोषण होता है तथा आत्मा में ही आत्मा की गति है

परमेश्वर श्रीकृष्ण की अन्तरंगा और बहिरंगा- दोनों शक्तियों के मध्यवर्ती तट पर जीव की स्थिति है, इसलिये जीव में दोनों तरफ जाने की योग्यता है। जीव चैतन्यस्वरूप होने पर भी अणु होने के कारण माया द्वारा पराभूत होने के योग्य है। अणु-चेतन जीव जब अपनी अणुस्वतन्त्रता के कारण बहिरंगा माया की ओर देखता है तब माया द्वारा मोहित होकर अपने आपको माया का भोक्ता और कर्त्ता समझता है, इसी को जड़ाहंकार या जड़ाभिमान कहते हैं। जीव के जड़ (जड़-वस्तुओं) में अभिनिवेश होने के कारण उत्पन्न जो भाव हैं उन्हें मन और इन भावों की निर्णायक शक्ति (Decisive faculty) को बुद्धि कहते हैं। जड़ीय अहंकार, बुद्धि और मन से ही जीव का सूक्ष्म शरीर तैयार हुआ है। सूक्ष्म देह की वासना के अनुसार ही क्रमशः स्थूल देह की प्राप्ति होती है – जैसे किसी व्यक्ति ने कोई कार्य करके कुछ सम्पत्ति प्राप्त की है, इसका मतलब ये नहीं कि वह सम्पत्ति ही व्यक्ति है। व्यक्ति तो उस सम्पत्ति का मालिक (Proprietor) है। Proprietor को मार कर property की रक्षा करना जैसे बुद्धिमानी नहीं है, उसी प्रकार आत्मा की जो आवश्यकता है उसको पूरा न कर देह और मन की आवश्यकताओं को ही पूरा करना बुद्धिमता नहीं है। आत्मा की जो अपनी आवश्यकता है, वही उसका वास्तविक प्रयोजन है या उसकी वास्तविक ज़रूरत है। समजातीय वस्तु के साथ समजातीय वस्तु का ही लेन-देन होता है। जैसे ये शरीर पंचमहाभूतात्मक है एवं अन्त में पंचमहाभूत ही उसकी गति हैं। उसी प्रकार आत्मा के लिये आत्मा ही आवश्यक है। आत्मा द्वारा ही आत्मा का तोषण, पोषण होता है तथा आत्मा में ही आत्मा की गति है। जो आत्मा तमाम आत्माओं की आवश्यकता है, जिस आत्मा द्वारा तमाम आत्माओं का तोषण होता है और अन्त में जिस आत्मा में तमाम आत्माओं की गति होती है, उसी आत्मा को ‘परमात्मा’ कहा जाता है।

श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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वासुदेव श्रीकृष्ण का जन्म एवं कर्म अलौकिक

श्रीमद् भगवद्गीता जिनके द्वारा प्रकाशित हुई है, कुरुक्षेत्र के उन श्रीकृष्ण को हम ‘वासुदेव’ कहते हैं। उन्होंने स्वयं ही अपने जन्म के अलौकिक होने के विषय में बतलाया है-

“जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।” – (गीता 4/9)

तात्पर्य यह है कि, – वे ‘अज’ एवं ‘अव्यय’ वस्तु हैं अर्थात् उनकी सृष्टि अर्थात् जन्म नहीं है एवं उनका विनाश भी नहीं है। तब भी वे अचिन्त्य शक्ति के द्वारा दिव्य जन्म और कर्म को स्वीकार करते हैं। जो व्यक्ति अपनी जड़-बुद्धि का आश्रय न लेकर तत्त्व-विचार का आश्रय करता है, वही जान पाता है कि भगवान् के जन्म-कर्म आदि समस्त कार्य ही दिव्य हैं। ऐसा व्यक्ति देह त्याग के बाद पुनः जन्म-ग्रहण नहीं करता। अतएव देखा जाता है, भगवान् ने ही स्वयं यहाँ बतलाया कि, ईश्वर के जन्म तत्त्व के सम्बन्ध में शुद्ध ज्ञान की महिमा क्या है। ईश्वर के ही शब्द होने के कारण यह अभ्रान्त (बिना भूल का) सत्य है- इस विषय में संशय का कोई प्रश्न ही नहीं है।

जिन्हें तत्त्व ज्ञान नहीं है, वे ही भगवान् के जन्म-कर्म के जागतिक होने की धारणा करते हैं – उनके श्रीअंग को पांचभौतिक (साधारण) मानते हैं, उन्हें जन्म-मृत्यु के अधीन समझते हैं। इस प्रकार की जागतिक बुद्धि या दुर्बुद्धि के कारण ही उनकी संसार दशा दूर नहीं होती – वे पुनः पुनः जन्म एवं मृत्यु को वरण (धारण) करने के लिए मजबूर होते हैं।

भगवान् ने स्वयं ही कहा है, मेरा जन्म ‘दिव्य’ अर्थात् अप्राकृत है। श्रीरामानुजाचार्य ने इस ‘दिव्य’ शब्द का अर्थ किया है – अप्राकृत । मधुसूदन सरस्वती – जो ‘अद्वैतसिद्धि’ ग्रन्थ के रचयिता हैं और बाद में, जिन्होंने श्रील जीव गोस्वामी के शिक्षा के प्रभाव से अद्वैतवाद का परित्याग किया था, उन्होंने भी इस प्रकार का ‘अप्राकृत’ शब्द का अर्थ ही स्वीकार किया है। श्रील श्रीधर स्वामी ने भी दिव्य ‘शब्द’ में ‘अलौकिक’ अर्थ को लिया है। अतएव श्रीकृष्ण के जन्म के साथ लौकिक विचार की दृष्टि से शुक्र-शौणित (पुरुष और स्त्री के संसर्ग से उत्पन्न होने) का कोई सम्बन्ध नहीं है तथा वे किसी पंचभौतिक देह से युक्त भी नहीं थे। वे नित्य ‘सच्चिदानन्द-विग्रह’ हैं एवं वे जब जड़ प्रकृति के अन्तर्गत अवतीर्ण होते हैं; तब भी वे वही ‘सच्चिदानन्द-विग्रह’ ही रहते हैं। यही उनका अजत्व (अजन्मा) और अव्ययत्व (मृत्युहीनत्व) होना है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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