नामग्रहण-विचार
गदाइ गौराङ जय जाह्नवा – जीवन ।
सीताद्वैत जय श्रीवासादि भक्तगण ।।
महाप्रेमे हरिदास करेन रोदन ।
प्रेमे ता रे गौरचन्द्र दिला आलिङ्गन ।।
बलेन, तोमार सम भक्त कोथा आर।
सर्वतत्त्वज्ञाता तुमि सदा मायापार ।।
श्रीगदाधर पंडित, श्रीगौरांग महाप्रभु व श्रीजाह्नवा देवी जी के जीवन स्वरूप श्रीनित्यानन्द जी की जय हो। सीतापति श्रीअद्वैताचार्य जी और श्रीवास आदि भक्तों की सर्वदा ही जय हो।
हरिनाम करते – करते हरिदास ठाकुर जी हरिनाम के प्रेम में विभोर होकर रो रहे थे। श्रीहरिदास ठाकुर जी को इस प्रकार प्रेम में डूबा देखकर श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने हरिदास ठाकुर जी को आलिंगन कर लिया और कहने लगे – हरिदास ! तुम्हारे जैसा भक्त मुझे और कहाँ मिलेगा, सचमुच तुम सब शास्त्रों के सार को जानने वाले हो तथा तुम हमेशा ही माया से परे हो।
अनन्य भजन की श्रेष्ठता
निचकुले अवतरि’ देखा ‘ले सकले।
धने माने कुले शीले कृष्ण नाहि मिले ।।
अनन्य भजने याँ’र श्रद्धा अतिशय ।
देवता अपेक्षा श्रेष्ठ सेइ महाशय ।।
नीचकुल में आकर तुमने सभी को दिखाया कि धन-दौलत, मान-सम्मान, ऊँचे कुल तथा शालीनता आदि से श्रीकृष्ण की प्राप्ति नहीं होती। भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी कहते हैं कि हे हरिदास ! वैसे भी अनन्य श्रीकृष्ण – भजन में जिसकी प्रगाढ़ श्रद्धा होती है, वह तो देवताओं से भी अधिक श्रेष्ठ है।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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भक्तों के अनुगत होना अति आवश्यक है
कृष्ण के इन्द्रियतर्पण में विघ्नकारी किसी भी व्यक्ति का कृष्णराज्य में प्रवेश का अधिकार नहीं है। इसलिए हम कभी भी ऐसे लोगों का आनुगत्य नहीं करेंगे । हम किसी को भी अपने ऊपर प्रभुत्व नहीं करने देंगे । एकमात्र विष्णु एवं उनके सेवकवर्ग ही हमारे ऊपर सम्पूर्णरूप से अपना प्रभुत्व करेंगे । यदि हम उदारता के नाम पर विष्णु एवं वैष्णवों के अतिरिक्त दूसरे किसी व्यक्ति को अपने ऊपर शासन करने दें या गुरु-कृष्ण के साथ दूसरे किसी की समानता करेंगे, तो हमें समझ लेना चाहिए कि निश्चय ही माया ने हमारे ऊपर अपना प्रभुत्व जमा लिया है। हम तथाकथित मुक्ति को पैरों की ठोकर से दूर करेंगे । सायुज्य मुक्ति तो अपराध की पराकाष्ठा है । मायावादी अपराधी होते हैं । अतः वे कदापि कृष्णनाम उच्चारण नहीं कर सकते । वह कृष्णनाम उच्चारण का जो अभिनय करते हैं, उससे कृष्ण के अंग बिंध जाते हैं। हम कुतर्क को ही अपना गन्तव्य विचार नहीं करेंगे। हम तर्क के द्वारा अपने वचनों का उपसंहार नहीं करेंगे। हम तर्क के द्वारा कभी भी तर्कातीत वस्तु की उपलब्धि नहीं हो सकती। इसलिए श्रीहरि की कथाओं को जानने के लिए तर्क को छोड़कर उनके भक्तों के अनुगत होना अति आवश्यक है । हम सर्वदा समस्त अवस्थाओं में समस्त इन्द्रियों के द्वारा श्रीहरि के दास्य में नियुक्त रहेंगे । हम आध्यक्षिक नहीं होंगे और आध्यक्षिकों का आनुगत्य भी नहीं करेंगे।
श्रीलप्रभुपाद
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“जीव चेतन होने पर भी तमाम चेतनों का कारण-चेतन नहीं है।”
‘कारण-चेतन’ या ‘पूर्ण-चेतन’ किसी के लिए भी नहीं होता, जबकि पक्षान्तर में समस्त वस्तुयें उनके लिये हैं। जीव पूर्ण-चेतन से निकला उसकी शक्ति का एक परमाणु है, इसीलिये निर्भर शील है। सर्वकारण-कारण-परिपूर्ण-चिद्वस्तु- भगवान् की सत्ता से ही जीव की सत्ता है।
जीव की सत्ता से भगवान् की सत्ता नहीं है। श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने जीव के स्वरूप के बारे में बतलाते हुये कहा है–
“जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर नित्यदास ।
कृष्णेर तटस्था शक्ति भेदाभेद प्रकाश” ॥
(चै.च.म.20/108)
श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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‘कृष्ण’ शब्द से गुरुदेव सहित श्रीकृष्ण को समझा जाता है
शास्त्रों में गुरुदेव को ‘साक्षात् कृष्ण’ मानने का निर्देश दिया गया है। इस निर्देश का उद्देश्य है कि, -कृष्ण से उनकी शक्ति को अलग नहीं किया जा सकता है इसीलिए वे एक ही वस्तु हैं। ‘कृष्ण’ कहने पर ही गुरुदेव सहित श्रीकृष्ण को समझा जायेगा। गुरु-शून्य (गुरु से अलग) कृष्ण की सत्ता नहीं है। इसीलिए श्रील कविराज गोस्वामी ने कहा है, “ताते कृष्ण भजे, करे गुरुर सेवन। मायाजाल छुटे, पाय कृष्णेर चरण।।” अर्थात् गुरुसेवा करने से कृष्णसेवा होती है और कृष्णसेवा करने से गुरुसेवा होती है। कोई शायद इस कविता के दूसरे छंद के आधार पर कह सकता है कि, ‘गुरुसेवा करने से माया के हाथों से मुक्ति मिलेगी और माया के हाथ से मुक्ति मिलने पर, कृष्ण-चरण प्राप्त करूँगा। इसलिए यहाँ कृष्ण-चरण प्राप्ति ही मूल है। कृष्ण की प्राप्ति हो जाने पर, गुरु की अब आवश्यकता नहीं है। साध्यवस्तु की प्राप्ति हो जाने पर साधन की जरूरत नहीं रहती।’ इस प्रकार का विचार मायावादियों का है, वैष्णवों का नहीं। कृष्णसेवा और गुरुसेवा दोनों ही नित्य सनातन और एक दूसरे से ओतप्रोत भाव से सम्बन्ध ायुक्त हैं। कृष्णसेवा देखने पर गुरुसेवा प्रतीत होगी और गुरुसेव्रा देखने पर कृष्णसेवा प्रतीत होगी। इसमें किसी प्रकार का भेद रहने पर समझना होगा कि, सेवक की सेवा-वृत्ति का पूर्ण विकास नहीं हुआ है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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मैं नमक से जला हुआ या बिना नमक का – दोनों प्रकार का भोजन लेने में अभ्यस्त हूँ। मैं प्रसाद पाता हूँ, इसीलिए जानता हूँ कि, उसका दोष-गुण विचार करने से अपराध होता है।
श्रील भक्ति वेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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