एकमात्र भगवान् की प्रसन्नता के लिए नृत्य एवं गायन

एक बार गुरु महाराज अमृतसर में प्रचार के उद्देश्य से गए हुए थे तथा हरिकथा का आयोजन नमक मण्डी में स्थित किसी मन्दिर में किया गया था। कथा के पश्चात् गुरु महाराज ने श्रीकृष्णबलराम के अत्यधिक सुन्दर तथा आकर्षक विग्रहों का दर्शन किया तथा उनके दर्शन से हृदय में कृष्ण-प्रेम की उद्दीपना होने के कारण जगत् की सुध-बुध खो बैठे व्यक्ति की भाँति बहुत देर तक भावविभोर हो कर नृत्य तथा गान किया।

उनके महापुरुषोचित दिव्य कलेवर तथा उनकी भाव-भङ्गिमाओं को देख कर उपस्थित भक्त-सज्जन मण्डली मन्त्र-मुग्ध हो गई।

दूसरे दिन मन्दिर के कर्तृ-पक्ष ने हरिकथा के उपरान्त, गुरु महाराज द्वारा पुनः नृत्य-कीर्त्तन की अपेक्षा में, अत्यधिक शीघ्रता एवं उत्साहपूर्वक अनेक बल्ब जलाए। गुरु महाराज के गत दिवस किए गए नृत्य-कीर्त्तन के स्थान को रस्सियों से घेर दिया। उनके नृत्य दर्शन की अपेक्षा में सब ओर से लोग भर गए। जिन लोगों ने गुरु महाराज के नृत्य-कीर्त्तन के दर्शन किए थे वे उसे देखने के लिए अन्य लोगों को भी अपने साथ लाए किन्तु उस दिन गुरु महाराज ने जय-ध्वनि देकर ही कार्यक्रम को विराम दे दिया।

सहारनपुर में भी अमृतसर जैसी उक्त घटना की पुनरावृत्ति हुई। एक दिन गुरु महाराज ने अति आनन्द में भरकर नृत्य-कीर्त्तन किया। अगले दिन सर्वत्र प्रचार हो गया कि नृत्य परम रमणीय एवं दर्शन करने योग्य है। इसी कारण अगले दिन अनेक लोगों का समागम हुआ। जब गुरु महाराज को बताया गया कि आज अधिकांश लोग आपके नृत्य का दर्शन करने के लिए आए हैं। अतः आप कार्यक्रम का आरम्भ नृत्य-कीर्त्तन से कीजिए, तब उन्होंने कहा, “साधु-वैष्णव इत्यादि साधारण लोगों की प्रसन्नता, उनके मनोरञ्जन के लिए नृत्य-कीर्त्तन नहीं बल्कि भगवान् की सेवा के उद्देश्य से करते हैं। लोकरञ्जन करने पर जगत् के प्रति प्रीति अर्थात् आसक्ति हो सकती है किन्तु भगवान् की भक्ति नहीं होगी। उससे विवेकरहित व्यक्तियों की प्रशंसा आदि की प्राप्ति, उनसे प्रतिष्ठा रूपी शूकर की विष्ठा आदि के लोभ से किया गया नृत्य-कीर्त्तन, हरि भक्ति के अनुकूल नहीं बल्कि सम्पूर्ण रूप से प्रतिकूल एवं त्रैयात्रिक (जड़ीय नृत्य-गीत वाद्य यन्त्रों के बजाने) में ही गण्य है।”

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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पापों में मति होने से ही नामापराध होता है

संसारी मानव येवा आचरये पाप।
प्रायश्चित्त आछे तार आर अनुताप ।।

किन्तु नामबले यदि पापे करे मति।
प्रायश्चित्त नाहि ता’र बड़इ दुर्गति ।।

बहुयमयातनादि पाइलेओ ता’र।
सेइ अपराध हइते ना हय उद्धार ।।

पापे मतिमात्रे हय एरूप यन्त्रणा।
पापाचारे यत दोष ता’र कि गणना ।।

संसारी व्यक्ति जब पाप करता है तो उसके लिए प्रायश्चित तथा पश्चाताप का विधान है परन्तु यदि कोई यह सोचकर कि मेरे द्वारा किया गया हरिनाम मेरे पाप धो डालेगा, ऐसे हरिनाम के बलबूते पर पाप करने की भावनाओं को हृदय में रखने से उसका कोई प्रायश्चित नहीं है, उसकी तो दुर्गति ही होगी। यहां तक की बहुत तरह की नरक यन्त्रणाओं में कष्ट पाने पर भी उसका उद्धार नहीं होता।

मन में पाप की भावना आने से जब इतना कष्ट मिलता है तो नाम के सहारे पाप कर्म करना कितना बड़ा दोष है, उसके बारे में भला क्या कहा जाये।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि