असावधानी वश यदि पाप हो जाता है तो उसके प्रायश्चित की कोई आवश्यकता नहीं रहती
यदि कभु प्रमादे घटय कोन पाप।
भक्त तबु नाहि सहे प्रायश्चित्त ताप ।।
से पाप क्षणिक, नाहि पाय अवस्थिति।
नामरसे भेसे याय, ना देय दुर्गति ।।
किन्तु यदि कोन जन नामे करि’ बल।
आचरे नूतन पाप, से जन चन्चल ।।
से केवल कपटता करिया आश्रय।
नाम – अपराधे पाय शोक मृति भय ।।
प्रमाद घटना आर विचारितकर्म।
सम्पूर्ण प्रभेद आछे भक्तिशास्त्रमर्म ।।
श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि यदि कभी किसी भक्त से प्रमाद वश अथवा असावधानीवश कोई पाप हो जाये तो उसे उसके लिए प्रायश्चित की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह पाप तो क्षणिक है। वह ज्यादा समय तक भक्त के पास टिक नहीं सकता। वह क्षणिक पाप तो हरिनाम के रस के प्रवाह में बह जाता है। इसलिए असावधानीवश भक्तों के द्वारा हुये किसी भी पाप से उनकी दुर्गति नहीं होती।
परन्तु यदि कोई चंचल व्यक्ति हरिनाम के बल पर नये-नये पाप करता चला जाता है तो उसकी ये क्रिया केवल मात्र कपटता ही होगी क्योंकि इसमें उसने कपटता का आश्रय लिया हुआ है अर्थात् यदि कोई व्यक्ति यह सोच कर नये-नये पाप करता रहे कि हरिनाम के प्रभाव से मेरे समस्त पाप नष्ट हो जायेंगे तो वह कपटी है। नामापराध से व्यक्ति को शोक एवं मृत्यु रूपी भय की प्राप्ति होती है। भक्ति शास्त्रों के अनुसार असावधानी और जानबूझ कर किये जानेवाले पापों में ज़मीन – आसमान का अन्तर है।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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जिस प्रकार, वृक्ष की जड़ में पानी देने से वृक्ष की टहनी, फूल पत्ता व तना इत्यादि सब तृप्त हो जाते हैं; जिस प्रकार पेट में खाना देने से पूरा शरीर व सब इन्द्रियाँ तृप्त हो जाती हैं, उसी प्रकार सब कारणों के कारण, सभी प्राणियों के साथ सम्बन्धयुक्त अद्धयज्ञानतत्व, सर्वव्यापक, अच्युत, श्रीहरि की सेवा के द्वारा सभी प्राणियों की सेवा या तृप्ति हो जाती है।
श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी