हरिनाम के द्वारा पिछले पाप तथा पापों की गन्ध भी अति शीघ्र दूर हो जाती है

पूर्व दुष्टभाव ता’र क्रमे हय क्षीण।
पवित्र स्वभाव शीघ्र हइवे प्रवीण ।।

एइ सन्धिकाले पूर्वपापेर सम्बन्ध।
थाकितेओ पारे किछुदिन पापगन्ध ।।

नामेर संसर्ग यत सुमति उदय ।
ह’ये सेइ पापगन्ध शीघ्र करे क्षय ।।

प्रतिज्ञा करे’छ नाथ अर्जुन – निकटे।
मोर भक्त कभु नाहि पड़िवे संकटे ।।

संकट-समये आमि हइव सहाय।
अतएव पाप याय तोमार कृपाय ।।

ज्ञानमार्गी कष्टे पाप करिया दमन।
तवाश्रय छाड़ि शीघ्र हयत पतन ।।

तव पदाश्रय या’र सेइ महाजन ।
विघ्न ना पाइवे कभु सिद्धान्त – वचन ।।

निरन्तर हरिनाम करते रहने से पहले के जो दुष्ट भाव हैं, वे धीरे-धीरे क्षीण होते चले जाते हैं और उनके स्थान पर साधक के हृदय में पवित्र स्वभाव प्रकटित होने लगता है। जब हरिनाम में थोड़ी थोड़ी रुचि उत्पन्न हो रही होती है, ऐसे समय में अर्थात् पापमय जीवन एवं हरिनाम के आश्रय में जीवन के सन्धिकाल में कभी -कभी पिछले पापों की कुछ गन्ध रह जाती है। किन्तु निरन्तर हरिनाम करते रहने से या यूँ कहें कि श्रीहरिनाम के प्रभाव से उसके हृदय में विद्यमान पूर्व पापों की वह गन्ध भी शीघ्र ही समाप्त हो जाती है और जीव की भगवद् – भक्तिमय मति उदित हो जाती है।

श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपने महाभारत के युद्ध के समय अर्जुन के सामने प्रतिज्ञा की थी कि मेरा भक्त कभी भी संकट में नहीं पड़ेगा और यदि कभी किसी कारणवश ऐसा हुआ भी तो आप स्वयं उस की रक्षा करेंगे। यही कारण है कि हरिनाम करने वाले के तमाम पाप आपकी कृपा से खत्म हो जाते हैं, जबकि ज्ञानमार्गी व्यक्ति पापों से छुटकारा पाने के लिए बहुत प्रयत्न करता है परन्तु आपका आश्रय छोड़ने के कारण उसका शीघ्र ही पतन हो जाता है। अतः हे प्रभु! ये सिद्धान्त है कि जो आपके चरणाश्रित है, ऐसे भक्त के निकट विघ्न कभी नहीं आते।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि