नवम् परिच्छेद

हरिनाम के बलबूते पर पाप करना

नाम्नो बलाद् यस्य हि पापबुद्धि नविद्यते तस्य यमैहि शुद्धिः ।

गौरगदाधर जय जाहवा – जीवन ।
जय जय सीताद्वैत जय भक्तगण ।।

श्रीगदाधर जी, श्रीगौरांग, महाप्रभु एवं श्रीमती जाह्नवा देवी जी के जीवन-स्वरूप श्रीनित्यानन्द जी की जय हो। सीतापति श्रीअद्वैताचार्य जी और श्रीवास आदि जितने भी भक्त हैं सभी की जय हो, जय हो।

नाम ग्रहण करने से सभी प्रकार के अनर्थ दूर होते हैं

हरिदास बले, नाम – शुद्ध सत्त्वमय ।
भाग्यवान् जीव करे नामेर आश्रय ।।

अति शीघ्र ताहार अनर्थ दूरे याय।
हृदय – दौर्बल्य आर स्थान नाहि पाय ।।

नामे दृढ़ हैले नाहि हय पापे मति।
पूर्वपाप दग्ध हय, चित्त शुद्ध अति ।।

पाप आर पापबीज, पापेर वासना।
अविद्या ताहार मूल ए तिन यन्त्रणा ।।

सर्वजीवे दया आसि’ हइवे उदय।
जीवेर मंगल – चेष्टा सतत करय ।।

जीवेर सन्ताप कभु सहिते ना पारे।
याहे परताप याय, ता’र चेष्टा करे ।।

विषयपिपासा अति तुच्छ मने हय।
इन्द्रियलालसा ता’र चित्ते नाहि रय ।।

कनककामिनी – चेष्टा-प्रति घृणा करे।
यथा धर्मलाभे तुष्ट थाकि’ प्राण धरे ।।

भक्ति – अनुकूल सब करये स्वीकार।
भक्तिप्रतिकूल नाहि करे अंगीकार ।।

कृष्ण रक्षाकर्त्ता एकमात्र बलि’ जाने।
जीवने पालनकर्त्ता कृष्ण, इहा माने ।।

अहं मम बुद्धयाशक्ति ना राखे हृदये।
दीनभावे नाम लय सकल समये ।।

स्वभावतः या’र एइरूप नामाश्रय।
पापे मति पापाचार ताहार कि हय ।।

नामाचार्य श्रील हरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि श्रीहरिनाम शुद्ध सत्वमय हैं और भाग्यवान जीव ही श्रीहरिनाम का आश्रय लेते हैं। हरिनाम के प्रभाव से जीव के हृदय में भरे हुये सारे अनर्थ अति शीघ्र दूर हो जाते हैं। हृदय की दुर्बलता नामक अनर्थ का तो उनके मन में स्थान ही नहीं रहता। हरिनाम के जप से साधक के मन में जब दृढ़ता आती है तब उसमें पापमय – बुद्धि नहीं रहती। यहाँ तक कि, हरिनाम के प्रभाव से उसके सारे पिछले पाप भी नष्ट हो जाते हैं और उसका चित्त बिल्कुल शुद्ध हो जाता है। अज्ञान के कारण पाप बीज तथा पाप की वासना जीव के हृदय में रहती है, उसके कारण जीव संसार में कष्ट भोगता रहता है। नाम जप के द्वारा जब किसी का हृदय निर्मल हो जाता है तो उसके अन्दर सभी जीवों के प्रति दया भाव उदित होता है और वह सदा-सर्वदा दूसरों का मंगल करने में ही लगा रहता है। उससे दूसरों का कष्ट नहीं देखा जाता। उसकी हर समय यही चेष्टा होती है कि वह कैसे दूसरे जीवों के क्लेश से उत्पन्न ताप को शान्त कर सके। ऐसी स्थिति में विषय वासना तो उसे बिल्कुल तुच्छ सी प्रतीत होती है। इन्द्रियों के भोगों की लालसा तो उसके हृदय में रहती ही नहीं। धन-दौलत और कामिनी के प्रति वह आकर्षित तो होता ही नहीं, उन्हें प्राप्त करने के लिए वह प्रयास तो करता ही नहीं, बल्कि इन सबसे वह घृणा करने लगता है। संसार में रहने के लिए ईमानदारी से जितना भी वो धन कमा पाता है, उसी में उसको सन्तोष रहता है। उसकी वास्तविक चेष्टा तो भगवान की भक्ति के अनुकूल कार्यों को करने में तथा भक्ति के प्रतिकूल कार्यों को त्यागने में ही रहती है। श्रीकृष्ण ही उसके एकमात्र रक्षाकर्त्ता एवं पालनकर्त्ता हैं, इस प्रकार का ढ विश्वास उसमें होता है। उसके हृदय में शरीर के प्रति “मैं” भाव तथा शरीर सम्बन्धी व्यक्तियों तथा वस्तुओं में “ममता” नहीं रहती। स्वाभाविक रूप से वह तो बड़ी दीनता के साथ हमेशा ही हरिनाम का आश्रय लिए रहता है। ऐसे में उसकी पापों में मति कैसे हो सकती है या ऐसी अवस्था में उसके द्वारा पाप भला कैसे हो सकते हैं।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि