श्रीहरिनाम की शक्ति, ज्ञान एवं कर्म की शक्ति की अपेक्षा अनन्त गुणा अधिक है

नामनामी एक, नामे दिया सर्वशक्ति।
सर्वोपरि करियाछ तव नामभक्ति ।।

तुमि त’ स्वतन्त्र तत्त्व सर्वशक्तिमान्।
तोमार इच्छाय यत विधिर विधान ।।

कर्मके क रेछ जड़, आर ब्रह्मज्ञाने।
दियाछ निर्वाणशक्ति स्वतन्त्र विधाने ।।

इच्छामय तुमि प्रभु, स्वीय नामाक्षरे।
अर्पियाछ सब शक्ति आर के कि करे ।।

अतएव तब नाम सर्वशक्तिमान्।
नामे अर्थवाद नाहि करिवे विद्वान् ।।

नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी को कहते हैं कि नाम और नामी एक ही हैं। हे प्रभु! आपने अपने नाम में तमाम शक्तियों का समावेश करके श्रीहरिनाम संकीर्तन को सर्वश्रेष्ठ भक्ति बना दिया है। हे प्रभु! आप पूर्ण स्वतन्त्र हैं तथा सर्वशक्तिमान हैं। आपकी इच्छा से ही विधि का विधान चलता है। आपने अपनी इच्छानुसार कर्म को जड़ बनाया है अर्थात् कर्म से केवल दुनियावी वस्तुओं की ही प्राप्ति हो सकती है जबकि आपने ही ज्ञान में मोक्ष प्रदान करने की शक्ति भर दी है। हे प्रभु! आप स्वतन्त्र इच्छामय हो। आपने अपने नामाक्षरों में सारी की सारी शक्तियाँ भर दी हैं, इसीलिए आपका नाम भी आपकी ही तरह सर्वशक्तिमान है। अतः जो बुद्धिमान पुरुष हैं, वे नाम में अर्थवाद नहीं करते।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि

_ _ _ _ _ _ _

घमण्ड से भगवान् को नहीं जाना जा सकता, कारण, वे unchallengable truth हैं। उनका न तो कोई कारण है, न कोई उनके समान है, उनसे अधिक होने का तो प्रश्न ही नहीं है। अतः उन भगवान् को जानने के लिये उनकी कृपा के अतिरिक्त किसी अन्य उपाय को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज