
श्रीहरिनाम चिन्मय हैं, उनमें अर्थवाद हो ही नहीं सकता
नाम सेइ आत्मरति निजे उपस्थित ।
साधनकालेते साध्यवस्तुर विहित ।।
कर्मर चरम फल नामरस हय।
साधुरूपे अनुष्ठित कर्मते निश्चय ।।
अतएव चौदहलोक भ्रमिया ब्राह्मण।
येइ फल नाहि पान, नाम ताहा हन ।।
नामफल सर्वोपरि अवश्य हइवे।
कर्मी ज्ञानी हिंसा करि’ नामे कि करिवे ।।
श्रीहरिनाम करने से आत्म साक्षात्कार व आत्मरति स्वतः ही हो जाती है। साधनकाल में ही हरिनाम साध्य – वस्तु का कुछ अनुभव करवा देते हैं। निष्काम – कर्म का चरमफल, हरिनाम में रुचि उत्पन्न होना है। सत्य वस्तु के लिए किया गया निष्काम कर्म निश्चित रूप से हरिनाम के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करता है। हरिनाम उस फल को, बड़ी सरलता एवं शीघ्रता से प्रदान करते हैं, जोकि चौदह लोकों में भ्रमण करने वाला ब्राह्मण भी प्राप्त नहीं कर सकता। प्रत्येक दृष्टि से हरिनाम का फल सर्वोपरि ही होगा कर्मी व ज्ञानी अपनी ईर्ष्या के कारण जितना भी प्रयास क्यों न कर लें वे नाम की महिमा का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
_ _ _ _ _ _ _ _ _ _
मेरी जो पूजा कर सकता है, स्तव, स्तुति कर सकता है अर्थात् मेरी तारीफ करता है या अपने दुनियावी स्वार्थों के लिये मेरी खुशामद करता है, उसका संग मेरे लिये हितकर नहीं है। जो शासन करता है, नियन्त्रण करता है, मेरी गलतियाँ दिखाता है; उसका संग ही मेरे लिये हितकर है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
_ _ _ _ _ _ _ _ _ _
साधक के लिए गुरु-तत्त्व का गुरुत्व
श्रीभगवान् ही गुरु के रूप में वास्तविक पथ दिखाते हैं, वे ही अन्तर्यामी रूप से साधक-साधिका के हृदय में प्रेरणा प्रदान करते हैं। इस प्रकार से सद्गुरु की प्राप्ति होती है और उनके आश्रय में वास्तव गंतव्य-स्थान (मंज़िल) की प्राप्ति होती है। उनके अयाचित मंगलदायक करकमलों के स्पर्श से दिव्यरत्न स्पर्शमणि-स्वरूप मुरलीधर श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। दिव्य ज्ञान प्राप्त होने से साधन मार्ग की सीढ़ियाँ चढ़कर क्रमशः ही उन्नत अवस्था में पहुँचा जा सकता है। साधक-साधिका का यथासर्वस्व और एकमात्र अवलम्बन वही शब्दब्रह्म और परब्रह्म में निष्णात- सद्गुरुदेव हैं, जिनको त्याग करने पर साधन-भजन विफल हो जाता है। इसीलिए ही भागवत में कहा गया है, “दुर्लभ मनुष्य जन्म में मनुष्य शरीर भजन का मूल और उपयुक्त नौका है; सद्गुरु ही इसके कर्णधार (केवट) हैं और भगवान् की कृपा रूपी अनुकूल वायु के द्वारा यह सुपरिचालित होती है।” अतः “आश्रय लइया भजे, तारे कृष्ण नाहि त्यजे, आर सब मरे अकारण” (आश्रय लेकर जो भजन करता है उसे कृष्ण त्याग नहीं करते, अन्य सब अकारण ही मर जाते हैं) वाक्य में आश्रित-अनाश्रित के अधिकार और दोनों के परिणाम में विपरीतता को दिखाया गया है। अतएव साधन मार्ग की सीढ़ी या सहारा हैं परम सत्य-स्वरूप सद्गुरु, जिनकी सहायता के बिना भजन-पिपासु व्यक्तियों की एक कदम भी चलने की क्षमता नहीं है। संक्षेप में कहा जाये तो गुरु-तत्त्व ही साधक-साधिका का भजन-साधन, पूजा-अर्चन, जीवन-सर्वस्व, वास्तव-पथ-निर्देशक, रक्षाकर्त्ता और परम-बान्धव हैं।
श्रील भक्ति वेदान्त वामन गोस्वामी महाराज