श्रीहरिनाम का फल सत्य है

कर्मकाण्डे आछे त’ कैतव स्वार्थज्ञान।
भक्तितत्त्वे नामे ताहा नहे विद्यमान ।।

कर्मकाण्डे फलश्रुति रोचनार्थ जानि।
भक्तितत्त्वे फलश्रुति नित्य सत्य मानि ।।

नामतत्त्वे शाम्य नाहि पाय कभु स्थान।
निजेर नाहिक स्वार्थ नाम करि’ दान ।।

कर्मकाण्ड में जैसी कपटता व स्वार्थबुद्धि भरी पड़ी है, वह भक्तितत्त्व में अर्थात् श्रीहरिनाम में नहीं है। श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि मेरा ऐसा मानना है कि कर्मकाण्ड में रुचि उत्पन्न करने के लिए उसमें बहुत तरह के फलों का प्रलोभन दिया गया है परन्तु भक्तितत्त्व में वर्णित फल, मात्र प्रलोभन नहीं, वरन् नित्य-सत्य हैं। श्रीहरिनाम के समान कुछ भी नहीं है तथा श्रीहरिनाम देने वालों का अपना कोई भी स्वार्थ नहीं होता।

नामदान श्रद्धावाने येइ जन करे।
कृष्णदास्य करे सेइ स्वार्थपरिहारे ।।

कर्म कराइले याजकेर अर्थलाभ।
अतएव ताहे कैतवेर त’ प्रभाव ।।

वेद-स्मृति नाम फल अनन्त बाखाने।
स्वार्थबुद्धि शून्य से ये ताहा नाहि माने ।।

कर्म सब शुभाशुभ जड़ेर आश्रये।
जड़मयफल याचे यजमानचये ।।

कर्मफल दूरे फेलि’ येवा करे कर्म।
हृदय विशुद्ध ता’र हय एइ मर्म ।।

विशुद्ध हृदये आत्मरति सुनिर्मल ।
उदय हड्या हय क्रमशः प्रबल ।।

जो श्रद्धावान व्यक्ति को श्रीहरिनाम प्रदान करते हैं, वह ऐसा करके श्रीकृष्ण – भक्ति ही करते हैं जबकि कर्मकाण्ड के यज्ञ कराने वालों को धन का लोभ रहता है। इसलिए उसमें कपटता का प्रभाव आ ही जाता है। वेद व स्मृतियाँ भगवान के नाम के फल की अनन्त महिमा का बखान करती हैं परन्तु स्वार्थी व्यक्ति इसे नहीं मानते। कर्मकाण्डी व्यक्ति हरिनाम करते हुए बहुत प्रकार के शुभ व अशुभ सांसारिक फलों की इच्छा रखते हैं। फल की कामना को त्याग कर जो कर्म करते हैं, उनका हृदय विशुद्ध हो जाता है तथा विशुद्ध – हृदय में ही सांसारिक विषयों से वैराग्य तथा आत्मतत्त्व में अनुराग उदित होता है। धीरे-धीरे यह अनुराग ही प्रगाढ़ प्रेम में परिवर्तित हो जाता है।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि