श्रीश्रीगुरुगौरांगौ जयतः
श्रीरंगक्षेत्र, (त्रिची) मद्रास;
५ दिसंबर, १९२६।
[ श्रीउडुपि-क्षेत्र दर्शन की इच्छा — भक्त-विरह — श्रीमद् मधुसूदन गोस्वामी प्रमुख वृन्दावनवासियों द्वारा प्रभुपाद के श्रीमुख से हरिकथा श्रवण — वैधी और विप्रलम्भ-सेवा का तारतम्य-विश्लेषण — श्रीराधाकृपा के बिना श्रीकृष्ण-माधुर्य-रस में प्रवेश की असंभावना — ‘नदीया-नागरी’-मतवाद — अनुज्ज्वल मधुर रस का ‘स्वकीय’-विचार में अवस्थान — सार्वभौम गोस्वामी द्वारा प्रभुपाद के वक्तव्य की प्रशंसा। ]
स्नेहविग्रहेषु—
मथुरा से २४ कार्तिक को आपको जो पत्र लिखा था, उसके बाद का भ्रमण-वृत्तांत आप जानना चाहते थे। इन दिनों श्रीमान् रामविनोद के विरह में अत्यधिक कातर रहने के कारण पत्र नहीं लिख सका। उनका अकस्मात श्रीव्रजधाम गमन हो जाएगा, यह न जानने के कारण यात्रा स्थगित करके श्रीगौड़ीयमठ लौटने का विचार किया था; किंतु उडुपि-क्षेत्र दर्शन के आकर्षण से स्वयं को न रोक पाने के कारण दक्षिण भारत के कुछ स्थानों के दर्शन किए। कई स्थानों के अन्वेषण और दर्शन की अभिलाषा थी, किंतु श्रीगौरसुन्दर की इच्छा स्वतंत्र है, अतः मुझ जैसे गौर-विमुख जन के भाग्य में वह घटित न हो सका। आर्यावर्त में जगह-जगह भ्रमण से शारीरिक अस्वस्थता तथा श्रीरामविनोद का इस धराधाम से महाप्रयाण आगे की यात्रा में बाधा स्वरूप उपस्थित होने से अब शीघ्र ही श्रीश्रीगौड़ीयमठ लौटने का निश्चय किया है। पिछले पत्र में मथुरा पहुँचने तक का वृत्तांत लिखा था, उसके बाद की घटनाओं का अब संक्षेप में उल्लेख कर रहा हूँ।
मैं २६ कार्तिक शुक्रवार को पुनः श्रीवृन्दावन गया। पूर्व दिवस ‘श्रीराधारमण-घेरा’ के अंतर्गत श्रीश्यामरमण-मंदिर में श्रील वन महाराज और श्रील तीर्थ महाराज का व्याख्यान हुआ था। मैं उस दिन उपस्थित नहीं हो सका। दोपहर में श्रीकृष्णगोपाल दीक्षित ने श्रीनृसिंहदास-कुञ्ज के महन्त श्रीगौड़दास से मेरा परिचय कराया। श्रीगौड़दास ने अपने कुञ्ज का समस्त भार हमें ग्रहण करने का विशेष अनुरोध किया; मैंने उनके प्रस्ताव का अनुमोदन किया। शाम को श्रीश्यामाचरण-मंदिर में तीर्थ महाराज के व्याख्यान के पश्चात् श्रीयुक्त मधुसूदन गोस्वामी सार्वभौम और उपस्थित अनेक गौड़ीय भद्रजनों ने मुझसे कुछ हरिकथा कहने का अनुरोध किया। उनके आग्रह की उपेक्षा न करते हुए मैंने अल्प समय के लिए कुछ विचार रखे।
उस दिन मेरे वक्तव्य का सार यह था कि मर्यादा-मार्ग पर जिस वैधी-उपासना का अनुष्ठान निष्ठावान भक्तों द्वारा किया जाता है, वह परतत्त्व-परक ही है। यद्यपि लौकिक प्रतिष्ठा से युक्त वैधी-उपासना कृष्ण के ऐश्वर्य की परिचायक है, तथापि वह स्वयंरूप की गौण उपासना मात्र है। मर्यादामयी उपासना में पूज्य तत्त्व यद्यपि श्रीकृष्ण ही हैं, तथापि वह जीव की विश्रम्भयुक्त (गाढ़ विश्वासमयी) माधुर्यमयी उपासना के समान नहीं है। उपासना-वैचित्र्य के साथ-साथ उपासक की साध्य-प्रतीति, साध्य-अनुभव और साध्य-अस्तित्व के मध्य स्थित वैशिष्ट्य तारतम्य-विचार में उपेक्षणीय नहीं है। इस विषय में मैंने कुछ शास्त्रीय विचार प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। स्वयंरूप परतत्त्व होने पर भी स्वयंरूप-प्रतीति वैधी परतत्त्व-निर्देशकों की उन्नत धारणा में ही स्थित रहती है। वैधी-भक्तों की बाह्यजगत के त्रिगुण-संबंधी परतत्त्व-विचारणा में कुछ शिथिलता होने पर भी शुद्धभक्ति-मार्ग में स्थित जन परतत्त्व सहित स्वयंरूप का सर्वदा नित्य-वैशिष्ट्य स्थापित करते हैं। स्वयंरूप से जो परतत्त्व-वैभव प्रकट होता है, मर्यादापरक विचार और मर्यादापरक वैधी-भक्तगण उसकी अनुभूति न कर पाने के कारण माधुर्यमय अनुराग-पथ में प्रवेश करने में असमर्थ रह जाते हैं। इस असमर्थता के कारण उनमें से कुछ लोग सर्वकारण-कारण, आकर-विग्रह (मूल स्रोत) स्वयंरूप व्रजेन्द्रनन्दन को ही स्वयंप्रकाश-तत्त्व का एकमात्र उत्पत्ति-स्थल मानने में अक्षम हो जाते हैं। उनके विचार में श्रौत-परम्परा (वैदिक धारा) कुछ मात्रा में उपेक्षित होने से वे कृष्ण के वैभव-प्रकाश तत्त्व को परतत्त्व-ज्ञान में स्थापित करके स्वयंरूप भूमिका को केवल वैभव-प्रकाश के विचार में ही सीमित कर देते हैं।
श्रीवृषभानुनन्दिनी (श्रीराधारानी) की कृपा के बिना श्रीकृष्ण-लीला के रस-समुद्र की एक अमृत-बूंद के आस्वादन का भी किसी को अधिकार नहीं है। इसलिए गोपी के कैंकर्य-भाव (दासी-भाव) के बिना ‘श्री’ (लक्ष्मी) और उनके अनुगत श्रीसम्प्रदाय को श्रीराधागोविन्द के सेवा-सौंदर्य के दर्शन का अधिकार नहीं मिलता।
इन सभी गूढ़ विचारों को न समझकर ही वर्तमान काल में ‘नदीया-नागरी’-सम्प्रदाय कृष्ण के वैभव-प्रकाश विग्रह का अवतार मानकर श्रीगौरसुन्दर के चरण-कमलों की वास्तविक सेवा से वंचित हो रहा है और स्वयं को ‘गौरनागरी’ आदि कल्पित अभिमान में प्रतिष्ठित कर रहा है। जड़-रस में स्थित होकर यह गौरनागरी-दल गौरसुन्दर को माधुर्य-रसाश्रय कृष्ण से पृथक रूप में स्थापित करता है; और स्वयं को कल्पित प्राकृत रस से परे मानकर कृष्णसेवा के बहाने गौरहरि के वैभव-प्रकाशपरक काल्पनिक ऐश्वर्ययुक्त नारायण-सेवा में ही व्यस्त रहता है। इसमें मधुर रस की उज्ज्वलता का सर्वथा अभाव ही दिखाई पड़ता है।
अनुज्ज्वल मधुर रस ‘स्वकीय’-विचार में अवस्थित है; अतः वह दास्य-रस का ही एक प्रकार-भेद मात्र है। कई लोग नारायण के स्वकीय वैधी पति-पत्नी-गत रस को ही भूलवश ‘मधुर रस’ समझ बैठते हैं। जिन्होंने श्रीचैतन्यचरितामृत के यथार्थ मर्म का आश्रय लिया है, वे ऐसे भ्रम से सैकड़ों-हजारों योजन दूर उज्ज्वल-रस में स्थित रहते हैं। अतः वे स्वकीय मधुर-सदृश रस को ‘विशुद्ध दास-रस’ के रूप में ही जानते हैं। दास्य-रस में दास के हृदय में गौरव, मर्यादा, विधि और विश्रम्भ (परम विश्वास) का अभाव जिस प्रकार प्रबल रहता है, उज्ज्वल-रस में माधुर्यमय विग्रह के अतिरिक्त औदार्य-लीला-विग्रह श्रीगौरसुन्दर के नित्य चिदानन्द-स्वरूप में स्थित भक्तों के हृदय में वैसा भाव प्रबल होने के स्थान पर अत्यंत विश्रम्भमय अनुराग-तत्परता परिलक्षित होती है। वैधी हृदय के भक्ताभिमानी वैष्णव ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ अथवा ‘उज्ज्वलनीलमणि’ ग्रंथ का पाठ करके मधुर-रस के प्रसंग में जो स्वकीय विचार की धारणा बना लेते हैं, वह अप्राकृत राज्य में श्रीरूपानुगत्य (श्रीरूप गोस्वामी के अनुगमन) के अभाव का ही परिणाम है। वे कहते हैं कि स्वकीय विचार से लक्ष्मी अथवा लक्ष्मीप्रिया व विष्णुप्रिया माता का श्रीगौरांग के प्रति अनुराग, अथवा श्रीसत्यभामा या श्रीकमला का द्वारकापति या परव्योमपति के प्रति आदर-भाव मर्यादा-युक्त होने से ही वह उज्ज्वल रस के विषयाश्रय का मधुर रस-सजातीय भाव है; अतः गौर-विष्णुप्रिया का स्वकीय-विचार ही उज्ज्वल रस है। परंतु रुचिप्रधान मार्ग में अनुगत अनुज्ज्वल दास-रस को भूलवश मधुर रस मान लेना यथार्थ ‘मधुर-रस’ के रूप में स्वीकृत नहीं है। श्रीसनातन गोस्वामी कृत ‘बृहद्भागवतामृत’ तथा श्रीरूप गोस्वामी कृत ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ एवं ‘उज्ज्वलनीलमणि’ का आश्रय लेने पर साधारण स्थूल आलंकारिक बुद्धि परिमार्जित हो सकती है और गौरनागरी-भाव का दुराग्रह अशास्त्रीय सिद्ध होता है।
उस दिन मुझे बहुत सी बातें कहनी थीं, किंतु वैधी-विचार के अनुसार श्रीविग्रह की सेवा का समय हो जाने के कारण मैं उन सब विषयों को विस्तार से समझाने का अवसर नहीं पा सका।
व्याख्यान का विषय अत्यंत गूढ़ और दुर्बोध होने पर भी गोस्वामी सार्वभौम महाशय ने धन्यवाद देते हुए कुछ शब्द कहे। इन सभी विषयों को पूर्ण करने का अनुरोध होने पर भी मैं अगले दिन श्रीश्यामरमण-मंदिर में उपस्थित होकर पूरी बात नहीं रख सका। किसी अन्य अवसर पर इन सब विषयों की विस्तृत विवेचना करने की अभिलाषा है। हमने उस रात्रि को श्रीराधारमण-घेरा में विश्राम किया और प्रातः काल भक्तवर डॉक्टर श्रीयुक्त बलहरिदास महाशय से कुछ वार्तालाप कर ताँगे से श्रीमथुरा लौट आए।
नित्याशीर्वादक
श्रीसिद्धान्तसरस्वती